महावीर सरन जैन का आलेख - समता, समाज और जातिवाद

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समता समाज और जातिवाद प्रोफेसर महावीर सरन जैन टाइम्स ऑफ इंडिया में अक्षय मुकुल की रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। उसका सार यह है कि भारतीय इतिहास श...

समता समाज और जातिवाद

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

टाइम्स ऑफ इंडिया में अक्षय मुकुल की रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। उसका सार यह है कि भारतीय इतिहास शोध संस्थान यानी आईसीएचआर के नव नियुक्त निदेशक वाई सुदर्शन राव (वारंगल स्थित काकातिया युनिवर्सिटी के इतिहास विभाग के पूर्व प्रोफेसर) ने जाति व्यवस्था को प्रासंगिक ठहराया है। उन्होंने अपने लेख में यह प्रतिपादित किया है कि प्राचीन काल में जाति व्यवस्था ने बहुत अच्छा काम किया। कुछ खास लोगों ने इसे गलत तरीके से दमनकारी सामाजिक व्यवस्था के रूप में प्रचारित किया है। आईसीएचआर के नव नियुक्त निदेशक वाई सुदर्शन राव ने यह भी विचार व्यक्त किया है कि अंग्रेजों के काल में पाश्चात्य विचारों से प्रभावित लोगों ने भारतीय समाज के जिन रीति रिवाजों की आलोचना की है, उनके समाज में पैदा होने का कारण मुसलमानों का शासन है। मुसलमानों ने उत्तर भारत में मध्य युग में सात सौ वर्षों तक शासन किया जिसके कारण गलत रीति रिवाजों ने जन्म लिया। जाति व्यवस्था तो सभ्य समाज का लक्षण है तथा मानवीय संसाधनों के प्रबंधन के लिए प्रासंगिक है।

हमने सन् 1978 में प्रकाशित ´समता समाज' शीर्षक लेख में यह प्रतिपादित किया था कि किसी समाज का सुदृढ़ निर्माण तभी सम्भव है जब सामाजिक संरचना, राजनैतिक व्यवस्था एवं दार्शनिक चिंतन में मूलभूत एकता हो। इसके लिए सामाजिक धरातल पर हमें समस्त नागरिकों के लिए बिना किसी भेदभाव के योग्यता के अनुसार जीवन यापन करने की व्यवस्था स्थापित करनी होगी। उसी स्थिति में सामाजिक धरातल पर समता का मूल्य स्थापित हो सकेगा। जन्म से प्रत्येक मनुष्य को समाज में समान स्थान प्राप्त होना चाहिए। विकास की स्थितियाँ सबके लिए समान होनी चाहिए। किसी व्यक्ति का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उसने अपनी प्रतिभा, योग्यता, संकल्प एवं परिश्रम के कारण कितना अधिक विकास किया है। मूल्यांकन का यह आधार एवं पैमाना नहीं होना चाहिए कि उसका जन्म किस परिवार में हुआ है, किस खानदान में हुआ है, किस जाति में हुआ है, किस वर्ण में हुआ है, किस प्रान्त में हुआ है अथवा उसके माता पिता की सामाजिक हैसियत क्या है। समता समाज के निर्माण के लिए समाज के प्रत्येक सदस्य के लिए विकास के समान अवसर एवं अधिकार जुटाने होंगे।

(देखें - समता समाज: श्रमणोपासक, समता विशेषांक, श्री अ0भा0सा0जै0संघ, बीकानेर, पृ0 199-206 (1978))

दार्शनिक धरातल पर समाज के समस्त सदस्यों के लिए दो मूल्यों को स्थापित करना जरूरी है। (1) स्वतंत्रता (2) समानता। भारतीय दर्शनों में, इन दोनों मूल्यों को स्थापित किया गया है। यह माना गया है कि अपने अस्तित्व की दृष्टि से प्रत्येक मनुष्य स्वतंत्र है। भारत में दार्शनिक धरातल पर इस विचार की स्थापना भी हुई है कि प्राणी मात्र स्वतंत्र है। अस्तित्व की दृष्टि से प्रत्येक सत्ता स्वतंत्र है। उसके गुण और पर्याय भी स्वतंत्र हैं। भगवान महावीर के शब्दों में “विवक्षित किसी एक द्रव्य का तथा उसके गुणों और पर्यायों का किसी अन्य द्रव्य से तथा उसके गुणों और पर्यायों से किसी प्रकार का कोई सम्बंध नहीं है”। व्यक्ति मात्र अपने बल पर उच्चतम विकास कर सकता है। स्वरूप की दृष्टि से प्रत्येक जीव आत्मतुल्य है। प्राणी मात्र आत्मतुल्य है। इसी आत्मतुल्यता की संकल्पना का प्रतिपादन उपनिषदों के ऋषियों ने अपनी भाषा में इस प्रकार किया है –

“ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते”।।

भारत के सभी दार्शनिकों ने इस विचार के प्रति सहमति जताई है कि अपना पाप स्वयं को ही भोगना है। जिन्होंने वाल्मीकि की जीवन गाथा पढ़ी है उनको इस विचार एवं तथ्य की स्वतः अनुभूति हो जाएगी। कर्म सिद्धांत इसी विचार की स्थापना करता है। इस नाते गहराई से विचार करने पर पाते हैं कि आत्मा और परमात्मा का भेद तात्त्विक नहीं है। यह भेद भाषिक है। आत्‍मवादी दार्शनिक आत्‍मा को अविनाशी मानते हैं। गीता में भी इसी प्रकार की मान्‍यता का प्रतिपादन हुआ है। आत्‍मा दो भागों में विभाजित है - जीवात्‍मा एवं परमात्‍मा।

