मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

नव वर्ष की कविताएँ


 

मंजुल भटनागर

नव वर्ष

जीवन क्रम में
एक दिवस नया
चंहु ओर नवागत
आह्लाद नया
नव वर्ष अभिनन्दन .

गाते भौरें गीत नया
पक्षी करते मंगला चरण
नव सूर्य पदार्पण
जुड़ता जाता आशाओं का
इतिहास नया .

सुन्दर आयोजन
रोज आवाहन
नए विश्वासों का
शुभागमन .

जीवन कर्म में
जुड़ता है जीवन रंग मंच पर
एक पृष्ठ नया
एक वर्ष नया .


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मनोज 'आजिज़'


                    
नव वर्ष में

नव प्रात लिए, नव आस लिए
नव वर्ष का नव सोपान है
नव प्रीत लिए, नव भाव लिए
पुरातन का अवसान है ।

है बीता जो भी अशुभ उसे
रखना नहीं है स्मरण में
नव ऊर्जा धारण करना है और
नव उत्ताप भी नव जागरण में ।

हो मन में स्नेह का नव अंकुर
नव उच्छ्वास का मलय बहे
क्रोध, अहं, द्वेष, विराग छोड़
नर-नार जगत में सदय रहे ।

ज्ञान, चेतना, मति की धारा
नव श्रृंखला में प्रवाहित हो
नव उद्दोग से नव वर्ष में
जन-जन उन्नत, पुलकित हो ।
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नव वर्ष पर एक ग़ज़ल

इक साल फिर ...

(ग़ज़ल)

                  
इक साल फिर बीत गया उम्र भी ढली
फिसल गए इतने दिन कर आँख मिचौली

न साथ दे पाया काफ़िले-ख़्वाब को हमने
सोचता हूँ कब हुई ख्वाहिशात भली

ये भी सच कि जो बीत गया बात गयी
पर रहते हैं ज़ेहन में यादें खट्टी मखमली

आशनाई, फ़र्जो रहम क़त्ल हुए देखे गए
कोई बताये क्या होनी कभी टली ?

इक साल फिर आ गया नेमत इसे समझ
छोड़ ज़िन्दगी की 'आजिज़' वो सँकरी गली


संपर्क: -  आदित्यपुर-२, जमशेदपुर, झारखण्ड

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शशांक मिश्र भारती

नववर्ष और हम

नववर्ष के आते ही
प्रसन्‍न हो गए
उत्‍साहित हो गए हम,
उमंगें भरने लगे
स्‍वप्‍नों में तैरने लगे
कल्‍पनाओं के पंख उगे
आशाओं के दीप सजे,
खुशियों का आगोश
हमें अति भाया
प्रतिवर्ष आने वाला
बहार बनके आया,
गत वर्ष की भांति ही
बधाईयां लाया।
किन्‍तु-
हम तो वहीं हैं
जहां कल थे, खड़े हैं आज भी वहीं पर
समय बदल गया
कैलेण्‍डर बदल गया,
किन्‍तु हम नहीं बदले;
क्‍या हमने नववर्ष को
बधाई पत्र भेजने का ही
साधन माना है
भेजकर उस पर ग्रीटिंग
कृतिश्री हो जाना है,
नहीं! कभी नहीं!!
मात्र बधाई भेजने से
नववर्ष नहीं हो सकता
हैपी न्‍यू ईयर कहने से खुशियां
नहीं आ सकतीं।
हमें भी नया बनना होगा
नया भाव जगाना होगा
समाज व देश में नूतन आयामों को
सजाना होगा,
उसमें व्‍याप्‍त विसंगतियों पर
अंकुश लगाना होगा।
प्रश्न चाहे जन का हो
समाज या राष्ट्र का,
सभी के प्रति हमें-
सेवा भाव से युक्‍त
समर्पण का भाव लाना होगा;
सेवा शब्द को सार्थक करना होगा
तभी निर्भीकता से कहने के
अधिकारी होंगे हम,
विश्व जनमानस के समक्ष
हैपी न्‍यू ईयर।
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सप्ताह की कुछ और कविताएँ :

 

