बुधवार, 2 जुलाई 2014

गोवर्धन यादव का यात्रा संस्मरण -- मारीशस माने मिनि भारत की यात्रा ( समापन किश्त)

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29 मई 2014

मन की स्थिति बडी विचित्र होती है. वह कब प्रफ़ुल्लित होकर तितली बन कर आसमान में जा उडेगा और कब उदासी का चादर ओढकर गुमसुम सा रहने लगेगा,कोई नहीं जान पाता. समझ में नहीं आता कि अक्सर ऎसा क्यों होता है हम सबके साथ ? इस पर यदि गंभीरता से विचार करें तो काफ़ी हद तक समझ में आने लगता है. यह स्थिति मेरे लिए ही नहीं बन पडी थी,बल्कि हम सबके साथ कुछ ऎसा ही हो रहा था. मैंने अपने मित्र से इसका कारण जानना चाहा तो सिर्फ़ इतना कहा कि आज मन कुछ उदास-उदास सा है..बस. ऎसा क्यों है, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ.

दरअसल इस उदासी का मुख्य कारण यह था कि हम विगत छः दिनों से मारीशस में रहते हुए मौज-मस्ती कर रहे थे. सुबह जल्दी उठ जाते. सारे नित्य क्रिया-कलाप से निजाद पाकर नाश्ते के टेबल पर जा पहुँचते. और नाश्ते के बाद कैंटिन में बनी “रामप्यारी” का घूँट हलक के नीचे उतारते और बीच-बीच में बतियाते जाते. चाय तो आखिर चाय ही होती है,लेकिन “रामप्यारी चाय” का अपना स्वाद है और पीने पर मिलने वाला आनन्द ही कुछ और है. चाय हलक के नीचे उतर भी नहीं पाती है कि श्वेताजी( गाइड) की आवाज गूंजने लगती है. वे सभी से निवेदन करती हैं कि जल्दी से बस में जाकर बैठ जाइए. आज हमें फ़लां-फ़लां स्थान पर जाना है, और हम सब शीघ्रता से वहाँ से रवाना हो जाते. और फ़िर पहुँच जाते किसी सुरम्य वादियों की गोद में. आज इन सब पर विराम लगने वाला है. आज दोपहर बाद हमें होटेल कालोडाईन सूर मेर को अलविदा कह देना है. अलविदा कह देना है इम्तियाज को, मनोज को, विनय को,नीलेश को, आनन्द को और राजेन्द्र को, जो बडॆ मनुहार से नाश्ता करवाते और रामप्यारी पिलवाते. अलविदा कहना होगा श्वेताजी को,जो हमारे साथ विगत छः दिनों से बनी रहती थीं. जब वे किसी दूसरी बस में जा बैठती तो लोग उनसे मनुहार करते कि वे कृपया हमारी बस में आकर बैठें. श्वेताजी एक हैं और हर व्यक्ति चाहता है कि वे उनकी बस में बैंठें. कैसे संभव है कि एक व्यक्ति हर जगह कैसे उपस्थित रह सकता है. इतने कम दिनों में इतना अनुराग.! अब आप ही बतलाएं कि कैसे हम अपने मुँह से उन्हें अलविदा कहेंगे ?

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(बाएं से दाएं=श्वेतासिंह,स्वपानिल तथा नीतूसिंह,)

शायद अब समझ में आया होगा आपको कि मन की स्थिति आज क्यों डांवाडॊल है? इतने कम समय में वे हमारे अपने से हो गए थे. उनका शिष्ठाचार के साथ मिलना, बतियाना, उनका सेवाभाव देखकर मन से सहजरुप से उन्हें परिवार का एक सदस्य बना लिया था. आज उन सबसे दूर चले जाना है. यह तो सभी जानते थे कि विजा की अवधि समाप्त हो जाने के बाद, उन्हें जाना ही होगा,लेकिन कम समय में किसी को अपना बना लेना या बन जाना,कितना सहज होता है और जब बिछुडने की बात आती है तो स्वाभाविक है कि मन उदासी में घिरने लगता है. यह भी उतना ही सच है कि एक लंबे अंतराल के बाद अपना परिवार याद आने लगता था. याद आने लगते थे अपने परिजन, भाई-बहन,पत्नि, बच्चे, नाती-पोते. वे भी तो हमारी याद कर रहे होते हैं. आखिर उनके पास भी तो लौटना होगा हमें. सारे क्रियाकलापों के लिए पहले से समय का निर्धारण कर लिया गया था कि कब और कितने बजे हमें होटल छोडना है, दोपहर का खाना कहाँ खाना है और कितने बजे हमें सर शिवसागर रामगुलाम एअर-पोर्ट पर पहुँच जाना है. कब हमारा विमान ऊडान भरेगा और कब हमें छत्रपति शिवाजी अन्तराष्ट्रीय हवाई अड्डॆ पर पहुँचना है. मुंबई के किस स्टेशन से हमारी ट्रेन रवाना होगी.आदि-आदि

