रामवृक्ष सिंह का आलेख - सचिन का रिटायरमेंट

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आलेख सचिन का रिटायरमेंट डॉ. रामवृक्ष सिंह अंग्रेजी रिटायरमेंट के कई अर्थ हैं, जिनमें एक सो जाना भी है। दूसरा है किसी कार्य, सेवा आदि से अ...

आलेख

सचिन का रिटायरमेंट

डॉ. रामवृक्ष सिंह

अंग्रेजी रिटायरमेंट के कई अर्थ हैं, जिनमें एक सो जाना भी है। दूसरा है किसी कार्य, सेवा आदि से अवकाश ले लेना, आगे से वह कार्य न करना। आजकल क्रिकेट के खेल से रिटायर हो रहे सचिन भाई की बात खूब जोर-शोर से की जा रही है। बहुत दिनों से देश के बहुत-से लोग हाथ धोकर और सत्तू बाँधकर सचिन के पीछे पड़े हुए थे कि वे रिटायरमेंट क्यों नहीं ले रहे। उन लोगों की बातों से ऐसा लगता था कि जैसे सचिन के रिटायर होने से उन्हीं का कोई स्वार्थ सिद्ध होने वाला है, जैसे कि कुछ सरकारी विभागों में होता है। बाप के रिटायर होने पर बेटे या किसी अन्य वारिस को नौकरी मिल जाती है। सच कहें तो पिछले कुछ समय में, किस्तों में सचिन ने उन लोगों की यह मुराद पूरी की है और क्रिकेट के हर संस्करण से धीर-धीरे रिटायर हो रहे हैं। अंतिम नंबर टेस्ट क्रिकेट का है। बस अब कुछ ही दिनों में ये सब भाई लोग आराम से बैठकर अपनी थरिया में सत्तू सान कर खा सकते हैं या लोटे में उसका घोल बनाकर पी सकते हैं और तोंद पर हाथ फेरकर आराम की नींद सो सकते हैं। अब उन्हें सचिन के पीछे-पीछे दौड़ने और रिटायरमेंट-रिटायरमेंट जपने की जरूरत नहीं रहेगी। सचिन रिटायर हो रहे हैं। खेल-जगत के एक युग का अवसान हो रहा है।

लेकिन हमें यक़ीन है कि रिटायरमेंट से इतनी बेइन्तिहा मोहब्बत करने वाले भाई लोग सचिन को सकुशल रिटायर करा देने के बाद भी हाथ धोए-धोए, सत्तू की पोटली काँधे पर लादे-लादे किसी और खिलाड़ी के पीछे पड़ जाएंगे। ऐसे लोगों के एकतरफा, एक-सूत्रीय एजेंडा से हमें चिढ़ होने लगी है। हम इन महानुभावों से विनम्र अनुरोध करते हैं कि वे अपने दृष्टि-परास में थोड़ी वृद्धि करें और देखें कि केवल क्रिकेट खेलनेवालों को ही नहीं, इस देश के बहुत-से दूसरे लोगों को भी रिटायर कराने की जरूरत है। क्रिकेट खेलनेवाला तो फिर भी मैदान में पसीना बहाता है, नहीं खेलता तो पानी-तौलिया लाकर खेलनेवाले अपने साथियों को थमाता है। उनके इशारे पर दस्ताने, बैट, हेल्मेट औ पैड लिए दौड़ता है। और नहीं तो कमेंटरी करता है। यानी कुछ न कुछ तो करता ही रहता है। इसी बहाने अपने चाहनेवालों के सामने रहता है। उनके टिकट के पैसे वसूल कराता रहता है। उन्हें जीने का एक मकसद दिए रहता है।

इनके बरक्स ऐसे लाखों लोग इस देश की सरकारी सेवाओं में हैं, जो न जाने कब से कुछ भी काम नहीं कर रहे हैं, बल्कि साठ (शिक्षकों के मामले में बासठ या पैंसठ) वर्ष की वय पूरी होने का इन्तजार कर रहे हैं। काम के नाम पर बस यही एक शगल उनके पास बचा है। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज में पढ़ते थे तो हमारे एक गुरुवर ने पूरे वर्ष केवल एक दिन क्लास ली। उन दिनों वे खुद डी.लिट. कर रहे थे। पाठ पढ़ाने के नाम पर उन्होंने केवल एक सीख दी- लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ो। लेक्चर एक भी नहीं लिया। हम एकलव्य की भांति गुरुजी का पुतला अपने मन में बनाकर लाइब्रेरी के पुस्तकारण्य में बैठकर पढ़ते रहे और स्वाध्याय के दम पर विश्वविद्यालय की परीक्षा में टॉप कर गए। इसका श्रेय हिन्दू कॉलेज को ज़रूर मिलना चाहिए, क्योंकि वहाँ की हवाओं में अध्ययनशीलता थी। लेकिन रिटायरमेंट के संदर्भ में तो हम यही कहेंगे कि हमारे पूज्य गुरुवर चालीस-पचास की उम्र के दरम्यान ही पठन-कार्य से स्वतः निवृत्त हो चुके थे। अब सुनते हैं कि विश्वविद्यालय आयोग ने ऐसे नियम बना दिए हैं कि सभी गुरुजनों को नियमित रूप से कक्षा में जाकर छात्रों को पढ़ाना होगा।