पूनम शुक्ला


1.जीवन के पीले मोती

धुंध फैली है चारों ओर
उजली पर धुँए सी
सबकुछ अदृश्य
नहीं कोई भी नहीं
हाथ का हाथ भी नहीं
कभी कुछ आवाजें हैं बस
किसी उपस्थिति का आभास देती
गुमसुम सी एक गुमनाम गली
आस की चाहत में जो
बलखाती बढ़ चलती थी आगे
ठहर गई है
सिमट गई है कोहरे की चादर में

पर रोशनी भी थमती है क्या
वो तो भेद ही देती है अभेद पर्तें
धुंध और कोहरे की सैकड़ों पर्तें
शीघ्र ही फूटेगी एक पीली रोशनी
और पड़ेगी पत्तों पर
उनपर पड़ी ओस की बूँदों पर
और चमकने लगेंगे
जीवन के असंख्य पीले मोती ।


2.मेरा पीला रंग

पीले कुर्ते में
एक लंबी काली पट्टी,
किसी डिज़ाइनर ने
अपनी अनुभूति को
रचनात्मक ढंग से
प्रस्तुत करना था चाहा
पर वह नहीं जान पाया
कि मधुर जल के प्रवाह के बीच
ये एक मेढ़ थी
प्रवाह की गतिशीलता को
रोकती
नहीं भाते मुझे
मेरे पीले रंग पर
काले बूटे या चित्रकारी
पीला रंग समा चुका है
आँख की कोरों में
भीतरी पोरों में
जो ले चलेगा दूर
दिखते लक्ष्य की तरफ ।

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चन्द्र कान्त बन्सल


तेरे कजरे से

मानी है हमने हार तेरे कजरे से
दिल लगाया है यार तेरे कजरे से

तेरे हुस्न की शमशीर तो कुंद है मगर
दिल में उतरे है एक कटार तेरे कजरे से

कोई करे प्यार तेरी सूरत से तेरी सीरत से
हम करते है मगर प्यार तेरे कजरे से

मेरी आँखों की चमक यूँ ही नहीं है
ली है हमने ये उधार तेरे कजरे से

इसकी धार के आगे न टिका कोई भी कभी
नश्तर भी है बेकार तेरे कजरे से

लुट जायेंगे एक बार आँखों की शरारत पर
मिटे है हम बार बार तेरे कजरे से

जिंदगी हमें भी प्यारी है अपनी मगर
‘रवि’ मरने को है तैयार तेरे कजरे से

 

तेरी जुल्फ

यूँ लग रहा है चाँद को बादलों ने ढंक लिया
जब भी तेरे चेहरे पर छाई है तेरी जुल्फ

तेरी नज़र के तीर से घायल न हो जाऊं
मेरे दिल को शायद बचाने आई है तेरी जुल्फ

इस चाँद से मुखड़े पर ये दाग कैसा है
दिल का मेरे वहम है ये परछाई है तेरी जुल्फ

इस चाँद को कहीं नज़र लग जाये न मेरी
इसलिए सबा ने आज लहराई है तेरी जुल्फ

ये चाँद जब मेरे पहलू में आ चुका है
फिर क्यों मेरे लिए अब भी पराई है तेरी जुल्फ

बिंदिया चूड़ी लाली झुमकों की न खबर है
‘रवि’ के दिल में सिर्फ समाई है तेरी जुल्फ

 

माथे का यह चाँद 

सितारों का सितारा है तेरे माथे का यह चाँद 
हमें जान से प्यारा है तेरे माथे का यह चाँद

तेरे मुखड़े का चाँद गर एक शोला है जानम
यह भी तो एक शरारा है तेरे माथे का यह चाँद

इस चाँद की चमक तो सूरज के जैसी है
झिलमिलाता ध्रुवतारा है तेरे माथे का यह चाँद

उस चाँद में सैकड़ों दाग होंगे पर एक भी
उसमे नहीं जो हमारा है तेरे माथे का यह चाँद

दो चांदों को कभी आज तक देखा न एक साथ
क्या नजारों का नजारा है तेरे माथे का यह चाँद

सवाल तो उम्दा है कि तुम्हे कौन पसंद है
जवाब भी तो करारा है तेरे माथे का यह चाँद

एक बार जो कह दे तू तो ‘रवि’ जान भी देदे
कि आज से ये तुम्हारा है तेरे माथे का यह चाँद


