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वीरेन्‍द्र‘सरल‘ का हास्य-व्यंग्य - एक महा आधुनिक मेम

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बचपन से मुझे दृष्‍टिदोष है या कोई मनारोग, यह मैं नहीं जानता। मगर जब से होश सम्‍हाला है तब से एक अजीब घटना से परेशान हूँ। वह घटना यह है कि म...

बचपन से मुझे दृष्‍टिदोष है या कोई मनारोग, यह मैं नहीं जानता। मगर जब से होश सम्‍हाला है तब से एक अजीब घटना से परेशान हूँ। वह घटना यह है कि मैं जब भी किसी दुकान पर कोई सामान खरीदने के लिये जाता हूँ। दुकानदार से उस सामान का मूल्‍य पूछता हूँ। दुकानदार उसका मूल्‍य बताता है तो उस सामान से एक खूबसूरत युवती प्रकट हो जाती है। वह मुझे देखकर ऐसे मोहक अंदाज में मुस्‍कुराती है, जैसे कह रही हो, दम है तो ले जा मुझे अपने साथ। फिर वह धीमी आवाज में फिल्‍मी गीत गुनगुनाती है। ‘‘आओ देखें जरा किसमें कितना है दम।‘‘ यदि उस सामान का मूल्‍य मेरे बजट में नहीं समाता और मैं उसे खरीदे बिना ही वापस आने लगता हूँ तो वह युवती मुँह बिचकाकर अंगूठा दिखाकर ऐसे घूरती है जैसे कह रही हो, ‘‘दम नहीं है तो दाम क्‍यों पूछते हो भिखमंगे कहीं के?‘‘ यदि मैं अपनी बजट की चिन्‍ता किये बिना उस सामान को खरीद लेता हूँ तो वह युवती हँसती-मुस्‍कुराती, इठलाती हुई मेरे पीछे-पीछे चलती है और मेरे घर के द्वार तक आकर अंतर्धान हो जाती हैं।

मैंने डाक्‍टर-वैद्य यहाँ तक की ओझा-गुनिया, नीम-हकीम के पास जाकर भी अपनी इस समस्‍या को बताया है। पर उनका कहना है कि इस समस्‍या से केवल तुम ही नहीं बल्‍कि देश के सारे लोग परेशान हैं। घबराने की बात नहीं है, धीरे-धीरे अभ्‍यस्‍त हो जाओगे। पर मैं संतुष्‍ट नहीं हूँ, सोचता हूँ कि ये मुझे बच्‍चा समझकर कहीं झूठी तसल्‍ली तो नहीं देते। जी चाहता है, सीधे उस युवती से ही बात करूँ। आखिर वह मुझे इस तरह परेशान क्‍यों करती है?

एक दिन जब मैं दुकान से कुछ खरीददारी करके निकला तो वह फिर इठलाती हुई मेरे पीछे चलने लगी। आज मैं उससे बात करने का मन बना चुका था, मगर बीच बाजार में उससे बातचीत करना मुझे उचित नहीं लगा। मैं चुपचाप आगे बढ़ते हुये भीड़ कम होने का इंतजार करने लगा। भीड़ कम होने पर मैंने उसे समझाने की कोशिश की। मैंने पूछा-‘‘आप इस तरह मेरा पीछा करके मुझे परेशान क्‍यों करती हैं? लोग देखेंगे तो क्‍या कहेंगे? लोग तो यही समझते हैं कि अकसर लड़के ही लड़कियों का पीछा करते हैं। प्रेम नामक रोग केवल लड़कों का अधिकृत रोग है। लड़कियों में इसका संक्रमण नहीं होता। ऑपरेशन मजनूं का नाम बार-बार सुनाई देता है, कहीं आपने ऑपरेशन लैला का नाम सुना है, नहीं ना? फिर आप क्‍यों हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ी हैं ? लोग समझेंगे, मैं ही आपको बहला-फुसला कर ले जा रहा हूँ। आप पिछले कई वर्षों से मेरा पीछा कर रही हैं। पहले आप कुंवारियों के आधुनिक परिधान में दिखाई देती थी और अब आप साड़ी पहननें लगी हैं। गले में मंगल-सूत्र भी आपने पहना है। मतलब अब आपकी शादी भी हो गई है। अब तो मेरा पीछा करना छोड़िये देवी जी।‘‘