मैं इस यात्रा का समापन इस प्रकार करने के पक्ष में बिल्कुल भी नहीं था,बल्कि यह कहें बिल्कुल भी नहीं हूँ. क्योंकि मैंने सोच रखा था कि मैं आपको इस अध्याय के बंद कर देने से पहले उन स्थान पर ले जाना चाहूँगा जहाँ जाकर मैंने अद्भुत आनन्द की अनुभूति प्राप्त की थी. इन जगहों का उल्लेख पहले भी किया जा सकता था,लेकिन आलेख के साथ वहाँ के छायाचित्रों को लगा देने से आलेख ज्यादा विस्तार लेने लगा था. अतः मैं इस निर्णय पर पहुँचा कि इनका उल्लेख बाद में भी किया जा सकता है. यदि इसका उल्लेख अभी नहीं हुआ तो फ़िर बाद में होना संभव भी नहीं लग रहा था.

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फ़ोर्ट आफ़ एडलेट

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Fort Adelaide Of Citadel ( फ़ोर्ट एडेलेड आफ़ सिटाडेल) --सन 1814 में नेपोलियन की हार के बाद फ़्रांस और ब्रिटिश सरकारों के बीच हुई संधि के अनुसार सीमा का निर्धारण किया गया और उस समय के तत्कालिन ब्रिटिश गवर्नर सर विलियम एम.निकोले ने इंगलैण्ड के राजा विलियम IV की पत्नि “एडेलेड” के नाम पर मारीशस में स्थित पर्वत जिसे (Pitite Moutagne) के नाम से जाना जाता है,बनाया गया.,जिसे बाद में मारीशस को सौंप दिया गया था. इसकी आधारशिला 1830 में रखी गई थी, जो दस वर्षों में बनकर तैयार हुआ. इस किले के निर्माण में भारतीय़ वास्तुकारो के अलावा कई मजदूर काम पर लगाए गए थे. यह किला समुद्र सतह से 240 फ़ीट की उँचाई पर स्थित है. कहा जाता है कि इस किले से बंदरगाह तक जाने के लिए सुरंग बनाई गई थी, ताकि किले

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में रसद तथा हथियारों की आपूर्ति बनायी जा सके. इस किले की बुर्ज पर जाकर आप शहर का विहंगम दृष्य देख सकते है.

Belle Mare beach (बेले मरे बीच)

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Belle Mare beach (बेले मारे बीच) ----मारीशस के दक्षिण में स्थित यह समुद्री तट अपने में नीलापन लिए हुए दूर-दूर तक फ़ैला हुआ है. इसके तट पर वृक्षॊं का फ़ैलाव आप देख सकते हैं. किसी ने मुझे बतलाया कि इसके तटॊं पर मारीशसवासी अपने पूर्वजों के नाम पर या फ़िर किसी बच्चे के जन्म दिन पर, या फ़िर शादी की वर्षगांठ पर वृक्षारोपण करते हैं. यह परम्परा काफ़ी समय से चली आ रही है, हवा के झोंकों पर नाचते वृक्षॊ को देखकर तथा यहाँ छाई हरियाली आपका मन मोह लेती है. सफ़ेद रेत दूर-दूर तक फ़ैली नजर आती है. अकसर यहाँ भीड कम नजर आती है, लेकिन छुट्टियों के दिन बडी संख्या में लोग यहाँ पहुँचते हैं. बोट की सवारी करते हैं और बेलून के जरिए ( Parasailing ) आकाश में जा उडते हैं.

यदि आप आकाश में उडना ही चाहते हैं, तो आपको उडने के पंख किराए पर मिल जाएंगे. जैसे ही आप इस बीच में प्रवेश करते हैं, एक काउण्टर बना हुआ है. यहाँ दो प्रकार की व्यवस्था की गई है. पहला बैलून के माध्यम से हवा में सैर करने के लिए आपको नौ सौ रुपया (मारीशियन रुपया) का टिकिट कटवाना होता है. आप दो लोग एक साथ उडना चाहते हैं तो इसके लिए आपको पन्द्रह सौ रुपयों का टिकिट लेना होता है. दूसरा- आप समुद्र में उतरकर कोरल, मछलियाँ या अन्य समुद्री जीव देखना चाहते हैं तो आपको बारह सौ रुपयों का टिकिट खरीदना होता है.और आप यदि समुद्री-जीवों के साथ फ़ोटॊ खिंचवाना चाहते हैं तो आपको दो हजार रुपया (मारीशियन) चुकाना होता है. इसमें आपको इसके clip_image030clip_image032

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प्रायोजक सी.डी. बनाकर देते हैं,जिसे आप बाद में भी देख सकते हैं.

