रविवार, 27 अप्रैल 2014

असगर वजाहत की दो कहानियाँ–राजधानी के नीचे तथा बनना

राजधानी के नीचे

उनकी वेशभूषा वातानुकूलित रेल के डिब्बे के अनुकूल ही थी सिल्क का कुर्ता, उसी तरह का पाजामा, पैर में हलकी चप्पलें, गलें में सोने की चेन, आंखों पर सुनहरा चश्मा, दोहरा बदन, बैंक बैलेंस का आभास कराती आगे की ओर निकली तोंद। हाथ उठाए तो उंगलियों में हीरे की अंगूठियां। पैर उठाए तो पैरों में सोने के छल्ले। गर्दन उठाई तो बीस तोले की जंजीर, आंखें उठाई तो छलछलाहट। जैसे भरा हुआ शराब का प्याला। निश्ंिचत मुस्कुराहट। हंसें तो दांतों में भरा सोना। पादें तो चमेली की-खुशबू-सी फैल गई।

वे जिधर हाथ डाल देते थे, उनके धनवान होने का एहसास तेजतर हो जाता था। नीचे ये ब्रीफ-केस निकाला तो विदेशी। चमड़े का थैला खोलकर गरम चादर निकाली तो कश्मीरी पश्मीना।

तीन सीटों में तीसरी पर बैठे ब्रिटिश पासपोर्टधारी प्रवासी भारतीय सत्ताइस साल के बाद देश लौटे थे। वे इधर-उधर हाथ नहीं डाल रहे थे। खिड़की में से बाहर अपने प्यारे देश की प्यारी जन्मभूमि के दर्शन तल्लीनता से कर रहे थे। धनवान सज्जन ने प्रवासी भारतीय से प्रारंभ में कुछ बातचीत की थी। उसके बाद दोनों का संवाद टूट गया था। राजधानी अपनी पूरी रफ्तार, यानी एक सौ पच्चीस किलोमीटर फी घंटा पर आ चुकी थी। जिन पटरियों पर चल रही थी उनका क्या हाल हो रहा होगा। जमीन शायद कांप रही हो। धूल का बवंडर उठ रहा हो। मकान शायद हिल रहे हों। लोग शायद दूर खड़े हो गए हों। लेकिन अंदर संगीत बज रहा था। बाहर की हवा बाहर से अंदर नहीं आ सकती थी। अंदर की हवा बाहर नहीं जा सकती थी तापमान तय था। दुधिया रोशनी में नहाए मुसाफिर राजधानी में ऊंघ रहे थे। ताश खेल रहे थे। खुसपुसा रहे थे। ठहाके लगा रहे थे। चाय-कॉफी पी रहे थे। रंगीन पत्रिकाओं के पृष्ठ उलट रहे थे। शाम की चाय सर्व की जा चुकी थी। बाहर धुंधलका बढ़ रहा था। धनवान सज्जन ने चमड़े का थैला खोला और उनके विदेशी घड़ी और हीरे की अंगूठियां पहने हाथ कि गिरफ्त में स्कॉच हृिस्की की बोतल आ गई। उसी समय घोषणा हुई कि राजधानी मादक द्रव्यों का सेवन जुर्म है। घोषणा सुनकर धनवान सज्जन मुस्कुराए और पास से गुजरते वेटर से गिलास और सोडा लाने के लिए कहा।

घोषणाओ, तुम क्या हो गरीब की जोरू वेश्या ताश का पत्ता धोखा फिर तुम की क्यों जाती हो किसके लिए की जाती हो घोषणाओ, तुम छलावा हो। घोषणाओ, तुम ही हमारी व्यथा हो। तुम ही अभिशाप हो। घोषणाओ, तुम क्या हो

सोडा आ गया। धनवान सज्जन ने सामने लगी फील्ंिडग मेज खोल ली और उस पर गिलास रख दिया। पैग बनाकर उन्होंने प्रवासी भारतीय से पूछा। प्रवासी भारतीय ने सज्जनता से इनकार कर दिया। धनवान सज्जन ने एक चुस्की लेकर वेटर से मुर्गे की टांगें तलवार लाने को कहा। वेटर ने ‘हां’ में गर्दन हिलाई जबकि मेरे ख्याल से उसे मना कर देना चाहिए था या जिंदा मुर्गा लाकर सामने खड़े कर देना चाहिए था। जिंदा मुर्गा सज्जन को समझा देता कि टांगों का क्या महत्व औैर उपयोगिता है।

बाहर प्यारी जन्म-भूमि जब अंधेरे में खो गई तो प्रवासी भारतीय अंदर की ओर मूड़े। सज्जन और उनमें बाते होने लगीं। जैसे-जैसे हृिस्की गिलास में कम होने लगी, वैसे-वैसे सज्जन की आवाज तेज होती चली गई।

‘‘लेकिन यूरोप में लोग मानते हैं कि इंडिया में बहुत गरीब हैं।’’

‘‘हो-हो-हो-हो...’’वे प्रवासी भारतीय की इस बात पर बहुत जोर से हंसे। कुछ क्षण हंसते रहे। प्रवासी भारतीय उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे थे।

‘‘बिलकुल गलत बात है। हमारे यहां गरीबी कहां है’

‘‘हर तरफ दिखाई देती है।’’

‘‘हो-हो-हो....मैं समझाता हूं आपको....वह हमारी सभ्यता है, हमारी संस्कृति है....यानी कल्चर है....’’

