सोमवार, 30 दिसंबर 2013

रामवृक्ष सिंह का आलेख - हिन्दी के अग्रदूत उड़न सिक्ख श्री मिल्खा सिंह

हिन्दी-प्रेमी श्री मिल्खा सिंह

हाल ही में लखनऊ के जयपुरिया स्कूल में आयोजित एक समारोह में छात्रों को संबोधित करते हुए उड़न-सिक्ख श्री मिल्खा सिंह ने कहा कि वे दुनिया के शताधिक देशों में गए हैं और हर जगह उन्होंने अपनी बात कहने के लिए हिन्दी का इस्तेमाल किया है। उनका कहना है कि यदि दुनिया के बाकी देशों के लोग अपनी-अपनी भाषा में अपनी बात कह सकते हैं तो हम हिन्दी वालों को ही अपनी भाषा, यानी हिन्दी में अपनी बात सबके सामने रखने में शर्म क्यों करनी चाहिए?

खेल-कूद के मैदान में अपने दम-खम और क्रीड़ा-कौशल का प्रदर्शन करके देश-वासियों के दिलों में दशकों तक के लिए जगह बना लेनेवाले हमारे खिलाड़ी और क्रीड़ा-जगत के लोग जब ऐसी बातें कहते और करते हैं तो मन प्रसन्न हो जाता है। देश के सबसे लोक-प्रिय खेल क्रिकेट से जुड़े मदनलाल अकसर और कभी-कभी कपिल देव भी हिन्दी में बोलते दिख जाते हैं। नवजोत सिंह सिद्धू का हिन्दी और अंग्रेजी पर समान अधिकार है और वे भी कई बार हिन्दी में बात करते हैं। हिन्दी सिनेमा से जुड़े ज्यादातर लोग अंग्रेजी-दां हैं। बहुत कम लोग हिन्दी को अपनी रोज-मर्रा की सामाजिक जिन्दगी में इस्तेमाल करते हैं। तो सवाल यह है कि जैसा जज्बा श्री मिल्खा सिंह ने दिखावाल हिन्दी के लिए वैसा जज्बा आज कितने लोगों के दिल में है? जो लोग हिन्दी के राजभाषा होने के कारण नौकरी पाए हुए हैं और यदि हिन्दी राजभाषा न होती तो कौड़ी के तीन होते, ऐसे लोगों के मन में भी हिन्दी के लिए शर्त-रहित प्रेम बहुत कम दिखाई पड़ता है। उनमें से बहुत-से लोग अपने निजी जीवन में हिन्दी का इस्तेमाल बहुत कम करते हैं। अपने आस-पास स्थित लोगों का बारीकी से अन्वीक्षण करने पर हम पाते हैं कि राजभाषा हिन्दी की नौकरी बजा रहे बहुत-से लोगों के मन में हिन्दी के लिए निजी तौर पर कोई भी जगह नहीं है। कुल मिलाकर वे लोग दोहरे चरित्रों वाले लोग हैं। और कमोबेश हर सरकारी नौकरी-पेशा व्यक्ति का यही हाल है।

इसके विपरीत हमारे खिलाड़ी और सार्वजनिक क्षेत्र से संबद्ध ये हस्तियाँ हैं, जो हिन्दी में अपनी बात दुनिया के सामने रखने में अपनी शान समझती हैं। इसके पीछे कारण क्या है, ज़रा इसकी ओर ध्यान देने की ज़रूरत है।

दरअसल भाषा अपने-आप में कोई हेतु या कारण नहीं है, वह तो हमारी आपसी बातचीत का माध्यम मात्र है। खेल जगत में, समाज-सेवा में, कला के क्षेत्र में अपनी जगह बना चुका व्यक्ति भाषा को बहुत गौण मानता है। वह अपनी विशेष योग्यता वाले क्षेत्र पर ही ध्यान केन्द्रित करता है। एम.एफ. हुसैन ने अपनी चित्र-कला से जो मुकाम हासिल कर लिया था, उसके चलते वे नंगे पाँव घूमें या जूते पहनकर, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। दुनिया के बड़े-बड़े खिलाड़ी, कलाकार, गायक, अभिनेता आदि हर जगह, हर प्रयोजन के लिए अपनी मातृ-भाषा का इस्तेमाल करते हैं और उनके मन में यह विचार भी नहीं आता कि उन्हें सामनेवाले को समझाने के लिए अपनी मातृ-भाषा से इतर कोई भाषा (जैसे अंग्रेजी) बोलनी चाहिए।

