रविवार, 15 जून 2014

पुस्तक समीक्षा - बारिश की दुआ

बारिश की दुआ’ देवी नागरानी का अनुदित कहानी संग्रह- डॉ. यशोधरा शाह

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मई 1941 के तत्कालीन अखंड भारत के कराची शहर में जन्मी बहन देवी लालवाणी (अब नागरानी) के भीतर सुप्त साहित्यकार 21 वीं सदी के शुरू होते होते जाग उठा। और 2004 से 2012 तक सिन्धी एवं हिन्दी में ग़ज़लों तथा भजनों के दस संग्रह प्रकाशित कर चुका। इसके अलावा गत वर्ष गध्य में भी दो अनुवाद की हुई पुस्तकें प्रकाशित हुईं।

अन्यान्य प्रसिद्ध सिन्धी लेखकों की कहानियों का एक हिन्दी अनुवाद है -- “और मैं बड़ी हो गई” नामक शीर्षक से और दूसर “बारिश की दुआ” जिसमें भारत के विभिन्न प्रांतिक लेखकों की हिन्दी भाषा में प्राप्य अलग- अलग भाषाओं की चुनिन्दा कहानियों का सिन्धी अनुवाद है। बहन देवी के इसी पुस्तक की तासरात मैं यहाँ पेश करने का प्रयास कर रही हूँ।

भाव पक्ष एवं कला पक्ष दोनों की दृष्टि से देवी जी का यह चयन उनके संवेदनशील मन का परिचायक है। उदाहरण के तौर पर सुधा अरोरा की कहानी जिसमें न तो सिलसिलेवार प्रसंग वर्णन है, न पात्र परिचय, न उनके नाम ही ! बस, .....तीन तीन निशानियों से विलग लिए हुए बोल हैं, कभी दो तो कभी चार, कभी आठ पंक्तियों के ! उन्हीं से पता चलता है कि यह सब एक तानाशाह पति द्वारा पत्नि को हर बात पर ताना मारने के विविध नमूने हैं। उसके लिए वह गरम चाय पेश करे तब भी, ठंडा शर्बत पेश करे तब भी......!

सत्रह कहानियों वाले संग्रह की इस कहानी-‘रहोगी तुम वैसी ही’ के पुरुष पात्र से बिलकुल निराला है सूर्यबाला जी की कहानी- ‘कहो ना’ का नायक पति, बिलकुल शांत, उचित-अनुचित व्याहवार का विवेक रखने वाला, शिष्टाचारी सज्जन! यध्यपि हर बात पर उसीका अंतिम फैसला पत्नी को कभी कभार अखरता है, पर चुभता नहीं। क्योंकि उसके पीछे गर्व या क्रोध न होकर तर्क होता है। पाँच दिनों की उसकी उपस्थिति में ‘रूर्टिन’ (routine) से मुक्त पत्नि को तब्दीली भाति तो है, पर अंतिम दिन बेसब्री से उसका इंतज़ार भी करने लगती है वह। (यहाँ भी दोनों बेनाम है केवल बेटे का नाम निक्की दर्ज हुआ है)

संतोष श्रीवास्तव की कहानी ‘एक और कार्गिल’ में अम्मा व बाबा (रजनी और चंद्रकांत) के नामों को मिलाकर बुआ ने भतीजे को नाम दिया था रजनीकान्त। बड़ी मिन्नतों के बाद मिली इकलौती संतान, लेकिन उस पर धुन सवार हो गई सरफ़रोशी की और कार्गिल युद्ध में लड़ते हुए शहीद हो गया। शादी के आठ महीनों बाद विधवा बन चुकी उमा का दिल टूट गया। महीनों अस्पताल में रही, पर फिर एक कंपनी में नौकरी करने लगी। वहीं पर मयंक से उसका परिचय हुआ, जिसने हक़ीक़तों को स्वीकार कर नए सिरे से जीने की हिम्मत दी। उमा छुट्टी का दिन भी उसके साथ बिताती पर शादी नहीं करना चाहती। बालसखी शेफ़ाली के पूछने पर कहती है- “न ही शहीद की पत्नी होने का गौरव छोड़ना चाहती हूँ, न ही माँ और बाबूजी को, जिन्होने मेरी हर बात मान्य की है, यहाँ तक कि मयंक के साथ सम्बंध भी।“ वैसे सास तो शेफ़ाली द्वारा उमा को कुछ समझाना चाहती है, पर बाबूजी ने उन्हें यह कहकर रोका कि –“आगे भी लम्बी उम्र उमा को काटनी है, हंसी-खुशी से उसे यहीं पर जीनो दो। टोकने पर हमें छोड़-छाड़ कर कहीं चली न जाए।“

