शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य - दौरे और उपहार

व्यंग्य

दौरे और उपहार

डॉ. रामवृक्ष सिंह

यह शीर्षक सुनने में हिन्दी फिल्म ‘हरियाली और रास्ता’ जैसा लगता है। दौरे और उपहार में क्या संबंध हो सकता है? इसे केवल वे लोग समझ सकते हैं जो सेवा में और खास तौर पर सरकारी सेवा में हैं। कोई व्यक्ति (वह ऊँचा अधिकारी और मंत्रालय/मुख्यालय का अदना-सा क्लर्क भी हो सकता है) आपके कार्यालय का दौरा करने आए तो मन में उठने वाला पहला विचार यही होता है कि उसे उपहार क्या दिया जाएगा? गोया बिना उपहार दिए दौरा पूरा ही नहीं माना जाए, या कि दौरे का मूल उद्देश्य उपहार बटोरना ही होता है, या फिर यह कि उपहार न दिया तो दौरा करनेवाला नाराज़ हो जाएगा और लौटकर अपनी दौरा रिपोर्ट में न जाने क्या अल्लम-गल्लम लिख मारेगा।

सेवा में दौरों का कितना महत्त्व है, यह अपने वरिष्ठ जनों के दौरा-प्रेम को देखकर सहज ही समझा जा सकता है। लेकिन दौरे से उपहार की जुगलबन्दी केवल स्वदेशी दौरों के संबंध में लागू होती है, विदेश दौरे तो अपने-आप में ही उपहार होते हैं- वह भी भारत की गरीब मुद्रा- रुपी में नहीं, बल्कि अमेरिका की अमीर मुद्रा यानी डॉलर में। कई-कई नौकरियाँ तो लोग दौरों के दौर देखकर ही करते हैं। चाहे तनख्वाह कम हो, पर दौरों की गुंजाइश खूब हो। ऐसी ही एक नौकरी अपन के राम को भी मिली थी- देश के सबसे बड़े बैंक में महाप्रबन्धक की नौकरी। वेतन और परिलब्धियाँ मिलाकर वर्तमान से करीब चालीस हजार रुपये कम थीं, किन्तु दौरों की संभावना बहुत अधिक। दौरे पर जाइए तो वाजिब दैनिक भत्ता तो मिलता ही है, खर्च अलबत्ता होता नहीं, क्योंकि जिस कार्यालय का दौरा कर रहे हैं, वही खाने (और पीने वालों के पीने) की माकूल व्यवस्था अपने खर्च पर कर देता है। यह व्यवस्था करने में दौराधीन कार्यालय के लोगों को भी लाभ होता है। वे खुद भी दौरा-कर्ता के साथ खाते (और पीते) हैं, खर्चा संस्था का। तो दैनिक भत्ता पूरा का पूरा बच जाता है। ऊपर से उपहार, जिसकी कहीं कोई गणना ही नहीं। लिहाजा हमसे अनौपचारिक रूप से कहा गया कि आप आइए तो सही, सारी कोर-कसर और कमी की पूर्ति हो जाएगी। हमने कहा- ना बाबा ना, दौरे और उपहार का क्या ठिकाना! आज है कल नहीं। तनख्वाह तो पक्की है, मिलनी ही मिलनी है। दूसरा यह कि दौरे के लिए अपनी जान हलकान करो, बीवी-बच्चों को उनीन्दा छोड़कर भोर चार बजे भागो, वरना सात बजे की फ्लाइट छूट जाएगी। शनिवार को देर रात लौटो और सोमवार को पौ फटने से पहले ही फिर अटैची उठाकर चल दो। बच्चे बड़े हों और पढ़ाई या नौकरी-चाकरी अथवा किसी अन्य कारण से घर से दूर दूसरे शहर में रहते हों तो बीवी को तनहा छोड़कर महीने के पच्चीस दिन इधर-उधर भटको। किसलिए? दैनिक भत्ते के हजार रुपयों और गाहे-ब-गाहे मिलनेवाले उपहारों के लिए।

