बुधवार, 25 जून 2014

गोवर्धन यादव का यात्रा संस्मरण : मारीशस माने मिनि भारत की यात्रा-(किस्त-6)

पिछली किश्तें – 1  | 2  |  3 | 4 | 5

 

दिनांक 27 मई 2014 दिन मंगलवार

26 मई 2014 में हमने टामारिन्ड जलप्रपात(Tamarind waterfall), -ट्राऊ आक्स सर्फ़्स(Trou aux cerfs)तथा चामरेल कलर्ड अर्थ(chamarel coloured earth) का भ्रमण किया था, जिसके मोहक सम्मोहन से अभी हम उभर भी नहीं पाए थे कि रात्रि के लगभग आठ बजे श्री राजनारायण गुट्टीजी ( कला एवं सांस्कृतिक मंत्रालय में सलाहकार), श्रीमती अलका धनपतजी (वरिष्ठ प्राध्यापक महा.गांधी संस्थान) का आगमन होता है. राष्ट्रपति भवन के सूत्रों से प्राप्त जानकारी देते हुए आपने बतलाया कि मारीशस के राष्ट्रपति महामहिम मान.श्री कैलाश प्रयागजी ने मुलाकात के लिए दोपहर एक बजे का समय निर्धारित किया है. निश्चित ही यह खबर पाकर हम प्रफ़ुल्लित थे और अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर रहे थे कि हमें देश के प्रथम पुरुष से मुलाकात करने का सुअवसर प्राप्त होने जा रहा है.

.कार्यक्रम की रुपरेखा बनाई जाने लगी. इसमें यह तय किया गया कि हम सुबह शीघ्र तैयार होकर पहले महात्मा गांधी संस्थान (मोका) जाएंगे और संस्था की निदेशक डा श्रीमती व्ही.डी.कुंजलजी से तथा वहाँ कार्यरत सभी प्राध्यापकों से मुलाकात करेंगे. इस कार्यक्रम की रुपरेखा श्रीमती अलका धनपतजी ने पहले से बना रखी थी.

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सुबह आठ बजे हम सबने चाय और नाश्ते का लुफ़्त उठाया. होटेल के प्रांगण में बसें लगाई जा चुकी थी. हम ठीक नौ बजे मोका के clip_image004लिए प्रस्थान करते हैं. हरी

भरी वादियों के बीच से सरपट दौडती हमारी बस महात्मा गांधी संस्थान के प्रागंण में प्रवेश करती है. महात्मा गांधी संस्थान की आधारशिला भारत की तत्कालीन प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधीजी तथा मारीशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री शिवसागर रामगुलामजी ने 3 जून 1970 में रखी थी. .इसी के साथ ही विश्व कवि श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर संस्थान की भी स्थापना की गई थी जिसमें भारतीय कला, संस्कृति, संगीत,नृत्यकला आदि का समावेश किया गया था. इस संस्था में सभी भारतीय भाषाओं के पाठ्यक्रम शुरु किए गए हैं,जो हम सभी के लिए गौरव का विषय है.

कुछ चुनिंदा मित्रों को साथ लेकर श्रीमती अलका धनपतजी ने संस्था की निदेशक डा.श्रीमती कुंजलजी से मुलाकात करवाई.

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( बाएं से दांए=गोवर्धन यादव,संतोष परिहार,श्री अय्यरजी,,डा.गंधारे जी ,श्रीमती कुंजल(निदेशक),बुंदेलेजी.कोरीजीएवं श्री मफ़तलालजी )

