गुरुवार, 17 जुलाई 2014

महावीर सरन जैन का आलेख - समता, समाज और जातिवाद

समता समाज और जातिवाद

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

टाइम्स ऑफ इंडिया में अक्षय मुकुल की रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। उसका सार यह है कि भारतीय इतिहास शोध संस्थान यानी आईसीएचआर के नव नियुक्त निदेशक वाई सुदर्शन राव (वारंगल स्थित काकातिया युनिवर्सिटी के इतिहास विभाग के पूर्व प्रोफेसर) ने जाति व्यवस्था को प्रासंगिक ठहराया है। उन्होंने अपने लेख में यह प्रतिपादित किया है कि प्राचीन काल में जाति व्यवस्था ने बहुत अच्छा काम किया। कुछ खास लोगों ने इसे गलत तरीके से दमनकारी सामाजिक व्यवस्था के रूप में प्रचारित किया है। आईसीएचआर के नव नियुक्त निदेशक वाई सुदर्शन राव ने यह भी विचार व्यक्त किया है कि अंग्रेजों के काल में पाश्चात्य विचारों से प्रभावित लोगों ने भारतीय समाज के जिन रीति रिवाजों की आलोचना की है, उनके समाज में पैदा होने का कारण मुसलमानों का शासन है। मुसलमानों ने उत्तर भारत में मध्य युग में सात सौ वर्षों तक शासन किया जिसके कारण गलत रीति रिवाजों ने जन्म लिया। जाति व्यवस्था तो सभ्य समाज का लक्षण है तथा मानवीय संसाधनों के प्रबंधन के लिए प्रासंगिक है।

हमने सन् 1978 में प्रकाशित ´समता समाज' शीर्षक लेख में यह प्रतिपादित किया था कि किसी समाज का सुदृढ़ निर्माण तभी सम्भव है जब सामाजिक संरचना, राजनैतिक व्यवस्था एवं दार्शनिक चिंतन में मूलभूत एकता हो। इसके लिए सामाजिक धरातल पर हमें समस्त नागरिकों के लिए बिना किसी भेदभाव के योग्यता के अनुसार जीवन यापन करने की व्यवस्था स्थापित करनी होगी। उसी स्थिति में सामाजिक धरातल पर समता का मूल्य स्थापित हो सकेगा। जन्म से प्रत्येक मनुष्य को समाज में समान स्थान प्राप्त होना चाहिए। विकास की स्थितियाँ सबके लिए समान होनी चाहिए। किसी व्यक्ति का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उसने अपनी प्रतिभा, योग्यता, संकल्प एवं परिश्रम के कारण कितना अधिक विकास किया है। मूल्यांकन का यह आधार एवं पैमाना नहीं होना चाहिए कि उसका जन्म किस परिवार में हुआ है, किस खानदान में हुआ है, किस जाति में हुआ है, किस वर्ण में हुआ है, किस प्रान्त में हुआ है अथवा उसके माता पिता की सामाजिक हैसियत क्या है। समता समाज के निर्माण के लिए समाज के प्रत्येक सदस्य के लिए विकास के समान अवसर एवं अधिकार जुटाने होंगे।

(देखें - समता समाज: श्रमणोपासक, समता विशेषांक, श्री अ0भा0सा0जै0संघ, बीकानेर, पृ0 199-206 (1978))

दार्शनिक धरातल पर समाज के समस्त सदस्यों के लिए दो मूल्यों को स्थापित करना जरूरी है। (1) स्वतंत्रता (2) समानता। भारतीय दर्शनों में, इन दोनों मूल्यों को स्थापित किया गया है। यह माना गया है कि अपने अस्तित्व की दृष्टि से प्रत्येक मनुष्य स्वतंत्र है। भारत में दार्शनिक धरातल पर इस विचार की स्थापना भी हुई है कि प्राणी मात्र स्वतंत्र है। अस्तित्व की दृष्टि से प्रत्येक सत्ता स्वतंत्र है। उसके गुण और पर्याय भी स्वतंत्र हैं। भगवान महावीर के शब्दों में “विवक्षित किसी एक द्रव्य का तथा उसके गुणों और पर्यायों का किसी अन्य द्रव्य से तथा उसके गुणों और पर्यायों से किसी प्रकार का कोई सम्बंध नहीं है”। व्यक्ति मात्र अपने बल पर उच्चतम विकास कर सकता है। स्वरूप की दृष्टि से प्रत्येक जीव आत्मतुल्य है। प्राणी मात्र आत्मतुल्य है। इसी आत्मतुल्यता की संकल्पना का प्रतिपादन उपनिषदों के ऋषियों ने अपनी भाषा में इस प्रकार किया है –

“ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते”।।

भारत के सभी दार्शनिकों ने इस विचार के प्रति सहमति जताई है कि अपना पाप स्वयं को ही भोगना है। जिन्होंने वाल्मीकि की जीवन गाथा पढ़ी है उनको इस विचार एवं तथ्य की स्वतः अनुभूति हो जाएगी। कर्म सिद्धांत इसी विचार की स्थापना करता है। इस नाते गहराई से विचार करने पर पाते हैं कि आत्मा और परमात्मा का भेद तात्त्विक नहीं है। यह भेद भाषिक है। आत्‍मवादी दार्शनिक आत्‍मा को अविनाशी मानते हैं। गीता में भी इसी प्रकार की मान्‍यता का प्रतिपादन हुआ है। आत्‍मा दो भागों में विभाजित है - जीवात्‍मा एवं परमात्‍मा।

