गुरुवार, 16 जनवरी 2014

रामवृक्ष सिंह का आलेख - अमृता प्रीतम

अमृता प्रीतम

रामवृक्ष सिंह

चार वर्ष की वय में सगाई, सोलह-सत्रह की वय में विवाह, बीस-इक्कीस की वय में मुहब्बत- और ज़िन्दगी भर का शिकवा, बकौल खुद अमृता प्रीतम-

लक्ख तेरे अम्बारां बिच्चों, दस्स की लब्भा सान्नूं

इक्को तंद प्यार दी लब्भी, ओह बी तंद इकहरी..

(तू ही बता कि लाखों के तेरे खज़ाने में से मुझे क्या मिला? इक डोर मिली प्यार की, वह भी इकहरी!!)

सोहणी-माहिवाल, हीर-राँझा और बुल्ले शाह के प्रांत पंजाब की प्रेम-पगी फिज़ाओं में, वर्तमान पाकिस्तान के गुजरांवाला में 31 अगस्त 1919 को एक सिक्ख परिवार में अमृता प्रीतम का जन्म हुआ। ‘रसीदी टिकट’ शीर्षक अपनी आत्मकथा में उन्होंने अपने माता-पिता का ज़िक्र कुछ इस प्रकार किया है- “मेरे माँ-बाप, दोनों पंचखंड भसोड़ के स्कूल में पढ़ाते थे। ”

माता-पिता के पूर्व-राग का वर्णन उन्होंने इस प्रकार किया है- “…बीस बरस की राज बीबी ने गुजरांवाला में साधुओं के एक डेरे में माथा टेका और उसकी नज़र कुछ उतने ही बरस के एक ‘नंद’ नाम के साधु पर जा पड़ी थी।” नंद नाम के ये सज्जन, जो अमृता प्रीतम के पिता बने, साहूकार परिवार में जन्मे थे और केवल छह माह की वय में माँ के चल बसने के कारण उनके वात्सल्य से महरूम हो गये थे। उनसे बड़े चार भाई थे और एक बहन, जिसने गौने के समय पति-गृह जाने के बजाय खुद को संन्यासिन घोषित कर दिया। इन्हीं बड़ी बहन की प्रेरणा से स्वयं नंद भी बचपन में कराई गयी सगाई तोड़, गेरुआ धारण कर, संत दयालजी के डेरे में शामिल हो गये और बालका साधु के नाम से पुकारे जाने लगे। उधर अमृता की माताजी राज बीबी गाँव मांगा, जिला गुजरात की रहनेवाली थीं। अदला-बदली में जिस व्यक्ति से उनका विवाह हुआ था, वह फौज में भरती होकर न जाने कहाँ गुम हो गया। राज बीवी अपनी विधवा भाभी के साथ रहकर एक स्कूल में पढ़ाती थीं। हर रोज़ स्कूल जाने के पहले दयालजी के डेरे में माथा टेकने का उन दोनों का नियम था। बकौल अमृता प्रीतम- “एक दिन जब दोनों दयालजी के डेरे आयीं, ज़ोर से मेंह बरसने लगा, दयालजी ने मेंह का समय बिताने के लिए अपने बालका साधु से कविता सुनाने के लिए कहा। वह सदा आँखें मूंदकर कविता सुना करते थे। उस दिन जब आँखें खोलीं तो देखा- उनके नंद की आँखें राज बीबी के मुँह की तरफ भटक रही हैं। कुछ दिनों बाद उन्होंने राज बीबी की व्यथा सुनी और नंद से कहा, नंद बेटा! जोग तुम्हारे लिए नहीं है। यह भगवे वस्त्र त्याग दो और गृहस्थ आश्रम में पैर रखो।... यही राज बीबी मेरी माँ बनीं और नंद साधु मेरे पिता। नंद ने जब गृहस्थ आश्रम स्वीकार, अपना नाम करतार सिंह रख लिया। कविता लिखते थे, इसलिए एक उपनाम भी- पीयूष। दस वर्ष बाद जब मेरा जन्म हुआ, उन्होंने पीयूष शब्द का पंजाबी में उल्था करके मेरा नाम अमृता रख दिया...।”