इस मुलाकत के दौरान मैंने अपना कहानी संग्रह “महुआ के वृक्ष”, तथा ,तीस बरस घाटी, श्री कैलाश पंतजी ( मंत्री-संचालक हिन्दी भवन भोपाल)की किताब संस्कार,संस्कृति और समाज, श्रीयुत कॄष्णकुमार यादवजी( निदेशक “डाक” इलाहाबाद) की पुस्तकें सोलह आने सोलह लोग, अभिलाषा(काव्य संग्रह) जंगल में क्रिकेट तथा श्रीमती आकांक्षा यादव की चांद पर पानी (दोनो बालगीत) इस निवेदन के साथ दी कि वे कृपया इन किताबों को अपने संस्थान के वाचनालय में स्थान देंगी..श्री संतोष परिहारजी ने भी अपना उपन्यास “रंगरेजवा” की एक प्रति दी. उन्होंने आश्वासन दिया कि सारी किताबें वाचनालय में रखी जाएगी जो मारीशस के लोगो को आपसे जोडॆ रखने के लिए “सेतु” का कार्य करेंगीं

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एक बडॆ हाल में मोका के सभी प्राध्यापकगणॊं से हमारी मुलाकात करवाई गई. एक के बाद एक प्राध्यापक सामने आता और अपना परिचय देता .सभी के मन में एक अजीब सा उत्साह था. उत्साह इस बात को लेकर कि उनके पूर्वज भारत से ही यहाँ आए थे. इसी क्रम में भ्रमण-दल का एक-एक व्यक्ति सामने आता और अपना परिचय देता. अपना परिचय देते, हुए अन्त में मैंने राष्ट्र भाषा प्रचार समिति, हिन्दी भवन भोपाल के मंत्री-संचालक श्री कैलाशचन्द्र पंतजी तथा वर्धा समिति से इस यात्रा के संयोजक श्री नरेन्द्र डंढारेजी के प्रति आभार व्यक्त किया और कहा कि आपके अथक प्रयासों से यह यात्रा संभव हो पाई है. मैं आभारी हूँ डा. अलका धनपत का, जिन्होंने इस मुलाकात के कार्यक्रम की रुपरेखा बनायीं. मुझे अत्यधिक प्रसन्नता इस बात को लेकर भी हो रही है कि मैं अपने हिन्दुस्थानी भाईयो और बहनो से मिल रहा हूँ, जो हिन्दी के उन्नयन और प्रचार-प्रसार में अपना योगदान दे रहे हैं. आप लोगो की मिलनसारिता, सहृदयता, सहजता और सरलता देखकर मुझे यह कभी महसूस नहीं हुआ कि मैं भारत से बाहर मारीशस में रह रहा हूँ”

कार्यक्रम के समापन के पश्चात वहाँ स्वल्पाहार तथा चाय की व्यवस्था की गई थी. सभी ने साथ मिलकर चाय और नाश्ते का आनन्द लिया. समय अपने पंख फ़ैलाए द्रुतगति से उडा चला जा रहा था. दिन के साढे बारह कैसे बज गए, पता ही नहीं चल पाया. अब हमें राष्ट्रपति भवन की ओर रवाना होना था.

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(१) राष्ट्रपति भवन के मुख्य कक्ष में शिष्ठमंडल (२) कक्ष में बाएं से दाएं श्री विकास काले,संतोष परिहार,गोवर्धन यादव,प्राचार्य पडॊडॆजी आदि (३) श्री शरद जैन (दायीं ओर)

वहाँ पहुँचने के बाद हमसे कहा गया कि अन्दर जाने से पहले अपने-अपने मोबाईल तथा कैमरे बाहर रख दें. ऎसा करने के बाद हमने एक आलीशान-सुसज्जित हाल में प्रवेश किया. दोनो ओर करीने से कुर्सियाँ लगी हुई थीं. सभी के मन में अपार प्रसन्न्ता के साथ उत्सुकता भी थी कि उनकी मुलाकात मारीशस के राष्ट्रपति महामहिम श्री कैलाश प्रयागजी से होने जा रही है. माननीय महोदय के आने से पूर्व हाल में उपस्थित प्रख्यात साहित्यकार एवं राष्ट्रपतिजी के सलाह्कार श्री राज हीरामनजी दिशा निर्देश दे रहे थे. आपके अलावा हाल में पुलिस के दो उच्च अधिकारी तथा एक गनमैन उपस्थित था. मुझे ही नहीं, प्रायः सभी के मन में यह प्रश्न जरुर तैर रहा होगा कि काश वे भारत के राष्ट्रपतिजी से मिलने जाते तो वहाँ का नजारा कुछ और ही होता. बडॆ-बडॆ आला-अफ़सर, संगीनो से लैस पुलिस के अधिकारी वहाँ तैनात होते और बारी-बारी से सभी की गहन तलाशी ली जाती. तब कहीं जाकर वे हाल में प्रवेश कर पाते. लेकिन यहाँ का नजारा कुछ और ही था. प्रवेश-द्वार पर न तो किसी की तलाशी ली गई और न ही उन्हें संदेह भरी दृष्टि से देखा गया. बस इतना जरुर कहा गया कि वे अपने कैमरे और मोबाईल एक टेबुल पर रख दें, और हाल में शांति के साथ बैठ जाएँ. सभी की निगाहें उस विशाल दरवाजे पर टिकी हुईं थीं, जहाँ से माननीय महोदयजी का आगमन होना था.