बाबूजी समझदार ससुर तो लगते ही है, सेवा भावी व मेहनती पति भी है, जो जोड़ों के दर्द से पीड़ित पत्नी को सब कुछ स्वयं बनाकर खिलाते-पिलाते हैं, घुमाने ले जाते हैं, वह भी बड़े प्यार-दुलार के साथ।

अवसाद व करुणा के बावजूद कुछ अचरज कुछ सुकून बख्शने वाली संतोष श्रीवास्तव की इस कहानी के करीब-करीब विपरीत माहौल में शुरू होती है श्री रमाकांत शर्मा की कहानी ‘सज़ा’, जिसमें नायक मनीष कहता है-“जब से मुझे कविता का पत्र मिला है, मैं अपने आप से बैठा झगड़ रहा हूँ। लगता है मैं दो हिस्सों में बंट गया हूँ: एक वह जो सब कुछ स्वीकार कर लेना चाहता है, और दूसरा अस्वीकार....”बड़ी उत्सुकता लगती है कि आखिर माजरा क्या है? ख़ुद से जूझने के बाद कहानी का किरदार कहता है-“विचारों की आँधी का एक बवंडर आया और वक़्त के उस पेपर वेट को उड़ा ले गया; जो मेरी गुज़री ज़िन्दगी के पन्नों को दबाए हुए था....!” फिर धीरे धीरे पता पड़ता है कि कॉलेज की सहपाठी कविता पर पहली नज़र में ही फ़िदा हो चुके ये साहबज़ादे इतने खुशनसीब निकले कि उसी के घर से रिश्ता आया और दोनों के फेरे भी लग चुके। लेकिन ...दुल्हन उसी रात को फ़रार हो गई है अपने बचपन के साथी व प्रेमी परेश के साथ सपनों का संसार बसाने हेतु!!

आघात से चूर-चूर मनीष जैसे अपनी ज़िंदाह लाश ढोता रहा है साल भर से। और आज अचानक यह पत्र ! “बाल मित्र होते हुए भी परेश खलनायक निकाला। मेरा सबकुछ लूटने के बाद फ़रार हो गया। गत पाँच महीनों में आत्म हत्या की कई कोशिशों में नाकाम रही हूँ। माफ़ी तो मैं खुद स्वयं को नहीं दे सकती, तो तुमसे कैसे मांगूँ? पर तुम्हारी गुनहगार तुमसे सज़ा का हुक़्म मांगती है। वह भुगत लूँ तभी मेरी आत्मा को कुछ शांति मिलेगी।“ पर न्यायधीश बड़ी उधेड़-बुन में पड़ जाता है, आख़िर फ़तवा क्या देता है? “अनचाहे पति की हिरासत में उम्र क़ैद !”

