सोमवार, 19 मई 2014

राजीव आनंद का आलेख -- व्यंग्यकार शरद जोशी : एक स्मरण

21 मई को शरद जोशी के जन्‍मदिवस पर विशेष

शरद जोशी ने लिखा था, ‘‘लिखना मेरे लिए जीने की तरकीब है․ इतना लिख लेने के बाद अपने लिखे को देख मैं सिर्फ यही कह पाता हूँ कि चलो, इतने बरस जी लिया․ यह न होता तो इसका क्‍या विकल्‍प होता, अब सोचना कठिन है․ लिखना मेरा निजी उदे्‌श्‍य है․''

21 मई 1931 को जन्‍मे शरद जोशी ने 25 साल तक कविता के मंच से गद्य पाठ किया․ वह देश के पहले व्‍यंग्‍यकार थे जिन्‍होंने पहली बार मुंबई में ‘चकल्‍लस' के मंच पर 1968 में गद्य पढ़ा और किसी कवि से अधिक लोकप्रिय हुए․ बिहारी के दोहे की तरह शरद जोशी अपने व्‍यंग्‍य का विस्‍तार पाठक पर छोड़ देते है․

आज के दौर में लोग व्‍यंग्‍य से दूर हो रहे है क्‍योंकि सामाजिक परिस्‍थितियाँ इतनी खराब होती जा रही है कि लोग व्‍यंग्‍य के शब्‍दों में छिपी बेदना को अभिव्‍यक्‍त करने वाले को स्‍वीकार करने में हिचकने लगे है, इस अमानवीय समय में मनुष्‍यता और रिश्‍तों को बचाना जरूरी है․ जब पूरी दुनिया एक बाजार में तब्‍दील हो चुकी है, जहाँ सब कुछ विकाउ हो जाने की संभावनाएँ मौजूद है, ऐसे मे शरद जोशी का व्‍यंग्‍य की प्रासंगिकता बढ़ जाती है․ शरदजोशी आजकल के व्‍यंग्‍यकारों की तरह बाजार को देखकर नहीं लिखते थे․ उनके व्‍यंग्‍य परिस्‍थितिजन्‍य होने के साथ उनमें सामाजिक सरोकार होते थे जबकि आजकल के व्‍यंग्‍यकारों में सपाटबयानी अधिक होती है․ वरिष्‍ठ कवि चंद्रकांत देवताले ने ठीक कहा है कि ‘‘वैश्‍वीकरण और भ्रष्‍टाचार जैसी चुनौतियों के बीच कोई ऐसा व्‍यंग्‍यकार नही है जो हमें विनोद की बजाय चुटकी लेकर जगाए․''

व्‍यंग्‍यकार शरद जोशी अपने समय के अनूठे व्‍यंग्‍यकार थे․ जहां एक तरफ पारसाई के व्‍यंग्‍य में कडवाहट अधिक है वहीं शरद जोशी के व्‍यंग्‍य में कडवाहट के साथ हास्‍य, मनोविनोद और चुटीलापन दिखाई देता है जो उन्‍हें जनप्रिय रचनाकार बनाता है․ अपने वक्‍त की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्‍कृतिक विसंगतियों को उन्‍होंने अत्‍यंत पैनी निगाह से देखा और बड़ी साफगोई के साथ उसे सटीक शब्‍दों में व्‍यक्‍त किया․ उन्‍होंने लिखा कि ‘‘हिन्‍दी में पाठक की तलाश एक मरीचिका है और शुद्ध लेखक आदर्श जीवन की कल्‍पना है․ हिन्‍दी साहित्‍य दोनों की अनुपस्‍थिति में फूल-फल रहा है, यह अपने आप में चमत्‍कार है․''

शरद जोशी की दूरदर्शिता की एक बानगी देखिए जब वे लिखते है कि ‘‘साहित्‍यकारों ने पिछले वर्षों में बड़े एण्‍टी आंदोलन चलाये, अकहानी, अकविता, अनाटक․ मगर आगे पाठक अपुस्‍तक का आंदोलन चलाएगा․ किताबों से इंकार का आंदोलन और वह साहित्‍यकारों को बड़ा भारी पड़ेगा․'' आज संजाल के जाल में हम किताबों से इंकार का आंदोलन ही तो चला रहे है․ पाठकों ने पुस्‍तक के बजाए ई-पुस्‍तक पढ़ना शुरू कर दिया है․

