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सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा की लघुकथा - नया जमाना

clip_image002लघु - कथा

नया जमाना

सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा .

“ माँ ! यह आदमी क्या शोर मचा रहा है ?”

“ पागल हो गया है ? ”

“ यह ऐसे क्यों कह रहा है की तुमने इसे धोखा दिया ?”

“ मैंने कहा न यह आदमी पागल हो गया है ?”

“ पागल तो नहीं लगता . इसके हाथ में तो एक कागज भी है जिसे यह तुम्हारा प्रेम - पत्र कहता है !”

“ झूठ बोलता है , यह कोई तगड़ा पागल है .”

“ माँ , उस कागज पर तुम्हारे दस्तखत भी हैं ,सच - सच बताओ न यह ऐसा क्यों कह रहा है ?”

“ बेटी , मेरी मानो यह आदमी कोई ,पागल है , मैंने इसे कोई धोखा नहीं दिया !”

“ माँ ! यह आदमी पागल नहीं लगता , इसके पास तो कोई तस्वीर भी है !”

“ तू मुझसे कहलवाना क्या चाहती है , मैंने कहा न यह आदमी पागल है .”

“ माँ , मेरी नजर में तुमने इसे नहीं , मेरे डैडी को धोखा दिया है , यह पागल तो उस सच का पोस्टर है ! बस.”

“ तो क्या इसे अंदर बुला लूँ .”

“ नहीं माँ ! भले ही यह पोस्टर- नुमा आदमी सच बोलता हो पर यह पोस्टर तुम्हारी बदसूरती का जरिया बन रहा है , तुम मेरी माँ हो , मैं तुम्हारी बदसूरती बर्दाश्त नहीं कर सकती . मैं इसे फाड़ दूँगी .”

“ यह तो मजबूत दिखता है , कैसे फाड़ोगी ?”

“ तुम चिंता न करो माँ. मेरे पास बहुत सारे हथियार हैं.”

“ मतलब ? “

“ अरे मेरे दोस्त , वे किस दिन काम आएंगे .”

“ वो तो ठीक है बेटी , पर जो कुछ तुम करने जा रही हो , वह खतरनाक है ."

" माँ ! अभी मेरे पास यह सोचने का समय नहीं है , डैडी तो मरने के बाद मिटटी में मिले हैं ,इस पागल के पागलपन के कारण तो तुम जीते जी मिट्टी में मिल जाओगी ! क्या इसे हम सहन कर पायेंगे ? "

“ जरा सावधानी से , कहीं बात बिगड़ न जाये !”

“ चिंता न करो माँ , तुम सुंदर बनी रहो बिना किसी कालिख के , यह मेरी मजबूरी है .”

सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा .

डी-184, श्याम आर्क एक्सटेंशन साहिबाबाद, उत्तरप्रदेश

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