शुक्रवार, 27 जून 2014

हरदेव कृष्ण का आलेख - विराम से आगे

विराम से आगे

हरदेव कृष्ण

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किसी शायर ने लिखा है,"मौत का एक दिन मुअय्यन है, नींद क्यों रात भर आती नहीं?" हर जीव को मृत्यु का भय सबसे ज्यादा होता है। राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है , "यदि कोई जीवन में अप्रिय वस्तु है, तो वह वस्तुतः मृत्यु नहीं , मृत्यु का भय है। मृत्यु हो जाने के बाद तो वह कोई विचारने की बात ही नहीं, मृत्यु जिस वक्त आती है , आमतौर से देखा जाता है कि मूर्च्छा उससे कुछ पहले ही पहुंच जाती है और मनुष्य मृत्यु के डरावने रुप को देख ही नहीं पाता। फिर भय और अप्रिय घटना का सवाल ही क्या हो सकता है? " कोई अचानक मर जाए तो उस का चेहरा हमारी आंख और दिमाग से हटता ही नहीं, उसके अन्तिम दर्शन के लिए जाते हैं। चलते फिरते लोगों पर किसी का ध्यान नहीं जाता, लेकिन उन्हीं में से कोई लाश में तबदील हो जाए तो सब की निगाहें उस पर केन्द्रित हो जाती हैं। मौत आती है तो कैसा लगता है? उसके बाद क्या होता है ? इसे कोई नहीं बता सकता। वास्तव में मौत से डर लगता ही इसलिए है कि यह व्यक्ति को हमारे बीच से हमेशा हमेशा के लिए जुदा कर देती है। लेकिन ऐसी भी घटनाएं पढ़ी व सुनी जा चुकी हैं जिसमें अमुक व्यक्ति मर गया , पर बाद में उसके प्राण लौट आए। उन सब का अनुभव लगभग एक सा ही था जैसे कि प्रकाश दिखाई देता है और मार्ग किसी सुरंग या नली जैसा नजर आता है। ऐसे ही वृतांतों का विवरण " इंटरनेशनल ऐसोसियशन फॉर नियर डेथ एक्सपिरिंयस स्टडी" ने प्रस्तुत किया है। एक पत्रिका " रसिसटेशन" इसी विषय पर सामग्री पकाशित करती है। ऐसे ही विवरण एक ब्रिटिश शोधकर्ता " सुरान ब्लॅकमोर " ने अपनी 84 पृष्ठ की एक पुस्तक " डांइग टू लाइव " में लिपिबद्ध किए है। चिकित्सा जगत के छात्र रेमण्ड मूडी ने अपनी पुस्तक , " लाईफ आफ्टर लाईफ" प्रकाशित की थी। इस में उन लोगों के साक्षात्कार हैं जो पुनर्जीवित हो गए थे। इसके सात साल बाद ऐसा ही अध्य्यन उन 147 बच्चों पर किया गया जिनकी हालत बहुत गंभीर थी। इनमें से 26 तो बिल्कुल मौत के नजदीक थे।

अब प्रश्न उठता है कि मरने के बाद आदमी जाता कहां है ? क्या सूक्ष्म रुप में वह आगे के सफर तय करता है? " एक संबुद्ध से किसी शिष्य ने पूछा , "मरने के बाद हम कहां जाते हैं?" इस पर उस संबुद्ध व्यक्ति ने उतर दिया ," इसका मुझे अनुभव नहीं है, मैं जीवित हूं, वही बता सकता हूं जो मुझे जीते जी अनुभव हो रहा है।" मृत्यु बाद के रहस्य जानने के लिए कोई इतना बेचैन हो सकता है कि अपने जीवन का अन्त कर डाले? लगभग दस साल पहले की घटना है, जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के पीएचडी ( तृतीय वर्ष ) के 27 वर्षीय एक छात्र ने आत्महत्या कर डाली। अपने सुसाइड नोट में यह लिखा कि मुझे कोई मानसिक परेशानी नहीं है, मौत के बाद क्या होता है यही जानने के लिए आत्महत्या कर रहा हूं।

