---प्रायोजक---

---***---

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.

दीपक शर्मा 'सार्थक' का व्यंग्य - यथार्थ का बलात्कार

साझा करें:

अभी  हाथ में न्यूज़ पेपर लेकर बैठा ही था कि  दरवाज़ा जोर जोर से पीटने की आवाज़ आई, मैं समझ गया कि द्विवेदी जी आ गए हैं क्योंकि वही दरवाज़े पर ...

image

अभी  हाथ में न्यूज़ पेपर लेकर बैठा ही था कि  दरवाज़ा जोर जोर से पीटने की आवाज़ आई, मैं समझ गया कि द्विवेदी जी आ गए हैं क्योंकि वही दरवाज़े पर इस तरह दस्तक देते हैं।  वो अलग बात है कि उनकी ऐसी खतरनाक दस्तक मेरे मन में दहशत भर देती है कि वे कहीं दरवाज़े सहित ही अंदर न आ जाएँ अतः मैं भाग कर दरवाजा खोलने के लिए उठा और दरवाज़े के  स्वतः खुलने से पहले ही उसे खोलने में कामयाब रहा।

दरवाज़ा खोलना था कि द्विवेदी जी ने राकेट के जैसे कमरे में प्रवेश किया और सोफे को हिरोशिमा समझ कर  उस पर परमाणु बम की तरह धम्म से गिर पड़े। मैंने दरवाज़ा बंद किया और उनके पास पहुंच कर ज़बरदस्ती मुस्कुराते हुए पूंछा, " कहिये कैसे आना हुआ द्विवेदी जी ?"

उन्होंने मेरे खिचड़ी नुमा इस साधारण से प्रश्न का  मटन कोरमानुमा स्वादिष्ट उत्तर देते हुए कहा, "अजी इधर से गुज़र रहे थे तो सोचा तुमसे मिलते चलें इसी बहाने कुछ गपशप हो जाएगी और चाय पानी भी हो जायेगा। "

अच्छे मेजबान का फ़र्ज़ अदा करते हुए मैं उनके चाय पानी और गपशप की  मांग पूरी करने में लग गया तब तक वो मेज पर रखे पेपर को उलट पलट कर अपनी पसंदीदा खबरे खोज कर पढ़ने लगे।

बहुत सी हेडलाइंस पर अपनी दिव्य दृष्टि दौड़ाते हुए वे एक हैडलाइन पर रुके, हैडलाइन  का शीर्षक था, "शौच को जाती किशोरी से हुआ बलात्कार।" उन्होंने इस खबर को बड़ी ही तन्मयता और रसास्वादन करते हुए पढ़ा और ऐसी ही अन्य खबरों को निपटाने के बाद पेपर एक तरफ रख दिया और चाय उठाकर सिप करते हुए मुझसे बोले, " देश की हालत बड़ी ख़राब है, क्या हो गया है लोगों को?"

मैं समझ गया कि चाय के साथ अब वे गपशप के मूड में हैं अतः सहयोग के लिए बात आगे बढ़ाते हुए बोला, " देश को क्या हुआ द्विवेदी जी?"

इतना पूछना था कि बस उन्होंने कश्मीर से कन्या कुमारी तक और गुजरात से लेकर पूर्वोत्तर तक देश की राजनीतिक व्यवस्था को अपने दस मिनट के भाषण में दही की तरह मथ दिया, जिसका मक्खन की तरह यह निष्कर्ष निकला कि देश की ऐसी दुर्दशा इसलिए है क्योंकि वे राजनेता नहीं हैं और परम्पराओं  व संस्कारों का महत्व ख़त्म होता जा रहा है। हालाँकि मैंने उनके इस प्रवचन का मात्र इतना ही निष्कर्ष निकाला कि उनकी राजनीतिक पिपासा जो पूरी न होने के कारण पीड़ा में बदल गयी, के कारण वे व्याकुल हैं।