अपनी मादरी ज़बान को छोड़कर अंग्रेजी बोलने की ज़रूरत हम मध्यवर्गीय भारतीय लोगों को ही महसूस होती है। कारण है हमारी ज़बरदस्त कुण्ठा। हमें लगता है कि अँग्रेज़ी में कही गई बात ज्यादा असरकारक होगी। अँग्रेजी में बात करेंगे तो हमें अधिक पढ़ा-लिखा, सुशिक्षित और रसूखदार विद्वान/अधिकारी/अमीर आदमी समझा जाएगा। इस लिहाज़ से अँग्रेजी हमारे सामाजिक कद को ऊँचा करके दिखाने का एक माध्यम बन जाती है। इसके विपरीत जब हम अपनी मातृ-भाषा (खासकर अपने घर-परिवार की बोली) में बात करते हैं तो भीतर ही भीतर कहीं इस हीन-भावना में घुल रहे होते हैं कि सामनेवाला क्या सोच रहा होगा! हम अपने गाँव की भाषा बोलेंगे तो उसके मन में आएगा कि अरे यह तो बिलकुल गँवई-गाँव का पिछड़ा हुआ व्यक्ति है। जब यह इस भाषा में बात कर रहा है तो इसकी औकात क्या होगी!

बहुत-से लोग अपने गाँव-घर के लोगों से भी अपनी उस नैसर्गिक भाषा में बात नहीं करते जो उनके गाँव और घर में बोली जाती है। गाँव का आदमी भी जब शहर आता है तो अपने अभिन्न लोगों व परिजनों से बात करने के लिए भी वह खड़ी बोली या अपनी भाषा के परिनिष्ठित रूप का इस्तेमाल करता है। इस प्रवृत्ति की भाषा-वैज्ञानिक नहीं, समाज-वैज्ञानिक पड़ताल करने की ज़रूरत है।

दरअसल बुनियादी तौर पर हम आम भारतीय इतने दबे-कुचले और गरीब लोग हैं कि अपनी गरीबी को किसी दूसरे के सामने दिखाते हमें लाज आती है। जैसे ही हमें दिखाने लायक कोई वस्तु या सामग्री मिल जाती है, हम उसे सबके सामने प्रदर्शित करके अपनी मान-मर्यादा की पताकाएँ फहराना चाहते हैं। हमारी जरूरत से कहीं बड़े मकान, बड़े सोफे, जरूरत से बड़ी गाड़ियाँ, ये सब चीजें हमारी स्फीत औकात, वास्तविक आकार से बड़ा आभास देनेवाली हमारी हैसियत का भ्रामक दृश्य पैदा करती हैं। हमें अपने जीवन को उसकी नैसर्गिक स्थिति में स्वीकार करने में शर्म आती है। जीवन के हर क्षेत्र पर यह बात लागू होती है और यदि उस हर क्षेत्र का चर्चा किया जाए तो फेहरिस्त बहुत लंबी होती चली जाएगी। लब्बो-लुआब यह कि भारतीय जीवन की सारी जाति-प्रथा, सारी दहेज-प्रथा, सारी ऑनर-किलिंग, सारी ढकोसलेबाजी कहीं न कहीं जीवन के नैसर्गिक प्रवाह के प्रति एक गहन अस्वीकार और लगभग उटोपिया की हैसियत रखनेवाले मानदंडों के पीछे भागने की प्रवृत्ति का परिणाम है।

हिन्दी और हिन्दीतर अन्य भारतीय भाषाओं व अपनी बोलियों के प्रति हीनता की दृष्टि रखने के कारण हम पीछे भागते हैं अंग्रेजी के, क्योंकि वह हमारे मन में गौरव का बोध जगाती है। आप इंटरनेट की किसी भी सामाजिक साइट पर जाइए। हिन्दी/देवनागरी में बहुत कम सामग्री मिलती है, अंग्रेजी/रोमन में ढेरों- बल्कि लगभग पूरी की पूरी। व्यक्तियों द्वारा नेट पर अंग्रेजी में डाली गई लगभग 90 प्रतिशत सामग्री अंग्रेजी के भ्रष्ट प्रयोगों से भरी पड़ी है। न लोगों को शब्दों के अर्थ का विवेक है, न उनकी वर्तनी का और न वाक्य-विन्यास का। इसके बावज़ूद वे अंग्रेजी में लिखते हैं। इसलिए लिखते हैं कि उनके मन में अंग्रेजी के लिए व्यामोह है। झूठा मोह। मोहाविष्ट आदमी टिकठी पर बंधे मुर्दे को भी नाव समझ लेता है और उसी के सहारे अपने प्रेय की तलाश में निकल पड़ता है। अंग्रेजी से मोहाविष्ट हम हिन्दुस्तानी इसका अपवाद नहीं हैं।

