विनीता शुक्ला की कहानी - डॉलफिनें

SHARE:

डॉलफिनें - विनीता शुक्ला उनकी डायरी के कवर- पेज पर लिखा था- “बी लाइक डॉल्फिन्स, व्हिच ऑलवेज स्माइल एंड बिगेट हैप्पीनेस; व्हिच स्टे अवे फ्...

डॉलफिनें
- विनीता शुक्ला
उनकी डायरी के कवर- पेज पर लिखा था- “बी लाइक डॉल्फिन्स, व्हिच ऑलवेज स्माइल एंड बिगेट हैप्पीनेस; व्हिच स्टे अवे फ्रॉम विकेड शार्क्स, टु मेन्टेन अ पॉजिटिव एटीट्यूड इन लाइफ” दार्शनिक अंदाज़ में उसे समझाते हुए वे कहतीं, “हमें डॉल्फिन्स की तरह बनना चाहिए, अलमस्त और जीवनी- ऊर्जा से भरपूर...शार्क सरीखे दुष्ट लोगों से एक फासला बनाकर चलना चाहिए; ताकि जीवन में सकारात्मक रुख बना रहे” इसके तुरत बाद उनका निंदा- पुराण चालू हो जाता. शार्क- सरीखे लोगों का जिक्र जो उनके जीवन में दखल देते थे; उनके परोपकारी पति का, गलत फायदा उठाने वाले लोग.

निंदा- रस में गोते खाते हुए, वे ठीक डॉलफिन जैसी दीखतीं- आँखें मिचमिचाकर दांत निपोरती हुई! अंतरा उनसे, यानि जयंती रंगनाथन से कब मिली, ठीक से याद नहीं; किन्तु जब भी मिली, दुनियादारी, पाक –कला और शॉपिंग आदि का ज्ञान फोकट में पाया. वो गप्पें दिलचस्प होतीं; लेकिन साथ होती, शिकायतों की पोटली! वे डॉलफिन बनकर, नकारात्मकता छोड़ने को कहतीं और दूसरी तरफ, पति को लेकर कुढ़ती रहतीं. उनके पति श्रीनिवास रंगनाथन- दोस्तों और परिचितों में, बेहद लोकप्रिय; सबके शुभचिंतक...सबके मददगार. श्रीनिवास की दिलदारी, उनकी पत्नी को रास न आती.

जयन्ती अक्का(दीदी) से सम्पर्क, चेन्नई आने के बाद हुआ. अन्तरा और उसके पति नील के लिए, तमिलभाषी दायरे में, पैठ बनाना आसान न था. अंजान शहर, अनजान लोग और उनकी अनजान बोली... अजब से रस्मों रिवाज, अजब से रंग ढंग. अजनबी चेहरों की भीड़ में, वे अलग- थलग महसूस करते. ज़िन्दगी रेंग सी रही थी, एकरसता की सुरंग में. वे अक्सर समुद्र किनारे, लहरें गिनते बैठते. उससे भी जी ऊबता तो मंदिरों के अद्भुत- भव्य विस्तार में, खो जाते; कला और संस्कृति के अवशेषों को इतिहासविद जैसा खंगालते; पौराणिक भित्तिचित्रों पर, अनाधिकृत रूप से उकेरे प्रेमियों के नाम; प्रेम- संदेशों व तीर से बिंधी हृदय- आकृतियों जैसे, बाजारू आग्रहों से खीजते हुए. मेले- ठेले और शहर की रौनक भी, उन्हें बहला न पाती.

यह अच्छा हुआ कि नील के कार्यालय में, एक वरिष्ठ अधिकारी वर्मा जी, उत्तर भारतीय थे. उनके घर से ही, सामाजिक परिधि में प्रवेश मिला. सुरेन्द्र वर्मा की पत्नी लतिका, बेहद आत्मीय महिला थीं. घरेलू कामकाज और खाना पकाने में निपुण. जल्द ही सुरेन्द्र जी, अपने पारिवारिक मित्र रंगनाथन जी के साथ, उनके यहाँ आ धमके. रंगनाथन जी कार्यालय की संयुक्त इकाई में थे. कार्यालय द्वारा प्रद्दत आवासीय सुविधा के तहत, सुरेन्द्र जी के पड़ोसी भी. यहीं से जयंती और लतिका की दोस्ती ने जन्म लिया. लतिका अपने संस्कारों के चलते, कुछ भीरु प्रवृत्ति की थीं; जबकि जयंती अंग्रेजी शिक्षा पाई हुई, आधुनिक महिला. लतिका के साधारण व्यक्तित्व पर, उनकी सहेली जयंती छा गयी.

