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असगर वजाहत की 3 कहानियाँ - 1 चार दिशाएँ, 2 नया गणित तथा आठवां आश्चर्य

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चार दिशाएं जिस दीवार पर लिखा होता है, ‘यहां पेशाब करना सख्त मना है,’ उसी दीवार को देखकर पेशाब करने के लिए मन मचल जाता है । आज भी कुछ ऐसा ...

चार दिशाएं

जिस दीवार पर लिखा होता है, ‘यहां पेशाब करना सख्त मना है,’ उसी दीवार को देखकर पेशाब करने के लिए मन मचल जाता है आज भी कुछ ऐसा ही हुआ।

रात के सात-आठ बजे थे। मैं अपनी धुन में चला जा रहा था कि एक दीवार पर उत्तेजित करने वाला वाक्य लिखा दिखाई दिया। मैंने तुरंत फैसला कर लिया। इस तरह जैसे अपना फर्ज ही नहीं निभाऊंगा, एक बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी भी पूरी करूंगा। लेकिन सामने से डंडा हिलाता एक सिपाही आता दिखाई पड़ा और मैं मन मसोसकर रह गया। सोचा, सिपाही आगे बढ़ जाए तो अरमान निकालूं। इस इंतजार में मैं दीवार के बराबर टहलने लगा और सोचने लगा, अगर दीवार पर यह लिखा होता तो कि कि इस दीवार के बराबर टहलाना सख्त मना है, तो मैं क्या करता

थोड़ा और आगे बढ़ा तो दीवार पर लिखा था, ‘दीवार पर पेशाब करने वाले को दंडित किया जाएगा।’ कुछ आगे लिखा था, ‘दीवार पर पेशाब करने वाले को पुलिस के हवाले किया जाएगा’ पढ़कर गुस्सा आया। वाह जी वाह, दीवार न हुई देश का संविधान हो गया।

कनखियों से देखने पर पता चला कि सिपाही अब भी दीवार की निगरानी कर रहा था। मैंने सोचा, उसे कैसे झांसा दिया जाए। एक तरफ नीम का बड़ा-सा पेड़ था। उसके नीचे कुछ अंधेरा था, मैं उसके नीचे खड़ा हो गया।

कुछ देर के बाद आंखें अंधेरे में देखने की आदी हुईं तो वहां एक आदमी और खड़ा दिखाई दिया। वह मुझे अपने जैसा ही लगा। कहते हैं अपने जैसों से बातचीत न करना पाप है, इसलिए मैंने उससे बातचीत शुरू की और पता चला कि वह भी मेरी तरह ‘इंताजार’ में है।

हमें वहां खड़े ज्यादा समय नहीं बीता था कि एक तीसरा आदमी हमारी तरफ आया। कुछ देर बाद तीसरे आदमी ने बताया कि वह ‘पेंटर’ है और उसी से दीवार पर निर्देश लिखवाए गए थे। यह जानकर हम समझे कि ‘पेंटर’ हमें पकड़वाने आया है, पर उसने बताया कि वह भी दीवार पर पेशाब करने आया है। ‘पेंटर’ की बात पर हमें थोड़ा आश्चर्य और ज्यादा खुशी हुई। हमने पूछा कि यदि उसी नें दीवार पर निर्देश लिखे हैं, तो अब वह दीवार पर पेशाब क्यों करना चाहता है पेंटर ने कहा, ‘‘मैंने अपना जीवन बचाने के लिए दीवार पर लिखा था, और अब अपने बच्चों के भविष्य के लिए दीवार पर पेशाब करना चाहता हूं।

हम बातें कर ही रहे थे कि वहां एक चौथी छाया भी आ गई ! चूंकि अंधेरा काफी था, इसलिए चौथी छाया जब हमसे हिल-मिल गई तो पता चला कि वह भी दीवार पर पेशाब करने के जुगाड़ में है। थोड़ा ध्यान से देखने और पूछने पर पता चला कि चौथी छाया दरअसल वह सिपाही है, जो डंडा लिए दीवार की सुरक्षा के लिए तैनात था।

नया गणित

चुनाव से चंद महीने पहले मंत्री महोदय अपने चुनाव क्षेत्र में इस तरह आये जैसे मस्त और घबराया भैंसा लगातार खेदे जाने के बाद बाड़े में घुसता है, यानी बाड़े में तूफान आ गया, छोटे-मोटे जानवर तो इधर-उधर दुबक गये कि मस्त और पागल भैसें की नजर उन पर न पड़ जाये, कुछ जानवर किनारे हो गये कि करने दो साले को जो करता है।

मंत्रीजी पूरे चार साल सात महीने सोते रहे थे, फिर उनकी नींद हाईकमान की डांट से खुली तो आंखें मलते-मलते चुनाव क्षेत्र में पहुंच गये थे। अकेले नहीं आते थे, क्योंकि वे जानते थे अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता। उनकी अमरीकी पत्नी साथ थी, दोनों बच्चे साथ थे, भोलू रसोइया सहित तीन नौकर थे। दो कुत्ते थे और मंत्रीजी के अपने कार्यालय के लोग तो थे ही थे। इतनी तैयारियों से आने का मतलब ही था वे चुनाव सिर्फ जीतने आये हैं।

