शनिवार, 28 दिसंबर 2013

गोवर्धन यादव की बाल कहानी - दो हंसों का जोड़ा

दो हंसों का जोडा.

रामदयाल एक धनी किसान था,लेकिन वह बहुत ही आलसी था. वह न तो अपने खेत देखने जाता और न ही अपने पशुधन की खोज-खबर रखता था. उसने अपना सारा काम नौकरों के भरोसे छोड रखा था. धीरे-धीरे घर की सारी व्यवस्था चौपट होने लगी ,लेकिन उसने उस ओर कभी ध्यान ही नही दिया.

उसे खाने-पीने का भी बेहद शौक था. अतः वह अपने लिए लजीज व्यंजन बनवाता. डट कर खाता और सोता पडा रहता. घर से निकलना भी उसने लगभग बंद कर दिया था .एक दिन ऐसा भी आया कि वह बिमार रहने लगा. उसने अपना इलाज गाँव के प्रसिद्ध वैद्ध-हकीमॊं से करवाया,लेकिन स्वास्थ्य मे कोई सुधार नहीं हुआ. उसे तो अब ऐसा भी लगने लगा था कि अब वह शायद ही बच पाएगा.

इस बात की खबर गाँव के एक बुजुर्ग को लगी तो वे उसे देखने जा पहुँचे. काफ़ी देर यहाँ-वहाँ की बातचीत होती रही. बातों ही बातों मे उस बुजुर्ग ने उसकी दैनिक दिनचर्या की सारी जानकारियाँ इकठ्ठी कर ली और सलाह देने की सोची. वे जानते थे कि रामप्रसाद शायद ही उनकी बातों पर सहजता से अमल करेगा. अतः उन्होने बिमारी का इलाज मनोविज्ञानिक ढंग से करने की ठानी. उन्होंने कहा कि यदि वह जल्दी ही ठीक होना चाहता है तो उसे एक काम करना होगा. काम कोई कठिन नहीं है ,यदि तुम उसे कर सके तो अच्छे होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा. बुजुर्ग की बात सुनकर उसे कुछ दिलासा सी हुई. उसने अधीर होकर उसका उपाय जानना चाहा.

बुजुर्ग ने किसी और पर रहस्य उजागर न करने की सलाह देते हुए कहा;- सूर्योदय के पूर्व, मानसरोवर में रहने वाले दो हंसों का जोडा उडते हुए तुम्हारे खेत में उतरता है. वह थॊडी देर आम के पेड पर बैठकर सुस्ताता हैं और फ़िर उड जाता हैं. वे रोज आएं ऐसा जरुरी नहीं है,लेकिन आते अवश्य हैं. जैसा कि तुम जानते ही हो कि हंस मोती खाते हैं. तुम एक पात्र में वहाँ मोती भर कर रख दो. यदि हंसों ने तुम्हारे मोती खा लिए तो समझो, तुम्हारी सारी बिमारी जाती रहेगी और तुम पहले की तरह भले -चंगे हो जाओगे.

उपाय सरल था और उसके पास काफ़ी बडी मात्रा मे मोतियों का जखीरा भी था .उसने सहमत होते हुए कहा कि वह काम कल सुबह से ही करना शुरु कर देगा.

रामप्रसाद भोर होने के पहले ही जाग गया. उसने अपने जेब में कुछ मोती डाले और बडा सा पात्र लेकर खेत जा पहुँचा. आम के पेड के नीचे पात्र को रखते हुए उसने उसे मोतियों से भर दिया. और छुपकर हंसों का इंतजार करने लगा. सूर्य आसमान में चमचमाने लगा था,लेकिन हंसों का कहीं अता-पता न था. वह यह सोच कर घर वापस लौट आया कि आज नहीं तो कल अवश्य ही वे आएगें.

दूसरे दिन फ़िर वह सूर्योदय से पहले खेत जा पहुँचा. जेब से मोती निकाल कर उसने उस पात्र में डाले और छुपकर हंसों का इंतजार करने लगा. इस बार भी निराशा ही हाथ लगी.यह क्रम लगातार कई दिनों तक चलता रहा.

