सोमवार, 30 दिसंबर 2013

अजय कुमार दुबे की लघुकथा - प्रोबेशन पर

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शी की शादी बड़ी धूम-धाम से राजेश से हुई थी। ससुराल वालों की तारीफ करते शशि के मम्मी पापा अघाते नहीं थे हरतीज -त्यौहार पर रस्म के अनुसार फल ,मिठाई कपड़ों आदि की सौगात भेजते रहते थे i शशि के विवाह के समय पाँच लाख नकद ,कपडे ,गहने मोटरसाइकल ,बर्तन आदि का दहेज़ दिया गया था। वह अपने सास ससुर की बहुत तारीफ करती थी और अपने पति के साथ खुश थी। उसको ससुराल वालों से केवल एक ही शिकायत थी कि उसे घर के किसी मसले पर निर्णय का अधिकार नहीं था, और न ही उसको बात में शामिल किया जाता है बड़ी बहू होने पर भी हर निर्णय से दूर रखा जाता था शशि की एक लड़की थी सास  -ससुर अपनी पोती का बहुत ख्याल रखते थे धीरे -धीरे तीन साल बीत गए। लड़की अपने दादा -दादी के साथ के घर से काफी दहेज आया ,किसी बात की कमी नही की उन्होंने "-सास कह रही थी। शशि थमक कर खड़ी हो गई। बात उसके बारे में ही हो रही थी। "वो तो ठीक है ,अभी हमे चार साल और चुप रहना है ,उसके बाद देखा जायेगा -क़ानून जो है -सात साल के बाद दहेज़ का कानून लागू नहीं होता "! वो सन्न रह गई। ये क्या कह है। लगा किसी ने पिघला शीशा डाल दिया हो। बना -उसका बनाया सपनों का महल ढह गया था और शशि मलबे में बिखरे सपनों को बीन रही थी जो जहाँ तहां बिखरे पड़े थे और वो बेसुध होकर वहीं बेठ गई उस मलबे के ढ़ेर पर -अभी तो मैं प्रोबेशन पर हूँ ........    

Ajay Kumar Dubey

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    1. aapka dhanyvad aapko nav varsh ki shubhkaamnaayan

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  2. दहेज़ प्रथा राजाओ ने और बनियो ने शुरू किया और यह बिमारी अन्य वर्गों में फ़ैल गयी. अब खुद बनिए/जैन इससे मुक्त हो रहे है -रेनिक बाफना [मेरे ब्लॉग :renikbafna.blogspot.com renikjain.blogspot.com

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