तुम्हारी हंसी


कातिलों से भी है कातिल ये तुम्हारी हंसी
ले गयी चुरा के मेरा दिल ये तुम्हारी हंसी

यूँ तो मुझको खबर है ज़माने भर की
देखूं तो हो जाऊं गाफिल ये तुम्हारी हंसी

आँखें तो कह रही है फिर कभी न मिलना
पर कह रही है और मिल ये तुम्हारी हंसी

तुम रूठो तो रूठे तुम मानो तो मान जाये
दो ही तो है एक ये लबे तिल दूजी ये तुम्हारी हंसी

माना कि इस इश्क में तूफान तो कई है
‘रवि’ के इश्क का है साहिल ये तुम्हारी हंसी


यह तुम्हारी आँखें


जादू सा एक जगाती है यह तुम्हारी आँखें
दिल को मेरे लुभाती है यह तुम्हारी आँखें

न बचपन में था मुकाबिल न जवानी में कोई सानी
हर उपमा को उपमेय से लजाती है यह तुम्हारी आँखें

न कोई आग है न शोला न कोई शरारा ही बस
जुगनुओं की चमक सी जगमगाती है यह दुलारी आँखें

अपना अक्स दर्पण में जो देखा तो चौंक उठी
क्या यह हमअक्स अपना साथी है यह कुंवारी आँखें

जुल्फों माथे और भवों से नज़र फिसलती रही
सिर्फ आँखों पे ही टिक जाती है यह हमारी आँखें

तुम गर चुप भी रहो तो यह ही है बहुत
जाने क्या क्या कह जाती है यह तुम्हारी आँखें

होंठों गालों और पलकों को दिल दे दे फिर भी
जान ‘रवि’ की लिए जाती है यह प्यारी आँखें

 

चन्द्र कान्त बन्सल

निकट विद्या भवन, कृष्णा नगर कानपूर रोड लखनऊ
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जसबीर चावला

की चोट करती सात ताज़ा कविताएँ
ठंड से कोई नहीं मरता
--------------------


जनाबे आली आपका सामान्य ज्ञान
ठीक
दुरूस्त फ़रमाया
ठंड से जो होती मौत
कौन फिर ज़िंदा रहता साइबेरिया में
*
दंगा पीड़ितों बनाओ'ईगलू'
ठंड से बचने के लिये
साइबेरिया जाओ
गर्म 'ईगलू' हैं
साइबेरियन सारस भी
उड़ भारत आते
*
ठंड से कोई नहीं मरता
मरता है निमोनिया / हायपोथर्मिया से
बताओ
देश में कब कौन भूख से मरा
मरता है
पोषक तत्वों की कमी से
*
रानी ने सही कहा था
रोटी नहीं है तो भूखे केक क्यों नहीं खाते
'लू' नहीं
मारता है डीहाइड्रेशन 
प्रकृति जन्य हैं बाढ़ आपदाएँ
'केदारनाथ'
भारतीय दर्शन कहता
सब कर्म गति है बाबा
जैसा बोए वैसा पाए
शरीर नश्वर है
आत्मा अजर अमर
*
कबीर से क्षमा
अफसर खड़ा केंप में
लिये माईक हाथ
जो झुग्गी फूंके आपनी
चले हमारे साथ


        ****
                
चूहे लोकपाल और फ़ैज़
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
आज़ादी के बाद
आज़ादी से
'चूहे' थे कि बढ़ते ही जा रहे
चूहों की तरह

सरकारी दफ़्तरों की सब फ़ाईलों में
रक्षा वित्त शिक्षा की मुँडेर पर
न्याय के चोग़े में
हर विभाग
प्रदेश में / देश में

पेन की निब की टिप पर
हस्ताक्षर के घुमाव पर
निर्णय की भूलभुल्लैया में
यत्र तत्र सर्वत्र चूहे ही चूहे
देश बना चूहों का'करणी माता मंदिर'
हर वर्ग रंग जाति के चूहे

क्या नहीं कुतरते
बिलों में खींचते
टेंडर खदानें ठेके
तेल हवा पानी ज़मीन
ईमान धर्म ज़मीर