लतिका को जयंती ने बिजनेस पार्टनर बना लिया. वे मिलकर सस्ते परिधान खरीदतीं, उनमें कुछ रद्दोबदल कर, फैशनेबल लुक देतीं. कारीगरों को निर्देश देकर, अपनी मनपसन्द डिजाइन का परिधान भी सिलवातीं. यहाँ लतिका का सिलाई का ज्ञान और जयंती की व्यवहारिक बुद्धि काम आई. उनका व्यापार खूब फला- फूला. और समय के इसी बिंदु पर, अंतरा की भेंट जयंती अक्का से हुई. वे लतिका भाभी के साथ उनके घर आयीं थीं. बड़े गर्व से, उन्होंने अपना परिचय, लतिका की बेस्ट फ्रेंड के रूप में दिया. वे दोनों साथ में, एक रचनात्मक गतिविधि को अंजाम दे रही थीं- इससे उनके पति भी प्रसन्न थे.

न जाने क्यों अंतरा को लगा कि जयंती की नीयत, लतिका को लेकर सही नहीं थी. एक तो वे उन पर आधिपत्य जमाने का प्रयास करतीं और दूसरे उनकी व्यक्तिगत बातों को, सरेआम उछालती फिरतीं. सुरेन्द्र वर्मा की रसिकता और दूषित वृत्तियों की, लतिका के सामने ही चर्चा... न जाने क्यों, लतिका चुपचाप सुनती रहतीं और प्रतिकार में कुछ न कह पातीं. उन्हें तो जयन्ती को, जोरों से लताड़ने की आवश्यकता थी किन्तु वे बस मुंह लटकाकर रह जातीं. शायद इसलिए, क्योंकि जीवन के नये अर्थ तलाशने में, उन्हें जयंती का साथ चाहिए था; या फिर इसलिए कि उन्होंने जयन्ती को वह भेद बता दिए थे, जो उन्हें नहीं बताने चाहिए थे.

कदाचित जयन्ती अक्का को दादागिरी करने में मज़ा आता था- खासकर पुरुषों को कटघरे में खडा करके. वे घोर स्त्रीवादी थीं. कई स्त्रीवादी संगठनो की सदस्य भी- वहीं से उन्हें अक्का का संबोधन मिला. वह अंतरा की माँ की उम्र की थीं फिर भी उसे, आंटी नहीं कहने देतीं...उन्हें अक्का(दीदी) कहकर ही बुलाना होता. ‘जगत- अक्का’ जो ठहरीं! विधवा, परित्यक्ता, जरूरतमंद स्त्रियों से अपने घर या दुकान का काम करवाकर, बदले में उनकी आर्थिक सहायता कर देतीं. उन सेविकाओं को भी वे, दोस्त ही कहतीं.

किन्तु अंतरा को, श्रीमती रंगनाथन की, इतनी उदारता हजम नहीं होती थी. वे महिलाएं उनकी दोस्त होने के नाते, डॉलफिन की श्रेणी में ही आतीं....सब उनकी ही तरह, छोटी और मिचमिची आँखों वाली! मानों डॉलफिन की प्रतिकृति!! तमिलों में तो, एक से एक नाम होते हैं- विशालाक्षी, मीनाक्षी, मयूराक्षी; बड़ी बड़ी आँखों वाली, सुन्दर स्त्रियाँ भी होती हैं. फिर इन नमूनों को ही, क्यों बटोर लायीं जयंती?! कॉलोनी की भद्र महिलाओं से, उनकी क्यों नहीं पटती? क्यों वे सब भी, इन्हें देखकर बिदक जाती हैं?? माँ कहती हैं कि छोटी आँखों वाली औरतें धूर्त होती हैं.