छोटे-से शहर के छोटे-से वीरान स्टेशन पर जब वातानुकूलित प्रथम श्रेणी डिब्बे में मंत्री महोदय निकले तो बाहर भीड़ जमा थी। जिले के कुल सरकार अधिकारी थे, कुल जमा छः फैक्टरियों के मालिक और उनका अम्ला था। पुलिस थी, और कुछ साधारण राह चलते थे। बाकी सब तो मंत्री की लल्लो-चप्पो में लग गये थे लेकिन जनता मंत्री महोदय की पत्नी तथा कुत्तों में रुचि ले रही थी। मंत्रीजी ने जनता की नजरों को ताड़ लिया, इसलिए सीधे सिंचाई विभाग के विश्राम-गृह की ओर प्रस्थान कर गये। सिंचाई विभाग का विश्राम-गृह पहले से ही तैयार था, वहां रहने वाले चौकन्ना थे, मंत्रीजी के स्टाफ ने उन्हें और चौकन्ना कर दिया। केयर टेकर को ड्यूटी कुत्तों पर लगा दी गयी, चौकीदारों को साग-सब्जी खरीदने पर लगाया गया।

नहा-धोकर चाय-वाय पीने के बाद मंत्री महोदय उस हाल में आ गये जहां जिलाधिकारी बैठे दो घंटे से उनकी प्रतीक्षा में हनुमान चालीसा पढ़ रहे थे। मंत्री जी आते ही बोले, ‘‘हमने कहा था जिले के अधिकारियों की सूची हम देखना चााहते हैं, वो बना लाये हो’

जिलाधिकारी ने ‘यस सर’ कहने से पहले ही सूची उनके हाथ में पकड़ा दी। उन्होंने सूची पर निगाह डालते हुए हाथ जिलाधिकारी की तरफ बढ़ाया। जिलाधिकारी समझ गये कि वे पेन मांग रहे हैं, जिलाधिकारी ने फौरन पेन उनके हाथ में दे दिया। मंत्री महोदय ने हर नाम को पढ़ना शुरू किया, और फिर किसी नाम के आगे उन्होंने टी. लिखा, किसी ने आगे वी. किसी के आगे पी. किसी के आगे एम. और किसी के आगे के. और किसी के आगे एस.टी. आदि लिखते चले गये। जिलाधिकारी शुरू में तो यह रहस्य समझ नहीं पाये, पर जब स्वयं उनके नाम के आगे मंत्री महोदय ने टी, लिखा तो बात उनकी समझ में आ गयी। कुछ क्षण तक गिनती करने के बाद मंत्री महोदय बोले, ‘‘क्या ये चीफ सेक्रेटरी चाहते हैं, हम चुनाव हार जायें’

‘‘जी सर’

‘‘जिले के सोलह अधिकारियों में ‘हमारे’ कितने आदमी है’

‘‘जी सर’

‘‘क्या जी सर, जी सर कर रहे हो...हमें चुनाव के लिए यहां अपनी विरादरी के अधिकारी चाहिए होंगे...समझे...’

‘‘जी सर...’’

‘‘यहां हाल ये है कि जिले के सोलह अधिकारियों में केवल तीन ही ब्राह्मण हैं...चीफ सेक्रेटरी को फोन मिलाओ’’

दूसरी जाति-बिरादरी के अधिकारी धक्के मारकर बाहर कर दिये और मंत्री महोदय ने ‘अपने’ लोगों को बुलवा लिया। जिलाधिकारी भी चलता किये गये और एस.पी. भी बदल गये। यह काम इतनी तेजी से हुआ कि पूरे जिले में कभी इतनी तेजी से कुछ न हुआ था।

शतरंज की ये चाल चलने के बाद मंत्री महोदय ने बड़े स्तर पर जनसम्पर्क बनाने की योजना बनायी। उन्होंने हर अफसर को यह मौखिक आदेश दिया कि उनके दौरों में हर अफसर अपनी गाड़ी लेकर उनके साथ रहेगा। इसके अलावा उन्होंने छः फैक्टरियों के मालिकों से कहा कि हर फैक्टरी से कम-से-कम दो-दो गाड़ियां हर दौरे में उनके साथ जायेंगी पुलिस ने कहा किकम-से-कम चार जीपें उनके साथ चला करेंगी मतलब यह कि अब छोटे-से शहर की पतली-पतली सड़कों से मंत्री महोदय की सवारी गुजरती थी तो तीस-चालीस मोटरों और जीपों की आवाज से ही लोग सहम जाते थे। जिस गांव में इतनी गाड़ियां और लोग पहुंच जाते वहां मंत्री महोदय का ऐसा आतंक जमता कि मजा आ जाता, और फिर मंत्री महोदय खुलकर मदद करते। जिन कामों को पिछले साढ़े चार सालों से इसी दिन के लिए रोका गया था, वो तत्काल हो जाते और मंत्री महोदय की जय-जयकार होने लगती।

सबसे अधिक सम्मानित और उपयोगी नागरिकों से जनसम्पर्क स्थापित करने के लिए उन्होंने पुलिस का सहारा लिया। यह पुलिस का अधिकार क्षेत्र था इस कारण यह कार्य किसी और विभाग को नहीं सौपा जा सकता था। पुलिस रात में बारह बजे के बाद विश्राम-गृह के पिछले गेट से अति विशिष्ट नागरिकों को अन्दर लाती थी, मंत्रीजी भेंट होती थी, शिकवे-गिले किये जाते थे, आश्वासन लिये जाते थे, गले-मिललव्वल होती और रात ही रात अति विशिष्ट नागरिक बीहड़ों, जिलों या दीगर अड्डों तक पहुंच जाते थे।

