शनिवार, 28 दिसंबर 2013

कुबेर सिंह साहू का व्यंग्य - समय का भविष्य

समय का भविष्य

मंदिर चौक की रौनक अब लौटने लगी थी। सड़क के किनारे खाने-पीने की स्टालों
में भीड़ जुटने लगी थी। शीतल पेय, गन्ना रस तथा फलों का रस मिलने वाले
स्टालों में भी भीड़ बढ़ने लगी थी।

इसी चौक पर ढेलू राम की पान की दुकान है। जब भी मैं इस चैंक से गुजरता
हूँ, ढेलू राम के ठेले से पान खाना नहीं भूलता। पर मैंने अपना इरादा बदल
लिया। दूर से ही मैंने वहाँ पर के. आर. जी को चिंतन की मुद्रा में खड़े
हुय देख लिया था। जैसे ही मैं दूसरी गली में मुड़ने को हुआ, के. आर. जी की
कर्णभेदी आवाज सुनाई दी - ’’गुरूदेव।’’

मेरे कदम ठिठक गए।

के. आर. जी नगर के उभरते हुए कामरेड हैं। कभी वे मेरा विद्यार्थी हुआ
करते थे। मैं उन्हें बड़े प्यार से कालू राम कहकर बुलाया करता था। तब बात
अलग थी। अब परिस्थितियाँ बदल गई हैं। उनका कद बढ़ गया है और वे कालू राम
से के. आर. जी हो गए हैं। साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और चाटुकारिता,
हर क्षेत्र में उनका रूतबा है। अब वे स्वयं को के. आर. जी ही कहलाना पसंद
करते हैं। उनके रूतबे का ही असर है कि लोग अब उन्हें के. आर. जी कह कर ही
बुलाते हैं। उन्हें हरगिज पसंद नहीं कि लोग उन्हें कालू राम कह कर
पुकारे। बकौल उनके, जो या तो उनकी योग्यता ये पूरी तरह परिचित नहीं होते
हैं, या जो जानबूझ कर उनकी योग्यता को स्वीकार नहीं करना चाहते हैं, वे
लोग ही ऐसा कह कर बुलाते हैं। ऐसे लोग उनके कट्टर विरोधी और घोर
प्रतिक्रियावादी होते हैं।

पर न तो मैं उनका विरोधी हूँ और न ही प्रतिक्रियावादी। पूरी तरह उनके
रूतबे के प्रभाव में आ चुका हूँ। आलम यह है कि अब तो मैं उनके फोन की
घंटी की आवाज सुनकर ही कुर्सी पर से उछल पड़ता हूँ। अब मैं भी उन्हें के.
आर. जी ही बुलाता हूँ।

कालू राम से के. आर. पर आने के लिए मुझे बड़ी तपस्या करनी पड़ी। मुँह से
अब-तब निकलने ही वाला था, कि - ’’कालू राम जी, खैरियत तो है?’’ पर
सुदीर्घ साधना और तपस्या का असर था कि ऐन मौके पर जुबान संभल गई। मैंने
कहा - ’’भाई! बड़े बेचैन लग रहे हो, क्या बात है?’’

’’बेचैनी तो होगी ही, गुरू देव बेचैनी तो होगी ही। जिन्हें देश की चिंता
होगी, गरीबों और मजदूरों की चिंता होगी, उन्हें बेचैनी तो होगी ही न?’’
जमाने भर का दर्द अपने चेहरे पर समेटते हुए के. आर. जी ने कहा और शून्य
भाव से शून्य की ओर देखने लगा।

’’और जगताप जी जैसे व्यक्ति का न रहना भी तो बेचैनी का एक बड़ा कारण है।’’
मैंने उनकी बात पूरी की।

अब तो के. आर. जी के अंदर का सुसुप्त लावा लगभग उबल पड़ा। ढेलू राम को
डपटते हुए उन्होंने कहा - ’’यार, तू भी बड़ा अहमक है, अब तक गुरूदेव की
पान नहीं लगाई। कोई बात नहीं, तब तक सिगरेट ही पिला दे।’’ और फिर झपटते
हुए सिगरेट की डिबिया उन्होंने अपने कब्जे में ले लिया।

सिगरेट को होठों से लगाते हुए वे जरा ठिठके। शायद उनके अंदर की आधुनिकता
और पारंपरिक संस्कारों के बीच अंतद्र्वंद्व चल रहा होगा। उनकी आधुनिकता
मेरी उपस्थिति की उपेक्षा करना चाहती हो, या बडों का सम्मान करने की
नसीहत को, वैयक्तिक निजता और स्वतंत्रता का हनन करने वाली मानती हो, और
उनके पारंपरिक संस्कार इन आधुनिक विचारों पर भारी पड़ रहे हों? सिगरेट
होठों तक न जाकर ऊँगलियों में ही फंसी रही। उन्होंने विचारों की एक मोटी
चादर ओढ़ ली।

उनकी मुद्रा गंभीर से गंभीरतर होती चली गई। अब वे इस दुनिया की
वास्तविकता या वास्तविक दुनिया की सरोकारों से काफी दूर कल्पनाओं और
अवास्तविकताओं की दुनिया में विचरण करने लगे थे। उन्हें शायद मेरी भी
उपस्थिति का ज्ञान नहीं रहा। अब सिगरेट उनके हाठों के बीच खेलने लगी थी।

सिगरेट का धुआँ अंदर जाते ही उनके चेहरे पर विचारों का आवरण और भी
तेजस्वी होता चला गया। वे कहने लगे - ’’आपको छब्बीस तारीख वाला इन्वीटेशन
तो मिल ही गया होगा?’’