हर धर्म के लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं। उनका विश्वास है कि शरीर नष्ट होने पर भी दिवंगत किसी दुनिया में रहता है। मिस्त्र जैसी प्राचीन सभ्यता का विश्वास था कि मृत्यु एक लंबी निद्रा है। इस लिए उन्होंने शवों को संरक्षित किया, इस आशा के साथ कि एक दिन मृत व्यक्ति जी उठेगा। हिन्दु धर्म में मान्यता है कि शरीर छोड़ने पर आत्मा 13 दिनों तक इसी लोक में रहता है। इस्लाम के अनुसार जितनी भी रुहें कब्रों में आराम फरमा रही हैं कयामत के दिन उनका फैसला होगा। ऐसा ही विश्वास ईसाई धर्म का है। लोगों का विश्वास है कि मौत द्वारा बिछुड़ा हुआ शख्स अव्यक्त रुप में कहीं न कहीं विद्यमान रहता है। तभी तो हिन्दु लोग श्राद्ध करते हैं, हरिद्वार या गया जैसे तीर्थ स्थानों पर पिंडदान करते हैं। ईसाइ व मुस्लिम बिरादरी भी बिछुड़ी आत्माओं को सम्मान से याद करते हैं। चीन में छिंग मिंग नाम की परंपरा है जिसमें अपने पूर्वजों और मृत रिश्तेदारों को कब्रिस्तान में जाकर याद किया जाता है। ऐसे ही रीतिरिवाज विश्व की तमाम आदिवासियों व जनजातियों में भी देखे जा सकते हैं।

चिकित्सीय दृष्टि से एक ब्रिटिश शोधकर्ता ने लिखा है,"मौत एक प्रक्रिया है,एकल क्रिया नहीं।" उसके अनुसार पहले ब्रेन डेथ , फुल ब्रेन डेथ और अंत में व्होल डेथ होती है। एक भारतीय डॉक्टर मनीष का भी यही कहना है,"मृत्यु एक प्रकृया है और मृत होना उस प्रकृया का रुकना है।" वे एक महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं, "1950 के दशक तक नाड़ी और श्वसन क्रिया के रुकने को मृत्यु करार दिया जाता था,पचास के दशक में पश्चिम में "रीसस्सीटेशन" नाम की एक तकनीकि आई, इस की सहायता से उन व्यक्तियों को जीवित कर लिया गया जिनकी नाड़ी और श्वसन क्रिया बंद हो चुकी थी।' इस प्रणाली के अंर्तगत हृदय पर बिजली की मशीन से झटके दिए जाते हैं, कृत्रिम जीवन सहायक यन्त्रों व डॉयलेसिस आदि का इस्तेमाल किया जाता है। वैज्ञानिक "मृत्यु" को भी एक "व्याधि" समझते हैं और इसका इलाज ढूंढने में लगे हैं।

दार्शनिक पक्ष से देखें तो जीते जी हमारा शरीर बहुत कुछ भोगता है , गमीदृसर्दी, दुखदृसुख , ईष्यादृद्वेष आदि। लेकिन मरने के पश्चात इन से मुक्त हो जाता ह़ै। किसी से कोई स्पर्धा नहीं, शत्रु मित्र सब भाव तिरोहित हो जाते हैं। जब शरीर किसी भयंकर बीमारी, आघात अथवा सघन मानसिक दबाव से गुजरता हैं तब मौत ही उसे मुक्ति दिलवाती है। किसी लंबे रोग के उपरान्त मरे आदमी के बारे में अक्सर यही कहा जाता है," छूट गया।" यहीं से मानव को "इच्छा मृत्यु" ख्याल आया। जीना दूभर हो जाए तो क्यों न इससे छुटकारा पा लें? इच्छा मृत्यु के समर्थक कहते हैं -  मनुष्य को जीने का हक है तो उसे मरने का हक भी दिया जाना चाहिए। सब और से लाचार आदमी जो हर रोज मरता है, उसे मृत्यु अपनाने की छूट मिलनी चाहिए। महान दार्शनिक प्लेटो ने आत्महत्या करने वाले की कठोर शब्दों में निंदा की है, लेकिन इच्छामृत्यु को खारिज नहीं किया। उसका मत था कि अगर व्यक्तिय किसी आसाध्य रोग, घोर गरीबी या गंभीर दुख से बेहाल है तो बेशक वह अपनी मृत्यु चुनने का अधिकारी है। इसी तरह 'नीत्शे' ने भी कहा है कि व्यक्ति को अपना जीवन समाप्त करने का नैतिक अधिकार होना चाहिए।