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श्री कोरी समुद्र की गहराइयों में उतरने के बाद दायीं ओर श्री पडौडेजी

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( श्री नर्मदा प्रसाद कोरी बैलून के सहारे आकाश में उडते हुए)

इस रोमांचक यात्रा में यदि वर्धा निवासी श्री के.बी.पडौडेजी की चर्चा न की जाए, तो शायद बात अधुरी रहेगी. वे प्राचार्य होकर सेवामुक्त हुए हैं. एकदम स्वस्थ हैं,लेकिन उन्हें पैरों के तकलीफ़ हैं, अतः छडी के सहारे चलना होता है उनकी उम्र लगभग 72-75 के करीब है,लेकिन उनका जोश देखने लायक होता था. जब कोई उन्हें सहारा देने के लिए हाथ बढाता तो मुस्कुरा कर कहते- भैया कब तक साथ दोगे मेरा,? और वे आगे बढ जाते. बैलून के सहारे आकाश में उडने की जिद, तो कभी समुद्र की गहाइयों में उतरने की जिद करते. कहते क्या मैं बूढा हो गया हूँ,? मैं क्यों नहीं उतर सकता समुद्र में और क्यों नहीं उड सकता बैलून ( PARASAILING) के साथ? शायद वे यह नहीं जानते थे कि उम्र के इस पडाव पर मनचाहा करना उनके लिए उचित नहीं होगा. काफ़ी समझाने-बुझाने के बाद आखिर वे मान जाते हैं. उन्होंने तो अपनी टिकिट भी कटवा ली थी. बाद में उन्हें रकम वापिस दे दी गई.

(28 th जून) -शाम को खाना खाने के साथ ही हमें सूचित कर दिया गया था कि कल सुबह दस बजे हमें होटल छॊड देना है. बसें हमारा इन्तजार कर रहीं थीं. अब हम उस होटल “ताज होटल” की तरफ़ बढ रहे  थे, जहाँ हमने पहली बार खाना खाया था. खाना खा चुकने के बाद हमारे पास काफ़ी समय बच रहा था. उसका हमने भरपूर फ़ायद उठाया. हमारी बस अब BLUE BAY MARINE की तरफ़ रवाना हो रही थी.

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Glass Water Boat trip in Blue Bay Marine Park

यह समुद्री पार्क Mehebourg के समीप दक्षिण-पूर्व में POINTE JEROME के करीब 353 मीटर में फ़ैला हुआ है. सुन्दर और आकर्षक समुद्र के तट देखते ही बनते हैं. दूर-दूर तक सफ़ेद रेत की चादर बिछी हुई है. इस मुलायम रेत की चादर पर से चलते हुए आप बोट तक पहुँचते हैं. चार-पांच बोट हमने ले ली थी. इन बोटॊं के तले काँच के बने हुए थे. बोट जब समुद्र की सतह पर आगे बढती है तो नाविक उसे उन स्थानों पर रोकते हुए धीरे-धीरे आगे बढता है, जहाँ से आप समुद्र तल में समाए कोरल और किस्म-किस्म की वनस्पतियों को देखकर दंग रह जाते हैं. इन वनस्पतियों के बीच रंग-बिरंगी मछलियों, तथा कछुओं को तैरता हुआ देखा जा सकता हैं. बोट एक स्थान से चलकर दूसरे स्थान पर आकर थम सी जाती है. हर बार नजारा कुछ और होता है. इससे पहले हमने-आपने कई समुद्र देखें होंगे लेकिन कभी उसके गर्भ में

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छिपे अनमोल खजाने को नहीं देख पाए होंगे, इन्हें देख कर आश्चर्य होना स्वाभाविक है.

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(बोट के तल में लगे कांच से आप समुद्र के गर्भ में छिपी विभिन्न वनस्पतियाँ-कोरल देख सकते हैं)

समुद्र के इस रोमांचक तट पर सैर करते हुए कब पाँच बज गए, पता ही नहीं चल पाया. अब हम सर शिवसागर रामगुलाम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डॆ की तरफ़ बढ चले थे. सुश्री श्वेताजी अब भी हमारे साथ ही चल रही थी. एअरपोर्ट पहुँचने के बाद वे सब से मिल रही थीं, वे सभी से फ़िर कभी आने का निमंत्रण देती हैं ,लेकिन उनकी आँखों से अविरल आँसू बह रहे होते हैं. उनकी रुलाई देखकर सभी के मन भारी हो चले थे. मात्र एक सप्ताह की मुलाकात,थी हमारी उनसे लेकिन कब वह अपनत्व में ढल जाती है, आपको पता ही नहीं चल पाता. शायद यही कारण था कि उनकी आँखें भर आयी थी.

