सोमवार, 16 जून 2014

पुस्तक समीक्षा - शब्द-बध

वीरेंद्र जैन का ‘शब्द-बध’ विचार-पुनर्विचार

डॉ. विजय शिंदे

लेखक और पाठक के बीच एक लंबा सफर है, इस सफर को तय करके लेखक के विचार पाठकों के पास पहुंचते हैं। यह सफर आसानी से तय नहीं किया जा सकता। लेखकीय विचार, भावनाएं, अनुभव, संवेदनाएं आदि पर कई शोषक प्रवृत्ति के लोग, व्यापारी, दलाल अत्याचार कर रहे हैं। एक ही व्यक्ति (लेखक) पर बार-बार अत्याचार करने के लिए एक वर्ग ‘लाईन’ लगाकर खड़ा है। यह दलाल और व्यापारी लोग चाहते हैं कि लेखकीय संवेदना का अच्छी तरह उपभोग लें, आनंद लें, आत्मसुख की प्राप्ति की जाए और रुपए भी कमाए जाए। वेश्याएं अपने मन के विरुद्ध या मजबूरी में शरीर बेचती है, लेकिन रुपए लेकर। साहित्यिक जगत् में साहित्यकार का मजबूरी से शोषण हो रहा है, निर्माताओं पर अत्याचार किया जा रहा है और विड़ंबना यह है कि यह सब क्रियाकलाप पीड़ितों से रुपए लेकर हो रहे हैं। रुपए देगा लेखक, अत्याचार होगा लेखक पर, लाभ होगा प्रकाशक और दलालों को, सुख मिलेगा इन्हीं दलालों को। ऊपर से इनकी मुख-मुद्रा ऐसी कि मानों लेखक को प्रकाशित कर बड़ी कृपा और दया की हो। साहित्य, शब्द, अक्षर, कलम और प्रतिभा को कुचला जा रहा है, उसका कत्ल किया जा रहा है। सिर्फ हिंदी जगत नहीं तो सभी भारतीय भाषाओं में लिखने वाले लेखकों की ऐसी ही दशा है। इसे बदला जा सकता है? इसके विरोध में आवाज उठाई जा सकती है? लेखकीय हक को उसके सपुर्द किया जा सकता है? लेखकीय कलम को न्याय मिल पाएगा? लेखक की प्रतिभा शक्ति को प्रोत्साहन मिलेगा या उसको कत्ल किया जाएगा? प्रश्न और प्रश्न! एक के पश्चात् एक निर्माण होने वाले प्रश्न! इन्हीं प्रश्नों को उठाकर नई पीढ़ी के लेखक वीरेंद्र जैन ने 158 पृष्ठों का ‘शब्द-बध’ उपन्यास लिखा है।

‘शब्द-बध’ पाठक के अंतर्बाह्य को झकझोरता उपन्यास है। लेखकीय वेदनाओं को प्रकट करता उपन्यास, ‘शब्द-बध’। अपने दुःख-दर्द, अनुभव को प्रकट रूप देने वाले लेखक वीरेंद्र जैन का उपन्यास ‘शब्द-बध’। शब्दों को कत्ल किया जा रहा है, शब्द आंसू बहा रहे हैं, उनके शरीर से खून निकल रहा है। क्रूर, संवेदनहीन, अमानवीय, राक्षस बने प्रकाशक और दलालों की लंबी कतार शब्दों से निकल रहे खून को गटक रही है, बिल्कुल निर्ममता के साथ। वीरेंद्र जैन को मानना पड़ेगा कि उन्होंने अपने अनुभवों को बेबाकी से रेखांकित किया है। ‘शब्द-बध’ में आए पात्र जटिल क्यों न हो लेकिन कुछ-कुछ को पहचाना जा सकता है। प्रकाशन संस्थानों को भी पहचाना जा सकता है और आनंदवर्द्धन आचार्य तो स्वयं लेखक ही तो है। एक लेखक सभी लेखकों के कटु अनुभवों को व्यक्त कर रहा है। इस उपन्यास को तीन भागों में विभाजित किया है – प्रवेश, प्रशिक्षण और परिणाम। आनंद का आर्थिक अभाव और उसे दूर करने का प्रयास ‘प्रवेश’ है। जीवनयापन के लिए, पढ़ाई के लिए और कुछ बनने के लिए रुपयों की आवश्यकता है, उसी जरूरत की पूर्ति के लिए ‘हितकारी’ कार्यालय में प्रवेश करता है। अंदर पहुंचते ही वह इस कार्यालय के पत्ते-पत्ते और रेशे–रेशे से परिचय कर रहा है। वहां के कर्मचारी, कर्मचारियों का शोषण, अन्याय-अत्याचार और सबसे दुर्भाग्य की बात सभी लोग पहले लिख रहे थे, पढ़ रहे थे, इस कार्यालय में पहुंचते ही सब कुछ बंद। प्रतिभाओं का खून, शब्दों का बध, लेखकीय आत्मा का कत्ल। यहां तक की हितकारी के संचालक भी कभी बहुत अच्छा लिखते थे। उनकी पत्नी श्रीमती लाल आनंदवर्द्धन को बता रही है कि इन्होंने अपना सबकुछ हितकारी में खो दिया है, "अपनी प्रतिभा, अपनी शक्ति, अपनी सोच, अपना सर्वस्व उसी में खपा दिया। या शायद व्यवस्था का भोजन है ही यह सब। इन्हें खबर भी नहीं मिली और वह जाने कब सब चट कर गई। उस पर मुटापा आता गया और ये हड्डियों के घांचे रह गए। मांस-मज्जा सब व्यवस्था के छप्पन भोग में तब्दील हो गए।" (पृ. 56) यह एक प्रतिभा का अंत, शब्दों का कत्ल नहीं तो क्या है? दुर्भाग्य यह है कि अपने प्रतिभा को मरते हुए संचालक ने देखा और वे भी नई प्रतिभाओं का कत्ल करने पर तुले हैं। उन्हे प्रोत्साहन देना दूर व्यापारी बन उनका शोषण कर रहे हैं। हां, एक जगह पर वे आनंद को कहते पाए जाते है कि अगर तुम इस कत्लगाहों से अपने आपको सही सलामत निकाल सकते हो तो तुम्हारी प्रतिभा में निखार आ सकता है। इसी आनंद के भीतर से निकलते वीरेंद्र जैन वर्तमान लेखकों के अग्रिम पंक्ति में बैठे मुस्कुराकर बता रहे है कि लेखकों का शोषण किया जा सकता है, उन पर अन्याय किए जा सकते हैं, उनके शब्दों पर अत्याचार किए जा सकते हैं लेकिन कत्ल नहीं। यही शोषण, अन्याय-अत्याचार, वेदनाएं या यूं कहे कि शब्दों के आंसू और उनमें से टपकने वाला खून गहरी काली रेखाएं खिंचते चला जाएगा और साहित्यिक संसार खड़ा होता रहेगा।

