बुधवार, 9 जुलाई 2014

अजय गोयल की कहानी - सोनचैरिया का पहला गीत

माँ! तुम्हारी यह सोनचैरिया जन्मना चाहती है।

ओस में भीगकर

सूरज से बतियाना चाहती है।

परिन्दों की तरह

आकाश चूमना चाहती है।

परसों कुदरत ने अपनी गुल्लक से निकाल एक मोती-सा दिन खर्च ने दिया तब मुझे लगा, पूरब में सुबह मुस्कराते बुद्ध के साथ हुई थी। तुमने दीदी को सोते समय बुद्ध कथा सुनाई थी ना। मैं सारी रात करूणा निथारती रही। जबकि तुम्हारे लिए पूरब में गुलाब खिला था। इस गर्भावस्था में तुम्हारी दुनिया गुलाब की गंध में रची बसी है। जिसका एक हिस्सा आप डिबिया में बंद कर लेना चाहती है।

आज घर में न गोविन्द माधव हरे मुरारी की धुन बजी। न सीताराम सीताराम गाकर दादी ने सुबह का अभिनंदन किया। उन्होंने उगते सूरज के दर्शन तक न किये थे। जबकि सुबह-सुबह उन्हें लगता कि क्षितिज पर कोई नन्हा मुन्ना खेलता चला आया है। वे अकसर अपना आंचल फैलाकर उगते सूरज से कहती, 'भेस सूरज भी तू। मेरा चन्दा भी तू। मेरी आंखों का तारा भी तू। आ मेरी गोद में आजा।''

मुझ से पहले दो-दो सोनचैरियाओं को वापस भेज चुकी दादी ने सुबह का नौका विहार जैसा उल्लास भंवर में फंसा दिया। मेरे लिए बोली, ''अब इसे भी निबटाने का इंतजाम करना होगा।'' उन्होंने माघ की नरम मुलायम धूप अचानक जेठ की बरछी-भालों सी चुभती विकराल दुपहरी में बदल दी थी।

माँ! दादी के लिए जमीन तभी फट गयी थी जब तुम्हारा अल्ट्रासाउंड करते हुए डॉक्टर ने कहा - ''सोनचैरिया।''

अपने घुटनों की पीर भूल कर दादी डॉक्टर की तरफ लपकी। रूँधे गले से एक बार फिर अल्ट्रासाउन्ड करने का आग्रह करने लगी।

स्थिति समझ कर आप तुरन्त अल्ट्रासाउन्ड रूम से बाहर आ गयी। तमतमा गयी थी आप क्योंकि अल्ट्रासाउन्ड पिछले सप्ताह से रह-रह कर आपके पेट में होने वाले दर्द के लिए किया जाने वाला था। ना कि लिंग परीक्षण के लिए।

घर लौटते समय सारे रास्ते दादी बड़बड़ाती रही। ''एक सोनचैरिया घर में है तो। फिर क्यों यह हाहाकार। दूसरी लाकर कीकर का बाग लगाना है क्या? कीकर और आमों का क्या मेल? दुनिया कहती है, लड़की मरे भाग्यवानों की। पहले जन्म में कौन से पाप किए हैं मेरे बेटे प्रदीप ने जो उसके नसीब में कीकर लिखें हैं ?''

माँ! किसी सपने का टूटना डूबने जैसा होता है। मन में अंधड़ हो तो बाहर भी अंधेरा लगता है। घर आकर आपने अपने आपको कमरे में बंद कर लिया। पिछले दो दिनों से मुझे बचा लेने के लिए लड़ रही हो। न कुछ खाया है। ना पिया है। जूझ रही हो अपनों से। इसलिए घाव तुम्हारे मन पर ज्यादा है।

बाहर पिताजी महाभारत किए हुए हैं। उन्हें समझ नहीं आ रही तुम्हारी जिद है। उनकी समझ से तुम दुनिया नहीं समझती। नासमझ हो।

माँ! मैं उन अदृश्य अल्ट्रासाउंड किरणों से कैसे बचती? कोना-कोना छान लेती हैं यह किरणें।

माँ! उड़ने के लिए पुष्पक विमान की कल्पना है। पाताल लोक हममें बसता है। दिव्य दृष्टि से महाभारत देखा गया। गर्भ में अभिमन्यु द्वारा चक्रव्यूह सीख लेने की कथा है। अंग प्रत्यारोपण के लिए गणेश है। यह अल्ट्रासाउंड अछूता है। इसके द्वारा गर्भ मन्यन में कालकूट विष एक सोनचैरिया होती है।

