गुरुवार, 16 जनवरी 2014

पुस्तक समीक्षा - रामदीन का चिराग

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रामदीन का चिराग( लघुकथा संग्रह) लेखक............ श्री गोविन्द शर्मा

बचपन में एक फ़िल्म देखी थी मैने “अलाउद्दीन का चिराग” अलाउद्दीन उस चिराग को अपनी हथेली से रगडता और चिराग में से एक जिन्न निकलता और कहता” हुक्म मेरे आका”. अलाउद्दीन अपने मन के बात जिन्न से कहता और वह पलक झपकते ही उसकी इच्छा पूरी कर देता. मन के किसी कोने में यह इच्छा बलवती हो उठी थी कि काश मुझे भी वह चिराग मिल जाता तो मैं भी उससे अपने मन की अभिलाषाएँ पूरी करवा पाता. वह युग फ़ेंटसी का युग था, उस समय बाबू देवकीनन्दान खत्री “चंद्रकांता संतति” लिख चुके थे. उसे भी पढने का सौभाग्य मुझे मिला. फ़िर क्या था, मन में तरह-तरह की इच्छाएँ करवटे लेने लगती और नए-नए सपनॊं का वितान सा छाने लगता. इस तिलिस्म से पीछा छुडा भी नहीं पाया था कि जासूसी उपन्यासों की झडी सी लग गई थी. इन उपन्यासों में एक से बढकर एक कारनामें पढने को मिलते. शायद किताबों की दुनिया से जुडने का इससे बडा योगदान और क्या हो सकता था. फ़िल्में भी कुछ इसी तरह की बन रही थी जिसमें जादू था, रोमांस था और कलाबाजी के नए-नए पेंच, नए रंग-ढंग. खैर, ये तो समय सापेक्ष कुछ बातें थीं.

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(बाएं से दांए=डा.राजकिशोर सक्सेना "राज, गोवर्धन यादव, गोविन्दशर्मा(बीच में ) डा. रामनिवास मानव एवं डा. हुंदराज बलवानी)

संयोग देखिए कि मेरे हाथ एक “चिराग” लगा. वह अलाउद्दीन का चिराग नहीं था बल्कि वह “रामदीन का चिराग” था. रामदीन का चिराग एक लघुकथा संग्रह है, जिसमे चौरानबें लघुकथाएँ संग्रहित हैं, जिसके लेखक हैं मित्र श्री गोविंद शर्माजी. आप अपनी व्यंग्य रचनाओं के माध्यम से तथा बालकथा कहानियों के माध्यम से देश में अपनी पहचान बना चुके हैं. आपके अब तक तीस संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें बालकथाऒं के संग्रह, नाटक संग्रह के अलावा दो व्यंग्य संग्रह भी शामिल है.( कुल मिलाकर तीस संग्रह). यह हमारे और आप सबके लिए गौरव का विषय है कि आपकी अनेक रचनाएँ पाठ्यपुस्तकों में अपना स्थान बना चुकी है. आपकी रचनाधार्मिता को रेखांकित करते हुए देश की अनेकानेक संस्थाओं ने आपको सम्मानीत और पुरस्कृत भी किया है.

संग्रह में प्रकाशित लघुकथाओं को अनेक वर्गों में बांटा जा सकता है यथा-राजनीति- जिसमें सत्ता और ताकत की बुनियादी बर्बर प्रकृति, राजनीतिक संस्थाओं के समक्ष साधारण मनुष्य की नियति, प्रचार आधारित सच का खोखलापन, शामिल किया जा सकता है. कुछ लघुकथाएं सामाजिक विद्वेष पर आधारित हैं. कहीं कुछ बोधकथा का मानक दिखती हैं तो कहीं नीतिपरक कथाओं का अनूठा गुंफ़न है. तो कहीं कुछ पाने की प्रछन्न चाहना और न पा सकने की टीस भी है. कहीं रोजमर्रा की कशमकश, और उसमें बिंधी इच्छाएँ, आकांक्षाएं, कौतुहल, विस्मय, विडम्बनाएं, वक्रताएं, आतंक, दमन, उत्पीडन, भूख और मृत्यु के बीच अतिसाधारण अनिवार्यताओं का घटना, मन-मस्तिस्क पर गहरा प्रभाव छॊडती हैं.

लेखक की अपनी शैली है और शब्दों की बुनावट में विलक्षणता, जिसमें तत्व-चिंतन और सांसारिक तथ्यात्मकता साथ-साथ चलती रहती है और साथ ही वृतांत और मन्थन भी. आपकी भाषा में आन्तरिक तहों में खास किस्म की विकलताएं, सेंस आफ़ ह्युमर और खिलवाड का एक ऎसा घालमेल है जो ताकत की दुनिया में नैतिक प्रतिरोध का एक अनिवार्य हिस्सा बनाती है. आपकी रचनाओं में कसावट और सतर्कता भी देखने को मिलती हैं, जो एक लम्बे आत्म-संघर्ष से उपजती हैं.

शर्माजी से मेरी मुलाकात बहुत पुरानी तो नहीं है,लेकिन उसे नयी भी नहीं कह सकते. आपसे मेरी पहली मुलाकात “बालवाटिका” के एक कार्यक्रम में भीलवाडा( राज.) में हुई थी. उसके बाद से लगातार मुलाकातें होती रही हैं. और पत्र व्यवहार भी. फ़ेसबुक पर तो प्रतिदिन आपसे मिलना और आपकी रचनाओं से रुबरु होने का सौभाग्य मिलता रहता है.

मुझे आशा ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास है कि आप अपनी रचना-धर्मिता से साहित्य के भण्डार को अनमोल रत्नों से भरते रहेंगे और नए-नए आयामों को स्पर्ष करते रहेंगे.

मैं धन्यवाद देना चाहता हूँ इस संग्रह के प्रकाशक “अपोलो प्रकाशन” को, जिन्होंने कडी मेहनत से इसको प्रकाशित किया और उस अनाम चित्रकार को जिन्होंने लघुकथा को आधार बनाकर बडा ही मोहक और आकर्षक चित्र उकेरा.

 

गोवर्धन यादव

103,कावेरीनगर,छिन्दवाडा(म.प्र.)480001

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