विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका -  नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.
रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -

पिछले अंक

पुस्तक समीक्षा - शब्द-बध

साझा करें:

वीरेंद्र जैन का ‘शब्द-बध’ विचार-पुनर्विचार डॉ. विजय शिंदे लेखक और पाठक के बीच एक लंबा सफर है, इस सफर को तय करके लेखक के विचार पाठकों ...

वीरेंद्र जैन का ‘शब्द-बध’ विचार-पुनर्विचार

डॉ. विजय शिंदे

लेखक और पाठक के बीच एक लंबा सफर है, इस सफर को तय करके लेखक के विचार पाठकों के पास पहुंचते हैं। यह सफर आसानी से तय नहीं किया जा सकता। लेखकीय विचार, भावनाएं, अनुभव, संवेदनाएं आदि पर कई शोषक प्रवृत्ति के लोग, व्यापारी, दलाल अत्याचार कर रहे हैं। एक ही व्यक्ति (लेखक) पर बार-बार अत्याचार करने के लिए एक वर्ग ‘लाईन’ लगाकर खड़ा है। यह दलाल और व्यापारी लोग चाहते हैं कि लेखकीय संवेदना का अच्छी तरह उपभोग लें, आनंद लें, आत्मसुख की प्राप्ति की जाए और रुपए भी कमाए जाए। वेश्याएं अपने मन के विरुद्ध या मजबूरी में शरीर बेचती है, लेकिन रुपए लेकर। साहित्यिक जगत् में साहित्यकार का मजबूरी से शोषण हो रहा है, निर्माताओं पर अत्याचार किया जा रहा है और विड़ंबना यह है कि यह सब क्रियाकलाप पीड़ितों से रुपए लेकर हो रहे हैं। रुपए देगा लेखक, अत्याचार होगा लेखक पर, लाभ होगा प्रकाशक और दलालों को, सुख मिलेगा इन्हीं दलालों को। ऊपर से इनकी मुख-मुद्रा ऐसी कि मानों लेखक को प्रकाशित कर बड़ी कृपा और दया की हो। साहित्य, शब्द, अक्षर, कलम और प्रतिभा को कुचला जा रहा है, उसका कत्ल किया जा रहा है। सिर्फ हिंदी जगत नहीं तो सभी भारतीय भाषाओं में लिखने वाले लेखकों की ऐसी ही दशा है। इसे बदला जा सकता है? इसके विरोध में आवाज उठाई जा सकती है? लेखकीय हक को उसके सपुर्द किया जा सकता है? लेखकीय कलम को न्याय मिल पाएगा? लेखक की प्रतिभा शक्ति को प्रोत्साहन मिलेगा या उसको कत्ल किया जाएगा? प्रश्न और प्रश्न! एक के पश्चात् एक निर्माण होने वाले प्रश्न! इन्हीं प्रश्नों को उठाकर नई पीढ़ी के लेखक वीरेंद्र जैन ने 158 पृष्ठों का ‘शब्द-बध’ उपन्यास लिखा है।