उन्होंने कई छोटे मोटे चुनाव लड़े थे लेकिन वे हार गए, जबकि उनमें नेता वाले सारे गुण हैं।  वैसे तो एक नेता निर्गुण, निराकार,निर्विघ्न, निर्भीक और समस्त कलाओं से युक्त होता है लेकिन फिर भी कुछ गुण ऐसे होते हैं जो उसके सफल होने और महान बनने में आवश्यक होते है। जैसे एक अनुभवी नेता, अनुभवी बलात्कारी की तरह होता है जिस तरह एक अनुभवी बलात्कारी बलात्कार के समय अपने अनुभव के  दम पर पीड़िता से भी सहयोग प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार एक सफल अनुभवी नेता जनता के शोषण के समय उसका सहयोग प्राप्त कर लेता है।

एक सफल नेता का चरित्र रुपये के जैसा होता है जो डॉलर के मुकाबले गिरता ही जाता  है और साथ ही निज स्वार्थ के कारण सेंसेक्स की तरह संवेदनशील होता है जो अगर विदेशी बाजार को  छींक भी आ जाये तो चारो खाने चित्त हो जाता है और सबसे बड़ी बात देश में उसकी स्थिति पांच सौ के नोट के जैसी होती है जिसे हर कोई शक की नज़र से देखता है फिर कलेजे से लगा के रख लेता है।

इन सब गुणों के होते हुए भी द्विवेदी जी क्यों सफल नहीं हुए ये शोध का विषय है।  मैं इस शोध में व्यस्त ही था कि  उन्होंने मुझे झझकोरते हुए कहा, " अरे कहाँ खो गए भाई, चलो कहीं टहल के आते हैं "

उनके इस अनुरोध की चासनी में लिपटे आदेश के कारण मैं उनके साथ चल पड़ा।  हम लोग टहलते हुए शहर के एक पार्कनुमा ऐतिहासिक स्थल पर पहुँच कर वहां का नज़ारा लेने लगे, जहाँ की रमणीयता केवल प्राकृतिक वातावरण के कारण ही नहीं बल्कि वहां आने वाले नवयुवती व युवकों के कारण भी आकर्षक थी जो इस ऐतिहासिक स्थल पर पहुंच कर,  खोह खंडहरों में घुसकर, झाड़ियों और पेड़ों के पीछे छुपकर एक दूसरे के भूगोल  को समझने में लगे रहते हैं।  कभी कभी तो भूगोल का प्रयोगात्मक ज्ञान लेने तक बात पहुँच जाती है अतः यह स्थान द्विवेदी जी को बहुत आकर्षक लगता है।  झाड़ियों के पीछे ऐसे ही रिसर्च वर्क में लगे एक जोड़े को  वे ध्यान से देखने  लगे जिससे उनकी आँखों पर हवस के लाल डोरे तैरने लगे, दृश्य का पूरा अवलोकन करने के बाद वो मेरी ओर पलटे फिर मैंने उनकी आँखों पर पड़े हवस के लाल डोरों को क्रोध के लाल डोरों में बदलते देखा जो शायद इसलिए था कि  वे उस  युवक की जगह क्यों नहीं हैं परन्तु अचानक उन्हें समाज पर ग़ुस्सा आ गया और मुझसे बाले, " देखो समाज कैसे विकृत होता जा  रहा है। स्त्रियां बेशर्म होती जा रही हैं।  उनमे लज्जा व शर्म ख़त्म होती जा रही है।  देश इसीलिए निश्तेज हो गया है क्योंकि यहाँ की स्त्रियों का सतीत्व समाप्त होता जा रहा है।"

उन्होंने आगे बताया की इस देश में फैले अनेक संक्रमण रोगों और बीमारियाँ जैसे- पीलिया, एनीमिया, हैजा, डायरिया, मलेरिया के कारण मौतें इसलिए हो रही हैं क्योंकि व्यक्ति संस्कारी नहीं हैं।

मुझे लगा की यदि ये बात सत्य है तो भारत सरकार को बिना मतलब इतना धन टीकों पर खर्च करने की क्या जरुरत है, अगर संस्कारों का टीका चल जाये तो समस्त परेशानियों से मुक्ति मिल सकती है।

