विनीता शुक्ला की कहानी - डॉलफिनें

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

डॉलफिनें
- विनीता शुक्ला
उनकी डायरी के कवर- पेज पर लिखा था- “बी लाइक डॉल्फिन्स, व्हिच ऑलवेज स्माइल एंड बिगेट हैप्पीनेस; व्हिच स्टे अवे फ्रॉम विकेड शार्क्स, टु मेन्टेन अ पॉजिटिव एटीट्यूड इन लाइफ” दार्शनिक अंदाज़ में उसे समझाते हुए वे कहतीं, “हमें डॉल्फिन्स की तरह बनना चाहिए, अलमस्त और जीवनी- ऊर्जा से भरपूर...शार्क सरीखे दुष्ट लोगों से एक फासला बनाकर चलना चाहिए; ताकि जीवन में सकारात्मक रुख बना रहे” इसके तुरत बाद उनका निंदा- पुराण चालू हो जाता. शार्क- सरीखे लोगों का जिक्र जो उनके जीवन में दखल देते थे; उनके परोपकारी पति का, गलत फायदा उठाने वाले लोग.

निंदा- रस में गोते खाते हुए, वे ठीक डॉलफिन जैसी दीखतीं- आँखें मिचमिचाकर दांत निपोरती हुई! अंतरा उनसे, यानि जयंती रंगनाथन से कब मिली, ठीक से याद नहीं; किन्तु जब भी मिली, दुनियादारी, पाक –कला और शॉपिंग आदि का ज्ञान फोकट में पाया. वो गप्पें दिलचस्प होतीं; लेकिन साथ होती, शिकायतों की पोटली! वे डॉलफिन बनकर, नकारात्मकता छोड़ने को कहतीं और दूसरी तरफ, पति को लेकर कुढ़ती रहतीं. उनके पति श्रीनिवास रंगनाथन- दोस्तों और परिचितों में, बेहद लोकप्रिय; सबके शुभचिंतक...सबके मददगार. श्रीनिवास की दिलदारी, उनकी पत्नी को रास न आती.

जयन्ती अक्का(दीदी) से सम्पर्क, चेन्नई आने के बाद हुआ. अन्तरा और उसके पति नील के लिए, तमिलभाषी दायरे में, पैठ बनाना आसान न था. अंजान शहर, अनजान लोग और उनकी अनजान बोली... अजब से रस्मों रिवाज, अजब से रंग ढंग. अजनबी चेहरों की भीड़ में, वे अलग- थलग महसूस करते. ज़िन्दगी रेंग सी रही थी, एकरसता की सुरंग में. वे अक्सर समुद्र किनारे, लहरें गिनते बैठते. उससे भी जी ऊबता तो मंदिरों के अद्भुत- भव्य विस्तार में, खो जाते; कला और संस्कृति के अवशेषों को इतिहासविद जैसा खंगालते; पौराणिक भित्तिचित्रों पर, अनाधिकृत रूप से उकेरे प्रेमियों के नाम; प्रेम- संदेशों व तीर से बिंधी हृदय- आकृतियों जैसे, बाजारू आग्रहों से खीजते हुए. मेले- ठेले और शहर की रौनक भी, उन्हें बहला न पाती.

यह अच्छा हुआ कि नील के कार्यालय में, एक वरिष्ठ अधिकारी वर्मा जी, उत्तर भारतीय थे. उनके घर से ही, सामाजिक परिधि में प्रवेश मिला. सुरेन्द्र वर्मा की पत्नी लतिका, बेहद आत्मीय महिला थीं. घरेलू कामकाज और खाना पकाने में निपुण. जल्द ही सुरेन्द्र जी, अपने पारिवारिक मित्र रंगनाथन जी के साथ, उनके यहाँ आ धमके. रंगनाथन जी कार्यालय की संयुक्त इकाई में थे. कार्यालय द्वारा प्रद्दत आवासीय सुविधा के तहत, सुरेन्द्र जी के पड़ोसी भी. यहीं से जयंती और लतिका की दोस्ती ने जन्म लिया. लतिका अपने संस्कारों के चलते, कुछ भीरु प्रवृत्ति की थीं; जबकि जयंती अंग्रेजी शिक्षा पाई हुई, आधुनिक महिला. लतिका के साधारण व्यक्तित्व पर, उनकी सहेली जयंती छा गयी.