थे कुछ क़ानूनी पिंजरे
ढीले ढाले
कमज़ोर हाथों में
थोड़े अभागे फँसते
कुछ फँसाये जाते
ताकि सनद रहे
पिंजरे नाकाम नहीं हैं चूहों के लिये
कार्यपालिका मुस्तैद है

मुक़दमे शैतान की आंत से लंबे
बरसों बरस
चूहे ही गवाह
चूहे जाँच अधिकारी
चूहा न्याय
और बाइज़्ज़त छूटते चूहे

सालों से मशक़्क़त जारी / चर्चा था
बनेगा नया शिकंजा / कड़ा क़ानून
आयेगा बिल
बच न सकेंगे चूहे

खोदा पहाड़
नाम दिया लोकपाल बिल
फँस सकेगें चूहे
बिल से निकल पायेंगे
इस'बिल'से
'फ़ैज़' ने कभी लिखा था
लाजिम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन जिसका वादा था
हम देखेंगे हम देखेंगे

  ***
टी वी पर शिकार
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
उनके मुंह ख़ून लग गया
चाहिये शिकार
खबर नहीं
शिकार दिखाते
हिंस्र द्रष्टि / चिंघाड़ते / टूट पड़ते
बोटी बोटी चीथड़े कर देंगे
तर्क / कुतर्क से धुर्रे उड़ा देंगे
बली चाहते


दिनों महीनों तक
तड़फा तड़फा
स्टूडियो में मजमा सजाकर
किश्तों में शिकार


चेहरा छिपाती
जिस महिला के लिये सारी बहस
आख़िर में बनती वह भी
आसान शिकार


शिकार की दलील ख़ारिज
पहले ही लिखा
दीवार पर उसका नाम


हांका डालते / उघेड़ते / निर्वस्त्र करते
एक ही शिकार कई कई चेनल
सुनते हैं
ख़ुर्शीद अनवर
बना है ताज़ा शिकार


         ***
घोड़ामण्डी
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
घोड़ों का व्यापार
इस दौर से गुज़रा न था
फल फूल रहा
बरसों से
मण्डी की हालत
कभी ऐसी तो ना थी
*
घोड़े तैयार
बिकने के लिये
नये अस्तबल जानें
चारा चंदी खानें के लिये
ख़रीदार तैयार
*
पर खिंच गई
नैतिक लक्ष्मण रेखाएँ
कैसे आऊँ जमुना के तीर
पाँव पड़ी ज़ंजीर
होश गुम
*
कुर्सीयां व्याकुल
करें आर्तनाद
कूल्हे भी बेक़रार
कसमसा / अकुला रहे
कब हो मिलन / निकले
फँसा फच्चर
ईमानदारी का

***
क्या खोया क्या पाया
-------------------


दंगों में बचपन ही नहीं गुमा
खिलोनें
दूधमुँही तुतलाहट
मासूमियत


बरसों का याराना
भाईचारा
अस्मत
विश्वास खोया
इंसानियत गई
रिश्ते तड़के
   *
शर्म हया उड़ी
इंसान मरा
आँख का पानी
स्वाभिमान टूटा
रोटी गई
रोज़गार गये
जले मकान
और
लुटे खेत खलिहान
    *
पाया क्या
सतत नफरत घृणा
दुश्मनी
उग्र साम्प्रदायिकता
बच्चों में भय बेचेनी
जीवन भर की उदासी
डरावने सपने
कुंठा
कुटिल राजनीति
धर्म के नाम अधर्म
और
थोड़े से वोट
     ***
  जिया बेक़रार है
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे
सूरदास उवाच
अमीर खान ने कहा
दिल है कि मानता नहीं

मेरा भी पंछी मन नहीं मानता
एक बार तो सोते जागते
उड़ आता है
उल्लू जैसे
डौंडियाखेड़ा के खंडहरों में

शोभन सरकार ने बताया
दबा है सोना हज़ार टन
किसी के इंतज़ार में
आये खोद ले जाये

दूर कहीं बज रहा गाना
जिया बेक़रार है
आजा मोरे बालमा
तेरा इंतज़ार है
मेरो मन अनत कहाँ सुख पावे