शहर के सामान्य नागरिकोें को उन तक लाने के लिए भी उनके एजेंट छुटे हुए थे, कुछ औरतें छुटी हुई थीं, जो मंत्री महोदय को विदेशी पत्नी ‘मारग्रेट भारती’ का प्रचार कर रही थीं। कुछ बच्चे छुटे हुए थे जो मंत्रीजी के बच्चों, अखिल भारती और अनूषा भारती का प्रचार कर रहे थे। कुछ ड्राइवरऔर रसोइये और नौकर छुटे हुए थे जो मंत्रीजी के ड्राइवरों, रसाइयों और नौकरों का प्रचार कर रहे थे।

वैसे अब शहर के अधिकारियों में सब ही मंत्री जी की जाति के अफसर थे लेकिन एक-दो किन्हीं मजबूरियों की वजह से रुके रह गये थे। उनमें एक वन अधिकारी गोपालसिंह भी थे। गोपालसिंह या उनके जैसे एक-दो अन्य अधिकारियों को मंत्री महोदय ने कुछ उदाहरण पेश करने के लिए रख छोड़ा था। ‘इन’ एक-दो अधिकारियों का अपमान करके मंत्री महोदय अन्य अधिकारियों तथा नागरिकों में अपना आतंक जमाये रखते थे। उदाहरण के लिए एक दिन लगभग बीस-पच्चीस सम्मानित नागरिकों तथा आठ दस अफसरों के सामने वन अधिकारी गोपालसिंह और मंत्री के बीच ऐसे संवाद हुए-

मंत्रीः तुम बरेठा वाली मीटिंग में क्यों नहीं आये

गोपालसिंह : सर, मैं पहुंचा था, पर तब तक आपकी मीटिंग खत्म होचुकी थी।

मंत्रीः क्या तुम वहां दरी उठाने पहुंचे थे

गोपालसिंह : जी, मेरी जीप खराब हो गयी थी।

मंत्रीः अब कभी मेरी मीटिंग में आ रहे हो और जीप खराब हो जाये तो जीप सिर पर उठाकर दौड़ते हुए समय से मीटिंग में पहुंचना।

गोपालसिंह : यस सर।

मंत्रीः बाबरपुर में प्लान्टेशन तो हुआ नहीं, तुमने झूठी रिपोर्ट दी है।

गोपालसिंह : नही सर हुआ है।

मंत्रीः तुम्हें वन अधिकारी किसने बना दिया है। तुम तो क्लर्क बनने लायक भी नहीं...तुम्हारे ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप हैं।

गोपालसिंह : सर!

मंत्रीः क्यों मेरा सिर खाये जा रहे हो...जिले में नहीं रहना चाहते क्या

गोपालसिंह : सर!

मंत्रीः जाओ...मैंने किसी भी मीटिंग में तुम्हें ने देखा तो अरुणाचल प्रदेश में नजर आओगे...समझे।

गोपालसिंह : यह सर।

मंत्रीः गेट आउट।

मंत्री महोदय को विदेशी पत्नी ‘मारग्रेट भारती’ ने शहर की सम्मानित महिलाओं को चाय पर बुलाया। निमंत्रण-पत्र दिल्ली से छपकर गये थे। एक ओर अंग्रेजी में, दूसरी ओर हिंदी में, नीचे ‘मारग्रेट भारती’ का नाम लिखा था। निमन्त्रण-पत्र देखकर छोटे शहर के अफसरों की बीवियों की आंखें फैल गयीं। लड़कियों के स्कूलों-कालिजों की प्राध्यापिकाओं के मुंह खुले-के-खुले रह गये। व्यापारियों और बनियों की महिलाओं पर अपने सम्मानित होने का दौरा पड़ गये। सभा-सोसाइटी तथा क्लब आदि में जानेवाली महिलाओं की बोलती बंद हो गयी। शहर की दो-चार लेडी डॉक्टरों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी।

ये सब चल ही रहा था कि मंत्री महोदय के मुंह लगे रसोइये भोलू ने छोटे शहर को चमत्कृत कर दिया। यानी अच्छे-अच्छों की हवा निकाल दी। हुआ यह कि शहर के छोटे-मोटे नेताओं को मंत्री महोदय से मिलने का जुगाड़ भिड़ाने में रसोइये भोलू की सेवा-टहल करनी पड़ती थी। यह तो खैर एक साधारण बात थी। लेकिन एक दिन एक औसत दर्जे के छुटभइया नेता रसोई में भोलू से बातें कर रहे थे। बात करते-करते कहने लगे, ‘‘भोलू भाई, मंत्रीजी इस चुनाव में जीतने के बाद आपको दिल्ली के किसी फाइव स्टार होटल में ‘हैड कुक’ तो बना ही देंगे।’’ राटी डालते-डालते भोलू रुक गया, उसने आंखें तरेरकर छुटभइया नेता की तरफ देखा और तड़पकर बोला, ‘‘आप क्या समझते हैं हम रसोइया हैं’

