शनिवार, 28 दिसंबर 2013

राकेश कशिव का ललित निबंध - मेरी रेल यात्रा

बचपन में निबन्ध लिखने के लिए मेरे तीन ही विषय प्रमुख थे। या यूँ कहे की, इन तीन विषय पर आप रात के दो बजे भी उठाते तो हम निबन्ध लिख देते। पहला विषय था गाय, बचपन से सुन रखा था

गाय हमारी माता है, हमें कुछ नहीं आता है।
बैल हमारा बाप है, पढना लिखना पाप है।।

कुछ हद तक यह जुमला हमारे ऊपर फिट भी बैठता था। पढाई लिखाई से हमारा छत्तीस का आंकड़ा था। अल्फा बीटा गामा थीटा हमें तो मास्टरनी ने सबसे पहले पीटा। इसी तर्ज पर कुछ पढ़ लिया करते। इन्हीं कारणों से गाय में हमारी विशेष रूचि हो गयी और जितनी सीधी सरल ये प्राणी है उससे भी सीधा सरल इसका निबन्ध रहता था। गाय के अंगों की संख्या का विवरण और उसके दिए हुए दूध से बनायीं गयी सामग्री मात्र लिखने से डेढ़ दो पेज तो यूँ ही भर जाते थे। और अंत में गौ माता की जय लिख अपने हिन्दू होने का प्रमाण देते ही दस में से आठ-नौ नम्बर पक्के हो जाते।

दूसरा विषय जो हमें पसंद था हमारे पूजनीय बापूजी याने श्री मोहन दास करम चन्द्र गाँधी। गाँधी जी की सबसे ख़ास बात यह थी की एक तो उनका नाम पूरी तरह लिखने में एक लाइन पुरी  तरह भर जाती और दूसरा बचपन से नोटों में उनकी तस्वीर देख कर उनकी सादा जीवन उच्च विचार वाली फिलोसोफी हिलोरें मारती। दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल। यह पंक्ति गाँधी जी के निबन्ध में चार चाँद लगा देती। एक और खास बात यह भी थी की स्वतन्त्रता संग्राम से जुडे हुए करीब पैंतीस चालीस सेनानियों का नाम लिखने से एक पेज तो श्योर भर जाता। इसे कहते है हिंग लगे न फिटकरी पर रंग चोखा। मास्टरनी जी भी देशप्रेम से ओतप्रोत इस लेखन को पूरे पूरे नम्बर दे देती थी।।

तीसरा विषय मुझे पसंद था हमारी रेल यात्रा। इस विषय में मैं बहुत पारंगत हो गया था। चार पांच पन्ने तो यूँ ही भर देता। रेल की यात्रा क्यू की उस समय तक विरले ही होती थी में सारी यात्रा को कंठस्थ कर लेता। रेल में जाने से पहले टिकट लेने का नैतिक पाठ हो या भीड़ में जल्दी से घुस कर सीट लेने की होड़ मैं माहिर हो गया था। रेल में तरह तरह के रास्ते, पेड़, पौधे, जंगल, खेत, किसान, जानवर, नदी, पर्वत, गाड़ी, मकान आदि सब उलटी दिशा में पीछे छूटते दीखते। तरह तरह के लोगो से मुलाकात होती विविध संस्कृतियों से परिचय होता यह सब मुझे भारतीय रेल के प्रति विशेष आकर्षित करता।