‘शब्द-बध’ पाठक के अंतर्बाह्य को झकझोरता उपन्यास है। लेखकीय वेदनाओं को प्रकट करता उपन्यास, ‘शब्द-बध’। अपने दुःख-दर्द, अनुभव को प्रकट रूप देने वाले लेखक वीरेंद्र जैन का उपन्यास ‘शब्द-बध’। शब्दों को कत्ल किया जा रहा है, शब्द आंसू बहा रहे हैं, उनके शरीर से खून निकल रहा है। क्रूर, संवेदनहीन, अमानवीय, राक्षस बने प्रकाशक और दलालों की लंबी कतार शब्दों से निकल रहे खून को गटक रही है, बिल्कुल निर्ममता के साथ। वीरेंद्र जैन को मानना पड़ेगा कि उन्होंने अपने अनुभवों को बेबाकी से रेखांकित किया है। ‘शब्द-बध’ में आए पात्र जटिल क्यों न हो लेकिन कुछ-कुछ को पहचाना जा सकता है। प्रकाशन संस्थानों को भी पहचाना जा सकता है और आनंदवर्द्धन आचार्य तो स्वयं लेखक ही तो है। एक लेखक सभी लेखकों के कटु अनुभवों को व्यक्त कर रहा है। इस उपन्यास को तीन भागों में विभाजित किया है – प्रवेश, प्रशिक्षण और परिणाम। आनंद का आर्थिक अभाव और उसे दूर करने का प्रयास ‘प्रवेश’ है। जीवनयापन के लिए, पढ़ाई के लिए और कुछ बनने के लिए रुपयों की आवश्यकता है, उसी जरूरत की पूर्ति के लिए ‘हितकारी’ कार्यालय में प्रवेश करता है। अंदर पहुंचते ही वह इस कार्यालय के पत्ते-पत्ते और रेशे–रेशे से परिचय कर रहा है। वहां के कर्मचारी, कर्मचारियों का शोषण, अन्याय-अत्याचार और सबसे दुर्भाग्य की बात सभी लोग पहले लिख रहे थे, पढ़ रहे थे, इस कार्यालय में पहुंचते ही सब कुछ बंद। प्रतिभाओं का खून, शब्दों का बध, लेखकीय आत्मा का कत्ल। यहां तक की हितकारी के संचालक भी कभी बहुत अच्छा लिखते थे। उनकी पत्नी श्रीमती लाल आनंदवर्द्धन को बता रही है कि इन्होंने अपना सबकुछ हितकारी में खो दिया है, "अपनी प्रतिभा, अपनी शक्ति, अपनी सोच, अपना सर्वस्व उसी में खपा दिया। या शायद व्यवस्था का भोजन है ही यह सब। इन्हें खबर भी नहीं मिली और वह जाने कब सब चट कर गई। उस पर मुटापा आता गया और ये हड्डियों के घांचे रह गए। मांस-मज्जा सब व्यवस्था के छप्पन भोग में तब्दील हो गए।" (पृ. 56) यह एक प्रतिभा का अंत, शब्दों का कत्ल नहीं तो क्या है? दुर्भाग्य यह है कि अपने प्रतिभा को मरते हुए संचालक ने देखा और वे भी नई प्रतिभाओं का कत्ल करने पर तुले हैं। उन्हे प्रोत्साहन देना दूर व्यापारी बन उनका शोषण कर रहे हैं। हां, एक जगह पर वे आनंद को कहते पाए जाते है कि अगर तुम इस कत्लगाहों से अपने आपको सही सलामत निकाल सकते हो तो तुम्हारी प्रतिभा में निखार आ सकता है। इसी आनंद के भीतर से निकलते वीरेंद्र जैन वर्तमान लेखकों के अग्रिम पंक्ति में बैठे मुस्कुराकर बता रहे है कि लेखकों का शोषण किया जा सकता है, उन पर अन्याय किए जा सकते हैं, उनके शब्दों पर अत्याचार किए जा सकते हैं लेकिन कत्ल नहीं। यही शोषण, अन्याय-अत्याचार, वेदनाएं या यूं कहे कि शब्दों के आंसू और उनमें से टपकने वाला खून गहरी काली रेखाएं खिंचते चला जाएगा और साहित्यिक संसार खड़ा होता रहेगा।