यदि किसी भले आदमी को यह लगता है कि दौरों के बिना संस्थाओं के काम नहीं हो पाएँगे तो इसे आंशिक सत्य मानकर भूल जाए। दौरे का उद्देश्य किसी काम को आगे बढ़ाना हो सकता है, लेकिन वह प्राथमिक उद्देश्य नहीं होता। दौरे का प्राथमिक उद्देश्य स्वयं दौरा ही होता है- विषस्य विषमौषधम् की तर्ज़ पर कहना चाहिए- दौरा दौरस्य कारणम्। दौरे के पहले जो स्थितियाँ थीं, दौरे के बाद भी वही रहेंगी। यह अवश्य है कि दौरे के बहाने लोग घूम-फिर लेंगे, सैर-सपाटा कर लेंगे, दर्शनीय स्थानों पर हो आएँगे, खा-पी लेंगे और दौरा-बिल बना लेंगे, उपहार ले-दे लेंगे। आँकड़े भर-भरा लेंगे, चिट्ठियाँ लिख-लिखा लेंगे। खाना-पूर्ति हो जाएगी। व्यवस्था की जड़ता यथावत बनी रहेगी।

तो दौरे का जिक्र होते ही उपहार की बात होती है। दौरे और उपहार का चोली-दामन का साथ है। पता नहीं आजकल के लोग दामन का मतलब समझेंगे या नहीं, पर मुहावरा है तो कभी-कभी इस्तेमाल कर लेते हैं। उपहार के मामले में एक पुरानी कहावत याद आती है- जैसा देवता वैसी पूजा। जिस देवता को जो पसन्द है, उसे वही पुजापा चढ़ाया जाता है। हनुमानजी को केले, बूँदी, बेसन के लड्डू और पेड़े, शिवजी को बेर, बिल्व, बिल्व-पत्र, धतूरा, भाँग और जलाभिषेक अथवा पानी मिला दुग्धाभिषेक, भैरों बाबा को दारू, काली मइया को बकरा, लक्ष्मी माता को रक्त-कमल। अपने यहाँ अतिथि को भी देवता माना जाता है- अतिथि देवो भव। इसलिए देवता की इच्छा-आस्था और मनोकामना के अनुसार उसे उपहार दिया जाता है।

अपने साथ तो कभी-कभी ऐसा भी हुआ कि अपना ही कोई पुराना साथी दौरा करने चला आया। तो अपुन ने बेतकल्लुफ़ होकर उससे पूछ ही लिया कि तेरी रज़ा क्या है? और उसने अपनी रज़ा बता दी। हमने जुगाड़ कर दिया। दौरा अत्यन्त सफल रहा। बाबा तुलसीदास ने दौरा करनेवालों के लिए ही शायद यह चौपाई लिखी- नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवक समेत सुत नारी।। दौरा करनेवाले के सामने बस इसी मुद्रा में पेश आएँ, उसकी यथा-योग्य पूजा कर दें। अपनी सकल संपदा में से उसका हिस्सा उसे दे दें। वह सफल मनोरथ हो और आप गंगा नहाएँ।

दिक्कत तब होती है, जब गंगा स्नान का यह पर्व हर दूसरे-तीसरे सप्ताह आ धमकता है। ऐसे में सोचना पड़ता है कि सामने वाले को क्या वस्तु उपहार में दें। दौरा करनेवाले भाई लोगों ने उसका भी तोड़ निकाल लिया है- वे नकदी, सोना, किसी देश-व्यापी मॉल के गिफ्ट कूपन, सब कुछ उपहार स्वरूप स्वीकार करने लगे हैं, बल्कि मुँह खोलकर माँगने में भी गुरेज नहीं करते। आप उन्हें अपना बजट बताइए, वे आपकी उलझन दूर करने के लिए सदैव तत्पर मिलेंगे- अहर्निशं सेवामहे। आखिर कोई कितने सूटकेस, कितने गुलदान, कितने गिलास और कटोरे (चाँदी के), कितने कैसरोल अपने घर में रखेगा? सोचने वाले सोच सकते हैं कि उपहार में मिली ये वस्तुएं वे दौरा-कर्ता देवता लोग अपने किसी परिचित या रिश्तेदार या पड़ोसी अधम मानव को भी तो दे सकते हैं। हम कहेंगे- भूल जाइए। जिसे लेने की आदत पड़ जाती है, वह देना नहीं जानता। आप उनके घर जाइए और वे आपको एक गिलास पानी या एक कप चाय पूछ लें, तो इसे उनका बहुत बड़ा वरदान समझिए और अपना अहोभाग्य समझिए। लेने वाले केवल लेना जानते हैं। देना तो उनके संस्कार और शब्द-कोश से ही गायब हो जाता है। यह मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ और पूरा विश्वास है कि सभी पाठकों का अनुभव यही होगा। इसे विश्वनाथ के रस-सिद्धान्त में वर्णित साधारणीकरण समझिए।

