मंगलवार, 11 मार्च 2014

यशवन्त कोठारी का संस्मरण - आह अमेरिका, वाह अमेरिका

आह अमेरिका , वाह अमेरिका

यशवन्‍त कोठारी

अमेरिका के क्‍या कहने। हर कोई जीवन में कम से कम एक बार अवश्‍य अमेरिका आना चाहता है, आकर वापस जाना नहीं चाहता। जीवन के असली आनन्‍द अमेरिका में है और हर भारतीय इनका आनन्‍द उठाना चाहता है। जो भी पहली बार आता है। आश्‍चर्य चकित रह जाता है। न ठेले, न थडि़या, न आवारा गाय, बैल, कुत्‍ते। सब कुछ व्‍यवस्‍थित। लेकिन व्‍यवस्‍था में अव्‍यवस्‍था के आनन्‍द भी यहीं है। कानून सख्‍त लोग मस्‍त।

थेंक्‍यू, सोरी, एस्‍क्‍यूज मी जैसे शब्‍दों से काम चल जाता है। ये शब्‍द काफी है। आधे अमेरीकी शॉपिंग माल में व्‍यस्‍त है ओर बचे हुए आधे अपनी बारी का इन्‍तजार करते हैं। वे एक दूसरे से ज्‍यादा सामान खरीदने का शोक रखते हैं। अमरीकी अपने आपको सर्व श्रेष्‍ठ समझते है मगर यह समझ कैसी है इसे शेप विश्‍व ही जानता है। डालर का रुतबा घटता-बढ़ता रहता हैं।

अमरीकी हंसी मजाक में माहिर है। एक होटल के बाहर लिखा था हम डग एडिक्‍ट को काम पर नहीं रखते लेकिन हमारे प्रतिद्वन्‍दी के पास आपके लिए काम है। एक होटल में लिखा था हम चाहते है आप हमारे होटल में ही रहे कभी भी चेक आउट नहीं करे, मगर फिर भी आप करते है तो समय ग्‍यारह बजे का है। यहां भी गे और लेसबियन की बहस जारी है ज्‍यादातर अमेरिकी काम ही काम करते हैं। महिलाएँ ज्‍यादा काम करती हैं।

लोसवेगास हो या डेनबर बर्फ का आनन्‍द यहां अलग ही है। ठण्‍ड तेज और राजनीति गरम। मेरिजुआना को अमरीकी समाज में मान्‍यता मिलगई है। खाओ-पीओ-ऐश करो का दर्शन सर्वत्र लागू है। लोग खुशहाल है, मगर एक तनाव, अकेलापन, हावी है। हर घर एक मिनीवालमार्ट लगता है। खरीददारी एक शौक है। आवश्‍यकता नहीं। अमरीकी खूब खाते है। खूब पीते है। यहाँ भी बीमारी, बेकारी, बैरोजगारी है और चौराहों पर भीख मांगते गरीब देखे जा सकते हैं। मनोरंजन सबसे बड़ा व्‍यवसाय है और निशल्‍क सुविधा का लाभ जी भर कर उठाया जा सकता है। नववर्ष पर ट्रेनें फुल चलती हैं। गाना, बजाना, पार्टी, सब एक साथ जमकर चलता है।

अखबारों की दुनिया भी बडी शानदार है। एक किलो तक के अखबार- विज्ञापनों की भरमार। पढ़ते-देखते आदमी थक जाता है। अखबारी विज्ञापनों के सहारे ही खरीदारी तय की जाती हैं।

बारहवीं तक शिक्षा निशुल्‍क है और इसके बाद की फीस सुनकर मध्‍यमवर्गी चकित रह जाता है। मगर लोन खूब मिलते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में सबसे नवीनतम चीजें उपलब्‍ध है। मैंने कुछ स्‍कूल देखे जो भारतीय स्‍कूलों से काफी अच्‍छे हैं, और निशुल्‍क। यहाँ की पुस्‍तकालय व्‍यवस्‍था की तारीफ की जानी चाहिये, मैंने प्रेमचन्‍द्र के उपन्‍यास ढूंढे और शिकागो के पुस्‍तकालय से मंगवाकर दिये गये। मैंने इन पुस्‍तकों को अन्‍यत्र वापस पढ़कर जमा करा दिया। यह व्‍यवस्‍था पूरे अमेरिका में लागू है। और निशुल्‍क है। मलाला के उपर लिखी पुस्‍तक को बुक कराने पर मेरा नम्‍बर प्रतीक्षा सूची में 85 वां आया और पुस्‍तकालयों में 55 प्रतियां है।

