शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

गोरख काकडे का आलेख - साहित्य अध्ययन-अध्यापन का महत्त्व

साहित्य निर्मिति एवं अध्ययन-अध्यापन का उद्देश्य हमेशा उदात्त एवं महान है, जो मानवको ‘अंधेरे से प्रकाश’ की ओ ले जाने में सहायक होता है और विश्वबंधुत्त्व एवं लोककल्याण का संदेश देता है। ‘ज्ञानेश्वरी’ में ज्ञानेश्वर पसायदान में विश्वदेवता से ‘दुरितों का अंधकार’ नष्ट होने की और विश्वधर्म स्थापना की मनीषा व्यक्त करके मानवतावाद एवं मानवीय मूल्यों की स्थापना करते हैं। जो आज की विपरीत स्थितियों में अत्यावश्यक बन गया है। वैश्वीकरण-बाजारवाद ने आज विश्वधर्म एवं विश्वबंधुत्त्व को आर्थिक एवं भौतिक रूप से जोड़ दिया है पर भावनिक एवं रागात्मक संबंधों को उधेड़ा है, जिसे आज पुनः संजोकर मानव जीवन में आ रही यांत्रिकता को समाप्त करने के लिए आज साहित्य अध्ययन और अध्यापन महत्त्वपूर्ण बनता जा रहा है।
समाज जीवन का वास्तव एवं भविष्यगत संभावनाएँ साहित्य के केंद्र में होती हैं, जिसे व्यक्त करना साहित्यकार का सामाजिक और लेखकीय दायित्त्व भी होता है। इस संदर्भ में अभ्यासक लिखते हैं, ‘‘मेरा विचार है कि साहित्यकार भी इसी जगत का प्राणी है और वह जीवन तथा जगत के प्रश्नों से आँखे नहीं चुरा सकता। यदि वह ऐसा करता है तो अपने साहित्य-कर्म को गम्भीरता से नहीं लेता। अतः जिस प्रकार साहित्य एवं जीवन का सम्बन्ध निर्विवाद है, उसी प्रकार साहित्यकार और उसके समाज का पारस्पारिक सम्बन्ध भी निर्विवाद है।’’१


आज के जगत एवं जगत के प्रश्नों को समझने के लिए साहित्यकार के साहित्यधर्म का अध्ययन-अध्यापन अत्यावश्यक बनता जा रहा है क्योंकि जगत अनुभूति की अभिव्यक्ति साहित्य है। जिसमें सत्यम्, शिवम्-सुंदरम् का आविष्कार है और जो मनुष्य जीवन में परिवर्तन लाने का काम कर सकता है। व्यक्तिमत्त्व विकास और इच्छा शक्ति को आधार देने का काम साहित्य का महत लक्ष्य है। समाज का मनोरंजन, उद्बोधन, उन्नयन एवं दिशा देने का काम भी साहित्य करता है। साथ ही वह विभिन्न संकायों एवं विषयों का भी परिचय कराता है। साहित्य और ललित कला का संबंध तो बहुत नजदीकी है। साथ ही सामाजिक शास्त्र और आज के वातावरणानुसार पर्यावरणशास्त्र एवं संगणक का भी परिचय साहित्य अध्ययन-अध्यापन से हो सकता है।
इन विभिन्न विषयों के ज्ञान के साथ ही साहित्य मानवतावादी नैतिक मूल्यों की शिक्षा देने का काम भी करता है। आज के विज्ञान युग में भी रामायण, महाभारत, बाईबल, कुरआन आदि पर लिखा साहित्य मानव को नैतिक आचरण की शिक्षा, प्रेरणा, उत्साह, आशा देने का काम कर रहा है


आज साहित्य अध्ययन की आवश्यकता रोटी, कपड़ा और मकान जैसी ही बन गई है। साहित्य जीवन को पूर्णता की ओर ले जाने का काम करता है। साहित्य के अध्ययन से मानव जीवन में चेतना आती है, वह गुण-अवगुण, सत्-असत् का निर्णय साहित्य संदेश के आधार पर करता है। बुद्धि को सचेत और हृदय को विभोर करने का काम भी साहित्य करता है।


साहित्य के अध्ययन से वर्तमान स्थिति में मनुष्य को अनेक संकटों, समस्याओं से किस तरह सुलझना चाहिए का ज्ञान होता है। ‘‘तुलसी को अगर हम ले तो देखेंगे कि उन्होंने एक रामराज्य की कल्पना की थी। प्रेमचंद ‘सेवासदन’ में वेश्यावृत्ति को दूर करने का उपाय खोज रहे थे ठीक इससे मिलता-जुलता समाधान माओं के चीन में भी अपनाया गया था।’’२ याने जो समस्याएँ तुलसी, प्रेमचंद एवं माओं के युग में थी उन्हें सुलझाने का काम यह लेखक अपने साहित्य के माध्यम से कर रहे थे।