वैसे भी हम भारतीय जन्म संस्कार से लेकर मृत्यु संस्कार और ऐसे ही हजारों संस्कारों और परम्पराओं से घिरे हुए हैं अतः ऐसा टीका लगवाने में किसी को कोई परेशानी नहीं होगी।

वैसे तो हमारा देश परम्पराओं और संस्कारों का धनी  है लेकिन द्विवेदी जी की बातों से मुझे लगा कि देश में संस्कारों और परम्पराओं की हो रही कमी को दूर करने के लिए इसका दूसरे देशो से आयात किया जाना चाहिए, जिसके लिए कुछ ख़ास करने की जरुरत नही है बस जो लोग संस्कारों और परम्पराओं को नहीं मानते हैं उन्हें इसी परम्पराओं के कोल्हू में पेर कर और उनके अंदर भरी मौलिकता तथा नवाचार की एक एक बूँद निचोड़ कर उसे  उन देशो में निर्यात किया जाये जहाँ मौलिकता और नवाचार की मांग है और उसके बदले संस्कारों और परंपराओं का आयात  किया जाना चाहिए और भविष्य में परम्पराओं की रक्षा के लिए नए विचारों पर बांध बनाना चाहिए जिससे संस्कार रुपी बिजली पैदा हो सके।

ख़ैर द्विवेदी जी मुझे परम्पराओं और संस्कारों के मजबूत संरक्षक दिखने लगे, जो इसकी रक्षा के लिए हर तरह से प्रयास कर रहे थे।  मैंने उन्हें श्रद्धा भरी नज़र से देखा और उनके द्वारा किये गए बलिदानों को याद करने लगा।  जैसे परम्पराओं और संस्कारों की खातिर उन्होंने भाभी  जी को बच्चा पैदा करने वाली मशीन बना दिया जिससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हो सके और आखिरकार छह बेटियों के बाद उन्हें ये सौभाग्य प्राप्त भी हुआ।  ऐसा इसलिए क्योंकि पुत्र और गुरु ये दोनों संस्कार के दो स्तम्भ हैं।  इनकी आवश्यकता बहुत से संस्कारों और परम्पराओं को पूर्ण करने में होती है। जैसे यदि पुत्र नहीं होगा तो अंतिम संस्कार कौन करेगा , गया हांड लेकर कौन जायेगा, मरने के बाद भी क्षुधा शांत करने के लिए श्राद्ध कौन करेगा और रही गुरु की बात तो प्रथम संस्कार से अंतिम संस्कार तक तो उसकी आवश्यकता है ही और वो गुरु ही है जो  ईश्वर के निवास स्थान से पहले पड़ने वाले भवसागर को पार कराने का ठेका लेता है।  दूसरे लोक में दिव्य व्यवस्था जैसे स्वर्ग में कैब्रे करती अप्सराओं का आनंद, सोमरस के आनंद की व्यवस्था गुरु के माध्यम से ही संभव है।

ऐसे ही विचारों में मग्न और द्विवेदी जी के अद्वितीय सांस्कृतिक व्याख्यानों को सुनता हुआ मैं घर आ गया।

द्विवेदी जी की दार्शनिक बातों के बारे में सोचते सोचते और पूरे दिन की हलचल व थकान के कारण मुझे नींद आ गयी।  फिर मैंने एक स्वप्न देखा जिसमें मेरी मृत्यु हो गयी है और देवदूत मुझे लेकर जा रहे हैं फिर उन्होंने फुटबॉल की तरह उठाकर मुझे भवसागर में फेंक दिया लेकिन वहां मैंने ईश्वर की एक विशेष कृपापात्र जानवर की पूँछ पकड़ ली जिसने मुझे वो सागर पार करा दिया उसके उस पार मैंने ईश्वर का निवास स्थान देखा।  मैंने देखा कि भगवान हजारों दलालों और लाखों दासों के बीच घिरा बैठा है। वहां सभी को उनके स्टेटस के हिसाब से आसन  प्राप्त है।

मैंने देखा कि ईश्वर के निकट बैठे एक देवता, जिसके हाथ में कई सारे रजिस्टर थे, ने कहा, " प्रभु इस रजिस्टर में पृथ्वी लोक के आय-व्यय का लेखा  जोखा है, आज्ञा हो तो पढ़कर सुनाऊँ !!"