‘‘क्या मतलब’

‘‘भाई साहब, आप यहां सड़क पर भीख मांगते लोगों को देखते हैं’

‘‘जी हां।’’

‘‘क्या आप समझते हैं वो गरीब हैं’

‘‘जी हां।’’

‘‘हो-हो-हो...यही गलत या कहें आप जानते नहीं....साब, दिल्ली में एक गरीब बुढ़िया थी...भीख मांगकर गुजर-बसर करती थी। टाट के पर्दे लगाकर झोंपड़ी में रहती थी। एक दिन मर गई। उसके मरने के बाद उसकी झोपड़ी खोदी गई तो जमीन के नीचे कई लाख रुपये की रेजगारी निकली समझे आप, कई लाख...अब आप उस बुढ़िया को क्या कहेंगे गरीब....हो....हो...हो....’’

प्रवासी भारतीय चुप हो गए। कुछ क्षण बाद बोले, ‘‘लेकिन ऐसा सबके साथ तो नहीं हो सकता।’’

-भाई साब देखिए....किसी आदमी को सिर्फ अगर कपड़ा लपेटे कोई यूरोपिय देख ले, उसे गरीब ही कहेगा न

‘‘जी हां।’’

‘‘अब बताइए...क्या गांधीजी गरीब थे हो-हो-हो-हो...अरे साहब, रियासत के दीवान के बेटे थे....हमारी तो परंपरा है। हमारे ऋषि-मुनि क्या गरीब थे’

‘‘पर यहां तो मैंने लोगों को भूख से मरते देखा है।’’

‘‘भाई साब, वो बुढ़िया भी भूख से ही मरी थी, जिसने लाखों रुपये की रेजगारी गाड़ रखी थी।’’

प्रवासी भारतीय चुप हो गए, लेकिन सज्जन ने तीसरा गिलास खत्म कर लिया था और अब उनकी आवाज इधर-उधर तक पहुंच रही थी।

‘‘भाइ साब, झुग्गी झोपड़ी में रहने वाला हर आदमी लखपति है.....लखपति....बतांऊ कैसे सुनिए इन्हें दो-दो, तीन-तीन बार प्लाट एलाट होते हैं। प्लाटों को बेचकर नई झुग्गिया डाल लेते हैं। दिल्ली में किसी ने तीन प्लाट कहीं किसी भी कीमत पर बेच लिए तो लखपति तो है ही। आप उन्हें गरीब कहेंगे....’’सज्जन का लहजा नरम हो गया। ‘‘भाई साब, ये यूरोपवाले समझ नहीं पाते...मौसम की वजह से हम लोग कपड़े कम पहनते हैं...अजी कैसी गरीबी, कहां की गरीबी....हो....हो....हो....’’

प्रवासी भारतीय थोड़ चिढ़ से गए। उन्होंने अपनी सीधी की और बोले-मेरा लड़का ऑक्सफोर्ड में ‘इकोनामिक्स’ का प्रोफेसर है....उसने पी-एच.डी.किया हैं ‘इंडियन पावर्टी’ पर.....आप समझते हैं वह सब झूठ है...

‘‘मैं तो आपको आंखों देखी बता रहा हूं....बात दरअसल ये है भाई साब, यहां का आदमी काम करना नहीं चाहता...बस और कोई बात नहीं है...आप कहीं चले जाओ....बैठे-बैठे रोटी तोड़ने वाले ही ज्यादातर मिलेंगे....क्या तरक्की हो सकती है...’’उन्होंने हृिस्की का एक लंबा घूंट लिया। प्रवासी भारतीय अंधेरे में ही प्यारी मातृभूमि की ओर देखने लगे। वेटर खाने की ट्रे लिए इधर-उधर दौड़ने-भागने लगे। संगीत की आवाज तेज हो गई।

खाने के बाद सज्जन ने पान बहार खाया और उसे मुंह में भरे-भरे प्रवासी भारतीय की तरफ मुड़ गए। प्रवासी भारतीय भी कुछ बातचीत करने पर उत्सुक नजर आ रहे थे। सज्जन की आंखें भरी थीं। खाने के बाद नशा चढ़ता-सा मालूम हो रहा था।

सज्जन बोले-ये तो मैं मानता हूं हमने तरक्की नहीं कि है....लेकिन भाई साब, क्यों नहीं कीें..जापान ने क्यों तरक्की की इसलिए कि उसके दो शहरों पर ऐटम बम गिरा दिया गया...जर्मनी ने क्यों तरक्की की इसलिए वॉर में तहस-नहस हो गया...रूस ने क्यों तरक्की की इसलिए कि सेकेंड वर्ल्डवॉर में हर घर से दो रूसी खेत रहे....समझे आप...हमारे यहां इंडिया में वॉर नहीं हूई...वॉर हो जाती तो सज्जन हंसे-मैं तो कहता हूं यहां एक ही ऐटम बम...अरे मैं कहता हूं....एक ही एटम बम गिरा जाए हो....