अक्का किसी अंग्रेजी जुमले से प्रेरित होकर, डॉलफिन और शार्क की तुलना करती रहती हैं. अंतरा प्राणी- विज्ञान की परास्नातक थी. डॉलफिनों के बारे में, उसे दूसरी ही जानकारी थी. डॉलफिनें मनुष्य के बाद सबसे बुद्धिमान प्राणी होती हैं; इसलिए कुटिल भी. मौका मिलते ही, वे नीचे से वार कर, शार्क का पेट फाड़ डालती हैं. शारीरिक तौर पर, वे शार्कों से उन्नीस बैठती हैं लेकिन दांव- पेंचों में, उनसे कहीं आगे. बच्चों के साथ तैर कर और दूसरी अदाओं से वे उनका मनोरंजन करती हैं. लेकिन जब मानव उनका गलत फायदा उठाता है तो वे हिंस्र हो जाती हैं. तैरने के लिए सीमित जगह मिलने और स्पीड- बोटों से बांधकर खींचे जाने पर, वे भडक उठती हैं और इंसान पर हमला कर, उसे चीर डालती हैं.

जयंती के भीतर भी, कुछ हिंसक भाव अवश्य थे. अंतरा की तीसरी इन्द्रिय उसे हमेशा चेताती. वह ऐसी ही स्त्रियों को, दोस्ती के लिए चुनतीं जिनका पति, परिवार और बच्चों से मोहभंग हो गया हो. हमेशा औरतों को, कुटुंब के ही खिलाफ, भड़काने का यत्न करतीं. ऐसा करते हुए, वे क्यों भूल जातीं – कि उनका अपना भी एक परिवार है?! क्या यह सब नारीवाद की खब्त थी या कुछ और गहरी बात??!!

उन्होंने उसके निजी मामले में भी नाक घुसेड़नी चाही. उसकी ससुराल में, जायदाद को लेकर पक्षपात हुआ. नील के भाइयों ने, संपत्ति का बड़ा हिस्सा हथिया लिया. इसे लेकर पति- पत्नी में, लम्बी बहस होती रही. जिसकी भनक पड़ोसियों को लग गयी और न जाने कैसे अक्का को भी! बस फिर क्या था, वे चालू हो गयीं- नील को लेकर. आलोचना के साथ साथ, कहती जा रहीं थीं, “ये सब मर्द ऐसे ही होते हैं, स्वार्थी और लम्पट...क्या हम इनके साथ सोने के लिए ही हैं?! हमारा भी कोई वजूद है या नहीं???”

जयंती की ऐसी बातें सुनकर, अंतरा सतर्क हो गयी. वह लतिका भाभी का हश्र देख चुकी थी. अब उनको खुद पर, हावी नहीं होने देना था; सो कठोरता से बोली, “इसके लिए आपको परेशान होने की जरूरत नहीं. यह हम पति- पत्नी का आपसी मामला है. सुलटा ही लेंगे. मेरे पति कोई बुरे आदमी नहीं... हां, कुछ सीधे जरूर हैं- इसी से...!” यह सुनते ही, उनका चेहरा लटक गया. इसके बाद कई दिनों तक, अंतरा से कटी- कटी रहीं. रंगनाथन अंकल के कारण, वे उससे एकदम पल्ला नहीं झाड़ पायीं; लेकिन उदासीनता को छुपा भी न पाईं.

अंकल अक्सर साथ मिल- बैठने का प्रोग्राम बना लेते; या कभी पिकनिक का ही. अंकल का स्नेही स्वभाव, अंतरा को बहुत भाता. वे उसे बेटी की तरह मान देते और गाढ़े वक्त में, सदा उनके काम आते. अंकल के साथ, ‘आंटी’ उर्फ़ अक्का को भी मन मारकर, उनका अभिभावक बनना पड़ता. वे उसे बेटी कहतीं. माँ की तरह, उसकी खातिर- तवज्जो भी करतीं; पर अन्तरा जानती थी कि ऐसा वे अंकल के दबाव में कर रही थीं. जो भी हो- ये उनका एहसान ही था. अक्का के अजब बर्ताव के बावजूद, नील इस परिवार से जुड़े रहना चाहते थे! कारण- अंकल व आंटी, दोनों ही, कामचलाऊ हिंदी जानते थे और फिर अंकल का अपनत्व...! उनकी एकमात्र संतान अस्वती भी मिलनसार थी.

समय बीता. अस्वती प्रेम- विवाह कर यू. एस. चली गयी. लतिका भाभी के पति का भी, तबादला हो गया. आंटी अकेली पड़ गयीं और कुछ पगला भी गयीं. एक दिन उन्होंने उससे, एक बहुत विचित्र बात कही, “ यू नो हमारे बगल में एक पत्रकार रहती है, अरे वो टेक्निकल- ऑफिसर की बीबी”

“हां, आपने बताया था- वह जो आपकी पॉपुलैरिटी से जलती है?”