लतिका को जयंती ने बिजनेस पार्टनर बना लिया. वे मिलकर सस्ते परिधान खरीदतीं, उनमें कुछ रद्दोबदल कर, फैशनेबल लुक देतीं. कारीगरों को निर्देश देकर, अपनी मनपसन्द डिजाइन का परिधान भी सिलवातीं. यहाँ लतिका का सिलाई का ज्ञान और जयंती की व्यवहारिक बुद्धि काम आई. उनका व्यापार खूब फला- फूला. और समय के इसी बिंदु पर, अंतरा की भेंट जयंती अक्का से हुई. वे लतिका भाभी के साथ उनके घर आयीं थीं. बड़े गर्व से, उन्होंने अपना परिचय, लतिका की बेस्ट फ्रेंड के रूप में दिया. वे दोनों साथ में, एक रचनात्मक गतिविधि को अंजाम दे रही थीं- इससे उनके पति भी प्रसन्न थे.

न जाने क्यों अंतरा को लगा कि जयंती की नीयत, लतिका को लेकर सही नहीं थी. एक तो वे उन पर आधिपत्य जमाने का प्रयास करतीं और दूसरे उनकी व्यक्तिगत बातों को, सरेआम उछालती फिरतीं. सुरेन्द्र वर्मा की रसिकता और दूषित वृत्तियों की, लतिका के सामने ही चर्चा... न जाने क्यों, लतिका चुपचाप सुनती रहतीं और प्रतिकार में कुछ न कह पातीं. उन्हें तो जयन्ती को, जोरों से लताड़ने की आवश्यकता थी किन्तु वे बस मुंह लटकाकर रह जातीं. शायद इसलिए, क्योंकि जीवन के नये अर्थ तलाशने में, उन्हें जयंती का साथ चाहिए था; या फिर इसलिए कि उन्होंने जयन्ती को वह भेद बता दिए थे, जो उन्हें नहीं बताने चाहिए थे.

कदाचित जयन्ती अक्का को दादागिरी करने में मज़ा आता था- खासकर पुरुषों को कटघरे में खडा करके. वे घोर स्त्रीवादी थीं. कई स्त्रीवादी संगठनो की सदस्य भी- वहीं से उन्हें अक्का का संबोधन मिला. वह अंतरा की माँ की उम्र की थीं फिर भी उसे, आंटी नहीं कहने देतीं...उन्हें अक्का(दीदी) कहकर ही बुलाना होता. ‘जगत- अक्का’ जो ठहरीं! विधवा, परित्यक्ता, जरूरतमंद स्त्रियों से अपने घर या दुकान का काम करवाकर, बदले में उनकी आर्थिक सहायता कर देतीं. उन सेविकाओं को भी वे, दोस्त ही कहतीं.

किन्तु अंतरा को, श्रीमती रंगनाथन की, इतनी उदारता हजम नहीं होती थी. वे महिलाएं उनकी दोस्त होने के नाते, डॉलफिन की श्रेणी में ही आतीं....सब उनकी ही तरह, छोटी और मिचमिची आँखों वाली! मानों डॉलफिन की प्रतिकृति!! तमिलों में तो, एक से एक नाम होते हैं- विशालाक्षी, मीनाक्षी, मयूराक्षी; बड़ी बड़ी आँखों वाली, सुन्दर स्त्रियाँ भी होती हैं. फिर इन नमूनों को ही, क्यों बटोर लायीं जयंती?! कॉलोनी की भद्र महिलाओं से, उनकी क्यों नहीं पटती? क्यों वे सब भी, इन्हें देखकर बिदक जाती हैं?? माँ कहती हैं कि छोटी आँखों वाली औरतें धूर्त होती हैं.

