शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

सूर्यकांत मिश्रा का आलेख - ऐश्वर्य की व्याकुलता ने बनाया नरेन्द्र से विवेकानंद

12 जनवरी जयंती पर विशेष
ऐश्वर्य की व्याकुलता ने बनाया नरेन्द्र से विवेकानंद
भारतवर्ष की कुल जनसंख्या में युवाओं की संख्या सबसे अधिक है। यही कारण है कि हमारे देश को युवा भारतवर्ष के नाम से संबोधित किया जाने लगा है। युवा नेता पुत्रों से लेकर खिलाड़ियों की नई पौध और युवा इंजीनियरों तथा वैज्ञानिकों की कुछ कर गुजरने की सोच भी बलवती होती दिखाई पड़ रही है। हमारे अपने देश में ऐसे ही एक युवा सन्यासी को अपने बीच पाकर सैकड़ों वर्ष पूर्व विश्व में अपनी आध्यात्मिक और दार्शनिक सोच के चलते जो पहचान बनाई वह आज एक शक्ति के रूप में खड़ी हो चुकी है। न केवल भारतवर्ष अपितु विदेशों में भी विवेकानंद आश्रम की स्थापना और युवाओं की संगठन ने हमारे अपने चहेते स्वामी विवेकानंद को भरपूर स्नेह दिया है। 19वीं शताब्दी में 12 जनवरी 1863 को जन्मे शिशु नरेन्द्र ने महज 37 वर्ष की उम्र पहुंचते-पहुंचते वेदांत के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरू का दर्जा पा लिया। ऐसे ही महान संतों ने हमारे देश में संतों महंतों के लिए मान सम्मान की पृष्ठभूमि तैयार कर दी। अपने हृदय में देश प्रेम के अलावा छल कपट और स्वार्थ को स्थान न देने वाले महान दार्शनिक स्वामी विवेकानंद ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि संतों के देश में भारतवर्ष की जनता ढाई अक्षर के इस शब्द से भय खाने लगेगी। ऐसे कौन से कारण है जिनके चलते इस देश में संतों की स्थिति बदतर हो चली है उसे यहां बताया जाना जरूरी जान नहीं पड़ता है


ऐश्वर्य से उत्पन्न व्याकुलता ने बनाया सन्यासी
हम जिस युवा सन्यासी और विश्व की सबसे बड़े दार्शनिक पर गर्व करते आ रहे है उनका सन्यास की ओर कदम बढ़ाना भी उनकी व्याकुलता का परिणाम ही था। व्याकुलता किस बात की अथवा व्याकुलता किस कमी की। इस पर विचार भी जरूरी है। आचार्य नरेन्द्र अथवा युवा नरेन्द्र का सादा जीवन विचार बचपन से ही पेड़ों की शाखाओं की भांति विस्तृत फैलाव ले चुका था। युवा नरेन्द्र के मन में व्याकुलता का सबसे बड़ा कारण कुछ ऐसे बिंब प्रकट कर रहा था जो धन संपत्ति, सोना-चांदी, प्रासाद, हाथी-घोड़े, बग्घियां, दास-दासियां, वस्त्राभूषण, भोजन-व्यजंन, सुंदर स्त्रियां तथा ऐश्वर्य में लिप्त जीवन के रूप में उनके समक्ष था। वे इन सभी ऐशो-आराम से अपना पिंड छुड़ाना चाहते थे। यहीं कारण था कि उनके मन में नये विचारों ने-सन्यासी का जीवन, हिमालय की गुफा, बल्कल वस्त्र, सिर पर जटाएं, तपस्या, तपस्या और तपस्या, ईश्वर के प्रति प्रेम, भक्ति दर्शन एवं उससे साक्षात्कार के रूप में जन्म लिया। अंततः ऐश्वर्यता पर त्याग भारी पड़ता दिखा और नरेन्द्र ने सन्यास में ही आनंद की खोज कर ली। 25 वर्ष की आयु में परिजनों द्वारा विवाह की बात किए जाने पर स्वामी विवेकानंद ने जो शब्द कहे वे परिजनों के लिए असहनीय थे। उन्होंने कहा-विवाह कर मैं न गृहस्थों के दायित्व से बच सकता हूं और न ही उनके प्रलोभनों से। कहना न होगा कि बचपन से ही आरामशुदा जिन्दगी के मोह जाल से दूर भागने वाले नरेन्द्र ने विवेकानंद तक का सफर महज ऐश्वर्य से उत्पन्न व्याकुलता के चलते ही पूरा कर पाया और भारतवर्ष सहित विश्व को एक संदेश दे दिया जो आज हम सभी के लिए गर्व का विषय बना हुआ है।