अमृता जब केवल दस-ग्यारह बरस की थीं, तभी माँ गुजर गयीं। पिता का झुकाव कभी फकीरी की ओर होता, तो कभी अमीरी की ओर... एक ऐसी विरासत जो अमृता को अपने पिता से खूब-खूब मिली- “आज आधी सदी के बाद सोचता हूँ- जैसे फकीरी और अमीरी, दोनों एक ही समय में, मेरे स्वभाव में हैं और वह स्वभाव, अपने नै-नक्श की तरह मुझे पिता से मिला है, शायद...।” पिता ने उन्हें पूजा-पाठ के लिए बार-बार प्रेरित किया, किन्तु माँ की असमय मृत्यु ने अमृता के मन में ईश्वरीय सत्ता के प्रति संदेह उपजाते हुए, उनको लगभग नास्तिक बना दिया था और ईश्वर की जगह उनके मन में किसी राजन को ला बिठाया था- “अब आँखें मींचकर अगर मैं ईश्वर का चिंतन न करूँ तो पिताजी मेरा क्या कर लेंगे? जिस ईश्वर ने मेरी वह बात नहीं सुनी, अब मैं उससे कोई बात नहीं करूँगी। उसके रूप का भी चिन्तन नहीं करूँगी। अब मैं आँखें मींचकर अपने राजन का चिन्तन करूँगी। वह मेरे साथ सपने में खेलता है, मेरे गीत सुनता है, वह कागज लेकर मेरी तसवीर बनाता है- बस उसी का ध्यान करूँगी, उसी का।”

मातृ-हीना अमृता के जीवन में सोलहवें साल का आगमन स्वाभाविक रीति में न होकर किसी चोर की तरह हुआ, जिसे वे ईश्वर की साजिश मानती हैं, क्योंकि उससे उनके बचपन की समाधि टूट गई थी। सोलह की वय में अमृता ने कविताएं रचना शुरू कर दिया था। पिता ने उन्हें क़ाफ़िये-रदीफ़ की तमीज़ सिखाई, लेकिन इस हिदायत के साथ कि वे धार्मिक कविताएँ लिखें। रूमानियत के जो संस्कार लेकर अमृता पैदा हुई थीं, वह सोलहवें साल के आगमन के साथ ही सांध्र होने लगे थे। यहाँ से उनकी तसव्वुराना उड़ान शुरू हुई, जो ताज़िन्दग़ी जारी रही- “ख़ुदा की जिस साजिश ने यह सोलहवाँ वर्ष किसी अप्सरा की तरह भेजकर मेरे बचपन की समाधि भंग की थी, उस साजिश की मैं ऋणी हूँ, क्योंकि उस साजिश का संबंध केवल एक वर्ष से नहीं था, मेरी सारी उम्र से है।”

पाकिस्तान में थीं तो कुछ दिन लाहौर ऑल इंडिया रेडियो में काम किया। वहाँ उनका परिचय सज्जाद हैदर से हुआ। स्वयं अमृता प्रीतम के शब्दों में कहें तो “अपने समकालीनों में किसी एक से भी ऐसी मुलाकात नहीं हुई, जो उलझनों और ग़लतफ़हमियों से रहित होकर हुई हो। दोनों हाथों से तल्ख़ियाँ बाँटनेवाली सब मुलाकातों में केवल सज्जाद की ऐसी मुलाकात थी, जो पहली थी और जिसके साथ दोस्ती लफ़्ज़ आँखों के आगे झिलमिला जाता था...।” सियासत ने ज़मीनें बाँट दीं, लेकिन दिलों के बंधन को और मजबूत किया। इस जज्बे को सज्जाद और अमृता ने बड़ी शिद्दत से जिया। अमृता की उदासी दूर करने के लिए सज्जाद लाहौर से दिल्ली आये, अट्ठारह दिन रहे। अमृता के अनुसार- “यह मेरी ज़िन्दग़ी में पहला समय था, जब मैंने जाना कि दुनिया में मेरा भी कोई दोस्त है, हर हाल में दोस्त, और पहली बार जाना कि कविता केवल इश्क के तूफान में से ही नहीं निकलती, यह दोस्ती के शान्त पानियों में से भी तैरती हुई आ सकती है।” सज्जाद के जाने के समय अमृता ने लिखा- “कहीं पंख बिकते हों तो हमें दे दो, परदेसी! या हमारे पास रह जाओ..।”