“करेक्ट...! पता है क्या कह रही थी?” अन्तरा ने प्रश्नवाचक दृष्टि से उन्हें देखा. इस पर वे बोलीं, “कह रही थी कि लतिका के बाद, मुझे दूसरी व्यवस्था कर लेनी चाहिए.” अंतरा अब भी नहीं समझी तो उन्हें खोलकर कहना पड़ा, “शी थिंक्स देट, आई ऍम इन अ फूलिश लव विद हर- यू नो, लाइक फिल्म फायर”

“यू मस्ट हैव स्लैप्ड हर!!!” अन्तरा उत्तेजना में बोल पड़ी. “हाथ उठाना अच्छी आदत नहीं अन्तरा” आंटी ने फौरन बात बदल दी. लेकिन उन्हें लेकर, अंतरा के मन में, गाँठ तो पड़ ही गयी. नील से बताया तो वे बोले, “अरे नहीं अन्तरा...आंटी के बारे में ऐसा न कहो! वे लोग सज्जन हैं ...हमारे लोकल गार्जियन हैं!!” लेकिन फिर भी, मन की ग्रंथि, न घुल सकी. अंतरा को जब- तब लगता कि उन्हें लेकर, दूसरे अफसरों की बीबियाँ, कुछ खुसर- पुसर करती हैं. पति उनका पक्ष लेता तो और भी वितृष्णा होती. सुना था कि नील की पुरानी दोस्त और सहकर्मी इला भी, चेन्नई ऑफिस में शिफ्ट हो गयी है. अक्सर दोनों साथ ही दीखते. लोग उनके बारे में, क्या क्या बक रहे थे! जयंती अक्का भी, बात को कुरेद कर मजा लेतीं. ऐसे में जयन्ती और नील उसे, एक ही थैली के चट्टे- बट्टे, नजर आते.

एक दिन जब अक्का, अंकल से विवाद कर रही थीं, अंतरा ने गलती से, उनका पक्ष ले लिया. तब दुलार जताती हुई वे, उससे चिपक गयीं थीं. अंतरा को उनका स्पर्श, कुछ लिजलिजा सा लगा. वह छिटककर अलग हट गयी तो जयंती हतप्रभ रह गयी थीं. उन्होंने उसके सर पर हाथ फेरकर कहा, “तुम तो हमारी बेटी हो. तुम्हारी भोली बातें, हमें बहुत पसंद हैं” सुनकर अंतरा को एहसास हुआ कि वो उनके बारे में गलत सोच रही थी. धीरे धीरे वह, उनसे खुलने लगी. एक बार नील ने सबके सामने, उससे कुछ कड़वा बोल दिया. आंटी ने पीठ पीछे, नील को बहुत कोसा. अन्तरा भावुक होकर बोल उठी, “जाने दीजिये अक्का...ये भी क्या करें! इनके परिवार के संस्कार ही कुछ ऐसे हैं!!” जाने –अनजाने ससुराल के बारे में, कुछ उलटा- पुल्टा भी बोल गयी. वह कहाँ जानती थी कि ऐसा करके, उसने अक्का की घृणित सोच को, शह दे दी है!!

अक्का का चेहरा, जल्द ही उघड़ गया था...एक बार फिर हुई थी, फिल्म फायर की चर्चा ! किन्तु अब किरदार बदल गये. इस बार, कॉलोनी की महिला ने, उनका चरित्र हनन किया था- क्लब की भूतपूर्व तथा अधेड़ परिचारिका के साथ, उन्हें जोड़कर. यह ‘दिव्य संज्ञान’, उनके ही ‘श्रीमुख’ से मिला. इस बार नील, जयंती का समर्थन न कर सके और अंतरा ने भी, उनसे कन्नी काट ली. वे अनजान बनकर कई बार, पूछ चुकी थीं कि वह, उनसे खिंची खिंची क्यों रहती है. इस पर अन्तरा, कोई गोलमोल सा जवाब देकर खिसक लेती. लेकिन वे क्लब में दिखीं तो मजबूरन, ‘हाय- हलो’ करनी पड़ी. उनसे कटकर भाग ही रही थी कि वे जानकर, उसकी पीठ पर गिर पडीं. इस बार स्पर्श को पहचानने में, उससे भूल नहीं हुई.