ऐसे नाजुक मौके पर मैंने मुंह खोला-आप ठीक कहते है भाई साब...सिर्फ एक एटम बम...गिरा दिया जाए...वो भी आपके शहर पर.....जहां भी आप रहते हो...दिल्ली में बंबई या जहां भी कहीं... और वह भी आपके घरे के ऊपर ही गिरे... और उस समय, जब आप अपने घर में हों... आपके बच्चे, पत्नी...मां-बाप...भाई-बहन...सब घर में हो...

‘‘ये आप क्या कह रहे हैंें..सज्जन की त्यौरियां चढ़ गई।’’

‘‘आपकी तरक्की हो जाएगी भाई साहब!’’

‘‘कमाल के आदमी हैं आप।...वे चिल्लाए।’’

‘‘आप भी तो कमाल के आदमी हैं भाई साहब’

‘‘आप चाहते हैं मैं...मैं अपने परिवार समेत मर जाऊं...उनकी आवाज तेज हो गई थी। वे घूर रहे थे।’’

‘‘ये मैंने कब कहां है...बात तो ऐटम बम की हो रही थी।’’

‘‘तो ऐटम बम क्या फूल है’

‘‘ये तो आप ही को मालूम होगा।’’

‘‘चुप रहिए...’’वे गरजे।

मैंने आस्तीनें समेट लीं। अब गाली-गलौज का नंबर था। फिर मार-पीट होती। बेबात की बात पर। प्रवासी भारतीय के यूरोपीय संस्कार उभर आए। वे घबरा गए। बीच-बचाव कराने लगे।

सज्जन ने मेरी ओर इस तरह देखा जैसे मैं चार होउं। फिर उनकी आंखों में मेरे लिए घृणा का भाव आया। फिर उन्होंने इस तरह देखा जैसे ललकार रहे हों फिर उदासीनता और उपेक्षा का भाव आ गया। मैं कनखियों से उनकी तरफ देख रहा था। मैं मुस्करा रहा था और चाहता था, सज्जन को थोड़ा और गुस्सा आ जाए। पर सज्जन के चेहरे पर भय छा गया। शायद सज्जन ने कल्पना में अपने घर ऐटम बम को गिरते देख लिया होगा।

और जो कुछ हुआ हो या न हुआ हो, पर सज्जन का नशा बिगड़ गया था। या उतर गया था। सज्जन थोड़ी असुविधाजनक स्थिति में लग रहे थे।

राजधानी पूरी रफ्तार और वेग से चली जा रही थी। जिसने न देखी हो उसके लिए दैत्य के समान या महामारी-जैसी। निस्सीमता में पूरी गति के साथ छोटे-छोटे शहरों, कस्बों की फलांगती, गांवों और पूरवों को लांघती, खेतों और खलिहानों को कुचलती, पोखरों, तालाबों और नदी-नालों को डराती, वनों, उपवनों को रौंदती, ध्वनि और धूल का बवंडर उठाती। लगता, केवल

अंदर बैठे लोग ही सुरक्षित हैं या वे शहर जहां से यह शुरू या खत्म होती है। सब कुछ उसके पहियों के नीचे था। फिर भी सज्जन क्यों चाहते हैं कि देश पर ऐटम बम गिरा दिया जाए।

 

बनना

उनकी जिंदगी कुछ साल पहले तक अपने ढर्रे पर गुजर हरी थी। मतलब ये नहीं कि ढर्रे से हटने के बाद उन्हें परेशानियां या तकलीफें हो गई थीं, या खाने-पीने की तंगी हो गई थी, या किसी और झंझट-झमेले में पड़ गए थे। ढर्रे से हटने का मतलब सिर्फ यह कि वे बदल गए थे और उनकी प्राथमिकताएं बदल गई थीं। ऐसा भी नहीं कि इससे किसी को तकलीफ या चिंता हो गई हो। पूरा कस्बा जैसा उनके ढर्रे पर रहता था, वैसा ही उनके ढर्रे से हटने के बाद भी था। सब थे और जिसको जो-जो दुःख-सुख थे,सब वैसे के वैसे ही थे। नोट करें, जिनके लिए इतने सर्वनाम प्रयोग किए गए, उनकी संज्ञा दिलावर मियां है। थोड़ा और ऑफीशियल हो जाएं तो दिलावर हुसैन हैं। उनकी उम्र पच्चीस-छब्बीस साल है। इंटर का प्राइवेट इम्तहान उन्हें कई बार झेल चुका है और अब तक झेल रहा है। लेकिन दिलावर मियां को कोई गिला शिकवा नहीं है। घर में खेती है। ट्यूबवेल है। ट्रैक्टर है। दीगर ऐसी चीजें, जो कस्बे के संपन्न लोगों के घरों में होती हैं। खेती, आम के बाग और गन्ने की काश्त और दोनों वक्त गोश्त-रोटी और घर गृहस्थी। और कुछ नहीं।

दिलावार मियां कुछ साल पहले तक खास उसी तरह के नौजवन थे, जैसा कि उनको होना चाहिए था। यानी दो-चार दोस्त, थोड़ा-बहुत घूमना-फिरना, पास के बड़े शहर जाकर कपड़े सिलवाना और विदेशी चीजों को जमा करना और बेपनाह गप्प-शप्प मारना और कभी-कभी खेतों या बाग में चले जाना और कस्बे के एकलौते सिनेमा हॉल में पिक्चर देख लेना। कस्बे में उन्हें क्या तकलीफ हो सकती थी सब जानते थे। दासियों, पीढ़ियों से रह रहे थे। साख थी।