माँ! विकास की यह कौन-सी सीढ़ी हैं जहाँ बेटी का चीरहरण गर्भ में किया जाने लगे। दुर्भाग्य से दुःशासन की भूमिका दादी निभा रही है। कहीं शरण लूँ मैं? मुझे कोई लक्ष्मणरेखा नहीं दिखती सिवाय तुम्हारे। जब द्वार पर मुझे निबटा देने के लिए मेरी दादी व पिता खड़े हुए हैं।

पिछले दो साल से दादी एक पोते के लिए जतन कर रही थी। पिताजी ने अपनी कुंडली में बृहस्पति की दशा आने की प्रतीक्षा की। आप भी गऊ सेवा के लिये प्रतिदिन गऊ-ग्रास लेकर जाती।

इस नव-रात में इस असाध्य की प्राप्ति के लिए दादी ने नौ वर्षीया नौ कन्याओं को पूजने का व्रत लिया था। दुर्गा पुकारे जाने वाली नौ वर्षीया नौ कन्यायें एक भरी-पूरी कालोनी में नहीं मिली। सारे जतन अधूरे रह गये। दादी का माथा ठनका। एक दुर्गा कम रह गयी थी। पंडित जी ने राह दिखायी, कहा ''प्रसाद को चीटियों के लिए छत पर सिला दो।' '

अपने घुटनों की पीड़ा के कारण बहुत समय बाद छत पर गयी थी दादी। देर तक बैठी रही। चीं-चीं करती फुदकती-चहकती एक चिड़िया नहीं आयी थी। कौओं की काँव-काँव होती रही। शायद पहली बार उन्हें अहसास हुआ कि जीवन में बस काँव-काँव रह गयी थी।

उस समय दादी पर नवरात्र का प्रभाव था और सिर पर उजाला उँडेलता सूरज था।

दादी ने देखा छत साफ सुथरी सिकरी थी। पक्षियों के लिए जलकुंड के साथ बाजरा भी था। तुम्हारी भरपूर उपस्थिति का दादी को भान हुआ। उनकी आँखें तरल हो गयी। उस नमी में तुम्हारे लिए बहुत कुछ था माँ। दादी सोचने लगी,-

''कैसी सुघड़ गृहस्थन बहू है। राम जी मैं तो तर गयी। बस एक पोते का मुँह दिखा दो। चाहे मेरी जान ले लो। मैं अब खुद लकड़ियों में जाना चाहती हूँ। जानती हूँ समुद्र तक आचमन में गटकने वाले अगस्त ऋषि कह गये हैं, स्त्री हन्ता कोई और नहीं रावण का रूप है। मैं पूरी लंका में रह रही हूँ; कदम-कदम पर सारा इंतजाम। मुलायम आवाज के साथ चमचम दीवारों के बीच सब इंतजार में रहते हैं। पैसा देख कर कोई मना नहीं करता। इस बार बहू को अपनी डॉक्टर सावित्री के पास ले जाऊँगी। प्रदीप की भी डिलीवरी वहाँ हुई थी। प्रदीप के साथ पैदा हुई जोडिया लड़की का न जाने क्या हुआ होगा, मेरे मन ने उस समय कहा था कि पहली लड़की लक्ष्मी होती है तो दूसरी लड़की दरिद्री कही जाती है। इसको साथ ले जाना दिलद्दर साथ ले जाना होगा। मैं भी कैसी पत्थर दिल हो गयी थी उस समय। पहली लड़की उमा के साथ वह पल ही जाती। लेकिन उस समय अकेली थी मैं। ना सास का साथ था। ना ससुर का साया। छोटा सा काम। हाथ छोटा हो तो ...। आदमी वैसे ही आधा पागल हो जाता है।''

-''कहाँ खो गयी हो। पंडित जी इंतजार में हैं।'' दादाजी उन्हें ढूँढते हुए छत पर आ गये थे।

माँ! छत पर दादी का जैसे कायांतरण हो गया था।

क्योंकि छत पर बैठी वे दादी नहीं थीं जिन्होंने गर्भ के दूसरे महीने में एक अन्जान सी जड़ खाने के लिए आपको विवश कर दिया। जिसके लिए उन्हें बताया गया था कि इस जड़ से गर्भ में पल रही लड़की भी लडके में परिवर्तित हो जाती है।

वे दादी भी नहीं थी जो अल्ट्रासाउंड होने से पहले तक आपके सामने बादाम का दूध प्रतिदिन रख देती। जिससे आने वाला पोता महान बुद्धिमान हो।

वे दादी भी नहीं थी जो आपको केवल आराम करने के लिए कहती। क्योंकि वे एक स्वस्थ पोता चाहती थी। इस बार दादी ने शुरु से कमान सम्भाल ली थी। तुम्हारे 'चेकअप' के दिन डा० सावित्री के पास साथ में जाती। उस दिन दादी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब तुमने उन्हें बताया कि इस गर्भावस्था में अपने चारों ओर गुलाबों की सुगन्ध बिखरी महसूस होती है।