युवावस्था में ही बदल दिया चोला
जिस उम्र में आज के युवा मौज मस्ती करना चाहते है उस उम्र में ही स्वामी विवेकानंद जी ने सन्यासी चोला धारण कर लिया। 25 वर्ष की आयु पहुंचते-पहुंचते उन्होंने गेरूआ वस्त्र धारण करने के साथ ही भारतवर्ष की आध्यात्मिक शक्ति से पूरे विश्व को परिचित कराने का बीड़ा उठा लिया। आज के आधुनिक साधु संत जो एसी कारों और हवाई जहाज तथा हेलीकाप्टर में उड़ते हुए गर्व का अनुभव करते है उन्हें इस बात पर गौर फरमाना चाहिए कि स्वामी जी ने उस छोटी सी उम्र में पूरे भारतवर्ष की पैदल यात्रा की। इतना ही नहीं त्याग और कष्ट को भी स्वामी जी ने अपने जीवन और मिशन का साथी मान लिया था। आज के सन्यासी जहां प्रवचन के अलावा राजनीति पर भी अनाप-शनाप वक्तव्य देने से परहेज नहीं कर रहे है वहीं संत के रूप में स्वामी विवेकानंद जी के वाणी सुनने लोग व्याकुल रहा करते थे। कहते है कि शिकागो सम्मेलन में अन्य देशों के लोगों ने भरसक प्रयास किया कि स्वामी जी को सर्व धर्म सभा में बोलने का अवसर न दिया जाए। एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा वक्त दिया गया जो बाद में वहां उपस्थित सभासदों को इतना प्रभावित किया कि सभी स्वामी जी के दीवाने हो गए। अमेरिका जैसे इसाई समुदाय वाले देश में स्वामी विवेकानंद जी ने अपने चाहने वालों और उनके संदेशों पर चलने वालों का एक बड़ा हुजूम तैयार कर लिया।


युवाओं का किया आव्हान
हमारे देश के महान दार्शनिक और पूरी दुनिया में भारतवर्ष के धर्म ग्रंथों के संदेशों को पहुंचाने वाले आचार्य नरेन्द्र देव ने देश के युवकों का आव्हान करते हुए कहा था कि युवाओं के कंधों में वह शक्ति है जो देश को ताकत दे सकती है। विवेकानंद जी ने युवाओं से कहा था कि वे गरीबों पर दया का भाव रखें, अपने जोश और जुनून को सही दिशा निर्देश देते हुए रचनात्मक कार्य में लगाए। स्वामी जी ने मार्ग प्रेरक लोगों से भी यह उम्मीद की थी कि वे एक अच्छे प्रखर प्रवक्ता बनकर युवाओं को दिशा निर्देशित करें। आज युवा भटका हुआ है, वह यह नहीं समझ पा रहा है कि उसके अंदर कितनी बड़ी शक्ति है और वह क्या कर सकता है? भटकन भरे इस युग में स्वामी विवेकानंद के विचारों के प्रचार-प्रसार की जरूरत जान पड़ रही है। युवाओं में उमंग भर देने वाले तथा तन मन में प्राणों का संचार कर देने वाले ऐसे ही संतों को समाज आज ढूंढ रहा है, जो युवा मन के अंदर छिपी शक्ति को उजागर कर दिखाए। शिक्षा और संस्कार के साथ सामाजिक दुराव को दूर करने में भी युवाओं की भूमिका ही सकारात्मक परिणाम दे सकती है।