***

क्योंकि तुम 'तुम' हो
ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं
तुम 'तुम' हो
इसलिये नाम तो तुम्हारा ही लिया जायेगा

तुम बोलो
चर्चा तुम्हारा होगा
ना बोलो तो भी
क्योंकि 'तुम' हो
चुनाव प्रदेश में हों
देश में
कहीं भी
किसी भेष में
राजनीति की बिसात पर
मोहरे तुम ही होंगे
तुम ही केन्द्र बिंदू

तुम्हारे में विवेक है
नहीं मानते
तुम भीड़ हो / भेड़ चाल हो
वोट बैंक हो
तुम्हारे हित का हर काम
तुष्टिकरण

होंगी जात पाँत तुममे अनेक
जुदा वर्ग
फिरके / अलग जमातें
अलग राजनैतिक रुझान
अकीदा एक है
बस इतना ही काफ़ी है तुम्हारे ख़िलाफ़
बोलने / भड़कनें के लिये
क्योंकि तुम 'तुम' हो

***
chawla.jasbir@gmail.com

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जगदीश पंकज


एक छंदमुक्त कविता -
'मैं कुछ नहीं कहता '

मैं कुछ नहीं कहता
मुझे डर लगता है ,इसलिए
कुछ नहीं कहता
मैं इसलिए कुछ नहीं कहता
क्यों कि फिर
मेरे कहे को
बताया जायेगा,
छापा जायेगा ,
दिखाया जायेगा ,
सुनाया जायेगा , कि
मैंने कहा है यह .
फिर ,
किसी के सम्मान को
ठेस पहुंचेगी ,
किसी की भावनाएं
आहत हो जाएँगी
मेरे कहे से .
उनमें से अधिकतर
ऐसे होंगे, जिन्होंने
नहीं सुना होगा ,
नहीं पढ़ा होगा
नहीं देखा होगा
मेरे कहे को .
व्याख्या की जाएगी ,कि
सौहार्द बिगड़ सकता है
सद्भाव हो सकता है नष्ट
मेरे कहे से .
भर्त्सना की जाएगी मेरी
पुतले फूंके जायेंगे
हो सकता है
गिरफ्तार कर लिया जाये मुझे
प्रतिबन्ध लगा दिया जाये
उस छपे पर, जो मैंने कहा था
कर ली जाएँ ज़ब्त
वे सारी प्रतियाँ
जहाँ-जहाँ छपा है, मेरा कहा हुआ
हो सकते हैं बौद्धिक विमर्श
पक्ष और विपक्ष में
मेरे कहे के .
और मुझे
घोषित किया जा सकता है 'अवांछित'
कानून-व्यवस्था के लिए
जनहित में .
फिर मुझे कहना पड़ेगा
मैंने ऐसा नहीं कहा था
मेरे बयान को गलत पेश किया गया है
मेरा यह आशय नहीं था .
प्रकट करना पड़ेगा मुझे खेद .
अब ,जब वे अधिकतर लोग चुप हैं
जो कह सकते थे ,
कह सकते हैं
जिन्हें कहना भी चाहिए
बिना किसी डर के
नहीं कह रहे हैं ,उसे जो
कहा जाना चाहिए
मैं सोचता हूँ, कि
क्या वे भी डरे हुए हैं मेरी तरह .
इसलिए मैं कुछ नहीं कहता
चाहे ,परोक्ष में
खड़ा दीखता रहूँ
निरपेक्ष रहते हुए
किसी के समर्थन और
यथास्तिथि के पक्ष में .
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का
अर्थ समझते हुए ,मैंने समझा है ,कि
मैं भी स्वतंत्र हूँ
अभिव्यक्त न करने के लिए .
कुछ नहीं कहता मैं
इसीलिए .

-जगदीश पंकज
सोमसदन, 5/41, सेक्टर-2,
राजेंद्र नगर ,साहिबाबाद,
गाज़ियाबाद-201005.     