ईश्वर ने आज्ञा दे दी, उसने पढ़ना शुरू किया, " प्रभु, लगातार व्यय बढ़ने और आय की प्राप्ति घटने के कारण 'भुगतान संतुलन' बिगड़ गया है।  इसके बहुत से कारण हैं जैसे बहुत से भक्त टैक्स चोरी करने लगे हैं, वे उतना चढ़ावा नहीं चढ़ाते जितना उनको चढ़ाना चाहिए और आज कल तो कुछ भक्त नकली सोना चांदी भी चढाने लगे हैं, प्रभु इसके कारण राजकोषीय घाटा बढ़ता जा रहा है। "

ईश्वर क्रोध में कांपने लगा और बहुत से सामाजिक कल्याणकारी कार्यक्रमों जैसे अंधे को आँख देने, निसन्तानों को संतान देना, कोढ़ियों को काया देना और निर्धनो को माया देने जैसी योजनाओं को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने का आदेश दिया।

किसी  दूसरे देवता ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा ,"प्रभु , ये भारत वासी बड़े ही कृतघ्न(अहसानफरामोश) हैं, आपने हमेशा जन्म लेने के लिए यही स्थान चुना तथा इस देश में न जाने कितनी कल्याणकारी योजनाएं चलायीं, लेकिन कुछ दुष्ट भारतीय अब दास बनकर या भक्त बनकर नहीं रहना चाहते, वो हर चीज का क्रेडिट आपको नहीं देना चाहते, इन दुष्टों को अब दास बनकर रहना अच्छा नहीं लगता और दबी जुबान से ये स्वतंत्रता की बात करने लगे हैं आपकी पूजा पाठ को कर्म काण्ड कहने लगे हैं अतः प्रभु इससे पहले कि ये लोग आपके द्वारा स्थापित संस्कारों और परम्पराओं को पूरी तरह नकारना शुरू कर दें, आपके जो सचमुच भक्त और दास हैं उन्हें बहला फुसला लें, आप इन दुष्टों को उचित दंड दें। "

फिर एक अन्य देवता खड़ा होकर उत्तेजना में बोलने लगा, " प्रभु , भारतियों में परम्पराओं के बंधन शिथिल होते जा रहे  हैं, खान-पान में तो यह जातिगत बंधन समाप्त ही होने वाला है और अब ये लोग अंतरजातीय विवाह भी करने लगे हैं जबकि आपने सम्भुक का वध करके जातीय व्यवस्था की नींव को मजबूत किया था लेकिन अब ये आदर्श ख़त्म होते जा रहे हैं और प्रभु, सबसे बुरी बात ये है कि आपका डर कुछ मानवों के ह्रदय से समाप्त होने लगा है।  कुछ तार्किक लोग आपके अस्तित्व को तार्किकता और सार्थकता के मानदंडों पर तौलने लगे हैं जो शुभ संकेत नहीं हैं।"

फिर मैंने देखा कि ईश्वर क्रोध में सर्प की तरह फ़ुफ़कारने  लगा, स्वार्थ और क्रोध से भरे ईश्वर ने भयानक गर्जना की जिससे उसी समय मेरा ये भ्रम टूट गया कि ईश्वर निर्विकार अर्थात विकारों से रहित है, मुझे उसमे हजारों बुराइयां दिखने लगीं अतः मैं वहां से आगे बढ़ गया। मैं कुछ दूर आगे बढ़ा था की किसी की चीखने की आवाजें सुनाई पड़ने लगी, मैं भाग कर उस तरफ गया तो एक भयानक दृश्य देखा। वहां मैंने द्विवेदी जी और उन जैसे हजारों लोगों को देखा, इन सभी ने 'यथार्थ' को पकड़ रखा था, वस्त्रविहीन यथार्थ की चीखें निकल रही थीं फिर सभी ने उसे परम्पराओं के बिस्तर पर ज़बरदस्ती लिटा दिया और संस्कारों से यथार्थ के हाथ पैर बांध दिए फिर बारी बारी से यथार्थ का बलात्कार करने लगे। ये हृदयविदारक दृश्य देखकर मैं भाग खड़ा हुआ, मुझे खुद  में बहुत ही हीनता और लघुता की अनुभूति हो रही थी। मैं  एक जगह खड़े होकर अपनी उखड़ी हुई साँसे दुरुस्त करने लगा  तभी वहीं दूर मुझे फक्कड़, यायावर सा एक व्यक्ति दिखा जो मुझे देख कर हंस रहा था।  मैंने उस व्यक्ति को  पहचान लिया। ये वही व्यक्ति था जिसने छह  सौ वर्ष पहले ही खुद को  सभी बंधनो व आसक्तियों से मुक्त कर लिया था। वो  हँसते हुए बार बार एक ही बात दोहरा रहा था,