लेकिन जिन कार्यालयों का दौरा होता है, उनमें उपहार देने का निर्णय करनेवाले लोग भी कभी-कभी बड़े घाघ और पहुँचे हुए पीर होते हैं। वे बखूबी जानते हैं कि दौरा-कर्ता नगर के किसी छोटे-से फ्लैट में रहता है, उसके पास सामान रखने की जगह नहीं होगी। सोना-चाँदी, नकदी या गिफ्ट कूपन दे दें तो दौरा-कर्ता के लिए सबसे ज्यादा आसानी हो जाएगी। लेकिन उपहार के निर्णयकर्ता अव्वल दर्ज़े के परपीड़नवादी होते हैं। आप हमें दुश्वारियाँ दें तो हम भी आपको सुखी क्यों रहने दें? वे भी जान-बूझकर कोई सामान ही उपहार के तौर पर देते हैं। ले बच्चे, यह फालतू का सामान ले जा और खुश हो। तेरा दौरा सफल रहा! तेरी यात्रा भी मंगलमय हो!

हमारे उर्वर दिमाग में यह प्रश्न कई बार आया है कि ऐसे सामान का दौरा-कर्ता लोग करते क्या होंगे? अगर हम उनकी जगह होते तो अपने घर से उपहारों का एक बुटीक चलाते और उपहार खरीदनेवाले लोगों को अपने फालतू उपहार बेचकर कुछ पैसे बना लेते। सब लोग तो ऐसा कर नहीं पाएँगे, इसलिए ऐसा भी हो सकता है कि ऐसे कुछ दौरा-कर्ता मिलकर अपना एक कोऑपरेटिव स्टोर खोल लें और उसमें अपने-अपने फालतू उपहार लाकर बिक्री के लिए रखते जाएँ। इससे कुछ बेरोजगारों को नौकरी भी मिलेगी- बतौर सेल्समैन या सेल्सगर्ल और देश की अर्थव्यवस्था को भी बल मिलेगा। एक तीसरा और सबसे कारगर उपाय यह हो सकता है कि उपहारों को वापस किसी गिफ्ट शॉप पर ही बेच दिया जाए- औने-पौने जो भी दाम मिलें, उसी पर। दौरे का उद्देश्य तो तभी पूरा होगा।

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5 blogger-facebook:

  1. इस व्यंग्य के ऑफ़्टर इफ़ेक्ट के लिए तैयार रहें :)
    बढ़िया लिखा है

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  2. हम रोज झेलते हैं इसी तरह के कई 440 वोल्ट से भी ज्यादा । इस देश की सच्चाईयाँ इसी तरह की हैं और कुछ लोग लिख कर हल्का हो ले रहे हैं :)

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  3. इन दौरों और उपहारों से मैं अच्छी तरह परिचित हूँ..जनसंपर्क विभाग में रहा हूँ-पूरे तैंतीस साल..आपने बिलकुल सही फरमाया है..अनेकों बार इस विषय पर सोचा..पर सोच तक ही सिमित रहा..आपने इसे लिखकर आम कर दिया..बधाई...प्रमोद यादव

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  4. akhilesh chandra srivastava10:09 pm

    Bhai Rambriksh ji ne daure aur uphar
    ko lekar achha vyang prastut kiya hai
    badhai

    उत्तर देंहटाएं

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