अब बात फिर से राजभाषा-हिन्दी के कर्ता-धर्ताओं की। बहुत पहले से सी-डेक और इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग ने हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं के लिए इन्स्क्रिप्ट कुंजी पटल तैयार करके उपलब्ध कराया हुआ है। यह कुंजी पटल भारतीय लिपियों की वर्ग-व्यवस्था यानी क-वर्ग, च-वर्ग, ट-वर्ग आदि पर आधारित है, जिसमें बाएं हाथ की अंगुलियों से स्वर और दाहिने हाथ की अंगुलियों से व्यंजन चलते हैं और एक ही अंगुली से, ऊपर नीचे की कुंजियों के अपर व लोअर केस का इस्तेमाल करते हुए संबंधित वर्ग के चारों वर्ण (जैसे क, ख, ग और घ) टाइप किए जा सकते हैं। इन्स्क्रिप्ट कुंजी-पटल की यह व्यवस्था आकृति आदि सॉफ्टवेयरों में उपलब्ध थी और अब यूनीकोड के लिए भी सबसे उपयुक्त पड़ती है। इसके अलावा रोमन के माध्यम से और परंपरागत रैमिंगटन कुंजी-पटल के ज़रिए भी हिन्दी में टंकण का काम किया जा सकता है। किन्तु सबसे वैज्ञानिक व्यवस्था इन्स्क्रिप्ट कुंजी-पटल में उपलब्ध है। राजभाषा कार्यान्वयन से जुड़े बहुत कम व्यक्ति इन्स्क्रिप्ट का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे स्वयं तो रोमन के माध्यम से हिन्दी में टाइप करते ही हैं, साथ ही, जिस किसी को सिखाते हैं उसे भी यही उल्टा पहाड़ा पढ़ा देते हैं। भारतीय भाषाओं का ककहरा प्रायः एक-सा है, केवल लिपियों में अंतर है। बेहतर होता कि हम इन्स्क्रिप्ट कुंजीपटल का इस्तेमाल करके अपनी-अपनी भाषा (जिसमें हिन्दी भी बड़े पुरज़ोर तरीके से शामिल है) में कंप्यूटर पर काम करते। पर हम प्रचार कर रहे हैं रोमन कुंजीपटल का। पहले आप अपने कथ्य को रोमन में लिखना सीखिए, तब अपनी लिपि में उसे व्यक्त कर पाएँगे।

देश के आज़ाद होने के समय गाँधी जी ने बीबीसी के संवाददाता से कहा था- दुनिया से कह दो, गाँधी अँग्रेजी भूल गया। आज जब कि हमें अपनी भाषाओं के इस्तेमाल के मामले में बहुत आगे बढ़ जाना चाहिए था, हम मनसा, वाचा, कर्मणा पूरी दुनिया से कह रहे हैं- हमें अपनी मातृ-भाषा बोलने और लिखने में शर्म आती है। हम अंग्रेजी के गुलाम हैं। बिना अंग्रेजी बोले हमें कल नहीं पड़ती है। अंग्रेजी बोल लेते हैं तो हमारी शान बढ़ जाती है।

ऐसे में हिन्दी का परचम लेकर दौड़नेवाले आदरणीय मिल्खा सिंह जी की कदमबोसी करने का मन करता है। वे हमारे लिए हिन्दी के अग्र-दूत हैं। चार सौ मीटर की दौड़ में वे चाहे ओलंपिक पदक न जीत पाए हों, किन्तु हिन्दी की पैरोकारी करके उन्होंने हम जैसे करोड़ों राष्ट्र-प्रेमियों के दिलों को जीत लिया है। हिन्दी और अपने राष्ट्र के लिए उनके इस जज्बे पर हजारों हजार ओलंपिक पदक कुर्बान किए जा सकते हैं

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डॉ. आर.वी. सिंह

उप महाप्रबन्धक (हिन्दी)/ Dy. G.M. (Hindi)
भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक/ Small Inds. Dev. Bank of India
प्रधान कार्यालय/Head Office
लखनऊ/Lucknow- 226 001

2 blogger-facebook:

  1. इसीलिये तो कहते है -अंगरेज तो चले गए , अपनी नाजायज औलाद हिंदुस्तान में ही छोड़ गए -रेनिक बाफना [मेरे ब्लॉग : renikbafna.blogspot.com renikjain.blogspot.com ] I can write in English, but to promote Hindi, I write in Hindi

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  2. सिंह जी ,
    बहुत सुंदर लेख दिया है , आपने | हिंदी साहित्य के लिए प्रेरणा है |

    उत्तर देंहटाएं

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