इस सवाल का छुटभइया नेता क्या जवाब देते, चुप-से रहे। उत्तर में भोलू ने कहा, ‘‘सात साल से एम.एल.ए. का टिकट पाने के लिए रोटियां डाल रहा हूं...अबकी पक्का है।’’

इतना सुनना था कि छुटभइया नेता बेहोश हो गये, उन्हें लाद-लूदकर घर ले जाया गया। जब वे होश में आये तो उन्होंने शहर के दो-चार छोटे और मझोले नेताओं के सामने पूरा किस्सा बयान किया। सबने दांतों तले हाथ दबा लिये। एक मझोले नेता ने कहा, ‘‘भइया हमारी गणित तो फेल हो गयी।’’

चतुर नेता बोले, ‘‘भइया, अब की राजनीति में दो और दो चार नहीं होते...बाईस होते हैं।’’

तीसरे नेता ने कहा,‘‘यही ‘मार्डन मैथेमेटिक्स’ कहलाती है। हम लोग इससे पार न पा सकेंगे।’’

उन सबने ठंडी सांसे भरीं। उधर भोलू के फुल्कों से गरम-गरम भाप निकल रही थी।

नाच

समय बदल गया है। लोगों के शौक भी बदल गये हैं। कल तक जो लोगों को अच्छा लगता था आज उसमें किसी की रुचि नहीं है-बंदर वाले ने सोचा। पिछले कई सालों से बंदर वाले की हालत पतली थी। उसका क्या, बंदर और बंदरिया तक का पेट नहीं भर पाता। तीनों दिन-दिन-भर घूमते रहते, पर कहीं कोई नाच दिखाने के लिए न कहता। कहीं को करबत दिखाने की फरमाइश न करता। कहीं बच्चों की भीड़ न लगती। कहीं लड़कियां बंदर-बदरियां की शादी या बंदरिया के ससुराल जाने के दृश्य न देखना चाहतीं।

भूखे मरने की नौबत तो पहले ही आ चुकी थी। अब मरने की नौबतआ गयी। तीनों सिर जोड़कर बैठ गये।

बंदर बोला, ‘‘उस्ताद, तुम भी वही हो, मैं भी वहीं हूं, बंदरिया भी वही है, हमारा तमाशा भी वही है, जिसे देखने के लिये पहले भीड़ लग जाया करती थी-तब, आज लोग क्यों नहीं देखते’

बंदरिया ठंडी सांस लेकर बोली, ‘‘शायद इसलिए कि अब मैं बूढ़ी हो गयी हूं पहले जवान थी तो लोग...’’

‘‘अरे चुप रह बुढ़िया, तेरा दिमाग खराब हो गया है क्या...’’बंदर बोला।

‘‘बात ये है कि आजकल फिल्मों का चलन बढ़ गया है...वीडियो टी. वी. लग गये हैं...सब वही देखते हैं।’’ बंदर नचाने वाला बोला।

‘‘तब हम क्या करें’ बंदरिया बोली।

‘‘भगवान ने पेट दिया है तो उसे भरने का प्रबन्ध तो करना ही पड़ेगा।’’ बंदर ने कहा।

बंदर नचाने वाला बोला, ‘‘हां, भगवान ने बुद्धि भी दी है उसका भी इस्तेमाल करना चाहिए।’’

तीनों फिर सिर जोड़कर बैठ गये। सोचने लगे। सोचते-सोचते बंदर नचाने वाले ने बंदर से कहा कि ‘‘तुम अपने कपड़े मुझे दे दो। मैं बंदर बन जाता हूं और तुम मेरे कपड़े पहनकर बंदर नचाने वाले बन जाओ।’’

अदला-बदली हो गयी। बंदर नचाने वाले के गले में रस्सी डाली गयी। वह और बंदरिया साथ-साथ चले। डोरी पकड़े आगे-आगे बंदर चला। उसने डुगडुगी बजाई, आवाज लगाई, ‘‘आओ...आओ...देखो...तमाशा देखो...बंदरिया के साथ आदमी की शादी का तमाशा देखो...’’जरा ही देर में बड़ी भीड़ जमा हो गयी। तमाशा शुरू हुआ। लोगों को खूब मजा आया। खूब हंसे। खूब पैसे मिले।

तीनों ने भरपेट खाना खाया। बंदर वाले ने खाने के बाद चिलम सुलगाई। बंदर और बंदरिया को एक-एक केला दिया। बंदर ने पूछा, ‘‘उस्ताद, मैं समझा नहीं...ये आज हुआ क्या’

बंदर वाले ने कहा, ‘‘देख जमूरे...ये दुनिया वाले जालिम हैं नाचने वाले का नाच देखकर उन्हें मजा नहीं आता...हां जो नहीं नाचता...उसे नाचता देख लोगों को मजा आता है।’’