मेरी समझाइश का उस पर कुछ भी असर नहीं हुआ। वह मंद-मंद मुस्‍कुराती रही। फिर जोर-जोर से ‘‘मुन्‍नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिये गाती हुई नाचने लगी।‘‘ मैं हैरान रह गया। हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुये मैंने कहा-‘‘आप बदनाम हों य न हो, पर मैं जरूर बदनाम हो जाऊँगा माता जी। मुझ पर दया कीजिये, कृपा करके मेरा पीछा करना छोड़ दीजिये।‘‘ वह मुझे लाल-लाल आँखों से घूर-घूर कर देखने लगी। शायद मेरा माता जी कहना उसे नागवार गुजरा था। वह चीखी-‘‘बदतमीज, माताजी होगी तुम्‍हारी माँ। माता जी कह कर मुझे गाली देते हो नालायक।‘‘ मैं सकपका गया, मैंने डरते हुये कहा-‘‘हमारी संस्‍कृति तो परायी स्‍त्रियों को माता जी कहने का संदेश देती है और आप आग-बबूला हो रही हैं बहन जी।‘‘ मेरा वाक्‍य अभी पूरा भी नहीं हुआ था और वह शेरनी की तरह आक्रामक मुद्रा मे आकर गुर्रायी-‘‘लगता है तेरी खोपड़ी पर दो-चार सैडिंल पड़ने पर ही तेरा दिमाग ठिकाने आयेगा। क्‍या तुम्‍हें खूबसूरत लड़कियों से बात करने का तरीका नहीं मालूम है? गंवार कहीं के।‘‘ मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। समझ में ही नहीं आ रहा था कि आखिर मुझसे ऐसी क्‍या गलती हो गई है। मैंने मेमने की तरह मिमयाते हुये कहा-‘‘मुझे माफ कर दो बेटी।‘‘ अब तो वह लाल आँखों से घूरती हुई चिल्‍लाई-‘‘शायद तुम तमाचा खाकर ही सुधरोगे?‘‘ मैं उसकी लाल-लाल आँखों को देख यह सोचकर डर गया कि कहीं अँखियों से गोली न मार दे। फिर वह आगे बोली-‘‘तुम्‍हें जरा भी शर्म नहीं आती? किस मुँह से अपने आप को युवा कहते हो? मैं रोज ब्‍यूटी पार्लर जाती हूँ, गोरेपन का क्रीम लगाती हूँ। आधुनिक परिधान पहनती हूँ फिर भी तुम्‍हें बच्‍ची नजर आ रही हूँ मूर्ख। आजकल के होनहार युवा तो लड़कियों को फिल्‍मी अंदाज मे छेड़ते हैं। सीटी बजाते हैं। चलती है क्‍या नौ-से-बारह और आती क्‍या ख्‍ंाडाला गाते हैं और एक तुम हो जो मुझे माँ, बहन, बेटी कहकर अपमानित कर रहे हो। धिक्‍कार है तुम्‍हारी जवानी पर। ठहर मैं अभी चिल्‍ला-चिल्‍लाकर भीड़ इकट्ठी करती हूँ कि तुम मुझे छेड़ रहे थे।‘‘ उसकी बातें सुनकर मेरे हाथ-पाँव फूल गये। पसीना आ गया, मेरा सिर चकराने लगा। बड़ी मुश्‍किल से मैंने अपने आप को गिरने से बचाया। मैं सोचने लगा, तो क्‍या गंगा सचमुच उल्‍टी बहने लगी है? पश्‍चिमी हवा के दुष्‍प्रभाव से माँ, बहन, बेटी जैसे पवित्र संबोधन गाली लगने लगी है इन आधुनिकाओं को? अब किसी भी प्रकार के रिस्‍क लेने के बजाय मैंने उन्‍हीं से पूछा-‘‘पहले तो आप ये बताइये कि मैं आपको किस संबोधन से संबोधित करूँ ?‘‘ वह सगर्व मुस्‍कुराते हुये बोली-‘‘हाँ अब आये न लाइन पर। तुम्‍हें इतना भी पता नहीं है, आधुनिक युवतियों को माय डियर, मुन्‍नी डार्लिंग, चिकनी चमेली, जलेबी बाई, छम्‍मक छल्‍लो , स्‍वीटहार्ट जैसे सम्‍मानित संबोधन से संबोधित किया जाना चाहिये। यही सब तो फिल्‍मी संबोधन हैं इनके लिये। लगता है कि तुम फिल्‍म या टी वी वगैरह नहीं देखते। जब मुन्‍नी स्‍वयं तुम्‍हारे लिये बदनाम होना चाहती है तो तुम क्‍यों उसके इस पवित्र कार्य में बाधा बनना चाहते हो ?‘‘ उसकी बातें सुनकर मैं अवाक रह गया।

वह मुझे अपने-आप को स्‍वीटहार्ट कहने की अनुमति दे रही थी पर मैं अपने हार्ट के फेल हो जाने के डर से हिम्‍मत नहीं जुटा रहा था। मध्‍यम मार्ग अपना कर मैंने उसे केवल मेम कहने में ही अपनी भलाई समझी। मैंने कहा-‘‘मैम! तो क्‍या आप आधुनिक है?‘‘ उसने मुँह बिचकाते हुये कहा-‘‘हूहं, आधुनिक? मै तो महाआधुनिक हूँ।‘‘ मैंने पूछा-‘‘मैंने तो केवल अत्‍याधुनिक तक का ही नाम सुना है। ये महा आधुनिक क्‍या होता है? वैसे, मुझे तो आपके आधुनिक होने पर ही शक है क्‍योंकि आप स्‍कार्फ बाँधकर नहीं चल रही हैं। आजकल तो ओल्‍ड और एक्‍सपायरी डेट की युवतियां भी स्‍कार्फ बाँधकर चलती हैं। आप महाआधुनिक होकर भी स्‍कार्फ नहीं बाँधती। क्‍या आपको शर्म नहीं आती ?‘‘