अक्का किसी अंग्रेजी जुमले से प्रेरित होकर, डॉलफिन और शार्क की तुलना करती रहती हैं. अंतरा प्राणी- विज्ञान की परास्नातक थी. डॉलफिनों के बारे में, उसे दूसरी ही जानकारी थी. डॉलफिनें मनुष्य के बाद सबसे बुद्धिमान प्राणी होती हैं; इसलिए कुटिल भी. मौका मिलते ही, वे नीचे से वार कर, शार्क का पेट फाड़ डालती हैं. शारीरिक तौर पर, वे शार्कों से उन्नीस बैठती हैं लेकिन दांव- पेंचों में, उनसे कहीं आगे. बच्चों के साथ तैर कर और दूसरी अदाओं से वे उनका मनोरंजन करती हैं. लेकिन जब मानव उनका गलत फायदा उठाता है तो वे हिंस्र हो जाती हैं. तैरने के लिए सीमित जगह मिलने और स्पीड- बोटों से बांधकर खींचे जाने पर, वे भडक उठती हैं और इंसान पर हमला कर, उसे चीर डालती हैं.

जयंती के भीतर भी, कुछ हिंसक भाव अवश्य थे. अंतरा की तीसरी इन्द्रिय उसे हमेशा चेताती. वह ऐसी ही स्त्रियों को, दोस्ती के लिए चुनतीं जिनका पति, परिवार और बच्चों से मोहभंग हो गया हो. हमेशा औरतों को, कुटुंब के ही खिलाफ, भड़काने का यत्न करतीं. ऐसा करते हुए, वे क्यों भूल जातीं – कि उनका अपना भी एक परिवार है?! क्या यह सब नारीवाद की खब्त थी या कुछ और गहरी बात??!!

उन्होंने उसके निजी मामले में भी नाक घुसेड़नी चाही. उसकी ससुराल में, जायदाद को लेकर पक्षपात हुआ. नील के भाइयों ने, संपत्ति का बड़ा हिस्सा हथिया लिया. इसे लेकर पति- पत्नी में, लम्बी बहस होती रही. जिसकी भनक पड़ोसियों को लग गयी और न जाने कैसे अक्का को भी! बस फिर क्या था, वे चालू हो गयीं- नील को लेकर. आलोचना के साथ साथ, कहती जा रहीं थीं, “ये सब मर्द ऐसे ही होते हैं, स्वार्थी और लम्पट...क्या हम इनके साथ सोने के लिए ही हैं?! हमारा भी कोई वजूद है या नहीं???”

जयंती की ऐसी बातें सुनकर, अंतरा सतर्क हो गयी. वह लतिका भाभी का हश्र देख चुकी थी. अब उनको खुद पर, हावी नहीं होने देना था; सो कठोरता से बोली, “इसके लिए आपको परेशान होने की जरूरत नहीं. यह हम पति- पत्नी का आपसी मामला है. सुलटा ही लेंगे. मेरे पति कोई बुरे आदमी नहीं... हां, कुछ सीधे जरूर हैं- इसी से...!” यह सुनते ही, उनका चेहरा लटक गया. इसके बाद कई दिनों तक, अंतरा से कटी- कटी रहीं. रंगनाथन अंकल के कारण, वे उससे एकदम पल्ला नहीं झाड़ पायीं; लेकिन उदासीनता को छुपा भी न पाईं.

अंकल अक्सर साथ मिल- बैठने का प्रोग्राम बना लेते; या कभी पिकनिक का ही. अंकल का स्नेही स्वभाव, अंतरा को बहुत भाता. वे उसे बेटी की तरह मान देते और गाढ़े वक्त में, सदा उनके काम आते. अंकल के साथ, ‘आंटी’ उर्फ़ अक्का को भी मन मारकर, उनका अभिभावक बनना पड़ता. वे उसे बेटी कहतीं. माँ की तरह, उसकी खातिर- तवज्जो भी करतीं; पर अन्तरा जानती थी कि ऐसा वे अंकल के दबाव में कर रही थीं. जो भी हो- ये उनका एहसान ही था. अक्का के अजब बर्ताव के बावजूद, नील इस परिवार से जुड़े रहना चाहते थे! कारण- अंकल व आंटी, दोनों ही, कामचलाऊ हिंदी जानते थे और फिर अंकल का अपनत्व...! उनकी एकमात्र संतान अस्वती भी मिलनसार थी.

