शुक्रवार, 30 मई 2014

पुस्तक समीक्षा – कार्यालय तेरी अकथ कहानी

चिन्‍तन परक आलेखो का संग्रह-कार्यालय तेरी अकथ कहानी

विनोद साव

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कार्यालय तेरी अकथ कहानी यह व्‍यंग्‍य के क्षेत्र में एक नवोदित लेखक वीरेन्‍द्र सरल के ताजा प्रकाशित पहले व्‍यंग्‍य संग्रह का नाम है। इसे यश पब्‍लिकेशन दिल्‍ली ने छापा है। वीरेन्‍द्र सरल वनाँचल क्षेत्र मगरलोड़ के उसी उर्जावान धरती के रचनाकार हैं जहाँ छत्त्‍ाीसगढ़ी और हिन्‍दी साहित्‍य में लिखने वालों की अधिकाधिक संख्‍या निरन्‍तर सृजनशील है।मगरलोड़ के संगम साहित्‍य एवं सांस्‍कृतिक समिति के सदस्‍यगणों के बीच गोष्‍ठियों मे शिरकत करते हुये वे साहित्‍यिक संस्‍कारो से युक्‍त हैं ।इन दिनो वे छत्त्‍ाीसगढ़ के अनेक अखबारों पत्रिकाओं मे कहीं न कहीं छप रहे हैं ।वे धमतरी जिले के ग्राम बोड़रा निवासी हैं और भोथीडीह के शासकीय उच्‍चतर माध्‍यमिक विद्यालय में उच्‍च श्रेणी शिक्षक हैं।

वीरेन्‍द्र सरल के इस व्‍यंग्‍य संग्रह की रचनाओं मे किसी नवोदित का अधपकापन नही हैं बल्‍कि किसी वरिष्‍ठ रचनाकर्मी की परिपक्‍कता है। समकालिन परिदृश्‍य पर कलम चलाते हुये उनके चिन्‍तन और भाषा में धीर-गंभीरता है, उन्‍हें अपनी बात कहने की जल्‍दबाजी नही होती ,वे धर्य और संबल बनाये हुये अपनी बारी का इंतजार करते हैं और अपने लेखन की रक्षात्‍मक पारी खेलते हुये अपनी रचना पूरी करते हैं । छत्त्‍ाीसगढ मे व्‍यंग्‍यकारों का जमवाड़ा तो रहा ही है पर किसी समर्थ नवोदित व्‍यंग्‍यकार की कमी लंबे समय से खटक रही थी यह कमी वीरेन्‍द्र सरल के पहले व्‍यंग्‍य संग्रह के आने से कुछ हद तक पूरी हुई है । उनके लेखन मे ब्‍यापकता है और वे व्‍यंग्‍य के केवल स्‍थानीय स्‍तर पर ही नहीं बल्‍कि अखिल भारतीय परिदृश्‍य पर पहचाने जाने वाले लेखक हो सकते हैं।इस दिशा में उनकी और भी संग्रहों की प्रतीक्षा रहेगी ।लेखक अपनी रचना में निहित सम्‍बल से भी प्रेरणा ले सकते हैं । लेखक को इस बात का भी श्रेय जाता है कि वे दूर साधनहीन क्षेत्र मे रहते हुये और अध्‍यापक के पद पर सेवारत रहते हुये भी समकालीनता व सम सामियकता के प्रति सजग हैं।व्‍यंग्‍यबाण चलाने की उनकी चेष्‍टा गुरू विहीन एकलब्‍य की भांति फलीभूत हो रही है।

संग्रह का शीर्षक कार्यालय तेरी अकथ कहानी संग्रह की पहली रचना है । यह बहुलिखित विषय है ।स्‍थानीय प्रशासन और राजनीति जैसे बहुलिखित विषयों पर लिखते समय उनमें नये अन्‍वेषण और खोज का श्रम साध्‍य कार्य करना पड़ता है ।अफसरशाही और बाबूगिरी की जानी समझी भंगिमाओं को लेखक कितना उद्‌धृत करे फिर भी बेरोजगार आवेदक का यह निवेदन ‘‘मैं रोजगार के लिये दर दर की ठोकरें खा रहा हूँ और यहाँ मेरी फाइल धूल खा रही है ‘‘ प्रत्‍युत्त्‍ार मे बाबू का यह कहना कि ‘‘तुम जैसे लोगों की फाइलों को धूल नही खायेगी तो क्‍या नेता और अधिकारी खायेंगें?‘‘ जैसे कुछ संवाद है जो स्‍थानीय प्रशासन की बेशर्मी को उजागर करते हैं ।एक ऐसे समय मे जहाँ सैकड़ों हजारों करोड़ों के घोटाले अब रोज हो रहें है तब भी लेखक में व्‍यंग्‍य करने का हौसला अब भी बाकी है और अपने किसम से मोरचा बांधने की अपनी तैयारी में जुटा रहना चाहता है ।यह लेखक की ऐसी शक्‍ति है जो बृहत्त्‍ार समाज के पक्ष में खड़े होकर जीवन मे बहुजनों के हौसले को भी बचाये रखने की कोशिश है।