‘ज्ञानाधिकरणमात्‍मा । सः द्विविधः जीवात्‍मा परमात्‍मा चेति।'

इस दृष्‍टि से आत्‍मा ही केन्‍द्र बिन्‍दु है जिस पर आगे चलकर परमात्‍मा का भव्‍य प्रासाद निर्मित किया गया।

आत्‍मा को ही बह्म रूप में स्‍वीकार करने की विचारधारा वैदिक एवं उपनिषद्‌ युग में मिलती है। ‘प्रज्ञाने ब्रह्म', ‘अहं ब्रह्मास्‍मि', ‘तत्‍वमसि', ‘अयमात्‍मा ब्रह्म' जैसे सूत्र वाक्‍य इसके प्रमाण है। ब्रह्म प्रकृष्‍ट ज्ञान स्‍वरूप है। यही लक्षण आत्‍मा का है। ‘मैं ब्रह्म हूँ', ‘तू ब्रह्म ही है; ‘मेरी आत्‍मा ही ब्रह्म है' आदि वाक्‍यों में आत्‍मा एवं ब्रह्म पर्याय रूप में प्रयुक्त हैं।

हमने एक लेख में, इसकी विवेचना की है कि आत्‍मा एवं परमात्‍मा का भेद तात्‍विक नहीं है; भाषिक है। समुद्र के किनारे खड़े होकर जब हम असीम एवं अथाह जलराशि को निहारते हैं तो हम उसे समुद्र भी कह सकते हैं तथा अनन्‍त एवं असंख्‍य जल की बूँदों का समूह भी कह सकते हैं। स्‍वभाव की दृष्‍टि से सभी जीव समान हैं। भाषिक दृष्‍टि से सर्व-जीव-समता की समष्‍टिगत सत्ता को ‘परमात्‍मा' वाचक से अभिहित किया जा सकता है। (रचनाकार: महावीर सरन जैन का आलेख - आत्‍मा एवं परमात्‍मा का भेद तात्‍विक नहीं है; भाषिक हैhttp://www.rachanakar.org/2009/11/blog-post_25.html#ixzz37c4qJY00)

सम्प्रति हमारा उद्देश्य आत्मा एवं परमात्मा के स्वरूप की दार्शनिक विवेचना करना नहीं है। हम केवल यह कहना चाहते हैं कि भारत में दार्शनिक धरातल पर यह स्वीकार किया गया कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक ही परम सत्ता (ॐ ईशावास्यमिदमं) से अनुस्यूत है। भारत के दार्शनिकों ने आतमवत् सर्वभूतेषु के सिद्धांत का प्रवर्तन किया है। सर्व भूत आत्मवत है। गीता का सार योग का उपदेश है और उस सार में समत्व दर्शन समाहित है। (समत्वं योग उच्यते – गीता 2/48)। समदर्शी ही सच्चा योगी है। वह संसार के चर-अचर सभी भूत-समुदाय को आत्म-दृष्टि से देखता है। श्री कृष्ण ने अर्जुन को सम्बोधित कर, कहा है –

 

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः। (गीता 6/32)

 

(हे अर्जुन। जो योगी आत्म-सदृश्य से सम्पूर्ण भूतों में समदृष्टि रखता है, सुख हो या दुख – दोनों में जिसकी दृष्टि सम रहती है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।)

भारत में विद्या-विनय सम्पन्न ब्राह्मण और चण्डाल को भी समभाव से देखने का विधान है। भगवान श्री कृष्ण के वचन हैं –

 

विद्या विनय सम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः।। (गीता- 5/18)

(विद्या-विनय-सम्पन्न ब्राह्मण, गाय, हाथी, श्वान और चण्डाल – इन सभी को ज्ञानी जन समभाव से देखने वाले होते हैं।)

 

भारत का पतन उस समय से आरम्भ हुआ जब सामाजिक धरातल पर समाज को जन्मना जाति और वर्णों में बाँट दिया गया। आदर्श और यथार्थ विषम हो गया। समाज को जाति, वर्ग, धर्म, प्रांत, भाषा, कुनबा, वंश, आदि में से किसी भी कारक के आधार पर बाँटने वाली तथा भेदभाव करने वाली विचारधारा अमानवीय, निंदनीय, गर्हित और घिनौनी है। इस प्रकार की विचारधारा न केवल अमानवीय है, भारतीय दर्शन की उदार दृष्टि की विरोधी है अपितु हमारे संविधान के मूल्यों के भी सर्वथा विपरीत है। यदि आज कोई देश का नागरिक जातिवाद जैसी व्यवस्था को प्रासंगिक बताने का अपराध करता है तो उस पर देश में वैमनस्य, दुर्भावना, मनमुटाव, रंजिश, तनाव, कलह फैलाने की साजिश में देश द्रोह का मुकदमा चलाया जाना चाहिए।

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवानिवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, भारत सरकार

123, हरि एन्कलेव

बुलन्द शहर – 293001

mahavirsaranjain@gmail.com

नाम

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श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर 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जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: महावीर सरन जैन का आलेख - समता, समाज और जातिवाद
महावीर सरन जैन का आलेख - समता, समाज और जातिवाद
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