22 जनू 1975 को शरद जोशी ने ‘पचास साल बाद-शायद' में लिखा कि ‘‘हिन्‍दी में दृढ़ विश्‍वास को व्‍यक्‍त करने के लिए सबसे सशक्‍त शब्‍द ‘शायद' ही है इसलिए मैं ‘शायद' लगा रहा हूँ․ उनके व्‍यंग्‍य लेखों का संग्रह ‘पिछले दिनों' में शरद जोशी ने जहां सामाजिक स्‍थितियों को नई दृष्‍टि देते हुए सही दिशा की ओर इंगित करते है वहीं दूसरी ओर उनकी तीक्ष्‍णता और पैनेपन से पाठक प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता․ ‘यत्र तत्र सर्वत्र' उनकी 101 व्‍यंग्‍य रचनाओं का संग्रह है जिसे पढ़ने पर यह स्‍पष्‍ट होता है कि शरद जोशी अपने चिंतन और लेखन के स्‍तर पर व्‍यापक मानवीय सरोकारों के साथ कितनी संवेदनशीलता और बौद्धिक सघनता से जुड़े हुए थे․ समकालीन जीवन और समाज की तमाम समस्‍याओं और विसंगतियों में एक सिद्धहस्‍त व्‍यंग्‍यकार की बहुत कुछ तोड़ने और बनाने की भीतरी छटपटाहट भी उनके व्‍यंग्‍यात्‍मक निबंध संग्रह ‘यथासमय', जीप पर सवार झल्‍लियां', रहा किनारे बैट' में देखा और पढ़ा जा सकता है․ उनके सम्‍पूर्ण साहित्‍य में से सौ बेहतरीन रचनाएं स्‍वयं शरद जोशी द्वारा चुनी हुई ‘यथासंभव' में संकलित है․ अपनी चिर-परिचित शालीन भाषा में वे कहते है कि ‘‘मैंने हिन्‍दी में व्‍यंग्‍य साहित्‍य का अभाव दूर करने की दिशा में ‘यथासंभव' प्रयास किया है․'' यह कहना अतिशओक्‍ति नहीं होगी कि शरद जोशी ने हिन्‍दी के गंभीर व्‍यंग्‍य को करोड़ों लोगों तक पहुंचाया․ उनके व्‍यंग्‍य संग्रहों से गुजरते हुए प्रेम, सौंदर्य, राजनीति, साहित्‍य, भाषा, पत्रकारिता, नैतिकता आदि तमाम विषयों पर पाठक उनके बेलौस और बेधक प्रतिक्रियाएं देख-पढ़ सकते हैं․

शरद जोशी ने टेलीबिजन के लिए ‘ये जो है जिंदगी', बिक्रम वैताल, सिहांसन बत्‍तीसी', बाह जनबा, देवीजी, प्‍याले में तूफान, दाने अनार के और ये दुनिया गजब की, धारावाहिक लिखें․ इन दिनों ‘सब' चैनेल पर उनकी कहानियां और व्‍यंग्‍य आधारित सिटकॉम, लापतागंज प्रसारित किया जा रहा है जो काफी सराहा भी गया है․ उन्‍होंने छोटी सी बात, सांच को आंच नहीं, गोधूलि, क्षितिज और उत्‍सव जैसे सफल फिल्‍मों की पटकथा भी लिखा․ शरद जोशी की मृत्‍यु 23 वर्ष पूर्व 5 सितंबर 1991 को मुंबई में हुई थी लेकिन उनकी लोकप्रियता आज भी वैसे ही बरकरार है जैसे उनके जीवनकाल में थी․ उनके कटाक्ष आज भी उतने ही प्रासंगिक है․

 

राजीव आनंद

संपर्क 9471765417ं

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