तो जनाब, दिलावर मियां की ऐसी पुरसुकून और ढर्रे पर गुजरने वाली जिंदगी में तुफान आ गया। कृपया ये न समझे कि उन्हें किसी से प्रेम हो गया। प्रेम हो जाने को हम लोग जिंदगी में तूफान नहीं मानते। ये हम लोगों से दो पीढ़ी पीछे के लेखक मानते थे और अब भी मानते हैं...तो तूफान से पहले दिलावर मियां को मालूम ही न था कि आने वाली छोटी-सी घटना उनके जीवन में तूफान सिद्ध हो जाएगी। पर भाई साहब, जब हमारे-आपके अंदाजे गलत हो जाते हैं, हम दोस्तों को कमीशन एजेंट और कमीशन एर्जेंटो कों दोस्त समझ लेते हैं, तो दिलावर मियां ने क्या गलती कि है कि उनके अंदाजे सही ही निकलें

खैर, इस बकवास के बाद अब सुनिए कहानी। देखिए, तीस-पैंतीस साल पहले कोई कहानीकार ये कहानी शुरू करता तो ऐसे करता...‘‘उसने लेटे-लेटे अपना हाथ मेज की तरफ बढ़ाया। हाथ में पहले माचिस आ गई। माचिस को लेकर उसने हाथ फिर बढ़ाया। सिगरेट का पैकेट खाली था। उसे याद आया, पिछली रात देर तक वह जागता रहा था। लैंप अभी भी जल रहा था। उसे पिछली रात संगीता के साथ इुई बातचीत का एक वाक्य-‘पुरुष पूरा होना चाहता है तो स्त्री के पास आता है लेकिन स्त्री अधूरी होना चाहती है तो पुरुष के पास आती है’-बिजली की तरह उसके मस्तिष्क में कौंध गया,...’’अब देखिए, साठोत्तर कहानीकार इसकी शुरुआत ऐसे करता-‘‘वह उठ बैठा। उसके चूतड़ों में अब तक दर्द था। वह थ्री-सी में देर तक घटिया वेश्याओं को झिझोड़ता रहा था और घटिया शराब की चुस्कियां लेता रहा था...’’लेकिन दिलावर मियां के साथ ये सब नहीं होगा। वे उठे और सीधे मुंह धोने चले गए। रोज के मुकाबले में आज जल्दी उठ गए थे। कल रहमत अली ने उन्हें बताया था कि आज एम.पी.आ रहे हैं। वैसे दिलावर पॉलिटिक्स से दूर ही रहते थे। उसे चूतियापा समझते थे और नेताओं और पॉलिटिक्स करने वालों पर हंसते थे। लेकिन रहमत अली के कहने पर वे इस बात पर तैयार हो गए थे क एम. पी. को लेने स्टेशन आ जाएंगे।

स्टेशन के बाहर गाड़ियों की लाइनें लगी थीं। कस्बे में एक साथ इतनी गाड़ियां कहां देखने को मिलती हैं। आगे बढ़ते ही उन्हें रहमत अली मिल गए। वो सफेद लड़खड़ाती हुई खादी में लैस थे। हाथ में गेंदे के फूलों की कई मालाएं थीं। उन्होंने एक माला दिलावर की तरफ बढ़ाईं।

‘‘लो, गले में डाल देना।’’

‘‘अमां रखो, मैं क्यो...’’

‘‘ओहो, पकड़ो-पकड़ो...यार, एम.पी. है।’’

‘‘अरे तो होगा....’’

‘‘अंमा, मेरी तरफ से डाल देना...’’

बेदिली से उन्होंने माला ले ली और अंदर आए। अंदर कस्बे के सब बड़े दुकानदार, कारखानेदार, अफसरों में सभी और तमाम खद्दरधारी जमा थे। खद्दरधारियों के दो अलग-अलग गुट थे। दोनों गुटों में चलती है। ये बात दिलावर को ही नहीं सबको मालूम थी। अचानक एक गुट में खलबली मची और किसी ने नारा लगाया, ‘‘देश को नेता कैसा हो...’’तीन-चार लोग साथ बोले, ‘‘रामस्वरूप जैसा हो।’’

अब सीताराम के गुट में भी खलबली मची और जोरदार नारा ये लगा कि देश का नेता सीताराम जैसा हो। रहमत अली चूंकि सीताराम के गुट के थे, इसलिए उनकी ये पक्की राय थी कि देश का नेता सीताराम जैसा होना चाहिए। जबकि हकीकत ये थी कि दोनों ही, यानी रामस्वरूप और सीताराम बाबू, दोनों किसी भी वक्त देश के नेता हो सकते थे, क्योंकि दोनों एम. एल.ए. थे। दोनों के पास गुंडों की फौज थी, दोनों भ्रष्ट थे। विवाद का विषय मात्रा पर था। दोनों खुशामदी थे। दोनों के पास पैसा था। यानी मुकाबला जोरदार था।