वर्चस्व स्थापित करने हुई थी धर्म सभा
सन् 1893 में शिकागो में की गई विश्व धर्म सभा का मुख्य उद्देश्य पूरी दुनिया में इसाई धर्म को प्रचारित-प्रसारित करते हुए वर्चस्व स्थापित करना ही था। उक्त सभा में महज 30 वर्ष की अवस्था में अखिल भारतवर्ष का प्रतिनिधित्व करने पहुंचे युवा संत का चोला और चेहरे का तेज देखकर पूरे विश्व के प्रतिनिधि स्तब्ध रह गए। सबसे युवा एंव तेजस्वी स्वामी विवेकानंद के धार्मिक व्याख्यान को सुनने पूरे अमेरिका में व्याकुलता देखी गई। सभा में जाने से पूर्व स्वामी विवेकानंद ने स्वामी तुरीयानंद से कहा था कि धर्म सभा का आयोजन हमारे लिए ही हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि भारतवर्ष के धर्म और आध्यात्म को सत्य की कसौटी पर स्वीकार करने अब पूरे संसार को अधिक समय इंतजार नहीं करना पड़ेगा। स्वामी विवेकानंद की उक्त सोच और आत्मविश्वास को खरा उतरने में वास्तव में समय नहीं लगा। जब स्वामी जी ने अपने उद्बोधन की शुरूआत अमेरिकी बहनों और भाईयों शब्द से की, तो हिन्दुस्तान की संस्कृति  ने सभी को आल्हादित कर दिया। स्वामी जी के द्वारा स्वयं लिखे पत्र में कहा गया है कि इसाई धर्म का अन्य सभी धार्मिक विश्वासों पर वर्चस्व साबित करने हेतु ही विश्व धर्म सभा का आयोजन किया गया है। उन्होंने पुनः एक स्थान पर लिखा है कि-मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यह विश्व धर्म महासभा का संगठन विश्व के समक्ष अक्रीस्तियों का मजाक उड़ाने के लिए किया गया है। बाद में सभा के क्रियाकलापों का अध्ययन करने वालों ने स्वामी जी द्वारा कहे गए शब्दों पर मुहर लगा दी।


विवेकानंद के आदर्शों को संतों ने भुलाया
वेद-वेदांत और योग क्रिया को पश्चिमी संस्कृति में प्रचलित करने की प्रबल इच्छा रखने वाले महान दार्शनिक संत और युवाओं के आदर्श विवेकानंद जी के संदेशों को स्वयं संतों ने भुला दिया है। कहीं न कहीं समाजसेवा और देश को उच्च आदर्शों तक पहुंचाने वाले उस युवा दार्शनिक की सोच अब स्वार्थ और लक्ष्मी प्राप्ति के प्रयास से जुड़ी हुई देखी जा रही है। अपना संपूर्ण जीवन गुरू चरणों में समर्पित कर देने वाले आचार्य नरेन्द्र नाथ की गुरू भक्ति भी असंयमित जीवन चर्या में दबी पड़ी है। आध्यात्मवाद और भौतिकवाद के झंझटों से दूर समता के सिद्धांत की जो मजबूत नींव विवेकानंद जी ने तैयार की थी उसे बाद के उत्तराधिकारियों ने नजरअंदाज करते हुए आधार को ही हिलाकर रख दिया है। विवेकानंद जी का सामाजिक दर्शन वास्तव में देखा जाए तो युवाओं को दृष्टिगत रख तैयार किया गया था। यह बड़े दुख का विषय है कि आज का युवा पूर्ण रूप से भटकन के मार्ग में है। बचपन से ही धर्म और आध्यात्म की ओर झुकाव रखने वाले शालीनता के प्रति स्वामी जी ने पूजा पाठ और योग को अपनी दिनचर्या में शामिल कर रखा था, जो आज युवाओं की समय सारणी से गायब है। संतों पर अटूट विश्वास की जो धारा स्वामी जी ने समाज में बहाई थी वह आज गंदी हो चुकी है। कहना न होगा कि इस गंदगी के लिए जहां आधुनिकता जिम्मेदार दिखाई पड़ रही है वहीं दूसरी ओर समाज को दिशा देने वाले संतों का चोला भी अब विश्वास की मजबूत परंपरा पर अमिट धब्बा बनकर रह गया है।

                             प्रस्तुतकर्ता
                                       (डा. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
                                    मो. नंबर 94255-59291

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