समय बीता. अस्वती प्रेम- विवाह कर यू. एस. चली गयी. लतिका भाभी के पति का भी, तबादला हो गया. आंटी अकेली पड़ गयीं और कुछ पगला भी गयीं. एक दिन उन्होंने उससे, एक बहुत विचित्र बात कही, “ यू नो हमारे बगल में एक पत्रकार रहती है, अरे वो टेक्निकल- ऑफिसर की बीबी”

“हां, आपने बताया था- वह जो आपकी पॉपुलैरिटी से जलती है?”

“करेक्ट...! पता है क्या कह रही थी?” अन्तरा ने प्रश्नवाचक दृष्टि से उन्हें देखा. इस पर वे बोलीं, “कह रही थी कि लतिका के बाद, मुझे दूसरी व्यवस्था कर लेनी चाहिए.” अंतरा अब भी नहीं समझी तो उन्हें खोलकर कहना पड़ा, “शी थिंक्स देट, आई ऍम इन अ फूलिश लव विद हर- यू नो, लाइक फिल्म फायर”

“यू मस्ट हैव स्लैप्ड हर!!!” अन्तरा उत्तेजना में बोल पड़ी. “हाथ उठाना अच्छी आदत नहीं अन्तरा” आंटी ने फौरन बात बदल दी. लेकिन उन्हें लेकर, अंतरा के मन में, गाँठ तो पड़ ही गयी. नील से बताया तो वे बोले, “अरे नहीं अन्तरा...आंटी के बारे में ऐसा न कहो! वे लोग सज्जन हैं ...हमारे लोकल गार्जियन हैं!!” लेकिन फिर भी, मन की ग्रंथि, न घुल सकी. अंतरा को जब- तब लगता कि उन्हें लेकर, दूसरे अफसरों की बीबियाँ, कुछ खुसर- पुसर करती हैं. पति उनका पक्ष लेता तो और भी वितृष्णा होती. सुना था कि नील की पुरानी दोस्त और सहकर्मी इला भी, चेन्नई ऑफिस में शिफ्ट हो गयी है. अक्सर दोनों साथ ही दीखते. लोग उनके बारे में, क्या क्या बक रहे थे! जयंती अक्का भी, बात को कुरेद कर मजा लेतीं. ऐसे में जयन्ती और नील उसे, एक ही थैली के चट्टे- बट्टे, नजर आते.

एक दिन जब अक्का, अंकल से विवाद कर रही थीं, अंतरा ने गलती से, उनका पक्ष ले लिया. तब दुलार जताती हुई वे, उससे चिपक गयीं थीं. अंतरा को उनका स्पर्श, कुछ लिजलिजा सा लगा. वह छिटककर अलग हट गयी तो जयंती हतप्रभ रह गयी थीं. उन्होंने उसके सर पर हाथ फेरकर कहा, “तुम तो हमारी बेटी हो. तुम्हारी भोली बातें, हमें बहुत पसंद हैं” सुनकर अंतरा को एहसास हुआ कि वो उनके बारे में गलत सोच रही थी. धीरे धीरे वह, उनसे खुलने लगी. एक बार नील ने सबके सामने, उससे कुछ कड़वा बोल दिया. आंटी ने पीठ पीछे, नील को बहुत कोसा. अन्तरा भावुक होकर बोल उठी, “जाने दीजिये अक्का...ये भी क्या करें! इनके परिवार के संस्कार ही कुछ ऐसे हैं!!” जाने –अनजाने ससुराल के बारे में, कुछ उलटा- पुल्टा भी बोल गयी. वह कहाँ जानती थी कि ऐसा करके, उसने अक्का की घृणित सोच को, शह दे दी है!!

अक्का का चेहरा, जल्द ही उघड़ गया था...एक बार फिर हुई थी, फिल्म फायर की चर्चा ! किन्तु अब किरदार बदल गये. इस बार, कॉलोनी की महिला ने, उनका चरित्र हनन किया था- क्लब की भूतपूर्व तथा अधेड़ परिचारिका के साथ, उन्हें जोड़कर. यह ‘दिव्य संज्ञान’, उनके ही ‘श्रीमुख’ से मिला. इस बार नील, जयंती का समर्थन न कर सके और अंतरा ने भी, उनसे कन्नी काट ली. वे अनजान बनकर कई बार, पूछ चुकी थीं कि वह, उनसे खिंची खिंची क्यों रहती है. इस पर अन्तरा, कोई गोलमोल सा जवाब देकर खिसक लेती. लेकिन वे क्लब में दिखीं तो मजबूरन, ‘हाय- हलो’ करनी पड़ी. उनसे कटकर भाग ही रही थी कि वे जानकर, उसकी पीठ पर गिर पडीं. इस बार स्पर्श को पहचानने में, उससे भूल नहीं हुई.