उस समय दादी को लगा जैसे सिंड्रेला का रथ, उसके घोड़े और उसकी राजसी वेषभूषा रात के बारह का घंटा बजने के बाद भी कद्दू चूहे और छड़ों में नहीं बदले।

मैं चाहती हूँ ''दादी मुझे सिंड्रेला की कहानी सुनाएं। वे अपने कन्धों पर मेरा स्पर्श महसूस करें। जन्म से पहले मेरा भी नाम रखें। जैसे उन्होंने अपने सम्भावित पोते का नाम गुलाब रख लिया था।''

माँ! आपके कमरे के बाहर नानी आ बैठी है। पिताजी ने उन्हें बुलाया है। आपसे कमरा खोलने के लिए वे कह चुकी हैं। मत खोलना माँ। वे पिताजी का विरोध करने की स्थिति में नहीं है। मैं डा० सावित्री की मुरीद हूँ। उन्होँने शुरूआत से आपको न झुकने के लिए कहा। इसके लिए ताकत दी। और चौथे माह के बाद बिना सलाह अल्ट्रासाउंड न कराने के लिए कहा। लेकिन दादी ने आपको भरमा लिया। दो चार दिन आपने पेट में दर्द क्या महसूस किया। बस। अल्ट्रासाउंड करा डॉ. साहब के पास चेकअप कराने के लिए उन्होंने आपको मना लिया। जबकि इस बार दादी ने लिंग परीक्षण न कराने का शुरूआत में आपको वचन दिया था। लेकिन दादी योजनाबद्ध तरीके से काम कर रही थी। माँ! दादी को सारी चालाकी डॉ. सावित्री के सामने पस्त हो जाती है। वे चाहकर भी नहीं पूछ सकी अपनी उस नवजात बेटी का हाल जिसे वे तीस बरस पहले अस्पताल में छोड़ आयी थी।

माँ! सकल ब्रह्माण्ड में जीवन का कैनवास है हमारी पृथ्वी। जहाँ जीवन के रंग सजते हैं। जीवन हिलोर लेता है। सूरज और चाँद देख जीवन अंगड़ाई लेता है। आपके गर्भ में इसका इतिहास दोहरा रही हूँ। करोड़ों वर्षों का। सांस लेने से पहले इस महायात्रा मेँ यदि अग्नि-परीक्षा देनी पड़े? तब जीवन का क्या अर्थ रह जाता है? वह भी स्त्री होने पर .....?

उस दिन चेम्बर में डॉ. सावित्री का कोई कर्मचारी नहीं था। दादी के मन की बात आपने पूछी।

डॉ. सावित्री ने तुरन्त सन्दर्भ बदल दिया। उन्होंने दादी से पूछा, -''घुटने में दर्द क्या काफी रहता है?'' -''डॉक्टर साहब घुटना बदलने के लिए कहते हैं। लाखों रूपये का इंतजाम बेटा कैसे करे? उसको अपना काम भी जमाना है। मुझे क्या करना है अब।'' हमदर्दी के दो शब्दों के आगे दादी अपनी गठरी खोल कर बैठ गयी। आपने एक बार फिर पूछा?

डॉ. सावित्री मुस्करा पड़ी। उनकी मुस्कराहट में मुझे मेरी जीवन रेखा दीखती है। मुझे वे ताला-हार लगती हैं। माँ! मुझे सांसे मिली तब दादी से अवश्य पूछूंगी, क्या राम को रावण गढ़ सकते हैं? या रावणों के कारण राम जन्म लेते हैं। आप राम को तारण-हार मानती हैं। माँ के लिए अनेक कथा-वाचकों की राम कथा सी० डी० लेकर आयीं। चाहती हैं, आप सुने और गुने, जिससे राम-सा पोता पैदा हो। क्या मैं राम का चरित्र लेकर पैदा नहीं हो सकती? आप अपने दिन का पहला घटा सीताराम-सीताराम जपती हुई गुजारती हो। सीता के राम को भजती हो या राजा राम को?''