खेर इन सब बातों को बीते कई साल हो गए। अब में आपको वर्तमान में ले चलता हूँ।

आज मुझे भोपाल निकलना था, दिमाग में गणित के सारे सूत्र भिड़ा दिए कैलकुलेशन 2 दिन पूर्व  से ही लगानी चालू कर दी। ऐसा जाने क्यू होता है जब भी अकेले सिंगरौली स्टेशन अलसुबह 05 :00 बजे की गाड़ी पकड़ना हो तो यहाँ का वासी काफी सामाजिक प्राणी बन जाता है। तो भाई हम भी मंगल गृह के वासी तो है नहीं हम भी सामाजिक हो गए,  अकेले तो थे ही क्लब वगैरह आने जाने की फ्रीक्वेंसी बड़ा दी। इसी उम्मीद में थे की किसी और सामाजिक प्राणी से अपनी फ्रीक्वेंसी मिल जाये तो रेसोनेंस का मजा आ जाये। जैसे की अभी अभी मैंने बतलाया की परिवार साथ था नहीं अकेले हे थे तो क्लब और कैंटीन ही हमारे उदर पोषण के स्त्रोत बने हुए थे। यहाँ हमारे जैन साहब भी इसी स्थिति के मारे थे वह भी आम मानव की तरह उदर पोषण की श से ग्रस्त थे और उन्होंने भी क्लब और कैंटीन को अपने सर्वे-सर्वा मान लिया था, बिलकुल हमारी तरह। वैसे विन्ध्याचल की यह खूबी रही है, अकेले रहने पर बड़े-बड़े तुर्रम खां इन्ही 2 जगह बिना नागा किये पाए जाते है। एक बार मंदिर-मस्जिद छुट जाये, पर मजाल है की यहाँ आना छुट जाये। भई पापी पेट का सवाल है और कहते भी है न, भगवान ने हाथ दिए स्पर्श सुख के लिए, आँख दी दर्शन सुख के लिए, जिव्हा दी भोग सुख के लिए पर ये पापी पेट क्यू दिया यह समझ में नहीं आता। पेट दुबला दिखे तो भी परेशानी बड़ा दिखे तो भी। गरीब बेचारा सुबह-सुबह उठ कर पेट भरने की जुगत में मिलो दौड़ लगाये तो अमीर भी बेचारा बड़ा पेट कम करने के लिए अलस-भोर जाग मिलो दौड़ लगाये। यदि थोड़ा ज्यादा अमीर हो तो घर पर हे ट्रेड-मिल में 10-5 किलोमीटर की दौड़ तो लगा ही लेता है।


नए-नए लेखकों की यही परेशानी होती है,  लिखना चालू तो कुछ और सोच कर करते है, पर विषय से भटक बहुत जल्दी जाते है। तो लो भाई हम वापस अपने विषय पर आते है। कहा थे हम, हाँ य़ाद् आया हम जुगाड़ लगा रहे थे की कोई और साथ मिल जाये इस सिंगरौली स्टेशन जैसे बियाबान में रात के चार बजे हमरा साथ दे सके। यूँ तो हमें डर नहीं लगता और हनुमान चालीसा की कुछ लाइन भी कंठस्त थी, लेकिन साहब अब आप लोगो से क्या छुपाना पेट में गुड-गुड तो होती हे है।

लेकिन हमें दूर-दूर तक कोई जुगाड़ नहीं मिल रही थी, मन बार बार धिक्कार रहा था, क्या काशिव, यही है तुम्हारा सामाजिक स्तर एक आदमी की जुगाड़ नहीं कर पाए। जाने का दिन पास आते ही जा रहे थे। तभी एक चमत्कार हुआ क्लब में खाना खाते हुए हमने यह समस्या जैन साहब से साँझा की, उन्होंने पूछा कब जा रहे है? हम बोले रविवार, वह बोले इस रविवार  को तो मैं भी जा रहा हूँ। इतना सुनते ही हमारी तो बांछें खिल गयी, इतना खुश हुए मानो मुंह मांगी मुराद मिल गयी। इसे कहते है बगल में छोरा और जगत में ढिंढोऱा।

खैर हमने बात बात ने बात बढाई और जानने पर पता चला की वह कटनी तक जबलपुर इंटरसिटी से जा रहे थे और हमें जाना था कोलकता अजमेर से। कहते है न आदमी की महत्वाकांक्षा असीमित है हम भी इससे अछूते नहीं थे। अब हम इस जुगत में लगे और जैन साहब को मनाने लगे की इंटरसिटी से कटनी तक जायेंगे, बेकार ट्रेन है, सुबह-सुबह परेशान होंगे, यह ट्रेन निकलती तो राईट टाइम है पर आगे चल कर इसका कोई माई बाप नहीं रहता।