अंतरा रात भर सोचती रही थी. डॉलफिनें जितनी बुद्धिमान होती हैं, उतनी ही क्रूर भी. नये दैहिक सम्बन्धों के लिए, अपने ही शिशुओं को मार डालती हैं. शार्क तो अपना पेट भरने के लिए, शिकार करती हैं पर डॉलफिनें, पोर्पोइस मछली के बच्चों को, मात्र मनोरंजन के लिए, घेर घेरकर मारती हैं. डॉलफिन एकमात्र पशु-प्रजाति है- जिसमें सामूहिक दुष्कर्म का प्रचलन है. जितनी प्रबल बुद्धि- उतने ही प्रबल विकार!!! जयन्ती जैसी औरतें, प्रकृति के सुंदर नियमों और शिवता के विरुद्ध, अपने मनोविकारों को पालती- पोसती हैं. किन्नर तो, दैहिक कुंठा से अवश होकर, ऐसा करते हैं पर एक भरी- पूरी स्त्री, भला ऐसा क्यों करती है???

इस जिज्ञासा का समाधान भी, शीघ्र ही मिल गया था. उनके बचपन की पड़ोसन रागम्मा, अंतरा के ‘किटी- समूह’ में शामिल हो गयीं थीं. रागम्मा की फुसफुसाहटों ने, जयंती का पर्दाफाश कर दिया. रागम्मा से मिले ज्ञान और अक्का से हुई बातों के आधार पर; अंतरा ने मानों, किसी जिगसॉ- पजल को सुलझा लिया था- पजल के टुकड़ों को यथास्थान जोड़कर. जयन्ती, एक उन्नीस वर्ष की किशोरी; जो बुरी तरह, विवाह को उत्सुक थी. विधवा माँ की आर्थिक दशा को देखते हुए, ब्याह का आसार न था. शरीर में उठ रहे, हारमोनों की तरंगें, उसे उद्वेलित करतीं.

समाज की वर्जनाओं ने, किसी लडके से मेल- मिलाप का अवसर नहीं दिया. सहजीवन का भी चलन नहीं था. जब कोई प्रेमी न मिला तो वह सहेली के साथ ही चली गयी- अर्धनारीश्वर की अवधारणा का मखौल उड़ाते हुए! विधुर रंगनाथन को, अपनी बेटी अस्वती की देखभाल के लिए, नई माँ चाहिए थी. उन्होंने सत्ताइस वर्षीया जयंती को अपना लिया. उसकी बूढ़ी मां, उन्हें दहेज़ में मिलीं. ब्याह के बाद जयंती परिस्थितियों में उलझकर रह गयीं...पहली बार में ही, गर्भपात हो गया और उनकी कोख, सदा के लिए बंजर हो गयी. दमित आकांक्षाओं ने, उन्हें फिर, पुराने दलदल में धकेल दिया.

रंगनाथन लोकलाज से बद्ध थे. पत्नी की लगाम, ठीक से कस नहीं पाते. इन बातों से उकताकर, अस्वती सदा के लिए, उनसे दूर चली गयी. हृदयाघात और पक्षाघात के बाद, अंकल का रहा सहा मनोबल भी जाता रहा. शरीर और पत्नी- दोनों पर से ही, उनका नियन्त्रण घट गया; जयंती के अलावा, किसी और का, आसरा भी तो नहीं था! ‘नेट’ पर वे, अपनी और पत्नी की युगल तस्वीरें डालकर, दुनियां को भ्रमित करते. पर सच्चाई, छुपाने से कहाँ छुपती है! एक बार लतिका भाभी का चेन्नई आना हुआ. उन्होंने दबे सुर में अन्तरा से पूछा, “ आजकल जयंती के यहाँ, जाती नहीं हो क्या” अंतरा भांप गयी कि वे क्या पूछना चाहती थीं. उसने उन्हें टालू सा उत्तर दिया. इस पर वे सशंकित हो उठीं. अंतरा ने पाया कि उनकी आंखे पहले डॉलफिन सी चमकीं, फिर शार्क जैसी रौद्र हुईं और अंततः बुझ सी गयीं- किसी ड्रैकुला के शिकार के जैसी!!!

