सोमवार, 27 जनवरी 2014

सूर्यकांत मिश्रा का आलेख - बसंत पंचमी का ऐतिहासिक महत्व

बसंत पंचमी पर्व पर विशेष आलेख ...

ऐतिहासिक महत्व भी रखता है पर्व - बसंत पंचमी


    माघ मास शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि बसंत पंचमी के नाम से जानी जाती है। इसी दिन वीणा-पाणी माँ सरस्वती का जन्म दिन होने से इस दिवस का महत्व बढ़ गया है। हिन्दू धर्म-शास्त्रों में भगवान गणेश और माँ सरस्वती को विद्या के देवी-देवता के रूप में पूजने का प्रावधान बताया गया है। भाद्रपक्ष मास की चतुर्थी तिथि से चतुर्दशी तक गणेशोत्सव पर्व मनाया जाता है। इसी तरह माघ मास में सभी शैक्षणिक संस्थाओं से लेकर हर प्रकार की विद्या प्रदान करने वाली संस्थाओं में माँ सरस्वती की पूजा बड़े धूमधाम से की जाती है। बसंत पंचमी का पर्व मौसम परिवर्तन का संकेत भी देता है। शरीर में चुभने वाली ठंडक कम होकर एक ऐसे मौसम का संचार करती है जिसमें न तो ठंडक परेशान करती है और न ही मौसम में अधिक गरमी होती है। इसी बसंत ऋ तु को च्च्ऋतु राजज्ज् भी कहा जाता है। माघ मास के बाद आने वाले फाल्गुन मास में रंगो का त्योहार भी बसंत से जुड़ा माना जा सकता है। बसंत पंचमी के दिन ही होलिका दहन वाले स्थान पर अण्डी का पेड़ गाड़कर फाग की शुरूआत कर दी जाती है।

-: पीले-वस्त्रों में करें माँ की अराधना :-
    विद्या की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती की पूजा अराधना पीले वस्त्र धारण कर करना चाहिए। बसंत ऋतु का समय ही वह अनुभूति कराने वाला समय है जब पूरी धरती एक दुल्हन की तरह सजी दिखायी देती है। खेतों में सरसों के फूल पूरी धरती माँ को पीली साड़ी में दृश्यावलोकित करती है, तो आकाश भी पीली पतंगों से आच्छादित दिखायी पड़ता है। माँ के आराधक गैंदे के पीले फूलों से पूजा का मण्डप तैयार कर केशर युक्त पीली खीर का प्रसाद माँ को अर्पित करते हैं। पूजा पण्डालों में युवक-युवतियाँ, बच्चे-बुजुर्ग सभी पीले वस्त्रों में दिखायी पड़ते हैं। पीले-पीले पके केलों और संतरों को माँ को अर्पित कर उसे प्रसाद रूप में वितरित किया जाता है। वैसे भी हिन्दु धर्म ग्रंथों में पीला रंग विशेष महत्व रखता है। पूजा के अवसर पर पीली धोती और पीली साड़ी स्त्री-पुरूषों की विशेष पोशाक होती है। पीले लड्डूओं का भोग लगाना भी अतिशुभ माना जाता है। पूजा के चांवलों को हल्दी में रंगकर-पीला रंग दिया जाता है। माँ सरस्वती को प्रसन्न करने के लिए इस मंत्र का जप करना चाहिए :-
    ऊँ वाग्देवी चः विद्धमहे, विरिन्जि परिनय्यी चः धीमहि,
    तन्नो वाणी प्रचोदयात् ।

-: सभी विद्याओं के लिए महत्वपूर्ण :-
    बसंत पंचमी पर्व का महत्व महज शिक्षा अथवा संगीत तक ही सीमित नही माना जा सकता है। अपनी रूची से चित्रों को आकार देने वाले छोटे-बड़े चित्रकार भी माँ सरस्वती की अराधना करते हुए अपनी विद्या में और अधिक निखार की प्रार्थना करते हैं। देवी भागवत में माँ सरस्वती को सृष्टि रचयिता ब्रहा जी की पुत्री बताया गया है। बसंत पंचमी के दिन जन्मी मां सरस्वती के साथ ही भगवान विष्णु और कामदेव की पूजा का प्रावधान भी चला आ रहा है। बसंत पंचमी का महत्व माँ के साधकों के लिए उसी प्रकार है जैसे एक सैनिक के लिए अपने शस्त्रों और विजयादशमी पर्व का होता है। विद्वानों के लिए जिस प्रकार पुस्तकें और व्यास पूर्णिमा (गुरू-पूर्णिमा) अति महत्वपूर्ण समझी जाती है। एक व्यापारी के लिए तराजू, बाट, बहीखाते और दीपावली जितना महत्व रखते है, वैसा ही इंतजार कलाकारों के लिए बसंत पंचमी का होता है। चाहे कोई कवि हो या लेखक, गायक हो अथवा वादक, कहानीकार हो अथवा अन्य प्रकार की रचना विद्या का ज्ञाता, सभी बड़ी बेसब्री से बसंत पंचमी पर्व का इंतजार करते दिखते हैं। बसंत पंचमी अथवा ऋषि पंचमी के दिन सभी उल्लास और उमंग में डूबकर माँ की पूजा करते हैं तथा ज्ञान और बुद्धि की याचना करते हैं।