मरने की तमन्ना अत्यधिक ऊब और तीव्र मानसिक आघात से भी हो सकती है। रामायण काल में जाएं तो वहां सीता धरती की गोद में समा जाती है। वाल्मीकि रामायण में पहले लक्ष्मण और बाद में राम द्वारा सरयू नदी में अपने प्राण त्यागने का उल्लेख है। शरभंग ऋषि और शबरी ने अग्नि में प्रवेश कर के जीवन का अंत किया था। महाभारत मे भी ऐसे विवरण मिलते हैं। भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। सत्यवती ने स्वंय मृत्यु को गले से लगाया और माद्री ने भी आत्मदाह कर लिया था। अंत में पांडव और साथ में द्रौपदी मृत्यु का वरण करने के लिए हिमालय की ओर चले गए।

देखा जाए तो स्वेच्छा मृत्यु की धारणा नई नहीं है। सामाजिक व धार्मिक कारणों से इसे माना जाता रहा है। बहुत प्राचीन काल की बात है, जैन समाज की एक स्त्री 'मचिकब्बे' ने उस वक्त की एक धार्मिक प्रक्रिया "संल्लेखन" द्वारा मृत्यु को प्राप्त किया था। इसने कर्नाटक के श्रवण बेलगोला क्षेत्र में एक महीना कठोर उपवास कर अपने प्राणों को त्याग दिया था। अपने पति व बेटी की मौत से इस महिला के अन्दर इतना वैराग्य उत्पन्न हो गया कि इसने अपने गुरु से ' सन्यसन्' व्रत धारण कर लिया। इस व्रत के अनुसार अन्नदृजल धीरेदृधीरे बन्द कर दिया जाता था और किसी खुली चट्टान में मृत्यु आने तक एक ही मुद्रा में रहना पड़ता था। इसी क्षेत्र में कटवप्र नाम की पहाड़ी है जहां सन् 601 से लेकर 1600 तक , सल्लेखन् द्वारा मरने वालों की विशाल सूची है। इसी तरह सती प्रथा नाम की भयानक कुरीति को चलाया जा रहा था, सन् 87 में राजस्थान की एक युवती रुपकुंवर सती हो गई थी। प्रसिद्ध समाजशास्त्री प़ी ़ सी ़ जोशी के अनुसार - पहले सती प्रथा थी, मगर इसे आत्महत्या नहीं कहेंगे, यह एक तरह का कर्तव्य माना जाता था। कहते है कि प्रयाग में डूब मरने की प्रथा थी ,बनारस में आरे से कटवाने की और जगन्नाथ में रथयात्रा के दौरान रथ के नीचे आने की। कहा नहीं जा सकता इनके पीछे कारण क्या होगें?

सुपसिद्ध साहित्यकार स्व ़"विजयदान देथा" ने एक साक्षात्कार में कहा था , "यह निश्चित है कि मेरे अस्तित्व का अर्थ है 'पढ़ना लिखना', यही मेरा धर्म है, ईश्वर है - यही जीवन है, जिस क्षण यह पूरी तरह तय हो जाएगा कि मुझ से अब पढ़ा लिखा नहीं जाएगा - तब मेरे जीने की सार्थकता नहीं रहेगी  दस बारह गोली डायबिटीज की एक साथ लेकर सो जाऊंगा।" भूदृदान आन्दोलन के जनक बिनोबा भावे ने अपनी शारीरिक अक्षमता को देखते हुए मृत्यु का वरण लिया था। अगर इन बिन्दुओं के आधार पर "मर्सी कीलिंग" का कानून पास हो जाए तो मृत्युशैया पर पड़ा मरीज निदान के साथ दृसाथ डॉक्टर से "मौत" भी मांग सकता है। तब डॉक्टर सुखमय मृत्यु प्रदान करने के अधिकारी हो सकते हैं। लेकिन कुछ लोगों का कहना है कि इस तरह सामाजिक समस्याएं पैदा होंगी, इस कानून का दुरुपयोग भी हो सकता है। भारतीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा इच्छामृत्यु को विधि सम्मत बनाने के ल्एि मुद्दा संविधान पीठ को भेजा जा चुका है जहां इसके सभी पहलुओं का अध्य्यन किया जाएगा।