अंतरा रात भर सोचती रही थी. डॉलफिनें जितनी बुद्धिमान होती हैं, उतनी ही क्रूर भी. नये दैहिक सम्बन्धों के लिए, अपने ही शिशुओं को मार डालती हैं. शार्क तो अपना पेट भरने के लिए, शिकार करती हैं पर डॉलफिनें, पोर्पोइस मछली के बच्चों को, मात्र मनोरंजन के लिए, घेर घेरकर मारती हैं. डॉलफिन एकमात्र पशु-प्रजाति है- जिसमें सामूहिक दुष्कर्म का प्रचलन है. जितनी प्रबल बुद्धि- उतने ही प्रबल विकार!!! जयन्ती जैसी औरतें, प्रकृति के सुंदर नियमों और शिवता के विरुद्ध, अपने मनोविकारों को पालती- पोसती हैं. किन्नर तो, दैहिक कुंठा से अवश होकर, ऐसा करते हैं पर एक भरी- पूरी स्त्री, भला ऐसा क्यों करती है???

इस जिज्ञासा का समाधान भी, शीघ्र ही मिल गया था. उनके बचपन की पड़ोसन रागम्मा, अंतरा के ‘किटी- समूह’ में शामिल हो गयीं थीं. रागम्मा की फुसफुसाहटों ने, जयंती का पर्दाफाश कर दिया. रागम्मा से मिले ज्ञान और अक्का से हुई बातों के आधार पर; अंतरा ने मानों, किसी जिगसॉ- पजल को सुलझा लिया था- पजल के टुकड़ों को यथास्थान जोड़कर. जयन्ती, एक उन्नीस वर्ष की किशोरी; जो बुरी तरह, विवाह को उत्सुक थी. विधवा माँ की आर्थिक दशा को देखते हुए, ब्याह का आसार न था. शरीर में उठ रहे, हारमोनों की तरंगें, उसे उद्वेलित करतीं.

समाज की वर्जनाओं ने, किसी लडके से मेल- मिलाप का अवसर नहीं दिया. सहजीवन का भी चलन नहीं था. जब कोई प्रेमी न मिला तो वह सहेली के साथ ही चली गयी- अर्धनारीश्वर की अवधारणा का मखौल उड़ाते हुए! विधुर रंगनाथन को, अपनी बेटी अस्वती की देखभाल के लिए, नई माँ चाहिए थी. उन्होंने सत्ताइस वर्षीया जयंती को अपना लिया. उसकी बूढ़ी मां, उन्हें दहेज़ में मिलीं. ब्याह के बाद जयंती परिस्थितियों में उलझकर रह गयीं...पहली बार में ही, गर्भपात हो गया और उनकी कोख, सदा के लिए बंजर हो गयी. दमित आकांक्षाओं ने, उन्हें फिर, पुराने दलदल में धकेल दिया.

रंगनाथन लोकलाज से बद्ध थे. पत्नी की लगाम, ठीक से कस नहीं पाते. इन बातों से उकताकर, अस्वती सदा के लिए, उनसे दूर चली गयी. हृदयाघात और पक्षाघात के बाद, अंकल का रहा सहा मनोबल भी जाता रहा. शरीर और पत्नी- दोनों पर से ही, उनका नियन्त्रण घट गया; जयंती के अलावा, किसी और का, आसरा भी तो नहीं था! ‘नेट’ पर वे, अपनी और पत्नी की युगल तस्वीरें डालकर, दुनियां को भ्रमित करते. पर सच्चाई, छुपाने से कहाँ छुपती है! एक बार लतिका भाभी का चेन्नई आना हुआ. उन्होंने दबे सुर में अन्तरा से पूछा, “ आजकल जयंती के यहाँ, जाती नहीं हो क्या” अंतरा भांप गयी कि वे क्या पूछना चाहती थीं. उसने उन्हें टालू सा उत्तर दिया. इस पर वे सशंकित हो उठीं. अंतरा ने पाया कि उनकी आंखे पहले डॉलफिन सी चमकीं, फिर शार्क जैसी रौद्र हुईं और अंततः बुझ सी गयीं- किसी ड्रैकुला के शिकार के जैसी!!!