‘ज्ञानाधिकरणमात्‍मा । सः द्विविधः जीवात्‍मा परमात्‍मा चेति।'

इस दृष्‍टि से आत्‍मा ही केन्‍द्र बिन्‍दु है जिस पर आगे चलकर परमात्‍मा का भव्‍य प्रासाद निर्मित किया गया।

आत्‍मा को ही बह्म रूप में स्‍वीकार करने की विचारधारा वैदिक एवं उपनिषद्‌ युग में मिलती है। ‘प्रज्ञाने ब्रह्म', ‘अहं ब्रह्मास्‍मि', ‘तत्‍वमसि', ‘अयमात्‍मा ब्रह्म' जैसे सूत्र वाक्‍य इसके प्रमाण है। ब्रह्म प्रकृष्‍ट ज्ञान स्‍वरूप है। यही लक्षण आत्‍मा का है। ‘मैं ब्रह्म हूँ', ‘तू ब्रह्म ही है; ‘मेरी आत्‍मा ही ब्रह्म है' आदि वाक्‍यों में आत्‍मा एवं ब्रह्म पर्याय रूप में प्रयुक्त हैं।

हमने एक लेख में, इसकी विवेचना की है कि आत्‍मा एवं परमात्‍मा का भेद तात्‍विक नहीं है; भाषिक है। समुद्र के किनारे खड़े होकर जब हम असीम एवं अथाह जलराशि को निहारते हैं तो हम उसे समुद्र भी कह सकते हैं तथा अनन्‍त एवं असंख्‍य जल की बूँदों का समूह भी कह सकते हैं। स्‍वभाव की दृष्‍टि से सभी जीव समान हैं। भाषिक दृष्‍टि से सर्व-जीव-समता की समष्‍टिगत सत्ता को ‘परमात्‍मा' वाचक से अभिहित किया जा सकता है। (रचनाकार: महावीर सरन जैन का आलेख - आत्‍मा एवं परमात्‍मा का भेद तात्‍विक नहीं है; भाषिक हैhttp://www.rachanakar.org/2009/11/blog-post_25.html#ixzz37c4qJY00)

सम्प्रति हमारा उद्देश्य आत्मा एवं परमात्मा के स्वरूप की दार्शनिक विवेचना करना नहीं है। हम केवल यह कहना चाहते हैं कि भारत में दार्शनिक धरातल पर यह स्वीकार किया गया कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक ही परम सत्ता (ॐ ईशावास्यमिदमं) से अनुस्यूत है। भारत के दार्शनिकों ने आतमवत् सर्वभूतेषु के सिद्धांत का प्रवर्तन किया है। सर्व भूत आत्मवत है। गीता का सार योग का उपदेश है और उस सार में समत्व दर्शन समाहित है। (समत्वं योग उच्यते – गीता 2/48)। समदर्शी ही सच्चा योगी है। वह संसार के चर-अचर सभी भूत-समुदाय को आत्म-दृष्टि से देखता है। श्री कृष्ण ने अर्जुन को सम्बोधित कर, कहा है –

 

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः। (गीता 6/32)

 

(हे अर्जुन। जो योगी आत्म-सदृश्य से सम्पूर्ण भूतों में समदृष्टि रखता है, सुख हो या दुख – दोनों में जिसकी दृष्टि सम रहती है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।)

भारत में विद्या-विनय सम्पन्न ब्राह्मण और चण्डाल को भी समभाव से देखने का विधान है। भगवान श्री कृष्ण के वचन हैं –

 

विद्या विनय सम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः।। (गीता- 5/18)

(विद्या-विनय-सम्पन्न ब्राह्मण, गाय, हाथी, श्वान और चण्डाल – इन सभी को ज्ञानी जन समभाव से देखने वाले होते हैं।)

 

भारत का पतन उस समय से आरम्भ हुआ जब सामाजिक धरातल पर समाज को जन्मना जाति और वर्णों में बाँट दिया गया। आदर्श और यथार्थ विषम हो गया। समाज को जाति, वर्ग, धर्म, प्रांत, भाषा, कुनबा, वंश, आदि में से किसी भी कारक के आधार पर बाँटने वाली तथा भेदभाव करने वाली विचारधारा अमानवीय, निंदनीय, गर्हित और घिनौनी है। इस प्रकार की विचारधारा न केवल अमानवीय है, भारतीय दर्शन की उदार दृष्टि की विरोधी है अपितु हमारे संविधान के मूल्यों के भी सर्वथा विपरीत है। यदि आज कोई देश का नागरिक जातिवाद जैसी व्यवस्था को प्रासंगिक बताने का अपराध करता है तो उस पर देश में वैमनस्य, दुर्भावना, मनमुटाव, रंजिश, तनाव, कलह फैलाने की साजिश में देश द्रोह का मुकदमा चलाया जाना चाहिए।

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवानिवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, भारत सरकार

123, हरि एन्कलेव

बुलन्द शहर – 293001

mahavirsaranjain@gmail.com

1 blogger-facebook:

  1. आपकी लिखी रचना बुधवार 19 जुलाई 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं

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