मुझे लगता है, सब केवल राजा पैदा करना चाहते हैं। जबकि राजा अपने आप में सबसे बड़ा संकट है। राजा अपने लिए जीता है। समय, समाज और सभ्यता सब खा जाता है। हमारे महान मुगलों की शहजादियों में बताओ किसका विवाह हुआ है? अकबर की छ: बेटियाँ थीं। तब अल्ट्रासाउंड पैदा नहीं हुआ था। छ: की छ: जीवन भर अपने पैदा होने के मकसद पर बिसूरती रही। दीवारों से सर मारती रही।

बस, राजा बना रहे।

राजा का इस्तकबाल बुलंद रहे।

राजा रथी रहे।

कुर्बानियाँ सुविधानुसार भुला दी जाती हैं।

माँ! देखो ना। उमा बुआ पढ़ने में होशियार थी। एक डॉक्टर बनना चाहती थी। जबकि पिताजी का दिल नहीं लगता था पढ़ाई में। उन्हें दादी एक डॉक्टर बनाना चाहती थी। किसी कम्पीटिशन में उनका चयन नहीं हो रहा था। उनकी कुंठा ने बुआ की भाग्य रेखा काट दी। एक दिन उन्होंने बुआ से कहा, -''तुम्हारा चयन हुआ और मेरा नहीं हुआ तो मैं आत्महत्या कर लूँगा।''

बुआ ने पढ़ना-लिखना छोड़ दिया। ड्सके बाद उनकी जिन्दगी में विवाह शेष रह गया था।

दो साल पहले पल में अटारी चढ़ने के फेर में कच्चे तेल के सौदों से गड्डे में जा गिरे थे पिता जी। उस घाटे को दादा जी ने अपनी जिन्दगी की कमाई स्वाहा कर भरा। और अब .... अपनी सोनचिरैया को निबटा कर अपने लिए हवा पानी का बीमा करा लेना चाहते हैं पिताजी।

माँ! क्या तुम्हें ध्यान है? बुद्ध कथा सुनते वक्त पास बैठे पिताजी अचानक चिढ़ गये थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था, आखिर शहर के धनवानों द्वारा दिये गये सोना-चाँदी को पिघलाकर करूणामयी मुस्कराहट लिये बुद्ध की मूर्ति क्यों नहीं बनेगी? वह एक गरीब लड़की के एक छोटे पैसे का पिघल कर मिलने का इंतजार आखिर क्यों करेगी? माँ! माँ! उठो! डॉ. सावित्री का दादी के पास अभी-अभी फोन आया है। भागीरथी बुआ के आने का। नहीं समझी। वे वही बुआ है। जिनका जन्म पिताजी के साथ हुआ था। जिन्हें दादी .अस्पताल में छोड़ आयी थी। दादी के छोड़ कर चले आने के बाद डा० साहब के चाचाजी अस्पताल पहुँचे थे। वे सुनकर हैरान रह गये कि कोई माँ इस तरह अपनी बच्ची को अस्पताल में छोड़ कर कैसे जा सकती है। बुआ उस क्षण चुपचाप पालने में थी। डा० साहब परेशान थे। जब चाचा जी ने बुआ को स्पर्श किया तो उनकी नन्हीं अंगुलियों ने उनके हाथों को पकड़ लिया। जिन्हें छुड़ाकर वे पलटे तो उन्होंने रोना शुरू कर दिया। उस समय उनके पैर आगे नहीं बढ़ सके। चाचा जी के पास कोई बेटी नहीं थी। एक बार फिर चाचा जी पालने के पास पहुँचे। सती बुआ को चूमना चाहा तब अपना नन्हा हाथ बीच में ले आयी। उन्हें लगा जैसे कह रही हो, स्नेह बाद में। हिम्मत है तो पहले जिम्मेदारी लो। बेटी को स्वीकार करो। दिखावा मत करो। बस, चाचाजी ने अपना लिया बुआ को। भागीरथी नाम दिया। आज बुआ एक डॉक्टर है। स्टेमसेल थरेपी की विशेषज्ञ।

उन्होंने घुटनों की क्षतिग्रस्त कार्टिलेज को इस थरेपी द्वारा रिजेनरेट कई बार कर दिखाया है। वे दादी से मिलना चाहती हैं। उनका इलाज करना चाहती हैं।

माँ! देखो! खिड़की से बाहर देखो। दादी द्वार पर हैं। भागीरथी बुआ आ चुकी हैं। दादी कह रही है,-''मेरी तारण-हार है भागीरथी। मुझे पापों से मुक्त करने आयी है। अब मेरी पोती भी आखें खोलेगी।''

माँ! तुम्हारे समुद्र-मंथन से धनवन्तरी के रूप में आयी हैं भागीरथी। जीवन कलश लेकर। तुम्हारे आयतन में मेरा अस्तित्व है। तुममें छुपी हुई हूँ मैं।

माँ! तुम गंगा हो

संस्कृति जीती हो।

धर्म साधती तुम

सातत्य को

उत्कर्ष तक वहन करती हो।

क्योंकि अमृत कलश हो।

इतिहास रचती तुम

वर्तमान साधकर

भविष्य की भूमिका बनती हो।

संजीवनी हो।

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- अजय गोयल

निदान नर्सिंग होम

फ्रीगंज रोड, हापुड़

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