जब-जब साहित्य की प्रासंगिकता, महत्त्व एवं उपयोगिता पर प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है और उसे रंगीन और मनमौजी दृष्टि से देखा जाता है तो कबीर एवं रीतियुग का साहित्य सामने आता है। इस संदर्भ में डॉ. बेचैन लिखते हैं, ‘‘उपयोगिता स्वतः एक सौंदर्य सृष्टि है जो कि छन्द, शब्द, ध्वनि और अलंकार इत्यादि से अधिक महत्त्व रखता है। अगर उपयोगिता कला न होती तो रीति-युग के कलात्मक रंगीन साहित्य को क्यों नहीं उतना ही स्थान आज प्राप्त है, जितना कि कबीर की कविता को प्राप्त है। कबीर की कविता एक सामाजिक चेतनायुक्त नारी है, तो रीतियुग की कविता सौंदर्यमय वेश्यानारी, जिसका जीवन चेतनाशुन्य निर्जीव है।’’३ जिस तरह से साहित्य की उपयोगिता निर्विवाद सत्य है उसी तरह उसके अध्ययन का महत्त्व भी निर्विवाद सत्य है।


आज जब हम वर्तमान युग की अलगाववाद, सांप्रदायिकता, दलित-शोषण, स्त्री-उत्पीड़न, भाषावाद, प्रांतवाद, आतंकवाद, नक्सलवाद, स्वार्थांध राजनीति, भाईभतिजावाद आदि समस्याओं को देखते हैं तो खिन्न हो जाते हैं और हमारी राष्ट्रीय एकात्मता, समता, बंधुत्त्व, न्याय आदि मूल्यों के बारे में प्रश्नचिन्ह उपस्थित होते हैं। जिसे साहित्यकार अपने साहित्य के माध्यम से मिटाने के लिए प्रयासरत है। ‘‘भारत की प्रादेशिक भाषाओं जैसे कि बंगला, उड़िया, गुजराती, असमिया आदि के साहित्य में इस प्रकार अनेक भाषात्मक एकात्मता के सूत्र बिखरे पड़े हैं जिन्हें संजोना आज की सर्वाधिक प्राथमिकता है।’’४ बंगला के महाश्वेता देवी आदिवासी की समस्याओं एवं उसके परिणाम स्वरूप उपजे नक्सलवाद को व्यक्त कर रही है।

हिंदी में कुमार, अंबुज, अरूण कमल, मंजुर एहतेशाम, ओमप्रकाश वाल्मीकि, रमणिका गुप्ता, मैत्रिय पुष्पा आदि सांप्रदायिकता, दलित शोषण, स्त्री उत्पीड़न, राजनीति में प्रचलित भाईभतिजावाद को व्यक्त कर रहे हैं। यही स्थिति, मराठी, गुजराती, पंजाबी आदि भाषाअें के साहित्य की भी है। साथ ही ‘‘साहित्य में सत्य को लोगों में प्रसारित करने की चतुराई के कई संदर्भ विलियम शेक्सपिअर, जोनाथन स्विफ्ट जैसे रचनाकारों की रचनाओं में प्रायः मिलते हैं।’’५ जिसका अध्ययन-अध्यापन आज की समस्याओं को सुलझाने के लिए महत्त्वपूर्ण आवश्यकता बन गई है।


संक्षेप में हम कह सकते हैं कि आज साहित्य का अध्ययन-अध्यापन नैतिक मूल्यों की स्थापना, आदर्शों का निर्माण, भावात्मक एकात्मता, राष्ट्रीय एकात्मता, विघटनकारी, अलगाववादी शक्तियों का विरोध एवं मानव जीवन में सत्य, शिव, सुंदरम् की स्थापना के लिए महत्त्वपूर्ण बन गया है। साथ ही प्रकृति का संवर्धन, संस्कृति के विकास और भूतदया का संदेश देने के लिए भी साहित्य के अध्ययन-अध्यापन की आवश्यकता है।

संदर्भ सूची :
(१) डॉ. सुधेश - साहित्य की विविध आयाम, पृ. २३
(२) डॉ. बेचैन - समकालीन साहित्य और समीक्षा, पृ. ५१
(३) वही, पृ. ५०
(४) डॉ. यतीन्द्र तिवारी - समकालीन दक्षिण भारतीय भाषा साहित्य, पृ. १३
(५) डॉ. अमरसिंह वधान - समय से संवाद, पृ. ०६

साहित्य अध्ययन-अध्यापन का महत्त्व
डॉ. काकडे गोरख
सहायक प्राध्यापक,
सरस्वती भुवन कला एवं वाणिज्य
महाविद्यालय, औरंगाबाद

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