सीताराम ने रहमत अली के कान में झुककर कहा, ‘‘आदमी लाए हो न’ यह वाक्य दिलावर ने सुन लिया और और उन्हें अच्छा नहीं लगा। मतलब, उन्हें सिर्फ आदमी समझा जा रहा है। ये बात रहमत अली भांप गए और उन्होंने सीताराम बाबू से दिलावर का परिचय कर दिया। तभी धड़धड़ाती हुई ट्रेन आ गई। अब दोनों गुट एक राय पर पहुंचे। यानी देश का नेता रामसिंह यादव, एम.पी. जैसा हो। ट्रेन जैसे धीमी होने लगी, प्लेटफार्म पर उतनी ही फुर्ती आने लगी। लोग दौड़े। नारे। फूल बरसे। मालाएं उड़ी। नारे उछले। सीताराम के साथ आदमी ज्यादा थे। सीताराम खुद भी कभी कुश्ती लड़ा करते थें। रहमत अली उनका दाहिना बाजू बने। ध्यानसिंह ने बायां बाजू संभाला। कंधे इस तरह चलने लगे जैसे तलवारें चलती हैं। पैर इस तरह चले जैसे टैंक चलते हैं। रामस्वरूप, रामसिंह यादव, सांसद को केलव गेंदे का एक हार ही पहना पाए थे कि भीड़ के रेले में बहते चले गए और सीताराम सांसद को लेकर तेजी से स्टेशन के बाहर निकले। उनके दाहिने रहमत अलीऔर बाएं ध्यानसिंह थे।

जीप पर सांसद के बैठते वक्त फिर जोर शुरू हुआ। लेकिन सीताराम बाजी मार ले गए। एम. पी के साथ बैठे सीताराम। उनके बराबर ध्यानसिंह। दरवाजे पर लटक गए रहमत अली। पीछे बैठे दिलावर और दूसरे ‘आदमी’। पीछे जीपें चलीं। नारे लगे। शोर मचा। सांसद चूकि होने वाले चुनाव के टिकटार्थियों का इंटरव्यू करने आए थे, इसलिए पानी तक में आग लगी हुई थी।

दिलावर सांसद के साथ सिर्फ एक दिन रहे। पर इस एक दिन ने उन्हें हिलाकर रख दिया। उन्हें बदल डाला। उलट-पलट दिया। सोते से लगा दिया। उन्हें उनकी आत्मा ने धिक्कारा। कहा, ‘हे मूर्ख, तू अब तक ये क्यों नहीं जानता था कि आज के राजा-नवाब यही एम.पी, एम.एल.ए. हैं। यही हर मर्ज की दवा है। यही हर मर्ज का इलाज हैं। मगर ये खुद लाइलाज हैं।’ धीरे-धीरे दिलावर के कुंआरे दिमाग में नेता बनने का ख्वाब इस तरह सिर उठाने लगा जैसे किसी नाबालिक लड़की के लिए में पहला प्यार पनपता है...ये सपना एक दिन उनकी जिंदगी का आइडियल बन गया। उन्होंने अपनी आंखों से देखा कि एम.पी. महोदय के सामने कलक्टर क्लर्क बन गया था। डिप्टी कलक्टर चपरासी बन गए थे। इंस्पेक्टर जमादार बन गए थे। सेठ-साहूकार घोड़े बन गए थे। दुकानदार खच्चर हो गए थे। और बाकी सब जनता हो गए थे। क्या जलवा था! दिलावर ने अपने-आप से कहा, ‘बस, यही है वह अमृत का भरा प्याला! उठा लो! मुंह से लगाओ और पी जाओ! बिना गुठली। का फल है! हार भी मेरी और जीत भी मेरी...’

कुछ ही महीनों के बाद दिलावर ने टेरीलीन और टेरीकाट के कपड़े नौकरों को बांट दिए और चमचमाते, जगमगाते, खरखराते कुर्ते-पाजामे में आ गए। आइने में अपने को देखा तो एक बार खुद ही रोब खा गए। काला चश्मा लगाया तो सोने पर सोहागा। पैर में कोल्हापुरी चप्पल डाली और बाहर आ गए।

दिलावर धीरे-धीरे इस तरह बदले कि किसी को हैरत न हुई। सबने कहा-जवान है। दिन में अरमान है। निकाल लेने दो। किसी ने हा-ये न करेगा नेतागिरी तो क्या रिक्शेवाले, झल्लीवाले करेंगे दिलावर मियां के वालिद ने जो रंग देखा तो डरे, लेकिन कुछ कहा नहीं। जवान लड़का और वो भी एकलौता। क्या करते दिलावर जैसे-जैसे घुसते गए, वैसे-वैसे पता चलता गया कि ये तो महासागर है। एक पर एक है। यहां से वहां तक नक्शा-ही-नक्शा है। उन्हें देखकर सलाम करने वाले बढ़ गए। उनकी इज्जत में चार चांद लग गए। रहमत अली को उन्होंने पीछे छोड़ दिया, क्योंकि रहमत अली को नेतागिरी के अलावा भी कुछ करना पड़ता था, जबकि दिलावर के पास एक ही काम था।