आठवां आश्चर्य

लड़की खूबसूरत थी। इतनी कि अगर किसी छोटे शहर में होती तो किसी मंत्री-पुत्र ने उसे उठवाने की कोशिश जरूर की होती। या उसके नाम पर दो-चार बार चाकू चलते। अगर नहीं, तो कम-से-कम सौ-पचास कविताएं तो लिखी ही जातीं। हजार पांच सौ प्रेम-पत्र मिलते। अगर बहुत बड़े शहर में होती तो फिल्मों और सीरियलों में काम के ऑफर मिल गए होते। विज्ञापन एजेन्सियों के गुरु घण्टालों ने डोरे डाले होते। साहित्य, कला, संस्कृति प्रेमियों से बच जाती तो रंगमंच और नृत्य वालों ने तो छोड़ा ही न होता। मतलब यह कि लड़की खूबसूरत थी, यात्रा में थी और साथ उसका पति था या हो सकता है होने वाला पति हो या ये भी हो सकता है कि कभी न हो पाने वाला पति हो। लड़की को देखकर सुरूर चढ़ता था। ऐसा जैसे एक छोटा पेग लगा लिया हो। लड़के को देखकर लगता था किसी ने छोटे पेग में नीबू निचोड़ दिया हो।

लड़की की उम्र करीब बीस-इक्कीस रही होगी। उसके साथ लड़का अट्ठाइस-तीस के करीब का था। दोनों ने रंग उड़ी नीली जीन्स जैकेट, एक रंग और डिजाइन के जूते पहने थे। दोनों ने घड़ियां भी मैच करती हुई लगाई थीं। दोनों का जोड़ा बड़ा फब रहा था। हो सकता है मैं केवल मर्दों के नजरिए से कह रहा हूं, लेकिन लड़की लड़के के मुकाबले गजब की चीज थी। उसके सीधे रेशमी लम्बे बाल कन्धों पर पड़े थे और जेवर के नाम पर नाक में बस हीरे के कील थी जिसकी चमक कल्पना के हिन्द महासागर में उतर जाने के लिए काफी थी। चेहरे पर बेफिक्री और मस्ती थी। जीन्स और जैकेट में उसका शरीर फुलझड़ियां छोड़ता-सा लग रहा था।

लड़की और लड़का हम लोगों को ट्रेन पर ही दिखाई दिये थे। दिल्ली से वे भी हमारी तरह ताज एक्सप्रेस में बैठे थे और जैसा कि अनुमान लगाने को भी जरूरत नहीं है, आगरा देखने जा रहे थे। मैं ट्रेन में भी लड़की को घूर रहा था। मुझे एक-दो बार पत्नी ने टोका भी था। पत्नी जब भी मुझे लड़कियों को घूरते पाती है, टोक देती है। ये टोकना आंखों के भाव वे सब कुछ कह देते हैं शायद जुबान भी न कह पाती।

सामने की सीट पर तो नहीं, लेकिन लड़की ट्रेन के डिब्बे में ऐसी जगह बैठी थी कि उसे सीधा देख सकता था। मेरे पास पत्नी बैठी थी। पत्नी की गोद में मुन्ना सो रहा था और पत्नी के बराबर सात साल की मुनिया, यानी हमारी बेटी बैठी थी। सपरिवार आगरा घूमने का ख्याल पत्नी के दिमाग में आया था। कारण यह था कि मुनिया को आगरे का पाठ अच्छी तरह समझाने के लिए आगरा दिखाना जरूरी है। मेरे लिए सब बराबर था। अगर पत्नी के बजाय मेरठ कह देती तो दूसरी ट्रेन पर बैठ जाता है। बीकानेर कह देती तो तीसरी ट्रेन पर बैठ जाता। और इटावा कह देती तो चौथी...मतलब यह कि मैं ‘ऑफीशियल ड्यूटी’ पर था। चाहे जिस ‘नेचर’ का काम होता, मेरे लिए सब बराबर यानी सब ‘ऑफीशियल’ होता।

गाड़ी के आगरा पहुंचने से पहले ही हमारे डिब्बे में ‘कण्डक्टेड टुअर’ वाले आ गए थे। चूंकि उन्होंने बताया था कि सरकारी हैं इसलिए ज्यादातर लोगों ने उनसे टिकट ले लिये थे। स्टेशन के बाहर ही उनकी बस खड़ी थी और उतरते ही हमको बस का नंबर बत दिया गया कि जाओ, उस पर जाकर बैठो।