स्त्री-पुरुष के परस्पर रिश्ते के एक और ज्वलंत कोण को उजगार करने के लिए देवी जी ने अनूदित की है उषा भटनागर के कहानी ‘हादसा’। नए कॉलेज में स्वयं को रैगिंग से बचाने वाले अनीश के साथ अंकिता को पहले दोस्ती और फिर प्यार होने लगा था। घंटों साथ बिताते हुए अनीश ने एक दिन सब अंतर मिटा देने पर मजबूर कर दिया, पर फिर पढ़ाई व कैरियर का वास्ता देकर शादी से मुकर गया। बावजूद इसके अंकिता ने एक दूर की मौसी के यहाँ जन्म देकर बेटे को उसके सुपुर्द कर दिया। पढ़ाई पूरी कर माँ बाप के कहे मुताबिक़ रोहित से शादी करके सोम को जन्म दिया। सब कुछ मज़े में चल रहा था, पर किसी तरह उसके पहले बेटे शिव की बात रोहित को मालूम हो गई तो उसने अंकिता को घर से निकालना चाहा, लेकिन सोम बेटे पर अपना अधिकार जताया। यानि, विवाह के बाद हुई संतान पर स्त्री का कोई हक़ नहीं, और विवाह पूर्व हुई संतान पर पुरुष का कोई दायित्व नहीं। नायिका पूछती है-“पुरुष ऐसे दोगले क्यों?”

स्त्री पुरुष के परस्पर बातों-संघर्षों के अलावा समाज-जीवन के अन्याय पहलुओं को भी संग्रह की बाक़ी कहानियों में स्थान मिला है। गिरिराजशरण अग्रवाल की कहानी ‘अजन्मा बेटा’ में सुमीत आहूजा अपने दोस्त को बताता है-“फरवरी माह की एक सर्द शाम को दिल्ली में एक गेस्ट हाउस के लॉंन पर तनाका नामक जापानी औरत ने मुझे भी आमंत्रित किया था-जन्म से पहले मर चुके अपने बेटे की 50 वीं सालगिरह की दावत में।“ सुनकर हैरान हुआ दोस्त, पर सुमीत उसके सवालों का उत्तर टालते हुए तनाका की प्रतिभा व विधवा दशा, समाज द्वारा ऐसी स्त्रियॉं पर अविशेष अन्याय वगैरह- वगैरह पर बोलता रहा। इसी बहाने पाठकों की उत्सुकता को चरम सीमा तक बढ़ाने के बाद ही अंत में जाकर उस पार्टी पर्व आयोजन, उसकी सादगी के कारण भूत पूर्व की भीषण घटना और एक तरसती विधवा की वत्सल व्यथा का रहस्योद्घाटन किया जाता है...बड़े ही कलात्मक व प्रभावी ढंग से .......!

इसी वत्सल सम्बंध की विपरीत दिशा का करुणा चित्र मिलता है श्री धीरेन्द्र अस्थाना की ‘चीख’ नामक कहानी में, जहां पीड़ित मजबूर माँ को उबार न सकने की कुंठा उसके मँझले बेटे को पागल बना देती है।

ठीक इसके विपरीत कमलेश बक्षी की ‘भाभो’ की रामकहानी है। एक तहसीलदार की बेटी और चाय-बगानों की मालकिन, 85 वर्ष की उम्र में, दोनों आँखें धुंधली हो जाने पर भी चौथी मंज़िल के फ्लैट की सीढ़ियाँ चड़ने को-उतरने को मजबूर....हालांकि बेटा और पोते-परपोते उसी शहर में बंगलों-गाड़ियों में ऐश करते रहते हैं। फिर भी बुढ़िया के मुंह पर कोई शिकवा-शिकन नहीं! उनके नौकर के मुंह से किए जाने वाले जश्नों-जलसों के समाचार सुनकर खुश होकर लोकगीत गाकर उनको दुआएं देती रहती थी।

परंतु उर्मिला शिरीष की कहानी का (बेनाम)‘वो’ बूढ़ा हो जाने पर घर के लोग-भाई, बहू-बेटियाँ, उनके बच्चे- सब उनकी ‘हैसियत’, उनकी छोटी बड़ी इच्छा, आकांक्षाओं की तनिक भी परवाह नहीं करते, इस बात के एहसास से व्यथित होकर एक सवेरे निकल पड़ते हैं महाशय, दरबान से कहकर कि –“हमेशा के लिए जा रहा हूँ”। पर कहाँ? तय नहीं कर पाते। दिन भर यहाँ वहाँ भटकते हुए, थके हारे रात को घर के पिछवाड़े जा बैठते हैं। वहाँ सभी को अपने लिए चिंतित देखकर तसल्ली पाते हैं कि ‘अब जानी उन्होने मेरी ‘हैसियत’ !