रूमानियत और अमृता प्रीतम का रिश्ता बहुत गहरा रहा है, जो सोलहवें साल के पड़ाव से होता हुआ जीवनपर्यन्त उनके साथ चला है। प्रेम और क्रान्ति के शायर साहिर लुधियानवी ने अपनी एक ग़ज़ल में कहा है- एक साया मुझे देता है, मुसलसल आवाज़ और फिर अपनी ही आवाज़ से घबराता है। अपने बहके हुए अंदाज़ का अहसास नहीं, मेरे बहके हुए अन्दाज़ से घबराता है। पढ़नेवाले यह जानकर हैरान न हों कि अमृता प्रीतम ने जब से रूमानियत की दुनिया में परवाज़ भरनी शुरू की, उनके ज़हन में एक साँवले से शख्स का साया तारी होता चला गया। जानते हैं वह अक़्स किसका था?- खुद साहिर लुधियानवी का। गोकि उस चेहरे का ज़िक्र अमृता प्रीतम ने बड़े रहस्यवादी तरीके से किया है, मुराद उनकी साहिर से ही है- “एस साँवला-सा साया था, जो बचपन से ही मेरे साथ चलने लगा। फिर धीरे-धीरे जाना कि इसमें बहुत कुछ मिला हुआ है- अपने महबूब का चेहरा भी, और अपना भी, जिसकी मुझे अभी केवल तमन्ना थी, मुझसे कहीं अधिक सयाना, गंभीर और तगड़ा- और इसके अलावा अपने देश और हर देश के मनुष्य का स्वतंत्र चेहरा भी...।”

लाहौर में साहिर से नज़दीकियों के बावज़ूद उनका रिश्ता किसी स्थायी मुकाम पर नहीं पहुँच सका। हालांकि साहिर के लिए उनकी चाहत दीवानगी की हद तक पहुँच गई थी। उसी दीवानगी में कभी अमृता ने चाहा कि उनकी पहली संतान की शक्लो-सूरत साहिर जैसी हो। गर्भावस्था में उन्होंने अपने कमरे में साहिर की तस्वीरें टाँगीं, हमेशा उन्हीं के खयालों में डूबी रहीं। “दीवानगी के इस आलम में जब 3 जुलाई 1947 को बच्चे का जन्म हुआ, पहली बार उसका मुँह देखा, अपने ईश्वर होने का यकीन हो गया, और बच्चे के पनपते हुए मुँह के साथ यह कल्पना भी पनपती रही कि उसकी सूरत सचमुच साहिर से मिलती है...।” बेटे का नाम उन्होंने नवराज रखा। इसी नवराज क्वात्रा का 65 वर्ष की वय में मुम्बई में कत्ल कर दिया गया।

नवराज के अलावा उनके कंदला नाम की एक बेटी भी हैं। नवराज़ ने तो कभी जिन्दगी को नया मोड़ देने पर अपनी माँ से शिकायत भी की, लेकिन कंदला ने उनके दर्द और जज्बात को एक औरत के नज़रिए से समझा और समझाया- “ममा! आप बहुत सोचा न करें, सैली (नवराज) बड़ा हो जाएगा तो अपने-आप ठीक हो जाएगा। ”

देश के बँटवारे ने अमृता को झिंझोड़कर रख दिया और ऐसी टीस उनके मन में भर दी, जो उनकी रचनाओं का अविभाज्य हिस्सा बन गई। विभाजन के समय अनुभव की गई हिंसा और अमानवीयता उनके दिलो-दिमाग पर हमेशा के लिए नक्श बहोकर रह गयी थी, जिसका ज़िक्र किसी न किसी रूप में उनकी रचनाओं में बार-बार होता है। चाहे कोई भी समाज हो, हैवानियत का पहला निवाला औरतों को बनना होता है। इस बात को अमृता ने बड़ी शिद्दत से अनुभव किया और अपनी रचनाओं में अभिव्यक्त किया। देश के बहुत बड़े अल्पसंख्यक वर्ग के प्रति उनके मन में बचपन से ही वैमनस्य के बीज बोने के प्रयास किए गये, किन्तु कट्टरपंथी बुजुर्गों की नसीहतों से अधिक तरज़ीह उन्होंने अपने ज़मीर की आवाज़ को दी, जिसके चलते उनकी ज़िन्दगी हिन्दुस्तान के सभी इदारों में सांप्रदायिक सद्भाव, प्रेम और खुलूस की नज़ीर बन गई। उन्होंने पंजाबी भाषा को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया, किन्तु दिल्ली आने के बाद वे हिन्दी में भी लिखने लगीं। सन् 1961 तक उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो में नौकरी की।