-: ऐतिहासिक घटनाएं भी जुड़ी है पर्व से :-
    भारत वर्ष के ऐतिहासिक पन्नों में दर्ज अनेक घटनाएँ भी बसंत पंचमी पर्व से सीधा संबंध रखती हैं। पृथ्वीराज चौहान से लेकर मोहम्मद गोरी और फातिमा बीबी तक की ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन हमें बसंत पंचमी पर्व की याद दिलाता है। इतिहास बताता है कि पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गोरी को युद्ध में लगातार क्म् बार पराजित किया और उसकी जान न लेते हुए उदारता पूर्वक छोड़ दिया। क्स्त्रवीं बार हुए युद्ध में जब पृथ्वीराज चौहान हार गया तो मोहम्मद गोरी उसे अफगानिस्तान ले गया और उसकी दोनों आंखे फोड़ दी। पृथ्वीराज चौहान को अंधा करने के बाद मोहमद गोरी उसके शद भेदी बाण की परीक्षा लेना चाहता था, वह भी उसके मृत्युदण्ड से पूर्व। तब पृथ्वीराज चौहान के मित्र चंदरबरदाई ने सहयोग करते हुए पृथ्वीराज चौहान को अपनी कविता की लाईनों से कुछ इस तरह इशारा किया-
    चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण।
    ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान ।


    पृथ्वीराज चौहान ने पंक्तियों का अर्थ समझते हुए शद भेदी बाण चलाया जो सीधे मोहम्मद गोरी के सीने को चीरता हुआ निकल गया। उक्त घटना बसंत पंचमी के दिन की ही बतायी जाती है।


    ऐसी ही एक घटना पाकिस्तान के लाहौर के  इतिहास के पन्नों में मिलती है। लाहौर निवासी वीर हकीकत को एक दिन पढ़ते समय बच्चों ने छेड़ा तो उसने उन्हें माँ दुर्गा की कसम दे दी। बच्चों ने माँ दुर्गा की हंसी उड़ायी, जिसे वीर हकीकत बर्दाश्त नहीं कर सके और कह बैठे कि यदि मैं तुम्हारी फातिमा बीवी के विषय में ऐसा ही कहुँ तो तुम्हें कैसा लगेगा। इस पर बात बिगड़ गयी और निर्णय के लिए मामला काजी तक पहुंच गया। काजी ने अपने निर्णय में कहा यदि वीर हकीकत मुस्लिम धर्म अपना लेता है तो उसकी जान बच जायेगी अन्यथा उसे मृत्युदण्ड भुगतना होगा। वीर हकीकत ने मृत्युदण्ड स्वीकार किया। जब जल्लाद के हाथ में तलवार देकर गर्दन काटने का आदेश दिया गया तो वह भी हक्का बक्का रह गया और तलवार हाथ से गिर गयी। इस पर खुद वीर हकीकत ने उसे ढाढस बंधाते हुए अपना कर्त्तव्य पूरा करने कहा। अंततः जल्लाद ने वीर हकीकत की गर्दन कलम कर दी, किन्तु हकीकत का सिर, नीचे न गिरकर सीधा स्वर्ग चला गया। कहते हैं यह घटना भी फरवरी में बसंत पंचमी के दिन घटित हुई।

-: साहित्य पुरोधा निराला भी बसंत पंचमी के दिन आये :-
    बसंत पंचमी पर्व का महत्व धर्म और इतिहास तक ही सीमित न रहते हुए साहित्य तक विस्तृत देखा जा सकता है। यही कारण है कि हिन्दी साहित्य से बसंत पंचमी का निकट का संबंध माना जाता है। हमारे देश में हिन्दी कविता के छायावादी युग के चार स्तंभों में से एक सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का जन्म् भी बसंत पंचमी के दिन ही हुआ। बसंत पंचमी फरवरी में जन्मे सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने अपने समकालीन अन्य कवियों से अलग अपनी कविताओं में कल्पना का सहारा नहीं लिया है। वे हिन्दी में मुक्त छंद के प्रवर्त्तक भी माने जाते हैं।

                                    प्रस्तुतकर्ता
                                       (डा. सूर्यकांत मिश्रा)
                                   जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)
                                                                                जूनी हटरी राजनांदगांव

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