लेकिन अनपढ़ ग्रामीण श्री रमाकांत शर्मा को वैसी तसल्ली भी नहीं होती। “किसी ज़रूरी काम से फलां दिन शहर आ रहा हूँ” ऐसा पत्र द्वारा सूचित कर देने के बावजूद बड़े भाई के घर पहुँचते वहाँ बड़ा सा ताला देखना पड़ता है। पास-पड़ोस के लोग नाम-काम तो पूछ लेते हैं पर पानी तक पिलाने की परवाह नहीं करते। एक तो बताता भी है कि पूरा परिवार किसी पार्टी में गया है, लेकिन यह नहीं कहता: “बाहर कब तक खड़े रहोगे। मेरे घर आकर बैठो ज़रा।“ ऐसा कहने वाला सड़क का ‘एक भला आदमी” जो रिक्षा चलाने वाला था। उसने यह भी बताया कि शहर में पार्टियां रात भर भी चलती हैं। “धर्मशाला एक तो शहर के पुराने विस्तारों में ही मिल सकती हैं और वहाँ भी आजकल पैसे वसूले जाते हैं, आप मेरे घर चलें।“ यह है मोहनदास नैमिशराइ की लिखी कहानी “एक भला मानस”।

इन सबसे हटकर ज़रा जासूसी माहौल मिला है वहीद ज़हीर की कहानी ‘आखिरी नज़र’ में जहां एक बूढ़ा चौकीदार अपनी ड्यूटी और नींद की तलब, दोनों को ताक पर रखकर अपने ही घर की चौकीदारी करने पर आमादा है। एक रात निकट की झड़ियों के पीछे से, तो दूसरी रात छत पर से, तेज़ धार वाली कुल्हाड़ी हाथ में थामे हुए राह जोहता रहा ...किसी चोर का उसी के घर में से निकलना, पर उसे पकड़ पाने के बजाय बूढ़ा धड़ाम से नीचे गिर पड़ा और मर्दाने जूते के निशानों को ही देख पाया...जो उसकी बेटी ने ही पहन रखे थे .!

कश्मीर के एक ब्राहमण माता-पिता की व्यथा तो इससे भी विदारक थी। एक रात अचानक 4-4 आतंकवादी घर में घुस आए। उनके फ़रमान पर ताज़ा खाना बनाकर खिलाया, रात भर सेंकने को आंच दी, और पुलिस आकर पूछे भी, तो सुराग़ न देने का वादा तक किया। फिर भी मुए जबरन किशोरी ‘वनी’ को अगुआ कर गए। उससे रसोइए, नर्स, नौकर के सिवा, चारों ने रखेल रूप में भी इस्तेमाल किया और निरंतर पहरे में रखा, ताकि भाग न पाए। साल भर उनके साथ यों भटकते वनी को एक बच्ची पैदा हुई तो उसकी हत्या पर उतारू हो गए। मिन्नतों बाद ज़िन्दा रखा भी, तो रोने पर मुंह को कसकर पट्टियों से बांध कर ...वनी के अन्दर जाग उठी माँ यह बर्दाश्त न कर पाई। चूहों के बहाने ज़हर मंगाकर चारों को सदा के लिए सुला दिया। पर दूर से उनके लिए टॉर्च का इशारा आता देख ख़तरे की घंटी दिमाग़ में बजी, और वह बेटी को पोटली में बांध नंगे पांव ही भाग निकली। अमावस रात के घोर अंधेरे में, भूत प्रेत लगते वृक्षों के बीहड़ के बीच से पांवों को खरोचते झड़ी-झंखरों में से, घुटनों तक कीचड़ भरे गढ़ों को पार करते मार्तंड (सूर्य) मंदिर के खंडहरों में पहुँच कर पनाह ली। सवेरा होते बच्ची जागी और सख्त चट्टान का ठंडा स्पर्श पाकर रोने लगी। सारे दहशत भरे तफ़्सील पढ़िये चंद्रकांता की कहानी ‘आवाज़’ में।

