शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

रचना गौड़ "भारती" की लघुकथाएँ

ये कहां आ गए हम...।

एक संस्‍थानिक क्‍विज़ में पूछे गए सवाल-‘‘भारत की विशेषताएं क्‍या-क्‍या हैं?''

बच्‍चों ने उसकी संस्‍कृति सभ्‍यता और रहन सहन की सम्‍पूर्ण बातों का जिक्र कर डाला। अगला प्रश्‍न-‘‘भारत विकसित और विकासशील में क्‍या कहलाएगा ?''

एक लड़के ने जवाब दिया-‘‘विकसित।''

हमने पूछा-‘‘कैसे कह सकते हो?''

‘‘मैडम, जो देश अमेरिका,ब्रिटेन व जापान से आगे है वह विकसित ही तो होगा।''

‘‘ऐसे नहीं सिद्ध करो।''

‘‘भारत सरोगेसी में अव्‍वल है, 4450 लाख अमरीकी डॉलर का तो वार्षिक कारोबार ही होता है। भारत में, विदेशों की तुलना में किराए की कोख आसानी से मिल रही है। 24 अरब रूपए के करीब है सरोगेसी का ‘बाज़ार' भारत में।''

उसका इतना कहना था कि मुझे अचानक चश्‍मे से धुंधला दिखता प्रतीत होने लगा। भारतीय संस्‍कृति व सभ्‍यता पर लगे धब्‍बे शायद मेरे चश्‍मे के लैंस पर छा गए थे।

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फैशन

घर में मेहमान आने वाले थे अपनी जवान लड़की को मैंने ढंग के हिन्‍दुस्‍तानी कपड़े पहनने को कहा तो-‘‘मम्‍मां! आप नहीं जानतीं आजकल तो लड़कियां इससे भी छोटे-छोटे कपड़े पहनती हैं। ''

‘‘पहनती होंगी, यह उनके संस्‍कार हैं।''

‘‘मम्‍मां, जस्‍ट चिल।''

कुछ ही दिन में बच्‍चों के ज़ोर देने पर हमारा पूरा परिवार एक फिल्म देखने गया। उसमें बच्‍चों व पेरेन्‍ट्‌स की बातचीत कुछ इस प्रकार थी-‘‘लड़कियों को आज़ादी मिलनी चाहिए, ये उनका हक है।''

उसकी मम्‍मी गुस्‍से से-‘‘अधिक आज़ादी से लड़कियां प्रैग्‍नेंट हो जातीं हैं।''

ए.सी. थिएटर में भी मुझे पसीना आ गया। दुनिया कहां जा रही है। इसका मतलब ये फिल्‍में ही बच्‍चों को भ्रष्‍ट कर रही हैं।

खैर! मूड फ्रैश करने के लिए सोचा थोड़ी शॉपिंग ही कर लें। साड़ियां दिखाते हुए दुकानदार-‘‘ये देखिए, करीना कपूर ने पहनी थी बिल्‍कुल ऐसी साड़ी। है न वही।''

‘‘.............''

‘‘अरे साब! इसका तो प्रियंका चोपड़ा ने ऐड किया है।''

हम साड़ियां छोड़ दुकान से नीचे आ गए, पता नहीं साड़ियां पसन्‍द नहीं थीं या कि उसकी सोच। कुछ दिन पूर्व ही पूनम ने अपने टेलर से कहा था-‘‘मास्‍टर जी! बैकलैस ब्‍लाउज़ बनाइए सिर्फ एक ब्रोच वाला।''

किसे दोष दें फिल्‍मों को, फिल्‍म स्‍टार को जो उन्‍हें बेच रहे हैं या बिकने वाले घिनौने विचार को। पूर्वी बार-बार पूछ रही थी-‘‘मम्‍मां, मैं ये ड्रेस ले लूं, प्‍लीज़।''

मैंने झुंझंलाकर स्‍वीकृति में सिर हिला दिया।

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तीर्थान्‍त

केदारनाथ त्रासदी में असंख्‍य श्रृद्धालुओं को अपनी जान गंवानी पड़ी। ये कैसा कहर था भगवान का जो हर वर्ष किसी न किसी रूप में लोगों को झेलना पड़ता है। चारों तरफ चीख पुकार का कोलाहल था। तभी मलबे में दबे युवक की आवाज़ आयी-‘‘हे भगवान! बचा ले मुझे!''उसके परिजन रो रोकर बेहाल थे। रमाकांत ने पूरे साल इंतज़ार कर छुटि्‌टयों का इंतज़ाम किया केदारनाथ यात्रा के लिए। लौटते समय बेटा-बहु को खोकर चले आए। कुछ के मुंह में था भगवान का बुलावा है। कुछ समय व पाप पूरे होने की दुहाई दे रहे थे। भगवान के दरबार में यात्रा वृत्तान्‍त बन गया। फिर भी हर वर्ष बसें भर भरकर यात्रीगण यात्रा पर आते हैं बिना ये सोचे कि लौटकर आ भी पाएंगे कि नहीं, बस गड्‌ढे या खाई में तो न जा गिरेगी। बस एक यही उम्‍मीद है आस्‍था की, जिसपर दुनिया टिकी है। आस्‍तिकों के लिए ये भगवान के समक्ष जीवन उत्‍सर्ग है तो नास्‍तिकों के लिए उनके पाप कर्म का पूरा होना। दुनिया व भगवान वही हैं पर आस्‍थाएं तो अनेक हैं। अगले साल देखें किसका बुलावा आता है

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रचना गौड़ ‘भारती'

(कवियत्री एंव लेखिका)

कार्यकारी सम्‍पादक ‘‘जिन्‍दगी Live"‍ त्रैमासिक पत्रिका कोटा (राज.)

कोटा (राज.)324008

email-racchu68@yahoo.com

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