लेकिन साल-छः महीने बाद दिलावर मियां और रहमत अली की ठन गई। हुआ ये कि रहमत अली ने दिलावर मियां को मेंबर नहीं बनने दिया। यानी खुद ही फार्म भरवाया और खुद ही काट कर दी। ये बात दिलावर को पता चल गई। लेकिन जब उनके लिए वापस लौटने के सारे रास्ते बंद हो चुके थे। वो आगे बढ़ चुके थे। उन्हें यह पता चल गया था कि बिल्ली कहां घाम लेती है।

दिलावर मियां की मेंबरशिप की दरखास्त पर नोट लगा दिया था कि उन्हें दो साल तक पार्टी का रचनात्मक काम करना है, तब मेंबरशिप मिल पाएगी। जिस तरह जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करती, उसी तरह दिलावर दो साल गोबर क्योंकर उठा सकते थे अब तो उनके साथ चार छः लोग रहने लगे थे। वे अखबार पढ़ने लगे थे। बहस करने लगे थे। कॉलेज के लड़के उनके पास आने लगे थे। ब्लाक, आफिस, तहसील, बीजगोदाम, सहकारी बैंक के चपरासी उन्हें ‘नेताजी राम-राम’ या ‘नेताजी सलाम’ कहने लगे थे। वे हर आदमी से प्यार से मिलते थे। झुककर मिलते थे। उन्होंने यह भी सीख लिया था कि नेता मिलता सबसे झुककर है, लेकिन काम अपने हिसाब से करता है।

दिलावर की भाषा बदल गई थी। वो भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, संविधान, संसद, लोकतंत्र, चुनाव, याचिका, आवेदन, नामांकनपत्र वगैरा शब्द बोलने लगे थे। अखबारी भाषा का असर भी उन पर पड़ा था। भाव-भंगिमाएं भी बदल गई थीं। जोर-जोर से बोलने के अलावा वा मेज पर घूंसा मारने लगे थे और चीखकर बातें करने लगे थे। अक्सर लोगों से घिरे रहते थे। लोग उनकी बातें सुनते थे। लोग उन तक जनता की तकलीफें पहुंचाते थे।

गाड़ी इसी तरह मजे में चलती रह सकती थी, लेकिन दिलावर को अचानक कि शासन पार्टी से तो दो साल के लिए पत्ता साफ हो गया। अब क्या रास्ता बचा है ‘क’ ‘ख’ ‘ग’ में या ‘अ’ ‘ब’ ‘स’ में वे जाना नहीं चाहते थे। वहां था भी क्या

तब क्या किया जाए

रात में नहीं, वो दिन में सपने देखते थे। खुली जीप पर खड़े हैं। चले जा रहे हैं। गले में मालाएं हैं। तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई पड़ रही है। अपार जनसमूह है जय-जयकार हो रही है। कैमरे की लाइटें पड़ रही हैं। क्लिक-क्लिक की आवाजें आ रही हैं। ये सब देखते-देखते दिलावर बिना पानी की मछली जैसा तड़पने लगते थे। जोर-जोर से बोलने लगते थे। इसी बीच उन्हें एक दिन लगा कि वे खरी-खरी कहने वाले, सख्त और अक्खड़ टाइप नेता हैं। हर बात कड़वी और खरी। हर बात कुल्हाड़ी जैसी चोट करने वाली। वे विद्रोही मुद्रा में आ जाया करते थे। और उस समय उनका भाषण सुनने वाला हुआ करता था। उन्हें यह भी पता लग गया था कि सभी इस मंजिल से गुजरते हैं। यहां से गुजरना जरूरी है।

अब दिलावर रात में आठ बजे के आसपास दो-चार बेफिक्रों के साथ थाने के सामने वाली पान की दुकान पर अपने राजनैतिक ख्याल का इजहार किया करते थे। उनके कल्ले में पान दबा होता था। एक हाथ में माचिस की तीली होती थी जिससे कान खुजाते हुए वे अमरीका, चीन और रूस से लेकर कस्बे तक की राजनीति पर बेधड़क बोलते थे दुर्भाग्य से वे किसी दल में न थे, इसलिए इनकी ईमानदारी का दबदबा था। अक्सर लोगों के एक आध काम-वाम भी करा दिया करते थे, जिससे कुछ साख बढ़ गई थी। कभी-कभार पैसे-कौड़ी से भी लोगों की मदद कर देते थे। इस बात पर गर्व करते थे कि उनके पास पुश्तैनी जायदाद इतनी है कि उन्हें भ्रष्ट होने की जरूरत नहीं है। कहते, मेरा तो पेट भरा है...अब मुझे क्या करना है मैं मरभुक्खा नेता नहीं हूं, जो रिक्शे वालो से चंदा खा जाते हैं और डकार तक नहीं लेते।’

इसी तरह कुछ साल बीते। बीते सालों के साथ-साथ उनकी तड़प बढ़ती गई उन्हें लगा, नेता तो नेता होता है। सत्ताधारी दल का हो या विरोधी पार्टी का। दोनोें का नक्शा होता है। ढंग अलग-अलग होता है, पर नक्शा होता है। इधर उन्होंने नेताओं के कारनामे जानने शुरू किए। धाकड़पन और बढ़ गया। अब कसर यह थी कि वे जेल चले जाते और एक चरण पूरा हो जाता।