तेरह पन्नों की इस दीर्घकथा के मुक़ाबले बिलकुल छोटी है आरिफ़ ज़िया की ‘बारिश की दुआ’। महीनों की झुलसाने वाली गर्मी से हताश मुसलमीन जुम्मे की नमाज़ के वक़्त ख़ुदा-ताला के आगे नमाज़ ता की, तब ज़ुबेदा भी अपने नन्हें हाथ उठाकर इल्तिजा करती है-“अभी नहीं, अल्ला मियां, पिछली बार झोंपड़ी की छत में से पानी ने हमें घंटों भिगोए रखा। मेरी माँ को तेज़ बुख़ार हो आया है। पहले उसे ठीक कर दो। हम किसी महफ़ूज़ जगह पहुँच जाएँ, तब दोनों मिलकर बारिश की दुआ मांगेंगे। तुम सुनना, हाँ।“ शायद वह क़बूलियत का लम्हा था। काले बादलों में दरारें पड़ गईं, सूरज पूरे आबो-ताब से चमकने लगा।

लेकिन मा॰ ना॰ नरहरि का ‘कुतरा हुआ आदमी भाग्यशाली नहीं है। केवल 45 रुपए माहवार वेतन वाली गांव की स्कूल मास्टरी छोड़ कर वह नसीब आज़माने शहर आया था। एक भले सुपरवाइज़र ने लेथ मशीन चला ना सिखाकर नौकरी दिलवाई, पर ख़ुद दिल के दौरे से चल बसा। उसकी असहाय बेवा का ध्यान रखने लगा तो पत्नी शक करके रोज़ झगड़ती, आखिर माइके चली गई। यहां नया सुपरवाइज़र मैनेजर के साथ मिली भगत करता, कमीशन खाता, मज़दूरों की झूठी शिकायतें करता......!

और अनजान लोगों को एक नंबर का ‘खडूस’ (कथाकार हरिप्रकाश साठी की कहानी) लगने वाले मित्तल साहनी, भले व परोपकारी होते हुए भी एकल रहने पर मजबूर। बचपन से गूंगे-बहरे होकर भी एक कारखाने में काम करते थे। पर दो साल पूर्व वहाँ एक आग भड़क उठी और उस में फंस गया-दोनों पैर कटा एक मज़दूर। अपना फर्ज़ जानकार मित्तल साहब उसे बचा लाए। लेकिन ख़ुद बुरी तरह झुलसे, दोनों हाथ आगे चलकर septic हो जाने पर कटवाने पड़े। कृत्रिम हाथ लगवाए पर उनसे बहुत कम हलचल कर पाते थे, नमस्ते करना और हाथ मिलना मुहाल था। पीड़ा व्यथ्त समस्याएँ कैसे बांटें?

कुंठा के कुछ और रूप जानने को मिलते हैं डॉ॰ बलशौरि रेड्डी की कहानी ‘भूख-हड़ताल’ में। कथानक ‘मैं’ को प्रौढ़ शिक्षा संबंधी भाषण देने के लिए दोपहर तक मद्रास ज़रूर पहुंचाना है, पर सवेरे-सवेरे एस॰ टी॰ स्टैंड पर पहुंचे तो जाना कि सरकारी परिवाहन कर्मचारी आज हड़ताल पर उतरे हैं। क्यों? वेतन और मथ्यों में यथोचित वृद्धि की उनकी मांगें व्यवस्थापकों ने अमान्य जो कर दीं थीं।