ठीक एक बजे वह दरवाजा खुलता है. महामहिम उससे निकलकर अपने निर्धारित स्थान की ओर बढते हैं.आपके आगमन के साथ ही हाल में उपस्थित सभी अभिवादन की मुद्रा में हाथ जोडकर खडॆ हो जाते हैं. वे मुस्कुराते हुए आगे बढ जाते हैं और सभी का अभिवादन कर अपनी कुर्सी पर विराजित हो जाते हैं. उनका सौम्य व्यक्तित्व और चेहरे पर छाई प्रसन्नता का उद्वेग देखकर मन गदगद हो उठता है.

श्री राज हीरामनजी, महामहिमजी को संबोधित करते हुए, हम लोगो के आगमन और प्रयोजन के बारे में बतलाते हैं. और अत्यंत ही विनम्रता के साथ निवेदित करते हुए कहते हैं कि भारतीय शिष्ट मंडल आपका स्वागत करना चाहता है. आपकी स्वीकृति पाकर अभ्युदय बहुउद्देशीय संस्था, वर्धा के अध्यक्ष श्री वैध्यनाथ अय्यरजी महामहिम को शाळ ओढाकर श्रीफ़ल भेंट में देते हैं. उसके बाद संस्था के महासचिव-संयोजक श्री नरेन्द्र दण्ढारेजी महामहिम को पुष्प-माला पहनाकर अभिनन्दन करते हैं. इसी क्रम में श्री संतोष परिहारजी अपनी एक कृति महामहिम को समर्पित करते हैं

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इस अभिनन्दन समारोह के पश्चात श्री हीरामनजी महामहिमजी से निवेदन करते हुए अनुनय करते हैं कि वे शिष्ठमंडल को संबोधित करें. महामहिमजी ने शिष्ट मंडल का स्वागत करते हुए भोजपुरी में अपना संक्षिप्त उदबोधन देते हुए हिन्दी के उन्नयन और प्रचार-प्रसार के लिए निरन्तर प्रयास करते रहने के लिए आग्रह किया. आपके ओजस्वी उद्बोधन के पश्चात श्री हीरामनजी ने आपसे अनुरोध करते हुए कहा कि शिष्टमंडल आपके साथ फ़ोटोग्रुप लेना चाहता है. आपने कितनी सहजता के साथ स्वीकृति प्रदान कर की, यह बात हमारे सबके मन को प्रफ़ुल्लित कर गई.

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महामहिम राष्ट्रपतिजी के साथ शिष्ठ मंडल

आज मंगलवार है. निश्चित ही आज का दिन हम सबके लिए मंगलकारी सिद्ध हुआ कि हमारी मुलाकात मारीशस के राष्ट्रपति महामहिम श्री कैलाश प्रयागजी के साथ हुई. इससे पूर्व हमारी मुलाकात उन हिन्दी सेवियों से हुई जो महात्मा गांधी संस्थान से जुडकर गौरवगाथा लिख रहे हैं.

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राष्ट्रपति भवन के प्रांगण के दृष्य

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