रविवार, 3 नवंबर 2013

दीपावली की कविताएँ

राना लिधौरी


 दीपावली पर
राना लिधौरी के 5'हाइकू
    1
शुभ दिवाली,
गरीबों की लाचारी।
अमीरों की चाँदी।।
    2
माटी के दिये,
दीपावली के आते।
खुश हो लिये।।
    3
दीपक बन,
तुम अतं:मन में।
उजाला करो।।
    4
मायूस न हो,
उम्मीदों के दीप तो।
रोशन करो।
    5
तम भगाये,
आओ हम स्नेह का।
दीप जलाये।।

-राजीव नामदेव 'राना लिधौरी
संपादक 'आकांक्षा पत्रिका
 अध्यक्ष-म.प्र लेखक संघ,टीकमगढ़
शिवनगर कालौनी,टीकमगढ़(म.प्र.)
भारत,पिन:472001
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डॉक्टरचंद जैन अंकुर

कालिमा संवार दो

 इस दिवाली रात में  माँ कालिमा संवार दो
कालिमा विकार की काली माँ संवार दो
मै दिया  हूँ  तू उजाला दीप को संवार दो
दीप को संवार दो द्वीप को संवार दो
चाँद तारे लिख दिया था माथ में वो याद है
सूर्य गोल लिख दिया था माथ में वो याद है
तुम यशोदा माँ तू मेरे कृष्ण को संवार दो
 इस दिवाली  ''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''दो
कालिमा '''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''दो
विश्व राह भूमि में धूम्र है भरा हुआ
धूम्र है भरा हुआ चारोँ तरफ धुआं धुआं
 मानव विकार जल रहा हर  पर्त में है कालिमा
करुणामयी कृपा करो मातृ  द्वार खोल दो
रस कहाँ वो  रुक गया जो नाभि से मैंने पिया
अनंत द्वार खोल दो फिर से रस का धार दो
इस दिवाली '''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''दो
कालिमा '''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''दो
.
शारदे तू सार है सच में तू हि ज्ञान है
क्या करूँगा जानकर अनंत ज्ञान दर्शन
माँ तू नहीं तो जिन्दगी में जिन्दगी बेकार है
पुत्र राह देखता ह्रदय कपाट खोल कर
माँ द्वार पर प्रवेश कर मेरी चेतना संवार दो
लक्ष्मी बन कृपा करो धन धान्य को संवार दो
इस दिवाली ''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''दो
कालिमा '''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''दो
मान जो तूने दिया अभिमान है  मैंने किया
दान जो तूने दिया मै दयालु बन गया
 मुक्त हो ये भाव माँ न मुझको अहंकार दो
रक्त में तुम्ही बहो गुरु कार्य भी तुम्ही करो
देह में तुम्ही चलो कर्तव्य को सम्हाल लो
मुझको अपना प्यार दो गुरुत्व को संवार दो
इस दिवाली  ''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''दो
कालिमा ''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''दो
doctor chand jain    "ankur"
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हिमकर श्याम 

हमें मिलके करनी है तम की विदाई

धरा रोशनी में हो जैसे नहाई
दिवाली की रौनक हरेक ओर छाई

उमंगों की किरणें झलकने लगी हैं
नयी ज्योति आशा की जलने लगी हैं
रंगोली से हमने ये चौखट सजाई

पिरोई है हमने उम्मीदों की लड़ियाँ
ग़मों से ही छनकर निकलती हैं खुशियाँ
हमें मिलके करनी है तम की विदाई

है महलों में जगमग, अँधेरी है बस्ती
कहीं मौज-मस्ती, कहीं जान सस्ती
अमीरी गरीबी की गहरी है खाई

न बाकी बचे अब कहीं भी अँधेरा
न उजड़े कहीं भी किसी का बसेरा
कहीं कोई आंसू न दे अब दिखाई

नहीं मिट सकी है जिनकी उदासी
चलो उनमें बांटे हंसी हम जरा सी
मिले अब अमावस से सबको रिहाई

खड़ा आँधियों में अकेला ये दीपक
अंधेरों से लड़ना सिखाता है दीपक
मुश्किलों से डरना नहीं मेरे भाई

बुझी है जो बाती उन्हें फिर जलाएं
मिटे आह पीड़ा, जलें हर बलाएं
तहे दिल से देते हैं सबको बधाई


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रमेश शर्मा

दीवाली का खेल
दीवाली के नाम पर,... बाजारों का खेल !
देखोगे जिस ओर भी,मिल जायेगा सेल!!
सर पे है दीपावली ,..सजे हुवे बाज़ार !
बच्चों की फरमाइशें, खीसा है लाचार!!
छाती जले गरीब की,...थर थर कांपे हाथ !
महंगा महंगा तेल जब,जले दीप के साथ !!
महंगाई ने कर दिये, आसमान पर भाव !
मन के मन में रह गये ,दीवाली के चाव !!
नहीं मुकम्मल हो रहे,बच्चों के सब ख्वाब !
फूलझड़ी के दाम भी,....सस्ते नहीं जनाब !!
रमेश शर्मा (मुम्बई) ------
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1 blogger-facebook:

  1. नमस्कार !
    आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [4.11.2013]
    चर्चामंच 1419 पर
    कृपया पधार कर अनुग्रहित करें |
    सादर
    सरिता भाटिया

    उत्तर देंहटाएं

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