इधर जहां लोगों की भीड़ जमा नहीं होती तब तक खरीदार नहीं मिलते, इसलिए एक लकड़हारा परेशान है। कहानी का पात्र ‘मैं’ उसे बच्चों को खिलाने के लिए कुछ रुपये देने लगा तो वह बोला-मैं भीख नहीं मांग रहा, और आज आप से ले भी लूँ तो कल क्या करूंगा।‘ मौसम या तबीयत ख़राब होने पर लकड़ी काट न पाएँ या बेच न पाएँ तो जेब व पेट खाली रह जाते हैं। इन हक़ीक़तों से समझौता करना ही पड़ता है क्योंकि भूख कभी हड़ताल पर उतरती नहीं।“

समाज में प्रसिद्धि व प्रतिष्ठा का अभाव भी किसी चिंतानन्द की कुंठा का कारण बन जाता है, जो पहुँच जाता है सुखानंद जैसे स्वामी के पास, यह पूछने कि –“हम महान कैसे बनें ?” ऐसे लोगों की कुंठा के काफ़ी इलाज सुझाते है डॉ॰ गिरिजशंकर त्रिवेदी इस कहानी में।

अपने अनोखे हंसी-व्यंगपूर्ण अंदाज़ में, जैसे नेता बन के अपने पुतले खड़े करवा के अमर हो जाना, समाज के सेवक/सुधारक कहलवाकर चंदों से अपनी कोठियाँ खड़ी करा देना, संपादकों की चापलूसी करके पुरानी पत्रिकाओं में से चुराई हुई रचनाएँ अपने नाम छपवाना और उन पर सार्थक चर्चा तथा परितोषिकों का जुगल करना, राजनैतिक हलाली करते हुए बिना फिटकरी के भी चोखा रंग ला पाना, वगैरह वगैरह ......!

आशा है कि मेरे ये परिचायक विधान पाठकों को प्रोत्साहित करेंगे, देवी नगरानी के इस अनुदित-संग्रह को पढ़ने के लिए । मुद्रित क्रम की बजाय उपयुक्त सिलसिले एवं दृष्टिकोण से पढ़ते हुए कथा रस का अस्वाद शायद और बढ़ जाय। साथ में मानव स्वभाव की सूज-बूझ, भाव-भावनाएँ, किस्मत के खेल ये सब तो उजगार होंगे ही।

और विशेषकर युवा पाठकों को तो इस अनुवाद की हुई सिंधी भाषा प्रयुक्त मात्रभाषा जैसे ही प्रतीत होगी। बेहिचक हिन्दी प्रयोगों का इस्तेमाल जैसे , अभिशाप, दलदल, परिचित, जिनके सिंधी शब्द हैं...सरापु, गपचिक, वाकिफ़ वगैरह। पर आजकल सभी भाषाएँ एक दूसरे से भी प्रभावित हो रही हैं। वे ज़िंदा रहें यही बहुत है। ख़ास करके सिन्धी भाषा, जिसे पूरे भारत में कोई प्रांत न होने से बड़ा खामिजाया उठाना पड़ा है और आगे तो अस्तित्व का खतरा भी मुंह उठाए खड़ा है। ऐन समय में अनुवाद के माध्यम से भाषाई दूरियों को समेट कर हिन्दी पाठकों के सामने देवी जी ने अपने मन के उद्गार व्यक्त करने की भरपूर कोशिश की है जिसके लिए उन्हें बधाई दिये बिना नहीं रह सकती। अनेक शुभकामनाओं के साथ:

समीक्षक : यशोधरा वाधवाणी काकड़ बिल्डिंग, नियर GPO फोर्ट, मुंबई-1 / Yashu2312@yahoo॰ com

पुस्तक नाम: बारिश कि दुआ (अरबी लिपि में)। अनुवादक: देवी नागरानी, पन्ने: 140, मूल्य:रु॰ 200, प्रकाशक स्कैन कम्प्युटर, 3 राधेश्याम apt, अहमदाबाद, 382340 ॰

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