जेल दिलावर मियां के ख्वाओं में इसी तरह बस गया था, जैसे बिल्लीको ख्वाब में छीछड़े दिखाई देते हैं। वे नेता ही क्या जो जेल न जा चुका हो बिना जेल वाला चाहे कितना बड़ा हो, पूरा नेता नहीं माना जाता। और जेल जाने के बाद मिसाल कायम हो जाती है। बार-बार बातचीत में ये कहा जा सकता है-जब मैं जेल में था...या जेल तक में डाल दिया सरकार ने, लेकिन मैंन सच्चाई का रास्ता नहीं छोड़ा...जेल जाने से पहले नेता का हार-फूल पहनाए जाते हैं। लोगों की भीड़ नारे लगाती जेल के गेट तक जाती है। लोगों को अपने-आप हमदर्दी पैदा हो जाती है। और फिर जेल से निकलना तो शादी जैसा है...बैंडबाजे आते हैं...खुली जीप में बैठकर शहर का चक्कर लगता है और तब भाषण...तालियां...जय-जयकार...

दिलावर मियां ने जेल जाने की कई बार कोशिश की। उन्होंने तहसील के बाहर धरना दिया। मांग ये थी कि एक अत्यंत भ्रष्ट पटवारी को हटाया जाए। धरने के दूसरे दिन मांग पूरी हो गई। धरना खत्म हो गया। इसके बाद दिलावर मियां ने सेल्सटैक्स के आंदोलन में दुकानें बंद कराईं। उन्हें गुमान था कि यहीं पुलिस आएगी और वे जेल चले जाएंगे। पर ये नहीं हुआ। इसके बाद एक दिन वो हिरजनों, भूमिहीनों को पट्टे किए जाने वाले मामले में तहसीलदार से अकड़ गए। उन्हें यकीन था कि जेल हो जाएगीं पर नहीं हुई। तहसीलदार उन्हें अच्छी तरह जानता था। समझा-बुझा दिए गए। तहसीलदार ने होटल से मंगवाकर चाय पिलाई और ठंडा कर दिया।

उन्होंने एक दिन अपने एक-दो खास लोगों से बात-ही-बात में जेल जाने वाली बात कही। बात पक्की थी। सबको पसंद आई। तय पाया कि दिलावर का थाने के सामने भाषण हो, जिसमें वे सरकारी तंत्र के चीथड़े उड़ा दें। पूरी व्यवस्था को नंगा कर दें। जनता को विद्रोह के लिए ललकारें।

राय दिलावर को पसंद आई और कार्यक्रम बन गया।

सुबह ग्यारह बजे उनका भाषण शुरू। कुछ लोग आ गए थे। दरी पर बैठ गए। मंच बना था, जिस पर दिलावर और चार-छः उनके साथी बैठे थे। पान की दुकान पर आए लोग रुक गये थे। सहकारी बैंक के क्लर्क भी बाहर बरामदे में खड़े हो गए थे। थाने के सामने कुर्सी डालकर दारोगाजी धूप खाने बैठते थे। आज भी बैठे थे। मोहल्ले के छोकरे झुंड के झुड मीटिंग में मौजूद थे।

दिलावर मियां ने भाषण देना शुरु किया। पहले उन्होंने जनता को बताया कि अब तक उन्होंने जनता के लिए क्या-क्या किया है और दूसरे नेताओं और उनमें फर्क है। फिर वो सरकार की नीतियों पर बोलने लगे। भ्रष्टाचार, धांधली, कमीशन, घूस, भाई-भतीजावाद, लूट-खसोट, अत्याचार, महंगाई बेरोजगारी, पर्दाफाश, करारी टक्कर, संघर्ष, जेल भरो, खून का बदला...आदि इस प्रकार के जितने शब्द हो सकते हैं उन सबका प्रयोग दिलावर कर रहे थे और तालियां पिट रही थीं। वातावरण बहुत शांतिपूर्ण था। दारोगाजी कुर्सी से उठकर पास आ गए थे...दिलावर कह रहे थे, ‘‘...हम सरकार की ईंट बजा देंगे...हम निकम्मे और भ्रष्ट प्रशासन की अर्थी उठाएंगे...हम टूट सकते हैं, झुक नहीं सकते..’’

दारोगाजी धीरे-धीरे चलते दिलावर के पास आए। दिलावर को और ज ोश आ गया। दारोगाजी ने पीछे जाकर उनसे कहा,‘‘दिलावर मियां, अब घर जाओ...’’इसके जवाब में दिलावर मियां बोले,...’’अन्याय, अत्याचार के आगे झुकना हमने नहीं सीखा है...हम संघर्ष के रास्ते पर बढ़ चुके हैं।’’ दारोगा ने फिर कहा, ‘‘चलो, बहुत हो गया, जाओ...’’ लेकिन दिलावर बोलते रहे। दारोगा ने एक बुरा-सा मुंह बनाया और क्वार्टर की तरफ चले गए। दिलावर मियां की आवाज भी मंद पड़ने लगी। उन्होंने पूरा भाषण खत्म किया। करीब एक घंटा बोले थे। थक गये थे। उन्हें लग रहा था, यह सब भी बेकार चला गया।

अचानक उन्होंने अपने कार्यकर्त्ता के हाथ से माइक ले लिया और कहा कि ‘‘मैं जनता की मांगों की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए आज शाम इसी जगह संविधान जलाऊंगा...हां, संविधान जलाऊंगा...’’