हितकारी कार्यालय में काम करने वाले लोग, उनके पास कभी कुछ लिखने की क्षमता थी, प्रतिभा थी वे अपनी प्रतिभा की हत्या कर चुपचाप बैठे हैं, लेकिन भीतर एक असंतोष है। "इतना असंतोष, इतनी उपेक्षा, इतना तिरस्कार लिए बैठे हैं ये लोग! यहां तो पूरा आवां का आवां ही ज्वालामुखी बना बैठा है किसी अगुआ के इंतजार में, जो इसे जरा-सा कुरेद भर दें। बस! फिर यह फट ही तो जाएगा!" (पृ. 53) आनंद का इस तरह सोचना सही है। इसी मौके को ताड़कर वह हितकारी में अपने अधिकार को हथिया लेता है। लेकिन ज्वालामुखी? सुप्त ही रहता है। आज सभी जगहों पर, समाज के सभी क्षेत्रों में आवां जल रहे हैं। भारतीय इंसान, मनुष्य और प्रत्येक युवक असंतुष्ट है। समाज, राजनीति, शिक्षा-व्यवस्था, संस्कृति तथा अन्यान्य क्षेत्र नेतृत्वहीन हो गए हैं। वहां पर सिर्फ आवां जल रहे हैं, ज्वालामुखी (क्रांति) के दर्शन दूर की कौड़ी नजर आ रही है। चारों ओर अव्यवस्था, धांधली, शोषण कत्ल, भ्रष्टाचार, अनैतिकता, बेकारी... सबकुछ अव्यवस्थित और मन में असंतोष पैदा करने वाली चीजें है। ‘शब्द-बध’ में अरिहंत नामक लेखक की प्रतिभा का कत्ल किया जाने की बात का स्पष्टीकरण है। एक बेटा अपने पिता (लेखक - अरिहंत) के साथ प्रकाशक की हैसियत से पेश आता है। लेखक की आत्मा के साथ खिलवाड़ कर रहा है, वहां अन्य लोग किस झांड़ की पत्ती है। आनंद उस प्रकाशक बेटे को फटकारते हुए कहता है, "आप! आप दरअसल हत्यारे हैं। आपने अरिहंत की हत्या की है। हिंदी साहित्य जगत् का अहित किया है आपने।" (पृ. 85) न जाने कितने अरिहंतों को इस व्यवस्था ने बलि पर चढ़ाया है? पता नहीं साहित्य जगत् का कितना नुकसान किया है? क्या इन लोगों के गुनाहों को कोई सजा है? मनुष्य का कत्ल करने वालों को न्याय व्यवस्था सजा देती है, क्या इस रूप में शब्द और प्रतिभा का कत्ल करने वाले गुनाहगारों को सजा दी जा सकती है? इन्हें कानून के कटघरे में खड़ा किया जा सकता है? उपन्यास के अंतिम हिस्से ‘परिणाम’ में आनंदवर्द्धन की किताब जो दूसरे प्रकाशक से छापी जा रही थी, उसके बंड़लों को जलाया जाता है। ‘प्रतिबद्ध’ की प्रमुख कांता जी उस प्रकाशक को मजबूर कर देती है। किताबों के बंड़ल अपने दफ्तर में लाने का आदेश देती है और आनंद के सामने आग लगा देती है। "जब सभी बंड़ल धू-धू करके जल उठे तब कांता जी ने एक बार मेरी तरफ विजयी मुद्रा में देखा और ठीक उसी मुद्रा में मेरा त्यागपत्र आग के हवाले करके वहीं से खड़े-खड़े फरमान जारी किया, मिस्टर आनंदवर्द्धन आचार्या, मैं तुम्हें आज, अभी इसी वक्त प्रतिबद्ध की नौकरी से बर्खास्त करती हूं।" (पृ. 157) कितनी भयानकता है इस दृश्य में। एक लेखक अपनी आत्मा को जलते हुए देख रहा है। प्रकाशन व्यवस्था की क्रूरता, असूरी वृत्ति का परिचय है, यह स्थिति। क्या इस प्रवृत्ति के लोग सजा के हकदार नहीं है?