एक दिन, जब वह खेत पहुँचा और पात्र में मोती डालने लगा तो उसकी आँखे आश्चर्य से फ़टी रह गई कि पात्र मे मोती क्म मात्रा मे शेष रह गए हैं. उसे यह सोच कर प्रसन्न्ता होने लगी थी कि वह हंसॊं को तो देख नहीं पाया,लेकिन उन्होंने कुछ मोती अवश्य ही चुग लिए हैं.

. रामप्रसाद की अब दिनचर्या बन गई थी कि वह रोज सबेरे उठने लगा था. नौकरों के बीच इस बात को फ़ैलने में देर नही लगी कि वह रोज सुबह अपने खेतों पर पहुँचने लगा है. इसका व्यापक असर पडा और अब वे ईमानदारी से अपना काम करने लगे थे. फ़सल भी खूब लहरा रही थी और पशु भी अब दूध ज्यादा देने लगे थे. यह सब देख कर उसे आश्चर्य होता.

एक सुबह ,जब वह हंसों के लिए मोती लेकर जा रहा था कि रास्ते में वही बुजुर्ग व्यक्ति आते दिखे. .रामप्रसाद ने हाथ जोडकर उनका अभिवादन किया. बात चल निकली. उस बुजुर्ग ने उससे पूछा कि क्या वह हंसों को देखने में सफ़ल हो पाया है अथवा नहीं ?. तो प्रत्युत्तर मे उसने कहा कि वह अब अब तक हंसों को देखने में सफ़लता तो हासिल नहीं कर पाया है,पर उसे इस बात का संतोष अवश्य है कि उसके द्वारा दिए गए मोतियों को हंस चुग जरुर रहे हैं. और उसका स्वास्थ्य दिनों दिन सुधर रहा है. यह उनकी कृपा का ही परिणाम है कि अब खेतों में फ़सल खूब लहरा रही है और उसके पशु भी अब पहले से ज्यादा दूध दे रहे हैं.

रामप्रसाद की बातें सुन कर वह बुजुर्ग व्यक्ति ठहाका लगा कर हंसने लगा. उसे इस तरह हंसता देख उसने आश्चर्य मे भरते हुए, हंसने का कारण जानना चाहा . उन्होंने कहा:-बेटा, हंसों के आने की बात बिल्कुल ही बेबुनियाद है. वे न तो पहले कभी वहाँ आए थे और न ही भविष्य मे कभी आएंगे. मैंने हंसों के आने की बात कहकर तुममे एक आत्मविश्वास जगाने का काम किया था .तुम उन हंसों की खोज में प्रतिदिन उठकर अपने खेत जाने लगे. इस तरह तुम प्रकृति के संपर्क में आए. यह वह समय होता है जब प्राणवायु प्रचुर मात्रा मे बहती है. इस तरह तुम जाने-अनजाने मे उसका सेवन करने लगे. दिन भर खाट पर पडा रहने वाला व्यक्ति, जब दो मील प्रतिदिन पैदल चलने लगे तो उसके स्वास्थ्य मे परिवर्तन अपने आप आने लगता है. इतना कहकर उस बुजुर्ग व्यक्ति ने अपनी जेब से उन सारे मोतियों को निकालकर उसे लौटाते हुए कहा कि वे उसके पहुँचने से पहले कुछ मोती निकाल लिया करता था.जिससे उसके विश्वास को बल मिले.

रामप्रसाद को अच्छी तरह समझ मे आ गया कि परिश्रम ही वह सफ़ेद हंस है, जिनके पंख हमेशा उजले होते हैं. जो श्रम करता है वह समाज में सम्पत्ति और सम्मान पाता है. उसने मन ही मन यह प्रण कर लिया था कि अब भविष्य में वह कभी भी परिश्रम से मुँह नहीं चुराएगा.

गोवर्धन यादव १०३,कावेरी नगर,छिन्दवाडा(म.प्र)४८०००१ संपर्क ०९४२४३५६४००

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  1. अखिलेश चन्द् श्रीवास्तव7:38 pm

    गोवर्धन जी इतनी सुन्दर कहानी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद् ये कहानी केवल बाल गोपाल के लिए नहीं अपितु सभी के लिए उपयोगी है

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी काहानी अच्छी लगी

    उत्तर देंहटाएं

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