सन् 1960 के आसपास अमृता के लेखन में नारीवादी स्वर बुलंदियों को छूने लगा और पुरुष-पीड़िता स्त्रियों के प्रति उनकी सहानुभूति बड़ी तेज़ा से उनके लेखन का हिस्सा बनने लगी। लगभग इसी समय उन्होंने अनुभव किया कि जिस शख्स को दुनियावी लिहाज़ से उनके शौहर का दर्ज़ा हासिल है, उसके प्रति वे पूरी तरह वफ़ादार नहीं रहीं। प्रेम और पातिव्रत्य, दोनों एक साथ निभाने में उन्हें उलझन होती थी। बकौल अमृता- “छाती का ईमान कहता था, मैं अपने खाविन्द को उसका हक़ नहीं दे रही हूँ, उसकी छाया मैंने ग़दर के माल की तरह चुराई हुई है, उसे लौटाना है... लौटाना है... जो फ़ासला विचारों की रग़-रग़ में था, वह भी दुःखदायी था, और जो फ़ासला सामाजिक रूप में पड़ना था, वह भी।..... दोनों को एक- दूसरे से कोई शिकवा नहीं था, एक यह गंभीर दोस्ताना फैसला था, जिसमें किसी की भी ज़बान पर किसी के भी व्यक्तित्व को छोटा करने वाले शब्द के आने का प्रश्न नहीं था।... कानून को अज़नबी समझकर कुछ नहीं कहा- न उससे कुछ पूछा, न उसे कुछ बताया। जब साथ चुना था, तब बहुत अनजान थे, इसलिए क़ानून का आसरा लिया था, पर जब साथ छूटा तब दोनों के अंदर की सच्चाई दोनों के लिए क़ानून से कहीं अधिक तगड़ी हो चुकी थी... मुझे उसके बाद के वर्षों में इमरोज़ की हसीनतर दोस्ती मिल गई, पर उसे केवल अकेलापन मिला। उसे कुछ भी देते समय ज़िन्दगी के हाथ कंजूस हो गये।”

अमृता प्रीतम ने 24 उपन्यास, 15 कहानी संकलन और 23 कविता संकलनों का प्रणयन किया। ढेरों विदेश यात्राएं कीं और साहित्य अकादमी पुरस्कार पानेवाली पहली महिला बनीं। 1982 में उन्हें अपने समग्र साहित्यिक कृतित्व के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। उनकी ढेरों रचनाओं का अनुवाद हुआ है, यानी उर्दू में 15, कन्नड़ में तीन, गुजराती में दो, मलयालम में दो, मराठी में दो और हिन्दी सब की सब का। वे स्वीकार करती हैं- “आर्थिक स्वतंत्रता मुझे हिन्दी भाषा से ही मिली है।” इसी प्रकार विदेशी भाषाओं में अनूदित रचनाओं की फेहरिश्त भी बहुत लंबी है। पूरी दुनिया में अमृता की शख्सियत और उनके काम को चाहनेवाले लोग हैं। नारीवादी लेखन के क्रम में पुरुष अहं पर चोट पहुँचाने को वे अभिशप्त थीं, जिसके कारण उन्हें अपने समकालीन संपादकों और समालोचकों की नफ़रत और हिक़ारत भी बेहिसाब मिली। समाज में रूढ़िबद्ध नैतिकता और बने-बनाए ढर्रों पर चलने-चलाने की रवायत को अपने तरीके से दरकाने के कारण वे मठाधीशों के तंज और तानों का शिकार भी हुईं, जिसके चलते अमृता को कहना पड़ा- “कलम ने अज्ज तोड़िया गीतां दा क़ाफिया, एह इश्क मेरा पहुँचिया अज्ज केहड़े मुकाम ते।” यह सिलसिला अधिक दिन तक नहीं चला और दुनिया में प्रेम की देवी बनकर उभरनेवाली अमृता को चाहनेवालों की तादाद दिन-ब-दिन बढ़ती ही गई। दुनिया के लगभग सभी तरक्क़ीपसंद तालीमी और अदबी इदारों ने अमृता को बेपनाह मुहब्बत दी। उज़्बेक की जुल्फिया, ज़ार्जिया के इराकली आबाशीदज़े, बाकू के रसूल रज़ा और मिखारद खानम, बल्गारिया के बागिरआना, डोरा गावे, सतांनका, कामेनोवा और ऐन्तोनिया, यूगोस्लाविया के गरोज़दाना व एलियाना चूरा, जापान के मोरीमोटो, रूस के आइगोर सैरबरियाक़ोफ़, न्यू जीलैंड के चार्ल्स बैश, लंदन के जार्ज ग्रिफिथ, मिशीगन के काल्रो कपोलो.... उफ! विदेश में अमृता के साहित्यिक मुरीदों की संख्या बहुत बड़ी है। भारत में उनके साहित्य का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद करनेवालों में खुशवन्त सिंह, महेन्द्र कुलश्रेष्ठ, प्रीतीश नन्दी, सुरेश कोहली, मनमोहन सिंह और कृष्णा गोरोबारा के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