बस तक कुछ लोग जल्दी पहुंच गए थे। कुछ बाद में पहुंचे। अब इत्तफाक से स्थिति ये पैदा हो गई कि ‘वे लोग’ जब बस में आए तो उन्हें एक साथ बैठने के लिए सीट नहीं मिली दोनों कुछ परेशान हो गए। मैंने ये परेशानी भांप ली और अपनी खिड़की वाली सीट छोड़कर पत्नी के बराबर आकर बैठ गया। मेरे ऐसा करने पर लड़की ने ‘थैंक यू’ या इसी किस्म का कोई शब्द बोला था। लड़का खामोश था। मैंने दिल ही दिल में कहा था, अरे इस पर क्या ‘थैंक यू’ कर रही हो। अभी तुमने मुझे देखा कहां है। आजकल के जमाने में तुम्हें मेरे जैसे आदमी मिलेंगे कहां, ये तो तुमने मेरी एक झलक भी नहीं देखी। देखो सहारा के रेगिस्तान में ऊंटों का एक कारवां चला जा रहा है। नीचे झुलसा देने वाली रेत है और ऊपर तपता हुआ सूरज है। ऊंटों की जबानें लटक आई हैं। हब्शी गुलाम नाकों को पकड़े इस तरह चल रहे हैं जैसे शताब्दियों बीत गई हों उन्हें चलते-चलते। एक ऊंट पर हाथी दांत की महफिल है। उस पर चीनी रेशम के पर्दे पड़े हैं। वह गुलाब के इत्र से महक रही है। उसके अन्दर तुम एक झीनी-सी नकाब डाले बैठी रेगीस्तान में कुछ देख रही हो। तुम्हारा जिस्म इतना नाजुक है कि उस परछाईं भी बोझ लगती है। फर्ज करो तुम्हारा बाप अब्दुल कुद्दूस बिन हसन हीरे-जवाहरात का व्यापारी है और इस्तम्बोल से हिरात जा रहा है। अचानक कारवां रुक जाता है। कारवां में एक आदमी तुम्हारे बाप अब्दुल कुद्दूस बिन हसन की हत्या कर देता है और तुम्हारे साथ बलात्कार करना चाहता है। उसी वक्त एक अदना-सा गुलाम, यानी मैं, एक छोटी-सी तलवार लेकर उसे ललकार दूं। वह मेरी तरफ देखकर हंसता है और अपने आदमियों से कहता है कि इस सिरफिरे को मसल डालो। लेकिन जल्दी ही उसे मेरे मुकाबले के लिए आना पड़ता है। तलवारें ऐसी कौंधती हैं कि ढलते हुए सूरज की रोशनी मन्द पड़ जाती है। खलनायक की भयानक चीख और तुम मेरे पसीने से भीगे चौड़े-चकले सीने पर सिर रखकर सिसकियां लेने लगती हो। मैं कहता हूं, नहीं हसीना, मैंने तुम्हें जीतकर एहसान नहीं किया है, तुम आजाद हो, जिसको चाहो अपना सकती हो। लेकिन तुम मेरे कदमों पर...

‘‘सुनो जी, इस तरह तो घूमने का कोई फायदा नहीं है’’पत्नी ने कहा।

‘‘क्यों क्या बात है’ मैं चौंक गया।

‘‘आप क्या सोचे जा रहे हैं मुनिया को बताते जाइए ना...आप तो आगरा कई बार जा चुके हैं।’’

‘‘हां...हां सुनो बेटी...वो रेगिस्तान है...’’

‘‘रेगिस्तान’ पत्नी ने हैरत से कहा।

‘‘ओ सॉरी...मतलब शहर है...’’

पत्नी बुरा-सा मुंह बनाकर बोली,‘‘मुनिया, तुम मेरे पास आ जाओ।’’ और उन्होंने मुन्ने को मेरी गोद में दे दिया।

कण्डक्टेड टुअर शुरू हो चुका था। ऐतिहासिक इमारतों के सामने बस रुकती थी। सब उसमें से उतरते थे। गाइड अंग्रेजी में बताना शुरू करता था। कुछ पर्यटक विदेशी भी थे। गाइड का पूरा ध्यान उनकी तरफ था। वह जानबूझकर कुछ उल्टे-सीधे तथ्य बताकर उन्हें हंसाने की कोशिश भी कर रहा था।

लड़की और लड़का भी ग्रूप के साथ थे। मैंने पाया कि वे आपस में अंग्रेजी में बात कर रहे थे। इस पर बहुत आश्चर्य होने की जरूरत नहीं थी लेकिन फिर भी मुझे लगा था कि वे आपस में तो उस भाषा को बोलते होेंगे जो उनके ‘देश’ की भाषा होगी, यानी गुजराती, बंगला, तमिल या कुछ और। वैसे ये दोनों किसी ऐसी जगह के लग भी नहीं रहे थे, जहां लोग सिर्फ अंग्रेजी बोलते हैं। क्योंकि वे हिन्दी बड़ी सरलता से समझ रहे थे।

‘कण्डक्टेड टुअर’ के ‘गाइड’ की बातें धीरे-धीरे बर्दाश्त से बाहर हो रही थीं। वह इतिहास नहीं जानता था, यह बात बर्दाश्त से बाहर नहीं था बल्कि यह थी कि वह इतिहास-पुरुषों का ही नहीं, हर उस चीज का मखौल उड़ा रहा था जो शानदार थी। मिसाल के तौर पर फतेहपुर सीकरी में वह अकबर बादशाह की पत्नियों का जिक्र निकाल बैठा। हरम की बातें चटखारे ले-लेकर सुनाने लगा। उसकी बातचीत से साबित हुआ कि अकबर के सामने बड़ी चुनौती हरम की औरतों को काबू में रखने की थी। ऐसी बातों पर मेरी टीका-टिप्पणी पत्नी के साथ जारी थी। मैं पत्नी को समझा रहा था कि यह षड्यंत्र है। देश को अपमानित करके पैसा कमाने का काम कितना घृणित है। यह गाइड जो अकबर की बर्बरता के किस्से सुना रहा है यह क्यों नहीं बताता कि सोलहवां शताब्दी में उस जैसा उदार और सहिष्णु राजा पूरे यूरोप में नहीं था...ये बातें सुनकर कुछ देर पत्नी खामोश रही फिर बोली,‘‘तुम अभी चुप रहो...तुम्हारी बातें घर में भी सुनी जा सकती हैं, अभी गाइड की बातें सुनने दो।’’ मुझे पत्नी पर गुस्सा आ गया और मैं चुप हो गया। अब गाइड से मेरे खामोश सवाल होने लगे। मेरे हर सवाल पर गाइड बंगले झाकने लगता था क्योंकि उसके पास जवाब नहीं थे।