दरअसल इन सब के पीछे लॉजिक यह है की हमें पता था की हमारी गाड़ी ने लेट आने का अपना धर्म बना लिया है। सोचिये आप सुबह  कम से कम 2:30 बजे उठे और फिर आपने अपनी बुद्धिमता प्रदर्शित करने के लिए अपने महंगे वाले स्मार्ट फ़ोन पर ट्रेन इन्क्वारी की साईट खोली और वहा से पता चला की आपकी ट्रेन मात्र सोलह मिनट लेट है। आप किसी जीती हुए जंग के बादशाह की तरह अपनी अबोध पत्नी और चालाक बच्चे की तरफ निहारते है। फिर किसी तरह तैयार होके 4 बजे घर से निकलते है। 05 बजे की गाड़ी पकड़ने के लिए साढ़े-चार  या पौने-पाच तक स्टेशन पहुचे और यहाँ आने के बाद आपको पता चले की आपकी ट्रेन सोलह मिनिट से बत्तीस मिनट लेट हो गयी है। आपकी नजरों के सामने से जबलपुर इंटरसिटी निकलती है जिसमें बैठ कर जैन साहब हाथ हिला रहे है। शायद यह हाथ हिलाते समय उन्हें गर्व हो रहा हो की देखा मेरी ट्रेन तो राईट टाइम निकली है ।

फिर चोपन पेसेंजर भी रेंगती हुए निकल जाती है आपकी बत्तीस मिनट लेट ट्रेन का अब तक कोई पता नहीं है। तभी आपकी ट्रेन का नम्बर और नाम अनाउंस होता है,  आप खुश हो जाते है, लेकिन कुछ ही पलों में, फूलो पर बिखरी ओंस की तरह आपकी ख़ुशी काफूर हो जाती है जब आपको यह पता चलता है की ट्रेन मिनिट की जगह घंटो से लेट है तब तक बनारस की इंटरसिटी भी प्रस्थान कर चुकी होती है आपकी हालत उस बहलिये कि तरह हो जाती है जिसके हाथ आया पंछी फुर्र से उड़ गया हो। आप मन मसोस के सिर्फ भारतीय रेलवे की माँ बहन करते है क्यूंकि और कुछ आप कर नहीं सकते। हाँ एक काम और करते है, वह ये की श्रृंगी ऋषि की  इस पावन धरती सिंगरौली में अपनी पोस्टिंग को कोसने का।

खैर जैन साहब को तो हम नहीं मना सके वह इंटरसिटी के लिए प्रतिबद्ध थे। और हो भी क्यू न भाई राईट टाइम जो चलती है भले हे राईट टाइम पहुचे न। हमने भी सोचा और किसी  सुबह सुबह के स्वप्न की तरह उपर लिखी सभी एक्टिविटी को क्रमानुसार होती गयी। एक एक करके सब ट्रेन हमारे सामने से निकलती रही, जैन साहब ने गर्वानुभित हुए हाथ हिलाया, नहीं आई तो सिर्फ हमारी ट्रेन। लगने लगा सही कहते है ये बाबा लोग, स्वर्ग और नर्क यही है, इसी धरा पर और हम सिंगरौली स्टेशन पर अपना नर्क ही भोग रहे है।

लेकिन होनी को कौन टाल सकता है, आई भाई आई, य़कीन मानिये हमारी ट्रेन भी आयी। कहते है न की, हर ऱात की सुबह होती है, हमारी ट्रेन भी रात की सुबह याने सवा सात बजे स्टेशन पर पहुंची। यात्रियों के चेहरे पर एक अनोखी आभा दमक रही थी सभी को बस उसमे चढने की जल्दी थी। सो रेले में हम भी बह गए और ट्रेन पर सवार हो गए।

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