---

 

विनीता शुक्ला

शिक्षा – बी. एस. सी., बी. एड. (कानपुर विश्वविद्यालय)

परास्नातक- फल संरक्षण एवं तकनीक (एफ. पी. सी. आई., लखनऊ)

अतिरिक्त योग्यता- कम्प्यूटर एप्लीकेशंस में ऑनर्स डिप्लोमा (एन. आई. आई. टी., लखनऊ)

कार्य अनुभव-

१- सेंट फ्रांसिस, अनपरा में कुछ वर्षों तक अध्यापन कार्य

२- आकाशवाणी कोच्चि के लिए अनुवाद कार्य

सम्प्रति- सदस्य, अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था, लखनऊ

सम्पर्क- फ़ोन नं. – (०४८४) २४२६०२४

मोबाइल- ०९४४६७८७०९२०

प्रकाशित रचनाएँ-

१- प्रथम कथा संग्रह’ अपने अपने मरुस्थल’( सन २००६) के लिए उ. प्र. हिंदी संस्थान के ‘पं. बद्री प्रसाद शिंगलू पुरस्कार’ से सम्मानित

२- ‘अभिव्यक्ति’ के कथा संकलनों ‘पत्तियों से छनती धूप’(सन २००४), ‘परिक्रमा’(सन २००७), ‘आरोह’(सन २००९) तथा प्रवाह(सन २०१०) में कहानियां प्रकाशित

३- लखनऊ से निकलने वाली पत्रिकाओं ‘नामान्तर’(अप्रैल २००५) एवं राष्ट्रधर्म (फरवरी २००७)में कहानियां प्रकाशित

४- झांसी से निकलने वाले दैनिक पत्र ‘राष्ट्रबोध’ के ‘०७-०१-०५’ तथा ‘०४-०४-०५’ के अंकों में रचनाएँ प्रकाशित

५- द्वितीय कथा संकलन ‘नागफनी’ का, मार्च २०१० में, लोकार्पण सम्पन्न

६- ‘वनिता’ के अप्रैल २०१० के अंक में कहानी प्रकाशित

७- ‘मेरी सहेली’ के एक्स्ट्रा इशू, २०१० में कहानी ‘पराभव’ प्रकाशित

८- कहानी ‘पराभव’ के लिए सांत्वना पुरस्कार

९- २६-१-‘१२ को हिंदी साहित्य सम्मेलन ‘तेजपुर’ में लोकार्पित पत्रिका ‘उषा ज्योति’ में रचना प्रकाशित

१०- ‘ओपन बुक्स ऑनलाइन’ में सितम्बर माह(२०१२) की, सर्वश्रेष्ठ रचना का पुरस्कार

११- ‘मेरी सहेली’ पत्रिका के अक्टूबर(२०१२) एवं जनवरी (२०१३) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

१२- ‘दैनिक जागरण’ में, नियमित (जागरण जंक्शन वाले) ब्लॉगों का प्रकाशन

१३- ‘गृहशोभा’ के जून प्रथम(२०१३) अंक में कहानी प्रकाशित

१४- ‘वनिता’ के जून(२०१३) और दिसम्बर (२०१३) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

१५- ‘जागरण सखी’ के मार्च(२०१४) के अंक में कहानी प्रकाशित

पत्राचार का पता- टाइप ५, फ्लैट नं. -९, एन. पी. ओ. एल. क्वार्टस, ‘सागर रेजिडेंशियल काम्प्लेक्स, पोस्ट- त्रिक्काकरा, कोच्चि, केरल- ६८२०२१

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "विनीता शुक्ला की कहानी - डॉलफिनें"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.