कार्ड तो स्वयं उन्होंनेे ही मुझे घर आकर दिया था। उनके भूलने की यह अदा
भी मुझे बड़ी प्यारी लगी। मैं उनकी आत्ममुग्धता को किसी प्रकार भी बाधित
नहीं करना चाहता था, लिहाजा मैंने भी थोड़ा अभिनय करते हुए कहा - ’’हाँ !
हाँ, वही न, तीव्रगामी साहित्य संघ वालों के कार्यक्रम का कार्ड।’’

’’हाँ! हाँ, बिलकुल वही। बड़ा महत्वपूर्ण आयोजन है भाई; कानपुर, लखनउ,
इलाहाबाद और पटना जैसी जगहों से बडे़-बड़े कामरेड और समीक्षक आ रहे हैं। न
तो ऐसा अवसर ही बार-बार आता है, और न ऐसे लोगों को सुनने का मौका ही
बार-बार मिलता है। अवश्य आइयेगा।’’ बीच में ही रोकते हुए उन्होंने मुझे
एक लंबी घुट्टी पिलाई।

इस बीच लगातार वे मुझे भाई कहकर संबोधित करते रहे। इतना ही नहीं, अब वे
सिगरेट की गहरी-गहरी कश लेने और धुएँ का गुबार मेरी ओर फेकने भी लगे थे।
शायद उनके विचारों का घनत्व उनके शिष्यत्व के संस्कारों को निगल चुका था।

इधर सिगरेट की डिबिया में सिगरेट की संख्या बड़ी तेजी से कम होती जा रही
थी, और उधर उसी अनुपात में उनके चेहरे पर गंभीरता का आवरण घना होता जा
रहा था। चुटकी बजा कर उन्होंने सिगरेट की अनचाही राख झाड़ी, मानो अपने
अंदर की तथाकथित बेचैनी को झाड़ रहे हांे। फिर एक छोटी सी खामोशी और एक
लंबी कश के बाद नाक और मुँह से धुएँ का गुबार छोड़ते हुए उन्होंने बात आगे
बढ़ाई - ’’भाई! जगताप साहब जैसे लेखक, विचारक, और गरीबों की चिंता करने
वाली हस्ती का चले जाना न सिर्फ साहित्य जगत के लिये, अपितु देश के
लाखों-करोड़ों गरीब, किसान और मजदूरों के लिए भी एक अपूरणीय क्षति है। मैं
तो कहता हूँ , उनके साथ ही इस शहर में प्रगतिवादी चिंतन के एक युग का
अवसान हो गया है। इस खास मौके पर उसका लड़का, जो विदेश में एक बहुत बड़ी
मल्टीनेशनल कंपनी का सी. ई. ओ. है, अपने परिवार के साथ आ रहा है। उनका
भतीजा जो मुंबई में एक बहुत बड़ा कारोबारी है, वह भी सपरिवार आ रहा है।
खैर, यह आयोजन तो उन्हें याद करने का, उनके विचारों से अवगत होने का एक
बहाना मात्ऱ है। जरूर आइयेगा।’’

आमंत्रण कार्ड के नीचे मोटे अक्षरों में छपे टीप, जिसमें लिखा था, ’अंत
में आमंत्रित साहित्यकारों के सम्मान में इच्छा-भोज का आयोजन भी रखा गया
है’, को लक्ष्य करते हुए मैंने कहा - ’’भइ, जरूर आयेंगे; वर्ना आप लोग
कहेंगे कि यहाँ के लोगों में साहित्य की जरा भी समझ नहीं है। बड़े बेशऊर
लोग हैं। इच्छा-भोज का भी आनंद लेना नहीं जानते।’’
इच्छा-भोज की बात पर मुझे इच्छा-मृत्यु का स्मरण हो आया। भीष्म पितामह को
इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त था। आजकल लोग अति पीड़ादायक अनिच्छा-मृत्यु
का वरदान लेकर पैदा होते हैं। अनिच्छा-मृत्यु का क्षण जब तक न आ जाए,
इच्छा-भोज उड़ाते रहो, जी भर कर खाते रहों। सरकार ने भी इच्छा-भोज की
व्यापक सुविधाएँ जो मुहैया करवाई हुई है।