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राजेश कुमार मिश्र

   स्मृतियाँ
प्रियवर, कैसे भूल सकेंगे
साथ बिताए सुखद पलों को,
द्रवित हृदय, भीगे नयनों संग
फिर भी आगे होगा बढ़ना।
जीवन सदा रहे आलोकित
पथ को सुगम प्रभु तुम करना,
बाधाएँ सारी दम तोड़ें
जीवन सदा खुशी से भरना।
तुमसे सीखा है हम सबने
सदा समय की कीमत करना,
ओजस्वी वाणी के दम पर
मन में विश्वासों को भरना।
कर्मठता की खुद मशाल बन
जीवन-पथ आलोकित करना,
शीतलता का मार्ग छोड़कर
रवि का ताप बदन पर सहना।
अडिग, अटल, निर्भीक सदा बन
तूफ़ानों से बढ़ कर लड़ना,
कैसी भी मुश्किल हो आगे
धैर्य सदा रख आगे बढ़ना।
कोई सीख सके तो सीखे
सपनों का सौदागर बनना,
सपनों का फिर महल बनाकर
मेहनत के रंगों से भरना।
हम चाहेंगे सदा बहे यह
ज्ञान-सुधा का अविरल झरना,
सीख तुम्हारी दिल में रखकर
बच्चे सीखें आगे बढ़ना।
      हमें मिटाना मत इस दिल से
सदा प्रेम यह कायम रखना,
बनकर अमर ज्ञान की ज्योति
सदा-सदा इस घट में रहना


संपर्क – डॉ0 राजेश कुमार मिश्र
हिंदी विभागाध्यक्ष, दि आसाम वैली स्कूल


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देवेन्द्रसिंह राठौड़


माँ-माँ देखो बन्दर आया,
बन्दर देख,बच्चा चिल्लाया।
बन्दर को मैं दूंगा रोटी,
अभिलाषा थी उसकी छोटी।
अन्दर जाके रोटी लाया,
उसके मन में आनन्द छाया।
बन्दर करता जैसे खी-खी,
बच्चा करता वैसे ही-ही।
तब तक आ गया भीड़ का रेला,
जैसे भर गया कोई मेला।
सारे लगे मचाने शोर ,
जैसे घुस आया कोई चोर।
लाठी से वो लगे भगाने,
सारे मिलकर लगे डराने।
बन्दर देख ये गया सहम,
उसके आगे छा गया तम।
इतमे में गया पैर फिसल,
बन्दर गिर गया मुँह के बल।
गया,जान से वो बैचारा,
मंजर गया बदल अब सारा।
बोल रहे जो लठ की बोली,
बन गई वो भक्तो की टोली।
जमा हो गये वो सब जन,
मिलकर करने लगे भजन।
तरसाया रोटी को कैसे,
करने लगे इकट्ठे पैसे।
बैकुण्ठी बन्दर की सजाई,
और,उसे माला पहनाई।
करने लगे भक्तजन ड्रामा,
गाने लगे पवनसुत नामा।
बैकुण्ठी को लगे सहारे,
लगे पवनसुत के जयकारे।
देखे बच्चा होके रुआंसा,
थी,अधूरी उसकी अभिलाषा।
बैकुण्ठी को देखे बच्चा,
मन का था वो बिल्कुल सच्चा।
जिन्दे को कितना तरसाया,
और,मुर्दे को इतना सजाया।
बच्चा माँ से करे सवाल,
वाह,मरने पे इतने निहाल।
 
संपर्क :- देवेन्द्रसिंह राठौड़ (भिनाय),
     बी.के.कौल नगर अजमेर
Email:- dsrbhinai@gmail.com

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  1. bahut sundar rachnayein
    नववर्ष 2014 सभी के लिये मंगलमय हो ,सुखकारी हो , आल्हादकारी हो

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया प्रस्तुति...आप को और सभी ब्लॉगर-मित्रों को मेरी ओर से नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...

    नयी पोस्ट@एक प्यार भरा नग़मा:-तुमसे कोई गिला नहीं है

    उत्तर देंहटाएं
  3. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव7:06 am

    बहुत सुन्दर बेबाक और मौलिक रचनाओं के लिये सम्बंधित लेखकों को बहुत बहुत बधाइऎ

    उत्तर देंहटाएं
  4. जगदीश पंकजजी,सुंदर अभिव्यक्ति.सचमुच हम सब अभिशप्त हैं मौन रहने के लिये.

    उत्तर देंहटाएं

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