वीरेन्‍द्र सरल के चिन्‍तन परक आलेखो में एक रचना दृष्‍टिकोण है ।लेखक कहते हैं कि मेरे विचार से दृष्‍टिकोण तीन तरह के होते हैं-यथा न्‍यून दृष्‍टिकोण ,सम दृष्‍टिकोण और अधिक दृष्‍टिकोण ।समदृष्‍टि कोण से देखने वाली प्रजाति विलुप्‍ति के कगार पर है ।आजकल सम दृष्‍टिकोण से वही देख सकता है जिसके पास वास्‍तव में दृष्‍टिकोण ही नही है।जिसके द्वारा स्‍वार्थ पूरा होता है ,उसे स्‍वार्थ सिद्ध करने वाला हमेशा अधिक दृष्‍टिकोण से देखता है।नही करने वाले को न्‍यून दृष्‍टिकोण से। अपने चिन्‍तन को विनोदप्रियता मे बदलते हुये लेखक की गलाकाट प्रतिद्वंदियों पर ये पंक्‍तियां है जब बकरों में ही पहले हलाल होने की प्रतिस्‍पर्धा हो तो कसाइयों का बाजार मूल्‍य तो बढ़ेगा ही । अपनी घोषणापत्र लेखक रचना में आजकल धड़ल्‍ले से हो रहे संक्षेपीकरण का उपहास करते हुये वे उन्‍हें घोपलेस कहते हैं। यह रचना ऐसे चरित्रो पर लक्षित है जो अपनी साहित्‍यिक उर्जा का प्रदर्शन केवल राजनेताओं को रिझाने के लिये करते हैं । इस प्रभाव से स्‍वयं लेखक भी मुक्‍त नही हो सके हैं और अपने पहले संग्रह पर मंत्री जी का चित्र और संदेश छपवा बैठे हैं ।

वीरेन्‍द्र सरल निबंधात्‍मकता की सपाट शैली से बचतें हैं और बहुधा अपनी रचनाओं में कोई सूत्रघार या कुछ पात्र खड़े करके उनके साथ संवाद कायम करते हैं। कथोपकथन की शैली अपनाते हुये वे अपनी रचना पूरी करते हैं इससे रचना में रोचकता बनी रहती है ।इसमें पाठक भी कहीं लेखक का सहयात्री होकर उस घटनाक्रम में उपस्‍थित हो जाता है जिस पर लेखक की कलम चल रही होती है।संग्रह की भूमिका मे श्री विनोद शंकर शुक्‍ल कहते है कि वीरेन्‍द्र सरल की दृष्‍टि साफ है और अभिप्राय स्‍पष्‍ट इसलिये उनकी रचनाओं को पढ़ते हुये किसी जटिलता से साक्षातकार नही होता । आशा है ,वे हिन्‍दी व्‍यंग्‍यकारों मेें स्‍थान बनाने में सफल होंगें ।

3 blogger-facebook:

  1. Achha hai ! Naye rachanakar vyangya vidha ko agar nayi disha dene ki ichha rakhte hain yah stutya hai. virendra saral ji ko sadhuvaad!
    Manoj Aajiz
    Jamshedpur
    mkp4ujsr@gmail.com

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  2. विचार वीथी, मई-जून 2013, में भी ’कार्यालय तेरी अकथ कहानी’ की समीक्षा प्रकाशित हुई है। यह अधिक विस्तृत और तर्कपूर्ण हैं। समीक्षक हैं डाॅ. जीवन यदु। www.vicharvithi.com पर जाकर इसे पढ़ा जा सकता है।

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  3. विचार वीथी, मई-जून 2013, में भी ’कार्यालय तेरी अकथ कहानी’ की समीक्षा प्रकाशित हुई है। यह अधिक विस्तृत और तर्कपूर्ण हैं। समीक्षक हैं डाॅ. जीवन यदु। www.vicharvithi.com पर जाकर इसे पढ़ा जा सकता है।

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