शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

अनिल जैन ' उपहार ' की कविताएँ


 

काल की विभीषिका  '


.
क्रूर काल के काले साये ने
फिर मेरे प्रदेश को लील दिया ।

धरा का विश्वास खंडित हो गया ।

यह कैसा अभिशाप मेरे युग की पीढ़ी भोग रही है
और अपने दुर्दिनों का गरल
गटक रही है ।
रूखी पहाड़ियों को सिसकते देख, शुक कृशकाय पेड़ काँपते हैं ।
अपने पशुओं की भीगी आँखों में

मेरे कृषक पड़ोसी के व्याकुल प्राण

आहत सीसी का इतिहास बाँचते हैं ।

गोबर मिली घास के तिनकों से पेट की ज्वाला शान्त करते
ये अभागे पशु
जीने की आस में रोडियाँ कुरेदते हैं,

और जंगल में किसी कलेजे के टुकडे,

अपने माँ-बाप की विवशता पर
तड़पते हैं


झीलों के आकार सिमट गये
फूलों की मुसकानें लुप्त हुईं,
भ्रमरों का गुंजन मन्द हुआ सरिता का संगीत खो गया ।

बार-बार की इस विभीषिका ने ।

प्रकृति को वैभवहीन
विधवा का स्वरूप दे दिया

भीगे स्वर, भीगी आँखें.

कुंठित मन, चेहरे उदास,
जीवन के मधुमय सपनों पर, पड़े कोहरे का साक्षी है
यह अन्तहीन इतिहास

इस पर भी अस्मत के लुटेरे,

हवस के दरिन्दे, पेट की खातिर
तन. के सौदों को मजबूर कर रहे हैं

और हम अपने कंधों पर
मानवता की लाश लिए
बोलो कौन-सी सदी की ओर बढ़ रहे हैं?

 


 

सरस्वती वंदना।


जोड़कर दोनों हाथों को श्रद्धा से

तुझको करता हूँ अर्पित सुमन शारदे । ।

दास चरणों का अपने मुझे जानकर, '

कर ले स्वीकार मेरा नमन शारदे ।
मुझको दौलत मिली और जो शोहरत मिली । ।

सच तो ये है किं तेरी बदौलत मिली ।!

तू जो कर दे करम तो चमक जाऊंगा,
ऐसा कहता है अब मेरा मन शारदे । ।

तेरी नजरों में हर इक का समान है ।
जैसा तुलसी है वैसा ही रसखान है ।
त्नेके कन्या कुमारी से कश्मीर तक, '

है ये तेरा ही सारा चमन शारदे ।
ये दिखावा नहीं मेरा ईमान है ।
जान में जब तलक भी मेरे जान है । ।

गीत प्यार- ओ-मोहब्बत के मैं गाऊँगा । ।,

दे रहा हूँ मैं तुझको वचन शारदे ।

मेरी भगवान से है ये आराधना ।
मंच पर जब करूं मैं तेरी वंदना ।
तेरी महिमा की गाथा को गाते हुए
बनाऊं जीवन को अर्थवान शारदे । । ।

सद्भावना का दीप


दीवार नफरत की गिरेगी ।
हवा दहशत की थमेगी ।
बन्द दरवाजे खुलेंगे
दाग दामन के धुलेंगे ।
अन्धेरा गम का भागेगा ।
घरा का भाग जागेगा ।
दूरियां सिमट जायेगी
खलिश भी सिर झुकायेगी ।
दुश्मन द्वार आयेगा ।
गले अपने लगायेगा ।
गिले-शिकवे भुला एक बार,।
दिल से दिल मिलाओ तो सही ।
सद्भावना का दीप छोटा-सा, जलाओ तो सही । 
2 देहरी आँगन मिलेंगे । ।,
गीत गजलों से जुड़ेंगे ।
रास्ते के खड़े कांटे,
फूल बनकर खिलेंगे ।
हमदर्दी के हाथ जब भी,
साथ मिलकर उठेंगे ।.
अंधेरे सिर झुका कर
रोशनी के कदम चूमेंगे ।
जिन्दगी खुलकर हँसेगी ।
अमन के नग्मे लिखेगी ।
प्यार से एक बार यारों,
मुस्कराओ तो सही ।
सद्भावना का दीप छोटा-सा, जलाओ तो सही ।
3.
स्वार्थ की फसलें जलेंगी ।
बीज कटुता के सडेंगे ।
भाई से भाई कभी भी
फिर न आपस में लड़ेंगे ।
द्वेषता का दमन होगा ।
खुशनुमा हर चमन होगा ।
भाईचारे की जमीं पर,
महकता गुलबदन होगा ।
अमन की बरसात होगी ।
गिरते हुए को प्यार से
मिलकर उठाओ तो सही ।
सद्हावना का दीप छोटा-सा जलाओ तो सही ।
4
एकता के पुल बनेंगे ।
शान्ति की धारा बहेगी ।
नम्रता की धरा जीवन की
मधुर गाथा कहेगी । दया, क्षमा, करुणा व्यापेगी ।
कण-कण में ऋजुता जागेगी ।
नैतिकता फिर भाव भूमि को मर्यादा में बांधेगी ।
मानवता के दीप जलेंगे ।
सद्भावों के फूल खिलेंगे ।
विनम्रता के नीर से, अभिमान की ज्वाला बुझाओ तो सही ।
सद्भावना का दीप छोटा सा, जलाओ तो सही ।
तुमने संस्कारों के बीज रोप
संघर्षों के झंझावत और
असहनीय पीडा भोगते हुये
लगाया था जो बिरवा,
' आज पल्लवित और पुष्पित होते देख
मन ही मन प्रसन्न होती थी तुम ।

माँ!