अमृता ने अपनी कलम के जादुई स्पर्श से नाटक और संस्मरण को छोड़कर लगभग हर साहित्यिक विधा को जीवंत किया है। उनकी प्रकाशित पुस्तकों की संख्या 75 से ऊपर है, जिसमें काव्य-संग्रह, कहानी-संग्रह, उपन्यास, निबंध-संग्रह और आत्मकथा शामिल हैं। संसार की 34 भाषाओं में उनकी रचनाओं का अनुवाद हुआ है। स्वदेश में साहित्य अकादमी, पद्मश्री, ज्ञानपीठ आदि पुरस्कारों के साथ-साथ विदेश में भी उन्हें कई बार पुरस्कृत और सम्मानित किया गया। देश के कई विश्वविद्यालयों ने उन्हें मानद डी.लिट्. उपाधि प्रदान की। प्रसिद्ध विचारक-लेखक कैलाश बाजपेयी के शब्दों में- “अमृता एक अनमोल रत्न थीं, जिन्होंने अपने प्रगतिशील विचारों और बेहिचक जीवन-शैली के बल पर तत्कालीन समाज का डटकर सामना किया। एक तरह से उन्होंने अपने समय में भविष्य को जिया। वह हमेशा से जिज्ञासु रही थीं, और काफी हद तक उनके जीवन पर सूफी संतों का प्रभाव रहा था।”

उनके पिंजर शीर्षक उपन्यास पर चंद्रप्रकाश द्विवेदी ने फिल्म बनाई थी, जिसके लिए अपनी बीमारी के बावज़ूद अमृता प्रीतम ने दो गीत भी लिखे थे। इस फिल्म में मुख्य भूमिकाएँ उर्मिला मातोंडकर और मनोज बाजपेयी ने निभायीं।

सन् 2002 में बाथरूम में फिसलकर गिर पड़ने से अमृता के कूल्हे की हड्डी टूट गई और उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया। जीवन भर सहजता और स्वतंत्रता का समर्थन और आख्यापन करनेवाली अमृता प्रीतम के शरीर ने स्टील रॉड और फीजियो थेरैपी के साथ सहयोग नहीं किया। आखिर सोमवार, 31 अक्तूबर, 2005 को नींद में ही अमृता प्रेम की उस इकहरी डोर को भी तोड़कर अंतहीन यात्रा के अगले पड़ाव की ओर चल पड़ीं, जिसके सहारे उन्होंने ज़िन्दग़ी के शानदार 86 बरस इस प्रेम-पियासी धरती पर बिताए थे। अपनी सूफियाना तबीयत और अपने ज़मीर के प्रति ईमानदार जीवन-शैली के साथ-साथ विपुल मात्रा में उत्कृष्ट साहित्य-सृजन के लिए भारतीय साहित्य-जगत उन्हें हमेशा बड़े सम्मान के साथ याद रखेगा।

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  1. रामवृक्ष सिंह जी, अमृता प्रीतम अपने जीवन के सांध्य दिनों में ओशो के बहुत निकट आ गईं थीं
    और उनके रंग में रँग गई थीं. ओशो की निकटता के उनके अनुभव उनके लेखों में मैंने पढ़े है. इसका जिक्र आपके आलेख में यत्किंचित भी नहीं है. लिहाजा यह आलेख अधूरा है.

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