हितकारी कार्यालय में काम करने वाले लोग, उनके पास कभी कुछ लिखने की क्षमता थी, प्रतिभा थी वे अपनी प्रतिभा की हत्या कर चुपचाप बैठे हैं, लेकिन भीतर एक असंतोष है। "इतना असंतोष, इतनी उपेक्षा, इतना तिरस्कार लिए बैठे हैं ये लोग! यहां तो पूरा आवां का आवां ही ज्वालामुखी बना बैठा है किसी अगुआ के इंतजार में, जो इसे जरा-सा कुरेद भर दें। बस! फिर यह फट ही तो जाएगा!" (पृ. 53) आनंद का इस तरह सोचना सही है। इसी मौके को ताड़कर वह हितकारी में अपने अधिकार को हथिया लेता है। लेकिन ज्वालामुखी? सुप्त ही रहता है। आज सभी जगहों पर, समाज के सभी क्षेत्रों में आवां जल रहे हैं। भारतीय इंसान, मनुष्य और प्रत्येक युवक असंतुष्ट है। समाज, राजनीति, शिक्षा-व्यवस्था, संस्कृति तथा अन्यान्य क्षेत्र नेतृत्वहीन हो गए हैं। वहां पर सिर्फ आवां जल रहे हैं, ज्वालामुखी (क्रांति) के दर्शन दूर की कौड़ी नजर आ रही है। चारों ओर अव्यवस्था, धांधली, शोषण कत्ल, भ्रष्टाचार, अनैतिकता, बेकारी... सबकुछ अव्यवस्थित और मन में असंतोष पैदा करने वाली चीजें है। ‘शब्द-बध’ में अरिहंत नामक लेखक की प्रतिभा का कत्ल किया जाने की बात का स्पष्टीकरण है। एक बेटा अपने पिता (लेखक - अरिहंत) के साथ प्रकाशक की हैसियत से पेश आता है। लेखक की आत्मा के साथ खिलवाड़ कर रहा है, वहां अन्य लोग किस झांड़ की पत्ती है। आनंद उस प्रकाशक बेटे को फटकारते हुए कहता है, "आप! आप दरअसल हत्यारे हैं। आपने अरिहंत की हत्या की है। हिंदी साहित्य जगत् का अहित किया है आपने।" (पृ. 85) न जाने कितने अरिहंतों को इस व्यवस्था ने बलि पर चढ़ाया है? पता नहीं साहित्य जगत् का कितना नुकसान किया है? क्या इन लोगों के गुनाहों को कोई सजा है? मनुष्य का कत्ल करने वालों को न्याय व्यवस्था सजा देती है, क्या इस रूप में शब्द और प्रतिभा का कत्ल करने वाले गुनाहगारों को सजा दी जा सकती है? इन्हें कानून के कटघरे में खड़ा किया जा सकता है? उपन्यास के अंतिम हिस्से ‘परिणाम’ में आनंदवर्द्धन की किताब जो दूसरे प्रकाशक से छापी जा रही थी, उसके बंड़लों को जलाया जाता है। ‘प्रतिबद्ध’ की प्रमुख कांता जी उस प्रकाशक को मजबूर कर देती है। किताबों के बंड़ल अपने दफ्तर में लाने का आदेश देती है और आनंद के सामने आग लगा देती है। "जब सभी बंड़ल धू-धू करके जल उठे तब कांता जी ने एक बार मेरी तरफ विजयी मुद्रा में देखा और ठीक उसी मुद्रा में मेरा त्यागपत्र आग के हवाले करके वहीं से खड़े-खड़े फरमान जारी किया, मिस्टर आनंदवर्द्धन आचार्या, मैं तुम्हें आज, अभी इसी वक्त प्रतिबद्ध की नौकरी से बर्खास्त करती हूं।" (पृ. 157) कितनी भयानकता है इस दृश्य में। एक लेखक अपनी आत्मा को जलते हुए देख रहा है। प्रकाशन व्यवस्था की क्रूरता, असूरी वृत्ति का परिचय है, यह स्थिति। क्या इस प्रवृत्ति के लोग सजा के हकदार नहीं है?

सभी प्रकाशक बुरी प्रवृत्ति के होते हैं? नहीं। इसीलिए साहित्य क्षेत्र में आज जो अच्छा आ रहा है उन्हें प्रोत्साहित करना, उसकी रक्षा करना और उन्हें सम्मानित करने का कार्य भी कई प्रकाशक कर रहे हैं। ‘एक’ प्रकाशक और ‘एक’ लेखक का उदाहरण देकर वीरेंद्र जैन ने इसका स्पष्टीकरण किया है। एक वयोवृद्ध लेखक अपनी बेटी की शादी कर रहे थे। रुपयों की कमी से परेशान थे। प्रकाशक को पता चलता है, तब मानवीय भावना से या कोई भविष्यकालीन योजना मन में लेकर मदत के लिए आते हैं। लेकिन लेखक रुपए लेने इंकार कर देता है। क्योंकि इस प्रकाशक से उनकी एक भी किताब छपी नहीं थी ओर दूसरी नई किताब देने के लिए इनके पास नहीं थी। अतः सहायता को लौटाते हैं, तब प्रकाशक ने आग्रह किया कि "ठीक है, तब आपके घर में जो भी लिखा-अधलिखा कागज पड़ा हो वह इनके बदले में हमें दीजिए। और सचमुच वे कई गैरजरूरी पांडुलिपियां लेकर चले गए।" (पृ. 106) जिस सामग्री को लेखक प्रकाशन योग्य नहीं मानता था वह पांडुलिपियां उस प्रकाशक ने छापी। लाभ-हानि की बात यहां महत्त्वपूर्ण नहीं, महत्त्व है सम्मान ओर प्रतिष्ठित करने का। प्रकाशक का मानवीय रूप, आत्मा को सम्मान देने वाला रूप, शब्द को उबारने वाला रुप। एक ओर शब्द का कत्ल करने वाले प्रकाशक और एक ओर प्रतिष्ठित करने वाले प्रकाशक।

