रविवार, 3 नवंबर 2013

गिरिराजशरण अग्रवाल का व्यंग्य - आओ भ्रष्टाचार करें

आओ भ्रष्टाचार करें

डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल



उस दिन श्री मंगलदास पांडेय मिले तो औसत से कुछ ज़्यादा ही प्रसन्न थे। मंगलदास पांडेय क्योंकि आई.ए.एस.अधिकारी हैं और इन दिनों कृषि विभाग में संयुक्त सचिव के पद पर कार्य कर रहे हैं। कल किस पद पर कार्य करेंगे, हम नहीं जानते, क्योंकि वह पाँच वर्ष में पंद्रह पद और पंद्रह स्थान बदल चुके हैं। और जैसाकि आप जानते हैं कि अदलाबदली, आवागमन, जन्म, पुनर्जन्म आई.ए.एस. अधिकारी के जीवन की नियति बन जाता है। आई.ए.एस. कोई लेखपाल तो होता नहीं कि पैदा भी लेखपाल का रूप लेकर हुआ और आपकी दुआ तथा सरकार की मेहरवानी से मरेगा भी लेखपाल की हैसियत से। आई.ए.एस. कोई चपरासी नहीं होता कि आदि में भी चपरासी और अंत में भी चपरासी। आई.ए.एस.अधिकारी का तो मतलब ही यह है कि जब चाहो ओर जहाँ चाहो, उसे चिपका दो- कभी इस पद पर, कभी उस पद पर।

क़िस्सा संक्षेप में यह है कि आई.ए.एस. अधिकारी किसी और चक्र में फँसे न फँसे, जीवनभर तबादला-चक्र में अवश्य फँसा रहता है। कभी स्वयं उसके तबादले होते हैं और कभी वह स्वयं अपने तवादले का जुगाड़ लगाता है। देखा जाए तो उसका मुख्य कार्य ही तबादले पर जाना और तबादलों की जुगाड़ में लगा रहना है। बाक़ी काम तो अपने-आप ही चलते रहते हैं। जैसे हमारी सामाजिक व्यवस्था अपने-आप चल रही है। दरअसल, सामाजिक व्यवस्थाएँ स्वचालित ही होती हैं। उसके चालक और संचालक तो हाथी के दाँत होते हैं, जो केवल दिखाने के लिए हैं, चबाने के लिए नहीं।

हाँ, तो उस दिन हमने देखा कि श्रीमान मंगलदास पांडेय औसत से कुछ ज़्यादा ही प्रसन्न थे। हम आपको यह बताते चले कि एक आई.ए.एस. अधिकारी के प्रसन्न होने का एक विशेष अर्थ होता है। उसकी प्रसन्नता हमारी-आपकी प्रसन्नता नहीं होती कि साबुन के झाग की तरह उभरी और बैठ गई। आई.ए.एस. अधिकारी की प्रसन्नता क़ानूनी होती है, हमारी-आपकी बातूनी। क़ानूनी हँसी और बातूनी हँसी में जो अंतर है, हम समझते हैं, आप जानते ही होंगे, न जानते हों तो बताए देते हैं। क़ानूनी मुस्कराहट हमेशा खतरनाक होती है और बातूनी मुस्कराहट हमेशा शर्मनाक। इसीलिए हम अपनी बातूनी मुस्कराहट पर हमेशा शर्म करते रहे हैं और शर्म से पानी-पानी होते रहे हैं।

तो उस दिन श्री मंगलदास पांडेय आई.ए.एस. औसत से कुछ ज़्यादा ही प्रसन्न थे। खोज-कुरेद करने पर पता यह चला कि आई.ए.एस. अधिकारियों की लॉबी में दो गुट बन गए हैं। एक गुट में नए खिलाड़ी हैं तो दूसरे में खाए-खेले खुर्राट। एक में फर्स्टहैंड आई.ए.एस. हैं तो दूसरे में सैकिंड हैंड। फर्स्टहैंड जोश में अपने नए-नए हाथ दिखाता ही है, पर बाज़ी हमेशा पुराने के हाथों में ही रहती है।