.अपना सामान तुलवाने तथा अन्य औपचारिकताओं को पूरा करने में लगभग दो घंटे से अधिक समय लग जाता है. सारी प्रक्रिया पूरी होने के बाद हमें प्रतीक्षालय में बैठना होता है. रात के ग्यारह बजे हमारी फ़्लाइट है. समय धीरे-धीरे रेंगते रहता है. रौशनी में जगमगाता हुआ हवाई अड्डा, सभी का मन मोह लेता है. तरह-तरह की सजी हुई दुकाने पर्यटक को अपने सम्मोहन में बांध लेती हैं,लेकिन दाम इतना अधिक होता है,कि आप चाहकर भी वस्तुओं को खरीद नहीं पाते. इसके पीछे केवल एक तर्क यह होता है कि जितनी भी चीजें आप वहाँ देख रहे होते हैं सारी की सारी चीजे भारत से निर्यात की गई होती हैं. अतः यात्री खरीद करने में तनिक भी दिलचस्पी नहीं दिखलाता.

रात्रि के ग्यारह बजने वाले हैं. सारे लोग अब विमान पर सवार होने के लिए चल पडते हैं. अपनी निर्धारित सीट पर आकर बैठ जाते हैं. ठीक ग्यारह बजे हमारा विमान रन-वे पर दौडने लगता है और पल भर में आकाश से बातें करने लगता है. पूरे छः घंटे की उडान के बाद वह छत्रपति शिवाजी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डॆ पर जा उतरता है. इस तरह इस यात्रा का समापन होता है.

इस अद्भुत और रोमांचकारी यात्रा को संपन्न करवाने के लिए मैं पुनः आभार प्रकट करता हूँ राष्ट्रभाषा प्रचार समिति भोपाल के मंत्री-संचालक मान.श्री कैलाशचन्द्र पंतजी के प्रति, जिन्होंने न सिर्फ़ हमें आर्थिक संबल प्रदान करवाया बल्कि हमारा हौसला बढाया और हिन्दी के उन्नयन और प्रचार-प्रसार के एक शुभ-अवसर प्रदान करवाया. मैं आभारी हूँ श्री नरेन्द्र दण्ढारेजी के प्रति,जिन्होंने इस यात्रा के कार्यक्रम की कसी हुई रुपरेखा बनाई, उन्होंने न सिर्फ़ अपने जिले को जोडा बल्कि अन्य प्रांतो के लोगो को भी अपने साथ जोडा और इस तरह एक सफ़ल आयोजन वे देश के बाहर कर सके. मैं आभारी हूँ मारीशस (मोका) की डा. श्रीमती अलका धनपतजी का, जिन्होने आकाशवाणी मारीशस के लिए मेरा साक्षात्कार लिया. मैं आभारी हूँ प्रख्यात साहित्यकार श्री राज हीरामनजी का जिन्होंने महामहिम राष्ट्रपतिजी से भेंट करवाने में अहम भूमिका का निर्वहन किया. तथा अपना साक्षात्कर रिकार्ड करवाने में आपने सहज ही अनुमति प्रदान की. मैं आभारी हूँ मान.श्री रामदेव धुंरधरजी का (जिनकॊ मैं पढ रहा था) साथ ही उन तमाम साहित्यकारों का जिनका परिचय मंच के द्वारा मुझे प्राप्त हुआ. मैं आभारी हूँ श्री स्वपनिल तथा नीतूसिंह का जो हमारे साथ छाया की तरह बने रहे.

निःसंदेह जब मैं यहाँ से रवाना हुआ था,उस समय तक मेरे हाथ रीते थे,लेकिन वहाँ से लौटा तो मैं मालदार हो चुका था. मुझे न सिर्फ़ अपरिमित संतोष की प्राप्ति हुई है बल्कि उन तमाम लोगों से मिलकर एक परिवारिक इकाई का सदस्य बन जाने का भी गौरव प्राप्त हुआ है. उन तमाम लोगो की स्मृतियाँ सदा मेरा पथ आलोकित करते रहेगी,ऎसा मेरा विश्वास है.

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किले के ऊपरी भाग में जाकर आप शहर का विहंगम दृश्य देख सकते हैं

2 blogger-facebook:

  1. गोवर्धन यादव3:10 pm

    नमस्कार श्री रविजी
    समापन किस्त के प्रकाशन पर धन्यवाद
    आशा हाइ, सानन्द-स्वस्थ हैं

    उत्तर देंहटाएं
  2. गोवर्धन यादव3:11 pm

    धन्यवाद रविजी

    उत्तर देंहटाएं

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