सी․डी․ बच्‍चों के खेल आदि निशुल्‍क उपलब्‍ध है। पुस्‍तकालयों में समय समय पर कई तरह के कार्यक्रम भी रखे जाते हैं। निशल्‍क हिन्‍दी, संस्‍कृत क्राफ्‌ट, आदि में कार्यक्रम रखे जाते हैं। इन कार्यक्रमों में बच्‍चे, बड़े, किशोर सभी के लिए अलग अलग व्‍यवस्‍था होती है।

यहाँ पर हार्न कभी कदा ही बजाये जाते हैं। पैदल यात्री को देखकर कारे रुक जाती है और पैदल यात्री के पार करने के बाद ही चलती है। कई जगहों पर पैदल यात्रियों के लिए बटन दबाने पर यातायात के रुकने की भी व्‍यवस्‍था है। कानून के दायरे में सब कुछ ठीक है, लेकिन गलती करने पर कानून की आंख बड़ी तेजी से काम करती है , और भारी आर्थिक दण्‍ड की व्‍यवस्‍था भी है। कानून से बचना मुश्‍किल है। हर गलती की सजा का प्रावधान है। यहाँ पर थूकना, कचरा फेंकना, संभव नहीं है। लेकिन कचरे के निस्‍तारण की बेहतरीन व्‍यवस्‍था है। सड़कें साफ सुथरी , चौबीस घन्‍टे गरम पानी, ठण्‍डा पानी, रेस्‍टरुमों की व्‍यवस्‍था भी अच्‍छी है। हर व्‍यक्‍ति सड़क पर अपने में व्‍यस्‍त है और एक दूसरे के निजी स्‍वतन्‍त्रता की रक्षा को प्रतिबद्ध हैं।

अमरीका भारतीय मेधा से प्रभावित है। राष्‍ट्रपति ने भी कहा है, पढ़ो नहीं तो भारतीय आकर तुम्‍हारा रोजगार ले लेंगे। वैसे भारतीय छाये हुए हैं, बेहतर काम करते हैं मगर वेतन-भत्‍ते कम मिलते हैं। अमेरिका में गरीब हैं, गरीबी है मगर अमीरी का आफताब भी चमक रहा है। सब पैसे की माया और पैसे का खेल है और यह खेल अनवरत पूरी दुनिया में खेला जा रहा है।

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केम्‍प-डेनबर यू․ एस․

यशवन्‍त कोठारी

86,लक्ष्‍मीनगर

ब्रहमपुरी बाहर ,जयपुर फो․ न․0141․

1 blogger-facebook:

  1. akhilesh chandra srivastava12:22 pm

    Bada sajeev varnan hai America ka , voh to basa hi bharteeyon ke videsh premke karan unhe apne desh se jyada videsh achha lagta hai vahan ke log achhe lagten hain vahan ka climate achha lagta hai JABKI HAMARE DESH MEN SUNDER VADIAN HAIN NADIA HAIN JUNGLE HAIN MAUSAM HAIN REETI RIVAJ HAIN TYOHAR HAIN KHUSHDIL LOG BHAI CHARA HAI PAR YEH HAMARA DURBHAGY HI HAI KI TALENTED HOTE HUYE HAMARI PRATIBHAON KA ASLI FAIDA TO VIDESHI HI LETE HAIN AUR HAM UNKI TAREEF KARTE KABHI NAHI THAKTE HINDUSTAN KO BHRASHTACHAR AUR BHAI BHATEEJAWAD KHATM KAR DE RAHA HAI AUR HAM CHETNE KO TAYYAR NAHIN PARIVARIK AUR SAMAJIK MOOLYON KO HAMSE BEHTAR KOI NAHI JANTA khair america ko varnit kar uska bhram to Yeshwantji ne kuch had tak door kar diya hai badhai

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