मंगलदास पांडेय चूँकि नए हैं, इसलिए नए फर्स्टहैंड वालों से जुड़ गए। नए आई.ए.एस. खिलाडि़यों ने 'नए नमाजी बोरिए का तहमद' या 'नया मुसलमान हरदम अल्ला ही अल्ला' की कहावत पर अमल करते हुए अपना एक अलग गुट बना लिया और पुराने भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध आवाज़़ बुलंद करने लगे। इसी को लेकर कल आई.ए.एस. अधिकारियों ने अपनी एक विशाल पंचायत बुलाई, जिसमें भ्रष्ट अधिकारियों की निशानदेही करने तथा सर्वोच्च भ्रष्टाचारी को भ्रष्टाचार की सबसे ऊँची उपाधि देने पर विचार किया जाना था। यह तो हम नहीं जानते कि इस पर कितना विचार हुआ, क्योंकि हमारे यहाँ विचार के लायक गंभीर बातों पर तो बिल्कुल नहीं, आलतू-फालतू बातों पर अधिक विचार किया जाता है। वैसे भ्रष्टाचार एवं भ्रष्टाचारियों पर विचार करना भी एक प्रकार से आलतू-फालतू बात ही है।

तो साहब! पंचायत की कार्रवाई का ब्यौरा देते हुए श्री मंगलदास पांडेय बोले, 'आज तो हमने भ्रष्टाचारियों की हालत पतली कर दी। ऐसी-ऐसी सुनाईं कि बोलती बंद हो गई उनकी।'

हमने सुना तो आश्चर्य से हमारा मुँह फटा-का-फटा रह गया, बिल्कुल ऐसे ही, जैसे ग़रीब का पाजामा फटे तो फटे-का-फटा ही रह जाए। उतरे तो सिले। न उतरेगा, न सिलेगा। तो साहब हमने अपने फटे मुँह से श्री मंगलदास पांडेय की ओर देखा और आश्चर्य से बोले, 'क्या कहा? पांडेय जी! हालत पतली कर दी भ्रष्टाचारियों की। विश्वास नहीं होता। अब तक तो हम यह सुनते आए थे कि साधन-संपत्ति और अधिकार-संपन्न महापुरुषों की हालत तो कभी पतली होती ही नहीं, हमेशा ग़रीब ही का हाल पतला होता है। उसी का आटा, उसी की दाल पतली होती है, महापुरुषों की नहीं। यहाँ लगे हाथों एक बात और कह चलें। जब समाज में कुछ पुरुष महापुरुष हो जाते हैं या बन जाते हैं तो कोई स्त्री महास्त्री क्यों नहीं बन पाती? क्या महानता के सारे अधिकार पुरुषों के लिए ही आरक्षित हैं, स्त्रियों के लिए नहीं। महापुरुष हो सकते हैं तो 'महास्त्री' क्यों नहीं होनी चाहिए! हमारा ख़्याल है कि हम महिला समाज को यह प्रेरणा देंगे कि महानता पर एकाधिकार रखनेवाले पुरुष-समाज को चुनौती दें और उसमें अपना कोटा आरक्षित कराएँ। सौ महापुरुषों में कम-से-कम तैंतीस स्त्रियाँ तो महास्त्रियों के कोटे में आनी ही चाहिए। महापुरुषों के समाज में यह महिलाओं के साथ बड़ा अन्याय है। अब रहा सवाल पंचायत में भ्रष्ट लॉबी की हालत पतली करने का, तो भाई हम समझते हैं कि हालत आप उनकी नहीं, अपनी ही पतली कर रहे हैं, क्योंकि जितना वह अब तक हज़म कर चुके हैं, उनकी सात पुश्तों के लिए काफ़ी है, आठवीं पुश्त जब आएगी तो उसका भी भगवान है। आप अपनी कहें, भ्रष्टाचार नहीं करेंगे तो क्या करेंगे? अचार-चटनी खाएँगे और प्रभु के गुण गाएँगे।

पांडेय जी एकटक हमारी ओर देखते रहे जैसे हम कोई अनबूझी बात कह रहे हों। हमने अपने विचारों को शब्द देने का क्रम जारी रखा, 'बात, दरअसल, यह है पांडेय जी! नाचना जिसे नहीं आता, वही आँगन को टेढ़ा बताता है। सुनी नहीं है वह कहावत आपने कि 'नाच न जाने, आँगन टेढ़ा।'