इच्छा-भोज की चलन ने अनिच्छा-मृत्यु की पीड़ा को कफी हद तक कम कर दिया है।
लोग अब अनिच्छा-मृत्यु मर तो जाते हैं, पर इच्छा-भोज के फेर में पड़ कर
उनकी आत्माएँ बार-बार, इच्छा-भोज प्रधान इस पवित्र भारत भूमि पर लौट-लौट
आती हैं। (पितामह इच्छा-मृत्यु मरे थे। और तब इच्छा-भोज का चलन भी तो
नहीं था। इसीलिये उनकी आत्मा लौटकर नहीं आई होगी।) पर अब बात अलग है।
आजकल लोग दिन में कई-कई बार अनिच्छा-मृत्यु मरते हैं। इच्छा-भोज की
अतृप्त इच्छा के कारण वे फिर-फिर जी उठते हैं। हमारे देश में नेताओं,
अधिकारियों और व्यापारियों को उनके खानदान सहित यह सुविधा मिली हुई है।
इस परा-दैवीय सुविधा को प्राप्त कर उनके दिन मौज में, और रातें ऐशो-आराम
में कट रही है।

मुझे खोया हुआ देख के. आर. जी ने झिंझोड़ा। कहा - ’’भाई! आप लोग समझते
नहीं हैं। आप लोगों का सारा ध्यान खाने-पीने में ही लगा रहता है। चर्चा
के केन्द्रीय विषय पर तो आप लोगों का ध्यान ही नहीं जाता।’’

मैंने कहा - ’’जाता क्यों नहीं साहब! अच्छी तरह जाता है। रह गई खाने-पीने
की बात, यह तो हमारा राष्ट्रीय चरित्र है। बस, यही एक काम तो हम पूरी
निष्ठा ओर ईमानदारी के साथ कर रहे हैं।’’

’’मजाक छोड़िये। बताइये विमर्ष का विषय क्या है?’’

’’गतिशीलता में भविष्य ..... ’’

’’जी नहीं; विषय है - ’तीव्रगामी साहित्यकारों की गतिशीलता: भूत और
वर्तमान के संदर्भ में समय का भविष्य।’’

मैंने अपनी अज्ञानता स्वीकारते हुए कहा - ’’वाह! कितना सुंदर, कितना
आकर्षक और कितना गंभीर विषय है। कितने महान हैं आयोजक, जिन्होंने चर्चा
के लिये ऐसे गंभ़ीर विषय का चयन किया है, और कितने महान होंगे वक्ता गण,
जो ’समय के भविष्य, का चिंतन करके उसके भविष्य की भविष्यवाणी करेंगे।’’

’’आप समझते क्यों नहीं साहब, समय बड़ा खराब आने वाला है।’’ मुँह बनाते हुए
के. आर. जी ने कहा।

मैंने कहा - ’’भइ! जिस देश में समय के भविष्य की चिंता करने वाले आप जैसे
चिंतनशील लोग हों, देश के भविष्य की चिंता करने के लिये गली-मुहल्लों से
लेकर संसद तक नेताओं की कतारें लगी हुई हो, धर्म के भविष्य की चिंता करने
के लिये स्वयंभू ठेकेदारों की भी कतारें लगी हुई हों, और जहाँ गरीबों,
किसानों और मजदूरों की चिंता का भार भगवान के कंघों पर डाल दी गई हों, उस
देश में मुझे तो समय का भविष्य बड़ा उज्जवल दिखाई देता है। सब दुरूस्त
दिखाई देता है।’’

’’सब कुछ दुरूस्त नहीं है, गुरूदेव ! सब कुछ दुरूस्त नहीं है। स्पार्टाकस
से लेकर अब तक, कुछ भी सही नहीं हुआ है। और फिर आप किस ईश्वर की बात कर
रहे हैं?’’ के. आर. जी ने बड़े कातर स्वर में कहा।

लंबे अंतराल के बाद पुनः गुरूदेव का संबोधन सुनकर मुझे सुकून मिला। लगा
कि अब वे पुनः जमीन की ओर लौट रहे हैं। मैंने कहा - ’’उसी ईश्वर की बात
कर रहा हूँ जनाब, जिसे आप लोग मरा समझकर दफना चुके हैं। अभी मैं उन्हीं
से मिल कर आ रहा हूँ। बिलकुल फिट हैं। यह देश उन्हीं के भरोसे तो चल रहा
है।’’

के. आर. जी अब और अधिक लंबे और गहरे कश लेने लगे थे। उनकी बेचैनी मैं समझ
सकता था। उन्हें मेरी बातें शायद चुभ गईं हो। उन्होंने सिगरेट की डिबिया
में पुनः सिगरेट तलाशी। डिबिया खाली हो चुका था। खाली डिबिया को उन्होंने
पूरी ताकत से सड़क के दूसरी ओर उछाल दिया। मेरी बातों को खारिज करने की
उनकी यह नई अदा थी। फिर चेहरे पर मुस्कुराहट का नया मुखौटा लगाकर,
हें....हें....करते हुए उन्होंने कहा - ’’माफ करना गुरूदेव ! छब्बीस को
जरूर आइये।’’

फिर बड़ी फुर्ती से वह भीड़ में गायब हो गया। जाते-जाते उनका शिष्यत्व पुनः
मुखरित हो गया था।

छब्बीस की आस लिये मैं भी उसी भीड़ में गायब हो गया।
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