सोमवार, 18 नवंबर 2013

सूर्यकांत मिश्रा का आलेख - शिक्षा नीति : अधिक खतरनाक हैं आज के नेता और नीतियां

लॉर्ड मेकाले को भला हम क्यों कोसें?
० अधिक खतरनाक है आज के नेता और नीतियां

शिक्षा के मामले में हमारे देश ने जितने प्रयोग किये हैं, अथवा जितनी कमेटियां बनायी हैं, वह विश्वस्तर पर एक कीर्तिमान हो सकता है। हमने शिक्षा के सुधार के लिये समय-समय पर शिक्षाविदों से परामर्श करते हुये इसे लागू किया। यह विडम्बना ही कहा जाना चाहिये कि किसी भी शिक्षा नीति को हमने उसके परिणामों तक पहुंचने देने का अवसर प्रदान नहीं किया। प्याज के छिलकों की तरह हर बार नई शिक्षा नीति ने हमारी आंखों में आंसू ही छलकाये हैं। अंग्रेजों के शासनकाल के बाद से लेकर अब तक ऐसी शिक्षा नीति नहीं बन पायी, जो हमें पूर्ण रूप से सुकून दे सकें।

18वीं शताब्दी में अंग्रेजों द्वारा लागू की गयी शिक्षा नीति जो लॉर्ड मेकाल की शिक्षा नीति के नाम से जानी गयी, उसे अलोचना के भरपूर शब्द मिले और आज भी हम जब शिक्षा नीति की चर्चा करते है, तो मेकाले को अपनी तिरछी निगाहों में अवश्य रखते है। यह कहा जाता रहा है कि मेकाले की शिक्षा नीति ने महज बाबू बनाने का ही रास्ता अख्तियार किया था। आजादी के बाद हमें किसने रोक रखा है कि हम अब तक एक अच्छी शिक्षा नीति की तलाश में भटक रहे है। जहां तक देखा जाये अंग्रेजों के जमाने अथवा हमारी गुलामी के दिनों में लागू की गयी शिक्षा प्रणाली कम से कम पढ़ने का अवसर तो प्रदान कर रही थी। आज की स्वार्थी राजनीति ने तो हमारे अपनों को कामचोर बनाना ही शुरू कर दिया है।


किसी भी देश के विकास के दो पहलू हुआ करते है। एक शिक्षा और दूसरा संस्कार। यह कहना गलत न होगा संस्कारयुक्त शिक्षा ही विकास के मार्ग को प्रशस्त करती है। प्रयोगधर्मिता को मनुष्य का विकासात्मक गुण माना जा सकता है, यही कारण है कि हम प्रयोग में विश्वास करते रहे है, किंतु विकास की सुदृढ़ दिशा सुनिश्चित करना सबसे महत्वपूर्ण माना जाना चाहिये। आज हमारे देश में शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग ही प्रयोग हो रहे है। शिक्षा का गिरता स्तर, गिरते मानवीय मूल्य, बढ़ता भ्रष्टाचार इन सभी ने हमारी वर्तमान के औचित्य पर सवाल खड़ा कर दिया है। शिक्षा के क्षेत्र में हमारा अतीत गौरवशाली रहा है।

यदि हमें ऐसा लगता है कि लॉर्ड मेकाले ने हमारे अनुसार शिक्षा का ढांचा तैयार नहीं था, तो उसे बदलने में अब क्या दिक्कत है? इस बात से इंकार करना नामुमकिन है कि 18वीं शताब्दी में हमारे देश में लाखों की संख्या में स्कूलें हुआ करती थी, प्रत्येक 400 आबादी पर एक प्राथमिक विद्यालय का संचालन हुआ करता था। साथ ही शासन अथवा जनसहयोग से संचालित शालाओं की संचालन व्यवस्था भी अद्भुत थी। सभी के लिये प्राथमिक शिक्षा स्वेच्छा से अनिवार्य बनायी गयी थी। आज यह चिंतन का विषय है कि अंग्रेजों के समय की शिक्षा नीतियां हमारे के लिये किस रूप में उचित नहीं मानी जा रही थी और आज हम कहां आ खड़े हुये है।


भारत वर्ष के वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य ने जिस प्रकार से अपना स्वार्थ सिद्ध करना शुरू किया है, मेरी नजरों में वह लॉर्ड मेकाले की शिक्षा नीति से भी अधिक खतरनाक है। यदि लॉर्ड मेकाले ने बाबू बनाने की शिक्षा तक हमें समेट रखा था, तो आज के राजनेताओं ने मानवीय कर्म और श्रम को ही समाप्त करने की कसम खा रखी है। अब मेहनत के निःशुल्क भोजन प्रदान करने की योजना ने हमारे देश के उद्योगों को बीमार कर रखा है, तो दूसरी ओर एक नई गुलामी की पटकथा तैयार की जा रही है। कक्षा 8वीं तक बिना परीक्षा पास करने की नीति किस उज्जवल भविष्य की नींव रख रही है, यह समझ से परे है।