अभी हम यहीं तक पहुँचे थे कि पांडेय जी बीच ही में टाँग अड़ा बैठे। बोले, 'आप इस कहावत के मायनी एकदम ग़लत समझते हैं और दुर्भाग्य यह है कि सौ पुश्तों से इस कहावत का अर्थ ग़लत ही समझा जाता रहा है। भाई ध्यान दो, कहने  वाले ने यह नहीं कहा कि जिस 'नचनिये' को नाचना नहीं आता, वही आँगन टेढ़ा बताता है, कहनेवाले ने कहा यह है कि आँगन चाहे कितना ही टेढ़ा क्यों न हो 'नचनिया' अपनी कला में दक्ष है तो नाचकर ही रहेगा। ज़रा पि र दोहराइए इस कहावत को, 'नाच न जाने आँगन टेढ़ा।' यानी नाच आँगन के टेढ़ा-मेढ़ा होने को नहीं जानता। वह तो नाचना ही जानता है।'

'जिंदाबाद, जिंदाबाद!' हमने पांडेय जी की बात सुनी तो ज़ोरदार नारा मारा। बोले, 'आपके मुँह में घी-शक्कर। आपने तो पांडेय जी, हमारे मुँह की बात छीन ली। काश! दूसरे की जेब का पैसा छीनने का गुण भी आप सीख जाएँ, फिर इन पंचायतों-वंचायतों के लफड़े में नहीं पडे़ंगे आप। कहावत ने यह सिद्ध कर दिया है कि स्थिति चाहे कितनी ही विकट और अँगनाई चाहे कितनी ही टेढ़ी क्यों न हो, भ्रष्टाचारी अपना भ्रष्ट आचरण और नचनिया अपना नाच दिखाकर ही रहेगा। पंचायतें उस पर रोक नहीं लगा पाएँगी।'

हमने देखा कि पांडेय जी का चेहरा कुछ उतर-सा रहा है। हमने उनके उतार को कुछ इस अंदाज़ से नज़रअंदाज़ कर दिया जैसे 'ग़रीबी हटाओ' वाले ग़रीब को नज़रअंदाज़ करते आए हैं। हमने पांडेय जी से कहा, 'वैसे इस कहावत के दोनों अर्थ हो सकते हैं। यानी नाचने में आँगन के टेढ़ा होने का बहाना भी और टेढ़ा आँगन होने के बावजूद नाचते रहना भी। कहावत वही अच्छी, जो दोनों अर्थ दे। यानी एक टिकट में दो-दो मज़े। तो भाई पांडेय जी, इस कहावत के पहले मायनी आपके लिए हैं और दूसरे मायनी उनके लिए, जिनके विरुद्ध अभियान चलाने का आप व्यर्थ में प्रयास कर रहे हैं। बात यह है कि भ्रष्टाचार भी चूँकि अपने-आपमें एक उ ँचे दर्जे का हुनर है और इस हुनर में आप सिद्धहस्त तो क्या अर्द्धसिद्धहस्त भी नहीं, इसलिए भ्रष्टाचार का आँगन आपके लिए टेढ़ा ही हुआ न! इसीलिए आप चाहते हैं कि जैसी सूखी खिचड़ी आप खा रहे हैं, दूसरे भी खाएँ। वाह भाई, वाह! यह भला कैसे हो सकता है? आपको नंगा देखकर हम भी कपड़े उतार दें। यह कहाँ की तुक है! भ्रष्टाचारी तो भाई, कहावत के दूसरे मायनी पर अमल करते आए हैं और आगे भी करते रहेंगे। यानी आप चाहें कितनी ही बाधाएँ क्यों न खड़ी करें और आँगन चाहे कितना ही टेढ़ा क्यों न हो, वे नाच दिखाकर यानी हाथ दिखाकर ही मानेंगे।'