वह विस्‍फोटक अंदाज में ठहाका लगाकर बोली-‘‘बच्‍चू! दुनिया गोल है। पहले चेहरा छिपाना पर्दा प्रथा कहा जाता था, अब वही आधुनिकता हो गई है। अब तो स्‍थिति यह हो गई है कि गृहणियां तक स्‍कार्फ बाँधकर गृहकार्य करती हैं। पता ही नहीं चलता कौन युवती है और कौन बूढ़ी अम्‍मा। शायद स्‍कार्फ आजकल अपनी पहचान छिपाने का सबसे सुंदर और सस्‍ता माध्‍यम बन गया है, समझे?‘‘

उसकी बातों से अब मैं एकदम बोर होने लगा था। मैंने हाथ जोड़कर कहा-‘‘मेरी माँ, ज्‍यादा तंग मत करो मेरा पीछा छोड़ो और अपनी राह चलो।‘‘ वह नैन मटकाते हुये खिलखिलाई और मेरी बातों का उपहास करते हुये बोली-‘‘मैं तो जनम-जनम तक तुम्‍हारा साथ छोड़ने वाली नहीं हूँ बच्‍चू।‘‘ मैं ऐसी-वैसी कोई साधारण युवती नहीं हूँ। महंगाई हूँ महंगाई, समझे?‘‘

महंगाई का नाम सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। ब्‍लडप्रेशर बढ़ गया और मुँह से अनायास निकल पड़ा-‘‘बाप-रे-बाप! जिसके कारण देश में लोगों की नींद हराम हो गई है, सारा देश परेशान है वह इतनी सुंदर है।‘‘ मैं अपलक उसके सौंदर्य को निहारने लगा ।

उसने मेरी आँखों के सामने अपना हाथ लहराते हुये कहा-‘‘कहाँ खो गये?‘‘ मैं तुरन्‍त त्राहि माम्‌ की मुद्रा में आ गया। अब उससे बातचीत करने में मुझे सामान्‍य युवती से कम खतरा लग रहा था। मैंने कहा-‘‘देवी आप क्‍यों आम लोगों को इस तरह परेशान कर रही हैं?लोग आपके कारण आत्‍महत्‍या करने को मजबूर हो रहे हैं। आपका मुँह तो सुरसा के समान बढ़ा जा रहा है। अब हमारी आवश्‍यकतायें हनुमान जी तो नहीं, जो आपके पेट में घुस जाये और कुछ पल ठहर कर सुरक्षित बाहर निकल आये, हम पर रहम करो मैया, दया करो। त्राहिमाम्‌ देवी त्राहिमाम्‌।‘‘

मेरी डबडबाई आँखें, उदास चेहरा और आर्त विनती सुनकर उसकी आँखें भी नम हो गई। उसने रूँधे गले से कहा-‘‘मैं विवश हूँ, नहीं चाहते हुये भी मुझे ये सब अपने पतियों के इशारे पर करना पड़ रहा है। मैं क्‍या करूँ? उनके इशारे पर नाचना मेरी मजबूरी है। मगर मेरी पीड़ा समझने वाले लोग कहाँ है?‘‘ इतना कह कर वह सुबक-सुबक कर रोने लगी ।

अब चौंकने की बारी मेरी थी। मैंने साश्‍चर्य पूछा-‘‘पति! कौन हैं आपके पति?‘‘ वह नजरें झुकाकर बोली-‘‘कालाधन, भ्रष्‍टाचार, जमाखोरी, रिश्‍वतखोरी, मिलावटखोरी, काला बाजारी, बेईमानी यही सब तो मेरे पति हैं। मैंने मासूमियत से पूछा-‘‘इतने सारे पति! मेम आपने शादी की है य देह व्‍यापार पर उतर आई हैं।‘‘ आगे मैं कुछ और पूछता, उससे पहले ही उसका झन्‍नाटेदार थप्‍पड़ मेरे गाल पर पड़ा। मैं तिलमिला गया, मुझे दिन में भी तारे दिखलाई पड़े। जब कुछ समय बाद मेरी आँखें कुछ देखने लायक हुई तो वहाँ दूर-दूर तक कोई भी नहीं था। वह अदृश्‍य हो चुकी थी ।

मैं अपने गाल को सहलाते हुये सोचने लगा, सारा देश बिल्‍कुल मेरी तरह मंहगाई की थप्‍पड़ से यूं ही तिलमिला रहा है।

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रचनाकार: वीरेन्‍द्र‘सरल‘ का हास्य-व्यंग्य - एक महा आधुनिक मेम
वीरेन्‍द्र‘सरल‘ का हास्य-व्यंग्य - एक महा आधुनिक मेम
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