1 रूपये किलो, 2 रूपये किलो गेंहू, निःशुल्क नमक, 5 रूपये किलो चना तथा न जाने ऐसी कितनी ही नीतियां हमारे देश के अर्थशास्त्र को डांवाडोल कर रही है, और हमारे देश के नेता किस अर्थशास्त्र के बुनियाद पर विकास की सीढ़ी मानकर उसे लागू कर रहे है, इसे हम बेहतर समझ सकते है। सन 1947 से पूर्व अंग्रेजों ने हम पर अपना शासन चलाया और हमें गुलामी का जीवन बिताना पड़ा। अब हम हमारे राजनेताओं द्वारा एक ऐसे मार्ग पर प्रशस्त किये जा रहे है, जहां अंग्रेजों की गुलामी वाला सिद्धांत एक नये रूप में हम पर अप्रत्यक्ष रूप से लादा जा रहा है। आने वाले कुछ दशकों में हमारे देश में ऐसे लोगों की फौज खड़ी हो जायेगी, जो बिना किसी मेहनत के सारी सुविधाएं चाहिये और सरकार की गुलामी करती ही दिखाई पड़ेगी। दूसरे शब्दों में कहूं तो आज की स्वतंत्र भारत की सरकारें अपने ही नागरिकों को नारकीय जीवन प्रदान करने जा रही है। उन गलत सरकारी नीतियों का परिणाम उद्योगों को श्रमिक न मिल पाने के रूप में भुगतना पड़ रहा है। निःशुल्क सुविधाएं देने के नाम पर कामचोरों की फौज तैयार करने वालों को यह समझ लेना चाहिये कि आने वाला समय उन्हें भी अंग्रेजों की तरह इस देश से बाहर करने एकजुट हो जायेगी। जब उसे ज्ञात होगा कि उसके साथ भारी छल किया गया है


भारत आने वाले विदेशियों ने अपने अपने विचारों और रूचियों के आधार पर भारत वर्ष का सर्वेक्षण  कर अपने हितों के हिसाब से निष्कर्ष निकाले। यही कारण है कि उन सभी के विचारों में प्रायः भिन्नता पायी गयी, जो विरोधाभाष के रूप में सामने आती है। यूरोपियन्स ने भारतीय ज्ञान विज्ञान की सही व्याख्या करते हुये उसके साथ न्याय नहीं किया। ऐसे ही लोगों में लॉर्ड मेकाले का नाम सबसे ऊपर आता है। लॉर्ड मेकाले की भारत के प्रति उपेक्षित दृष्टि का कारण उसके अंदर पनपा भारत के प्रति भय और ईर्ष्या का भाव ही प्रमुख था। इतना होते हुये भी भारतीय साहित्य को एकदम से नकार पाने में लॉर्ड मेकाले ने भी स्वयं को समक्ष नहीं पाया। आज हमारे अपने देश के योजनाकारों ने मिल जुलकर देश के नौजवानों को बेकार और लाचार बनाने का जो बीड़ा उठाया है, वह भारत को आने वाले दिनों में पूरी तरह से पंगू बनाकर रख देगा। हम रोजगार के साधनों में वृद्धि को प्रमुख न मानते हुये चालू उद्योगों में कार्यरत श्रमिकों के कार्य की क्षमता पर जंग लगाने का काम कर रहे है। उन्हें कर्मवीर बनाने का प्रयास न करते हुये कर्म कर रहे लोगों को निःशुल्क अथवा निःशुल्क जैसी सारी सुविधाएं उपलब्ध कराकर उद्योगपतियों के लिये मुश्किलें पैदा कर रहे है।


लॉर्ड मैकाले ने तो महज शिक्षा के ढांचे को गलत ढंग से प्रस्तुत किया था। आज के हमारे नेता तो पूरे विकास के ढांचे शिक्षा तथा संस्कृति को ही दांव पर लगा चुके है। अब हिन्दूस्तान के शरहदों में केवल और केवल वोट की राजनीति ने सभी को अंधा बना रखा है। स्वार्थ के आगे देश का मान सम्मान और कला तथा संस्कृति के लिये पहचान बनाने वाले भारत वर्ष में कला के साथ सारी योग्यताओं को ग्रहण लगाने का काम 542 लॉर्ड मैकाले संसद रूपी भवन में बैठकर बड़े साहस के साथ कर रहे है। इतना ही नहीं प्रदेश की विधानसभाएं भी कुछ ऐसे ही सदस्यों से भरी पड़ी है। फिर 18वीं सदी के अंग्रेज शासन लॉर्ड मैकाले की नीतियों का रोना हम भला कब तक रोते रहेंगे।


                                                  (डा. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

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