गाइड बता रहा था, ‘‘यहां बादशाह शतरंज खेलता था। मोहरों की जगह लडकियां बैठती थीं और जो मोहरा पिट जाता, उसे कत्ल कर दिया जाता था।’’

‘‘सच! बूढ़ी अंग्रेज और अमरीकन औरतों की आंखें फट रह गईं। गाइड मुस्कराया। जवाब में वे भी हंसीं।

‘‘बर्बरता...’’एक फुसफसाई।

मैंने दिल में तय कर लिया कि मैं गाइड की लिखित शिकायत करुंगा। लेकिन लिखित शिकायतों पर होता क्या है। देश में कागज की कमी है और सरकार के पास इतने कार्यालय नहीं है जहां शिकायती चिट्ठियां रखी जा सकें।

गाइड से मेरे खामोश सवाल शुरू हो गए।

‘‘मिस्टर गाइड, क्या आपको मालूम है कि सोलहवीं शताब्दी में हमारे देश में लोहे का उत्पादन यूरोप से अधिक था’ गाइड की आंखों हैरत से फटी-की फटी कर गई।

‘‘यही नहीं, गाइड महोदय, आपको मालूम है कि अकबर जिस कक्ष में खाना खाता था वहां उसने ईसा और मरियम की तस्वीर लगा रखी थी जबकि वह ईसाई नहीं था। गाइड महोदय, आप कुछ बोलना चाहते हैं, बोलिए।’’ गाइड ने कहा, ‘‘इसमें संदेह नहीं कि अंग्रेज हमसे श्रेष्ठ थे, उन्होंने पचास साल के अन्दर लगभग पूरे देश पर अधिकार जमा लिया था।’’

‘‘गाइड महोदय, आपने पंडित सुन्दरलाल को पुस्तक ‘भारत में अंग्रेजी राज’ पढ़ी है खैर, न पढ़ी होगी। लेकिन पुस्तक में स्पष्ट लिखा है कि आदिम और बर्बर जातियों ने सदा सभ्य और विकसित जातियों पर विजय पाई है।’’

‘‘गाइड महोदय, क्या आप जानते हैं, गुलामों के घृणित व्यापार में इंग्लैंड की महारानी की पूंजी भी लगी हुई थी...महोदय, अवसरवादिता, छल-कपट द्वारा स्वार्थसिद्धि, मनुष्य-विरोधी कार्य, छीना-झपटी को आप चाहें तो सभ्यता कहें...संसार तो नहीं कहेगा।’’

‘‘यहां बादशाह जंगली जानवरों की लड़ाई देखता था।’’

‘‘यहां बैठकर बादशाह संगीत सुनता था।’’

‘‘यहां बैठकर शराब पीता था।’’

‘‘यहां सोता था।’’

मैंने पत्नी से कहा, ‘‘ये क्यों नहीं बता रहा है कि अकबर की लायब्रेरी में चौबीस हजार किताबें थीं। उसने महाभारत और रामायण का फारसी में अनुवाद ही नहीं कराया उस पर चित्र भी बनवाए थे।’’ पत्नी ने कहा,‘‘यह सब तुम बताते क्यों नहीं हो, इन लोगों को ‘‘मैंने कहा, ‘‘मैं गाइड थोड़ी ही हूं।’’

गाइड से चिढ़ और ऊब कर मैं लड़की की ओर ही ध्यान देने लगा। वे दोनों एक-दूसरे की फोटो खींच रहे थे। लड़की ने बैग से पानी की बोतल निकाली थी और विदेशियों की तरह होंठ तर कर रही थी। लड़के ने अपनी जैकेट कंधे पर डाल ली थी। वे दोनों साथ के लोगों से न तो बात कर रहे थे और न उनके करीब ही आ रहे थे। ऐसा लगता था जैसे वे इतिहास और वर्तमान से ज्यादा एक-दूसरे में रुचि ले रहे हों। हां-वे कभी-कभी विदेशी पर्यटकों में एक-दो बातें कर लेते थे। मैं लड़की और लड़के के सामने एक-दो बार इस तरह आ गया कि उनको मुझसे कुछ बात करनी चाहिए थी, लेकिन वे चुप रहे। धीरे-धीरे वे मुझे ‘स्नॉब’ लगने लगे।