मैनेजमेंट गुरुओं का सर्वस्वीकृत फंडा है- भारत भर के प्रतिष्ठानों और दफ्तरों में केवल बीस प्रतिशत लोग काम करते हैं, शेष अस्सी प्रतिशत आराम। सरकारी ही नहीं, निजी क्षेत्र के प्रतिष्ठानों में भी कार्मिकों के मामले में एक जुमला प्रसिद्ध है- मौज करेगा पगला, काम करेगा अगला। बहुत-से लोग काम के मामले में अपनी अयोग्यता, अक्षमता और अनभिज्ञता व्यक्त करके काम जैसी फालू शै से हमेशा के लिए मुक्ति पा लेते हैं और जो लोग अधिक सयाने-समझदार बनते हैं, वे जीवन भर एड़ियाँ रगड़ते रहते हैं, निकम्मे सहकर्मियों के हिस्से का भी काम करने का शाप झेलते रहते हैं। जो लोग काम नहीं करते, उनके लिए कार्यालयीन जीवन की क्या प्रासंगिकता है? वे काम के नज़रिए से तो रिटायर हो चुके हैं, किन्तु वेतन और अन्य परिलाभों की दावेदारी के लिए सदैव, अहर्निश सक्रिय रहते हैं। किसी माई के लाल में हिम्मत है तो इन अकर्मण्य सरकारी कर्मचारियों से रिटायरमेंट माँगकर दिखलाए।

फिर बारी आती है उन नेताओं की, जिनके लिए इस पेशे (अब नेतागिरी खूब ढेर सारा पैसा बनानेवाला पेशा ही तो है) में आने की तो उम्र हो सकती है, किन्तु रिटायरमेंट की कोई उम्र नहीं है। इन भाई लोगों के रिटायर होने की केवल दो सूरते हैं, या तो अल्ला मियाँ, या रामजी ही ऊपर से यमराज के हाथों परवाना भेज दें कि बहुत धमा-चौकड़ी मचा चुके, अब बचवा, जरा हियाँ आओ, तुमरी जनम भर की कमाई का पाई-पाई हिसाब-किताब करके तुमको यथा-योग्य नरक-वास दिया जाए। या फिर इहैं धरतिए पर कोई माननीय न्यायालय उनकी दशकों पहले की काली करतूतों के आधार पर ताजिराते-हिन्द की किसी धारा के तहत दस-पाँच साल कैद-ए-बा-इज्जत की सज़ा सुना दे और वे कुछ समय के लिए अन्दर होकर आगे चुनाव लड़ने की योग्यता ही खो दें।

ऐसे भाई लोगों के रिटायरमेंट की बात हम भले हिन्दुस्तानी नहीं करेंगे। क्यों? या तो हम उनसे डरते हैं या फिर  कहीं न कहीं हम खुद भी ऐसे ही हैं- उतने ही पहुँचे हुए फक़ीर, उतने ही मुर्दा-ज़मीर और उतने ही बेगैरत। तो फिर सचिन भाई ने क्या पाप किया था?  इसलिए पिछले कई वर्षों से रिटायरमेंट की गूँज-अनुगूँज के फ़िज़ाओं में होने के बावज़ूद सचिन ने अब जाकर रिटायरमेंट लिया है। वे खेल रहे थे, कोई पाप तो नहीं कर रहे थे। किसी का पैसा तो नहीं मार रहे थे। देश में जो लूट-खसूट मची हुई है, जो निकम्मापन, भ्रष्टाचार और अनाचार फैला है, उसमें तो शिरकत नहीं कर रहे थे। वे शारीरिक, मानसिक और नैतिक फिटनेस की नज़ीर पेश कर रहे थे। उनके रिटायर हो जाने के बाद ऐसी नज़ीर पेश करनेवाला कम से कम एक व्यक्ति हमारी आँखों के सामने से ओझल हो जाएगा। यदि वे किसी कमेंटरी बॉक्स में दिख जाएँ तो हम अपना सौभाग्य मानेंगे।

बहरहाल, उनसे तो आपने रिटायरमेंट माँग लिया, लेकिन जो लोग भ्रष्टाचार की नंगी तस्वीरें बने, बड़े-बड़े पदों पर काबिज हैं, देश की ढेरों संस्थाओं के सर्वेसर्वा और कर्ता-धर्ता बने बैठे हैं, उनसे रिटायरमेंट माँगने का माद्दा है आपमें? ऐसे अंगुलिमालों से कोई गौतम बुद्ध तो जाकर कहे- मैं तो रुक गया, तू कब रुकेगा?

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रचनाकार: रामवृक्ष सिंह का आलेख - सचिन का रिटायरमेंट
रामवृक्ष सिंह का आलेख - सचिन का रिटायरमेंट
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