प्रकाशकों के दोनों पक्षों का विवेचन, विश्लेषण ‘शब्ध-बध’ है। सीना तानकर ईमानदारी और स्वाभीमान से प्रकाशन व्यवस्था का विरोध करने वाले वीरेंद्र जैन ने ‘शब्द-बध’ की सहायता से साहसी वृत्ति का परिचय दिया है। परंतु इस रचना का साहित्यिक मूल्य क्या है? क्या सचमुच में यह उपन्यास है? या आत्मकथन है? इसके रचनाकर प्रतिभा संपन्न है। उनमें अपने अनुभवों को साहित्य की विधाओं में ढालने की क्षमता है। लेखक ने रचना को शुरुआती दौर में लिखा है, इसमें शुरुआती संघर्ष और लेखकीय पीड़ा है, अतः कुछ छूट जाने का या शेष रहने का आभास होता है। अब वीरेंद्र जैन मान्यता प्राप्त और स्थापित लेखक है। बीच के कई वर्षों में प्रकाशकों से नए अनुभव प्राप्त किए हैं। अब इस पर दुबारा सोचकर एक विस्तृत और परिपूर्ण रचना लिखने की जरूरत है। ‘शब्द-बध’ की अपूर्णता तभी पूर्ण होगी जब एक व्यापक सर्वपक्षीय अनुभव का विवेचन होगा। अगर वीरेंद्र जैन इस दृष्टि से अब सोचते हैं तो ‘शब्द-बध’ की अपूर्णता पूरी की जा सकती है। वह आत्मकथन हो या आत्मकथात्मक उपन्यास हो यह सोचना लेखक के लेखन आजादी से ताल्लुक रखता है।

 

समीक्षा ग्रंथ –

शब्द-बध (उपन्यास) – वीरेंद्र जैन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली,

प्रथम संस्करण - 1993, तृतीय संस्करण – 1997, पृष्ठ 158, मूल्य – 95 ₹

डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र)

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

---प्रायोजक---

---***---

---प्रायोजक---

---***---

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1$h=100

प्रायोजक

--***--

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधा/विषय पर क्लिक/टच कर पढ़ें : ~

|* कहानी * || * उपन्यास *|| * हास्य-व्यंग्य * || * कविता  *|| * आलेख * || * लोककथा * || * लघुकथा * || * ग़ज़ल  *|| * संस्मरण * || * साहित्य समाचार * || * कला जगत  *|| * पाक कला * || * हास-परिहास * || * नाटक * || * बाल कथा * || * विज्ञान कथा * |* समीक्षा * |

---***---



---प्रायोजक---

---***---

|आपको ये रचनाएँ भी पसंद आएंगी-_$type=three$count=6$src=random$page=1$va=0$au=0$h=110$d=0

प्रायोजक

----****----

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4082,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,341,ईबुक,196,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,262,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,112,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3038,कहानी,2273,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,542,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,31,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,102,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,346,बाल कलम,25,बाल दिवस,4,बालकथा,68,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,16,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,29,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,244,लघुकथा,1265,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,19,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,327,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2011,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,712,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,800,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,18,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,89,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,209,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,77,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: पुस्तक समीक्षा - शब्द-बध
पुस्तक समीक्षा - शब्द-बध
http://lh3.ggpht.com/-XhpL7_GRxvY/UTmKZwD2GrI/AAAAAAAAUJQ/8UigKGb7CjQ/image%25255B3%25255D.png?imgmax=200
http://lh3.ggpht.com/-XhpL7_GRxvY/UTmKZwD2GrI/AAAAAAAAUJQ/8UigKGb7CjQ/s72-c/image%25255B3%25255D.png?imgmax=200
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2014/06/blog-post_4709.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2014/06/blog-post_4709.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय SEARCH सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