तुम्हारी दुआओं के असर ने
चमन को महकाया, खुशनुमा बनाया ।
खुद उलझी रही पुरातन परम्पराओं, मर्यादाओं
के बन्धन में ।
ना कोई इच्छा, आकांक्षा, शिकायत ।
बस देखना चाहती थी तुम,
अपने त्याग और समर्पण में, अपने अस्तित्व को बनाये रखना ।

अपनी तपस्या के समुचित फल से घर आँगन को महकते देखना ।
माँ भोर की प्रथम किरण के साथ, आशीषों में उठने वाले तुम्हारे हाथ
नित्य नई प्रेरणा, ऊर्जा और स्फूर्ति देते थे ।
आज जब तुम नहीं हो तो ढूँढता हूँ मैं तुम्हें शून्य में ।

और याद करता हूँ
आटा सने तुम्हारे हाथ चौका चूल्हा करते तुम्हारा साथ,

तुम्हारे चेहरे की झुर्रियों में छिपी उस जन्नत को
जिसने दिया घर द्वार, आत्म विश्वास और संस्कार ।

आज तुम्हारी कमी ने हमें,
बना दिया है बेसहारा, बेजान और अनाथ ।
कहने को अब नहीं हो लेकिन, है तुम्हारी
दुआ का, अहसास, विश्वास और प्रकाश
हे माँ!
तुम्हारी रिक्तता अब नहीं भर पायेगी मन के सूनेपन को ।

उदासी और संस्कारों के स्पंदन को ।
लेकिन
तुम्हारी दुआओं के दीप जगमगाते, रोशन करेंगे सूनी राहों को, प्रकाशित करेंगे, उदास हवाओं को काश! मैं समझ पाता माँ होने की परिभाषा
और लिख पाता एक महाकाव्य तुम पर ।
मेरे गीत और छन्द पुकारते हैं तुमको
लेकिन मैं जानता हूँ कि तुम कभी नहीं लौटोगी उसी यात्रा से

हे! ममतामयी, देवी स्वरूपा, ।,
वात्सल्य मूर्ति माँ! तुम्हें अनन्त प्रणाम माँ।
--.

माँ की पीड़ा

सूर्य रश्मियां सबसे पहले
जिसके चरण चूमती थी ।
मलयानिल की मंद समीर
जिसकी गोद में अठखेलियां करती थी ।
लेकिन,
आपसी द्वेष के नाग ने
जिस तरह से तेरे अंगों को डसा है और किया है
आज उस दशा को देखकर
माँ
मेरी लेखनी रो पड़ती है ।
आँसू शब्द बन कविता के रूप में बहने लगते हैं ।
मेरी आंखों में उभरते
अनगिनत सवाल, मुझे अपने
असहाय होने का संकेत मात्र देते हैं ।

मेरा मन फिर उन धुंधली यादों में खो जाता है ।
और, खोजता है, वही पुराना भारत जो कभी सोने की चिड़िया कहलाता था ।
--.

कलम कभी नहीं रुकती

सरस्वती की वीणा है यह, नीलकंठ का शंखनाद है ।
चक्र सुदर्शन श्रीकृष्ण का, गांडीव का भीषण निनाद है । ।
पुरुषोत्तम की मर्यादा-सी दर्प दशानन-सा भारी ।
भीष्म पितामह-सी कठोर, यह बने प्रतिज्ञा की धारी । ।
वेद ऋचाओं की जननी, यह आदि कवि की मन पीड़ा ।
दर्प दलन करती रहती यह दुर्गा -सी बनकर क्रीड़ा । ।
अन्तर में भीषण आग लिये, यह कृश-काया सी दिखती है ।

स्वाभिमान की दीप शिखा यह, कलम कभी नहीं रुकती है ।

महावीर की सत्य अंहिसा, नानक की मीठी वाणी ।
गीता का यह .कर्मयोग है, गौतम की है कल्याणी ।
भ्रमरगीत है सूरदास का, प्रेम दीवानी मीरां की ।
गोस्वामी का पावन मानस, साखी यही कबीरा की ।
स्वार्थों के कुरुक्षेत्र रोंधती, मकाकाल का रूप धरे ।
अन्यायी औंधे मुँह गिरते, ज्यों पतझड़ में पात झर ।
गिरते मानव मूल्यों की, रक्षा में जीवन घिसती है ।
स्वाभिमान की दीप शिखा यह, कलम कभी नहीं रुकती है ।

संस्कृति के गौरव की, रक्षा का दायित्व निभाती है ।
दुर्बलता के मरुथल में, विश्वास का दीप जलाती है ।
यह नहीं किसी की दासी है, समृद्ध राष्ट्र की थाती है ।
लडखडाते जीवन को भी, संबल यही दिलाती है ।
संघर्षों की बेटी है यह, इसे अभावों ने पाला ।
लगे फूल-सी कोमल तो, यह लगे कभी भीषण ज्वाला ।

निष्पक्ष और निर्भीक सदा यह स्वाभिमान से जीती है ।
स्वाभिमान की दीप शिखा यह, कलम कभी नहीं रुकती है ।
--

Anil Jain Uphar

kavi, geetkar

aniluphar123@gmail.com

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  1. आपके इस प्रयास की जितनी सराहना की जाये कम है ,आप रचनाकारों का होसला इसी तरह बढ़ाते रहें तथा माँ शारदे के भंडार कों यूँही भरते रहें इसी मंगल कामना के साथ आपको साधुवाद |एवम नव वर्ष की अशेष शुभ कामनाये |-------------------------अनिल उपहार

    उत्तर देंहटाएं
  2. सद्भावना के द्वीप और माँ पर लिखी कवितायेँ पसंद आई बधाई
    मंजुल भटनागर

    उत्तर देंहटाएं

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