जनता जो बैठी उनका भाषण सुन रही थी, समझ नहीं पाई कि दिलावर मियां ने क्या कहा और क्यों कहा। लेकिन दिलावर मियां के कार्यकर्ता समझ गए। उन्होंने ‘दिलावर भइया की’ का नारा लगाया और लोगों ने ‘जय’ बोल दी...शुक्र है कि लोगों को जय बोलना आ गया। जिसकी चाहें बुलवा सकते हैं। नहीं बोलते हैं...तो अपनी जय।

दिलावर मियां के सब कार्यकर्ता बेनी माधो के यहां बैठे थे। इतना तय था कि संविधान जलाने वाला आइडिया शानदार हैं। एक लड़के को शर्मा माट्साब के यहां से संविधान लाने भेजा जा चुका था। कोने में मिट्टी के तेल की बोलती रखी थी। माधो का छोटा भाई गैस-बत्तियों का इंतजाम करने गया था। दिलावर का चेहरा खुशी से खिला हुआ था। उन्हें कोफ्त ये हो रही थी कि इससे पहले उनके दिमाग में सविधान जलाने वाली बात क्यों नहीं आई! कुछ देर बाद शर्मा माट्साब के यहां से लड़का लौट आया। माट्साब के वास संविधान नहीं था। अब कहां मिल सकता है माट्साब तो कॉलिज में राजनीतिशास्त्र पढ़ाते हैं। उनके पास नहीं है तो कहां होगा, किसी ने कहा, बद्री बाबू वकील के पास होगा। वहां एक आदमी गया और कुछ देर बाद लौट आया। संविधान उनके पास भी नहीं था। अब तो दिलावर मियां को फिक्र पड़ गई। एक आदमी तहसीलदार साहब के पेशकार के पास भेजा गया, एक डॉक्टर साब के पास गया। एक इनकमटैक्स के वकील दीनदयाल बाबू के पास गया। एक लड़का किताबों की दुकान के मालिक रामलाल रस्तोगी के घर गया कि यदि संविधान दुकान में हो तो दुकान खुलवाकर खरीद ले। लेकिन संविधान का दुर्भाग्य कि वह कहीं नहीं था। सब के मुंह लटक गए।

रात का आठ बज गया था, जबकि दिलावर मियां ने संविधान जलाने का समय सात बजे का रखा था। दिलावर मियां के हाथ-पैर फूल गए। उन्हें लगा कि अगर संविधान न जलाया गया तो उन्हें डरपोक समझ लिया जाएगा और पूरी जिंदगी ये दाग उनके माथे से न धुल सकेगा। आने वाली पीढ़ियां उन पर थू-थू करेंगी और इतिहास में उनका नाम मीर जाफर और मीरचंद के साथ लिखा जाएगा।

‘‘अब क्या करें बेनी’

‘‘अब क्या बताएं...ये क्या मालूम कि यहां साला संविधान न मिलेगा।’’

‘‘नाक कट जाएगी।’’

‘‘सबको कहने को मिल जाएगी एक बात।’’

‘‘यार, कुछ करो।’’

‘‘एक आइडिया है,’’ कुछ देर बाद बेनी ने कहा।

‘‘क्या जल्दी बताओ, यार...यहां तो जान पर बनी हुई हैं’’

‘‘कोई भी किताब जला दी जाएगी...लोग क्या समझेंगे कि संविधान ही है या कुछ और है।’’

‘‘यार...वो बात ये है कि संविधान मैंने एक बार लखनऊ में देखा था...कॉफी मोटा है...मतलब साइज भी बड़ा है और पन्ने भी ज्यादा हैं।’’

‘‘तो ये बड़े साइज की फिल्मी पत्रिका के पंद्रह-बीस अंक ले लेते हैं। सब अंकों को अखबार में लपेटकर जला देते हैं।’’

‘‘माल लो, कुछ न जल सके...सुबह किसी को मिल गए तो’

‘‘जलेंगे कैसे नहीं...सबको साले को मिट्टी के तेल में डुबो लेंगे। रद्दी अखबारों के साथ जलाएंगे...’’

‘‘हां, ये ठीक है।’’

रात साढ़े दस बजे जब ज्यादातर लोग जा चुके थे किराए पर लाई गई गैस-बत्तियां भरभराने लगी थीं, तब मंच पर चढ़कर दिलावर मियां ने एक संक्षिप्त भाषण दिया और कहा कि वे संविधान जलाने जा रहे हैं।

सामने खड़े दारोगाजी से जलील वकील ने कहा कि दिलावर मियां को गिरफ्तार क्यों नहीं किया जा रहा, तो दरोगा जी बोले, ‘‘जब तक कोई एफ.आई.आर. नहीं दर्ज कराता हम उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकते।’’

‘‘एफ.आई.आर. कौन दर्ज कराएगा’ जलील वकील ने कहा।

‘‘आप ही करा दीजिए,’’ दारोगाजी ने नाक से निकाले काले और लसलसे पदार्थ को नीम के पेड़ के तने पर चिपकाते हुए कहा।

दरोगा ने इस सुझाव पर जलील वकील हंसे और पान की थोड़ी-सी पीक गटक गए।

उधर संविधान जल रहा था।

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