सभी प्रकाशक बुरी प्रवृत्ति के होते हैं? नहीं। इसीलिए साहित्य क्षेत्र में आज जो अच्छा आ रहा है उन्हें प्रोत्साहित करना, उसकी रक्षा करना और उन्हें सम्मानित करने का कार्य भी कई प्रकाशक कर रहे हैं। ‘एक’ प्रकाशक और ‘एक’ लेखक का उदाहरण देकर वीरेंद्र जैन ने इसका स्पष्टीकरण किया है। एक वयोवृद्ध लेखक अपनी बेटी की शादी कर रहे थे। रुपयों की कमी से परेशान थे। प्रकाशक को पता चलता है, तब मानवीय भावना से या कोई भविष्यकालीन योजना मन में लेकर मदत के लिए आते हैं। लेकिन लेखक रुपए लेने इंकार कर देता है। क्योंकि इस प्रकाशक से उनकी एक भी किताब छपी नहीं थी ओर दूसरी नई किताब देने के लिए इनके पास नहीं थी। अतः सहायता को लौटाते हैं, तब प्रकाशक ने आग्रह किया कि "ठीक है, तब आपके घर में जो भी लिखा-अधलिखा कागज पड़ा हो वह इनके बदले में हमें दीजिए। और सचमुच वे कई गैरजरूरी पांडुलिपियां लेकर चले गए।" (पृ. 106) जिस सामग्री को लेखक प्रकाशन योग्य नहीं मानता था वह पांडुलिपियां उस प्रकाशक ने छापी। लाभ-हानि की बात यहां महत्त्वपूर्ण नहीं, महत्त्व है सम्मान ओर प्रतिष्ठित करने का। प्रकाशक का मानवीय रूप, आत्मा को सम्मान देने वाला रूप, शब्द को उबारने वाला रुप। एक ओर शब्द का कत्ल करने वाले प्रकाशक और एक ओर प्रतिष्ठित करने वाले प्रकाशक।

प्रकाशकों के दोनों पक्षों का विवेचन, विश्लेषण ‘शब्ध-बध’ है। सीना तानकर ईमानदारी और स्वाभीमान से प्रकाशन व्यवस्था का विरोध करने वाले वीरेंद्र जैन ने ‘शब्द-बध’ की सहायता से साहसी वृत्ति का परिचय दिया है। परंतु इस रचना का साहित्यिक मूल्य क्या है? क्या सचमुच में यह उपन्यास है? या आत्मकथन है? इसके रचनाकर प्रतिभा संपन्न है। उनमें अपने अनुभवों को साहित्य की विधाओं में ढालने की क्षमता है। लेखक ने रचना को शुरुआती दौर में लिखा है, इसमें शुरुआती संघर्ष और लेखकीय पीड़ा है, अतः कुछ छूट जाने का या शेष रहने का आभास होता है। अब वीरेंद्र जैन मान्यता प्राप्त और स्थापित लेखक है। बीच के कई वर्षों में प्रकाशकों से नए अनुभव प्राप्त किए हैं। अब इस पर दुबारा सोचकर एक विस्तृत और परिपूर्ण रचना लिखने की जरूरत है। ‘शब्द-बध’ की अपूर्णता तभी पूर्ण होगी जब एक व्यापक सर्वपक्षीय अनुभव का विवेचन होगा। अगर वीरेंद्र जैन इस दृष्टि से अब सोचते हैं तो ‘शब्द-बध’ की अपूर्णता पूरी की जा सकती है। वह आत्मकथन हो या आत्मकथात्मक उपन्यास हो यह सोचना लेखक के लेखन आजादी से ताल्लुक रखता है।

 

समीक्षा ग्रंथ –

शब्द-बध (उपन्यास) – वीरेंद्र जैन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली,

प्रथम संस्करण - 1993, तृतीय संस्करण – 1997, पृष्ठ 158, मूल्य – 95 ₹

डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र)

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

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