---

 

विनीता शुक्ला

शिक्षा – बी. एस. सी., बी. एड. (कानपुर विश्वविद्यालय)

परास्नातक- फल संरक्षण एवं तकनीक (एफ. पी. सी. आई., लखनऊ)

अतिरिक्त योग्यता- कम्प्यूटर एप्लीकेशंस में ऑनर्स डिप्लोमा (एन. आई. आई. टी., लखनऊ)

कार्य अनुभव-

१- सेंट फ्रांसिस, अनपरा में कुछ वर्षों तक अध्यापन कार्य

२- आकाशवाणी कोच्चि के लिए अनुवाद कार्य

सम्प्रति- सदस्य, अभिव्यक्ति साहित्यिक संस्था, लखनऊ

सम्पर्क- फ़ोन नं. – (०४८४) २४२६०२४

मोबाइल- ०९४४६७८७०९२०

प्रकाशित रचनाएँ-

१- प्रथम कथा संग्रह’ अपने अपने मरुस्थल’( सन २००६) के लिए उ. प्र. हिंदी संस्थान के ‘पं. बद्री प्रसाद शिंगलू पुरस्कार’ से सम्मानित

२- ‘अभिव्यक्ति’ के कथा संकलनों ‘पत्तियों से छनती धूप’(सन २००४), ‘परिक्रमा’(सन २००७), ‘आरोह’(सन २००९) तथा प्रवाह(सन २०१०) में कहानियां प्रकाशित

३- लखनऊ से निकलने वाली पत्रिकाओं ‘नामान्तर’(अप्रैल २००५) एवं राष्ट्रधर्म (फरवरी २००७)में कहानियां प्रकाशित

४- झांसी से निकलने वाले दैनिक पत्र ‘राष्ट्रबोध’ के ‘०७-०१-०५’ तथा ‘०४-०४-०५’ के अंकों में रचनाएँ प्रकाशित

५- द्वितीय कथा संकलन ‘नागफनी’ का, मार्च २०१० में, लोकार्पण सम्पन्न

६- ‘वनिता’ के अप्रैल २०१० के अंक में कहानी प्रकाशित

७- ‘मेरी सहेली’ के एक्स्ट्रा इशू, २०१० में कहानी ‘पराभव’ प्रकाशित

८- कहानी ‘पराभव’ के लिए सांत्वना पुरस्कार

९- २६-१-‘१२ को हिंदी साहित्य सम्मेलन ‘तेजपुर’ में लोकार्पित पत्रिका ‘उषा ज्योति’ में रचना प्रकाशित

१०- ‘ओपन बुक्स ऑनलाइन’ में सितम्बर माह(२०१२) की, सर्वश्रेष्ठ रचना का पुरस्कार

११- ‘मेरी सहेली’ पत्रिका के अक्टूबर(२०१२) एवं जनवरी (२०१३) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

१२- ‘दैनिक जागरण’ में, नियमित (जागरण जंक्शन वाले) ब्लॉगों का प्रकाशन

१३- ‘गृहशोभा’ के जून प्रथम(२०१३) अंक में कहानी प्रकाशित

१४- ‘वनिता’ के जून(२०१३) और दिसम्बर (२०१३) अंकों में कहानियाँ प्रकाशित

१५- ‘जागरण सखी’ के मार्च(२०१४) के अंक में कहानी प्रकाशित

पत्राचार का पता- टाइप ५, फ्लैट नं. -९, एन. पी. ओ. एल. क्वार्टस, ‘सागर रेजिडेंशियल काम्प्लेक्स, पोस्ट- त्रिक्काकरा, कोच्चि, केरल- ६८२०२१

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आत्मकथा,1,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,4290,आलोक कुमार,3,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,374,ईबुक,231,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,269,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,113,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,3240,कहानी,2361,कहानी संग्रह,247,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: विनीता शुक्ला की कहानी - डॉलफिनें
विनीता शुक्ला की कहानी - डॉलफिनें
http://lh3.ggpht.com/-PzWJ0tqpD3Y/U8JT-7DZCXI/AAAAAAAAZgw/8bS-oExk2Tg/clip_image002_thumb%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800
http://lh3.ggpht.com/-PzWJ0tqpD3Y/U8JT-7DZCXI/AAAAAAAAZgw/8bS-oExk2Tg/s72-c/clip_image002_thumb%25255B2%25255D.jpg?imgmax=800
रचनाकार
https://www.rachanakar.org/2014/07/blog-post_3141.html
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/
https://www.rachanakar.org/2014/07/blog-post_3141.html
true
15182217
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content