हमने देखा, पांडेय जी के माथे पर चिंता की परछाइयाँ नाच रही थीं, हमने परछाइयों की तो क्या अच्छाइयों तक की कभी चिंता नहीं की, इसलिए बिना लगाम लगाए अपना बयान जारी रखा, 'हमारा सुझाव तो यह है पांडेय जी, कि आप आगे से भ्रष्टाचार-विरोधी पंचायतें बिल्कुल आयोजित न करें, बल्कि उनके स्थान पर दो अलग-अलग पुरस्कार-समारोहों को विधिवत् आयोजित करें। एक अधिकारी वर्ग के नामी-गिरामी कमाउ पुत्रों को सम्मानित करने के लिए हो, दूसरा तस्कर-क्लास राजनेताओं को सम्मानित करने के लिए। दोनों समारोहों की अध्यक्षता हवालापार्टी के अध्यक्ष से कराएँ और ऊँचे दर्जे के सभी भ्रष्टाचारियों को पुरस्कृत करें। यह काम राष्ट्रीय स्तर पर होना चाहिए।'

हमने देखा कि पांडेय जी चुप हैं और विचारों की पूरी-की-पूरी मालगाड़ी उनके मस्तिष्क से गुज़र रही है। इसलिए जैसे ही एक छोटा-सा हाल्ट आया, हमने  एक और विचार उनकी तरफ़ फेंका, 'पुरस्कार-समारोहों के उपरांत आप लेने में दक्ष महापुरुषों व महास्त्रियों की एक विशिष्ट टीम गठित करें, जो नए खिलाडि़यों को 'लेने' की कला का ऐसा बढि़या प्रशिक्षण दे, जिससे कभी 'लेने के देने' न पड़ें, जैसे कभी-कभार अब भी पड़ जाते हैं।'

पांडेय जी निरंतर मौन धारण किए हुए थे। हम यह नहीं समझ पा रहे थे कि वह हमारी बात से सहमत हैं या असहमत हैं। क्योंकि हम अपने बोलने के क्रम में उन्हें कुछ कहने का अवसर देने को तैयार ही नहीं थे। विरोधीपक्ष को पराजित करने का एकमात्र गुर यही है कि अपनी कहो, दूसरे को बोलने ही मत दो। हारेगा, झक मारेगा और अंत में चारों खाने चित्त आ गिरेगा। सो, हमने भाई पांडेय जी के मौन का एक बार फिर फायदा उठाते हुए कहा, 'भाई पांडेय जी! जैसी लूट-खसोट मच रही है, इस देश में, जन-धन पर जिस तरह हाथ साफ़ किया जा रहा है, जिस तरह अरबों-खरबों अंदर किए जा रहे हैं, उसे देखकर तो यही लगता है कि पिछले दिनों हमारे एक चित्रकार मित्र ने भावी भारत का जो नक़्शा बनाकर हमें दिखाया था, वही सच होनेवाला है।'

पांडेय जी का मौन टूटा। बोले, 'क्या था उसमें?' हमने बताया, 'चित्रकार ने भारत का एक विशाल चित्र तैयार किया था, जिसमें बड़े-बड़े समतल मैदान दिखाए गए थे। न तो नदी-नाले, न कल-कारख़ाने, न शहर-बाज़ार। बस बड़े-बड़े ख़ाली मैदान। और इन मैदानों के बाहर एक भैंस जुगाली करती हुई।'

हमने चित्र देखा तो हैरत हुई। अपने चित्रकार दोस्त से पूछा, 'भई, यह क्या बनाया है तुमने?'

बोला, 'तुम स्वयं बूझो तो जानें।' हम देर तक ध्यानपूर्वक इस अद्भुत नक़्शे को देखते रहे पर कुछ पल्ले नहीं पड़ा। हार मान ली। कहा, 'हम तो कुछ समझ नहीं पा रहे हैं चित्रकार भाई। आपकी माया आप ही जानें। पर कुछ हमें भी तो बताइए यह क्या है?'

चित्रकार भाई बोले, 'होता क्या? भारत का नक़्शा है और घास के मैदान हैं।'

'पर इन मैदानों में घास कहाँ है? वे तो गंजों की खोपड़ी जैसे सफाचट पड़े हैं।'

चित्रकार बोला, 'घास तो भैंस चर गई।'

हमने पूछा, 'भैंस कहाँ है?' बोला, 'देख नहीं रहे हो, बैठी जुगाली कर रही है।'

पहली बार पांडेय जी हमारी बात पर ठहाका मारकर हँसे। फिर बोले, 'तब तो भ्रष्टाचार-विरोधी लॉबी को मजबूत करना और भी ज़रूरी है वर्ना भारत गंजे की खोपड़ी बनकर रह जाएगा।'



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