                                                "कर का मनका डार दे, मनका मनका फेर"

उसके बार बार यही दोहराने के कारण मैं बहुत ही विचलित हो उठा, मेरे अंदर छटपटाहट होने लगी और मेरी आँख खुल गयी मैं पसीने से नहाया हुआ था, मेरी धड़कन बहुत तेज चल रही थी फिर धीरे धीरे सब ठीक होने लगा लेकिन न जाने क्यों मन बहुत भारी है, न जाने क्यों वातावरण में ऑक्सीजन ख़त्म सी हो गयी है, ना जाने क्यों बंधनों से आज़ाद होने के लिए मन छटपटा रहा है, न जाने क्यों …???

                                                                          --- दीपक शर्मा 'सार्थक'

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 2
  1. अखिलेश चन्द्र श्रीवास्तव7:28 am

    श्री सार्थक जी का व्यंग "यथार्थ का बलात्कार"
    एक गूढ़ सारगर्भित व्यंग है जो आम व्यक्ति की
    भावनाओं की अभिव्यक्ति का ही वर्णन करता है
    रचना अच्छी बन पड़ी है लेखक को हमारी बधाई

    जवाब देंहटाएं
रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

---प्रायोजक---

---***---

---प्रायोजक---

---***---

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1$h=100

प्रायोजक

--***--

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधा/विषय पर क्लिक/टच कर पढ़ें : ~

|* कहानी * |

| * उपन्यास *|

| * हास्य-व्यंग्य * |

| * कविता  *|

| * आलेख * |

| * लोककथा * |

| * लघुकथा * |

| * ग़ज़ल  *|

| * संस्मरण * |

| * साहित्य समाचार * |

| * कला जगत  *|

| * पाक कला * |

| * हास-परिहास * |

| * नाटक * |

| * बाल कथा * |

| * विज्ञान कथा * |

* समीक्षा * |

---***---



---प्रायोजक---

---***---

|आपको ये रचनाएँ भी पसंद आएंगी-_$type=three$count=6$src=random$page=1$va=0$au=0$h=110$d=0

प्रायोजक

----****----

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4039,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,338,ईबुक,193,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,262,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,112,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3000,कहानी,2253,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,540,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,31,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,96,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,345,बाल कलम,25,बाल दिवस,4,बालकथा,67,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,16,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,28,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,242,लघुकथा,1248,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2005,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,708,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,793,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,17,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,83,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,204,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,77,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: दीपक शर्मा 'सार्थक' का व्यंग्य - यथार्थ का बलात्कार
दीपक शर्मा 'सार्थक' का व्यंग्य - यथार्थ का बलात्कार
http://lh6.ggpht.com/-wEi7JCrWrn0/U4nDQdG3aBI/AAAAAAAAYcw/AV3qxcFyPA4/image_thumb%25255B1%25255D.png?imgmax=800
http://lh6.ggpht.com/-wEi7JCrWrn0/U4nDQdG3aBI/AAAAAAAAYcw/AV3qxcFyPA4/s72-c/image_thumb%25255B1%25255D.png?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2014/05/blog-post_31.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2014/05/blog-post_31.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय SEARCH सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