अब थोड़ा सन्तों के नजरिए से देखें। कबीर ने अपने एक दोहे में लिखा है,"जीवन से मरना भला,जो मरि जानै कोय। मरने से पहिलै जो मरे,अजर रु अम्मर होय।" उनका एक और दोहा है, "कबीर जिस मरने ते जग डरै मेरे मन आनंदु।मरने ही ते पाईए पूरनु परमानंदु। गोरख कहते हैं - मरो वे जोगी मरो मरो मरन है मीठा तिस मरणी मरौ जिस मरणी गोरख मर दीठा। यह मरना वह मरना नहीं है जो आजकल आत्महत्याओं के रुप में हो रहा है। यह सन्त मत की एक प्रक्रिया है जिसमें साधक अपने ध्यान को तीसरे नेत्र पर केन्द्रित कर देता है। वह सुन्न समाधि की अवस्था को प्राप्त कर लेता है जिसे संतों की भाषा में "जीते जी मरना" कहा जाता है। कबीर का दावा है कि ऐसी स्थिति अगर प्राप्त हो जाए तो मृत्यु का भय सदा के लिए चला जाता है और निरंतर ऐसा अभ्यास करने से मोक्ष मिल जाता है। कुरान में भी एक आयत है दृ "मूतू कबलन्त मूतू" अर्थात मरने से पहले मर जाओ। आधुनिक सन्त ओशो ने भी ध्यान की इस पद्धति का समर्थन किया है।  एक फिल्मी गीत के कुछ बोल ध्यान करने योग्य है , " जिन्दगी तो बेवफा है एक दिन ठुकराएगी , मौत महबूबा है साथ लेकर जाएगी , मर के जीने की अदा जो दुनिया को सिखालाएगा , वो मुकद्दर का सिकंदर कहलाएगा।" यहां गीतकार का वही आशय नजर आता है जो कबीर व अन्य सन्तों का है। मसला मृत्यु के खौफ पर विजय पाने का है। एक संवेदनशील कवि ( शिशु ' रश्मि ' ) की पंक्तियां हैं - " वाल्मीकि कहता है , तुलसी भी लिखता है/ मौत एक शीशा है राम जिसमें दिखता है /सच बड़ा सख्त है जूती सा काटता है, इज्जत बचाता है , धोती बन जाता है/ मौत तो आराम है, आराम में ही राम है/ मौत की आशंका से फिर क्यों डर जाता हूं? "

मृत्यु पर शोध होते रहेंगे। वैज्ञानिक अमरत्व की खोज में लगे हैं। पर हमें यह याद रखना चाहिए कि मृत्यु अन्त नहीं है। बुद्ध मत में कहा है,"मौत जीवन का नहीं केवल शरीर का अन्त है।"। गीता में साफ कहा गया है कि आत्मा नष्ट नहीं होता, जैसे शरीर नए वस्त्र धारण करता है वैसे ही आत्मा एक नया शरीर धारण करता है। प्रसिद्ध विचारक दीपक चोपड़ा इसे समझाने के लिए एक सुन्दर उदाहरण देते हैं, "जल की एक बूंद जब सूखती है तो उसका अन्त नहीं हो जाता, वह वाष्प बनकर बादलों के समूह में शामिल हो जाती है।" कुदरत यही चाहती है कि आपको जो जीवन प्राप्त हुआ है इसका सम्मान करें। विनम्रता , धैर्य और सहनशीलता से पुरुषार्थ करते हुए एक एक दिन व्यतीत करें। अपनी शक्ति और सार्म्थय का सदुपयोग करें उसका दुरुपयोग भूल कर भी न करें , ताकि अन्तिम समय में आपको कोई पीड़ा या मलाल न रहे।

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पताः- हरदेव कृष्ण, ग्राम व डाक- मल्लाह

पिनकोड-134102 (हरियाणा)

Mail:- hardevkrishan@gmail.com

सामग्रीस्त्रोतः-1 अहा जिंदगी (फरवरी,2007)—रामायण प्रसंग

2 द्वैमासिक स्त्रोत पत्रिका (मार्च-अप्रैल,1997) – जैनधर्म की संल्लेखन प्रथा

3 अमरउजाला, दैनिक ट्रिब्यून व अन्य पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित समाचार व सूचनाएं

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  1. लेख अच्छा है सही है जीवन के एक एक पल का सदुपयोग करना चाहिए .

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