लंच टाइम में गोरे और काले बंट गए थे। गोरे या तो सिर्फ फल ले रहे थे या अपने साथ ही लंच पैकेट लाए थे। हम काले लोगों के लिए खाने की दुकानों और चीजों की कोई कमी न थी। पंजाब से लेकर केरल तक केपकवानों का ढेर लगा था। कम पैसे में ज्यादा खाना खाने का एक तरीका थाली है। हम दोनों ने एक थाली और एक प्लेट बड़ा सांभर मंगा लिया, और प्यार से चट कर गए। खाना खाकर मुनिया को पेशाब कराने के लिए मैं कोई एकांत जगह देख रहा था तो मैंने लड़की और लड़के को बैठे देखा। उन लोगों ने एक बड़े पत्थर को मेज बना डाला था। उस पर कागज के नैपकिन बिछाकर सैंडविच और कॉफी का थर्मस रखा था। एक-दो फल भी थे। आमने-सामने दो छोटे पत्थरों की कुर्सियां बनायी थीं। उन पर वे दोनों बैठे खा रहे थे। लड़की सैंडविच इस तरह कुतर रही थी कि गिलहरी को मात दे रही थी...ये कैसा खाना है जहां पानी ही नहीं है बिना पानी के खाना। वाह भई वाह...दोनों पर गुस्सा नहीं, चिढ़ आई। लगा याद हद कर दी। अरे सीधे-सादे खाना खाते, ये क्या मजाक कर रहे हैं। इनके सालों के बाप-दादा क्या इसी तरह खाना खाते होंगे! अंग्रेजों का ठीक है, जो चाहे करें, इससे मतलब क्या लेकिन यार, अपने बन्दे यानी हिन्दुस्तानी भाई इस तरह के चुतियाते में पड़ जाएं तो तकलीफ तो होती ही है...अरे भाई सादा खाना ही खाना चाहते हो तो दाल-रोटी खाओ...और सादा चाहिए तो साथ में सत्तू बांध लेते। अगर कुछ साल बाद सत्तू को कोई अमेरिकन मल्टीनेशनल कम्पनी ‘सेट्टीज फास्ट फूड’ के नाम से पैक कर दे तो यही लोग सत्तू खा-खाकर...

मुनिया को पेशाब कराके पत्नी के पास आया तो मेरे मुंह से अपने आप निकला,‘‘नईं जी नईं, अपने बन्दे नईं हैं।’’ पत्नी ने आश्चर्य से देखा और पूछा, ‘‘क्या बात है’

‘‘दोनों साले सैण्डविच खा रहे हैं।’’

पत्नी पूरी तरह न समझ पायी, पर इतना जरूर समझ गई कि मैं किसी के फटे में टांग डालने वाला अपना पसन्दीदा विचार कर रहा हूं।

‘‘मैं कहती हूं तुम्हें न घर चैन, न बाहर चैन।’’

‘‘छोड़ो-छोड़ो।’’

‘‘तुम्हें उल्टा-सीधा सोचने की क्या पड़ी रहती है’

‘‘क्या मैं उल्टा-सीधा सोचता हूं’

‘‘तो क्या यहीं पर लड़ोगे’

मैं चुप हो गया। पर लड़की-लड़के पर गुस्सा सख्त आ रहा था। सूरज में तपिश बढ़ गई थी। मैंने सोचा यार, इतनी गर्मी में दोपाहर का खाना खाकर कोई अगर पानी नहीं पीता तो...

लंच टाइम खत्म हो गया। ‘गाइड’ फिर आ गए। उन्होंने किले के अन्दर ही किसी रेस्टोरेंट में लंच किया था और फोकट में किया था, क्योंकि उन्हें जैसी प्यारी डकारें आ रही थीं वैसी पैसे देकर किये भोजन में नहीं आतीं। धीरे-धीरे लोग जमा होने लगे। सबसे पहले लोग आ गए। फिर काले आने लगे। ‘गाइड’ साहब ने बताया कि अब हम ‘ताजमहल’ देखने जा रहे हैं।

‘ताजमहल’ के सामने बस रुकी तो दस्तकारी की चीजें बेचने वाले लोग आ गए। उन्होंने बस को घेर लिया। इस बीच लड़की और लड़का नजरों से ओझल हो गए। गाइड ने पहले ही बता दिया था कि ताजमहल देखने के लिए सबसे ज्यादा वक्त दिया जाएगा। बहरहाल जब मैं, पत्नी और बच्चे ताजमहल के बाहरी दरवाजे से अन्दर घुस रहे थे तो मैंने लड़की ने होंठो को ताजा लिपस्टिक लगाई थी। बाल बनाए थे। शायद किसी तरह की क्रीम लगाने की वजह से चेहरा दमक-सा रहा था। लड़के न भी, लगता था, हाथ-मुंह धोकर कंघा वगैरा किया है। वे दोनों ताजमहल देखकर विदेशी पर्यटकों की तरह खुश हो रहे थे। ‘गाइड’ ताजमहल की सुन्दरता और उसका महत्त्व बताने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन अफसोस कि गलत जगह पर, यानी ताजमहल के सामने कर रहे थे।

ताजमहल देखकर हम लोग बाहर निकले और बस की तरफ बढ़े तो संसार का आठवां आश्चर्य देखने को मिला। बस के पास चाट वाले ठेले परलड़की और लड़का गोलगप्पे खा रहे हैं। मैं उन्हें पहले तो एकटक देखता रहा फिर मुस्कराया। फिर हंस आ गई। फिर पत्नी की तरफ देखा, पत्नी उधर वहीं देख रही थी। उन्होंने मुझे अपनी तरफ देखते पाया तो बोली,‘‘इससे बड़ी सुन्दरता की कल्पना नहीं की जा सकती।’’ मैं चाट खाते जोड़े को देख रहा था, मैंने कहा, ‘‘हां, इससे बड़ी सुन्दरता की कल्पना नहीं की जा सकती।’’

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रचनाकार: असगर वजाहत की 3 कहानियाँ - 1 चार दिशाएँ, 2 नया गणित तथा आठवां आश्चर्य
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