शनिवार, 12 जुलाई 2014

रचना व्यास का आलेख - राम : जन के आदर्श

रामायण पर असंख्य ग्रन्थ व टीकाएँ लिखी गई है । उनमें वाल्मिकी व तुलसीदास के ग्रंथ सिरमौर है । वे जनमानस में भक्ति की संजीवनी सुंघाने का सामर्थ्य रखते हैं पर नरेंद्र कोहली का उपन्यास 'अभ्युदय' कर्मयोगी बनने का मार्ग प्रशस्त करता है । अभ्युदय वो अद्भुत कथा है जो राम के चरित्र को हर युग ,देश , काल व परिस्थिति में अनुकरण योग्य बनाती है । यदि राम को हम देवता ही मानते रहे तो वे जनमानस के आदर्श पुरुष कैसे बन सकते हैं ? यदि वे चमत्कारसम्पन्न थे तो रावण का वध वनवास अवधि के १४वें वर्ष में क्यों हुआ । क्यों न वे अपने चमत्कार के बल पर उसे पहले ही वर्ष में मर गिराते ।

अभ्युदय के नायक राम कहीं भी ऐसे चित्रित नहीं किये गये हैं कि वे दिव्यशक्तिसम्पन्न देवता है । न वे भमित करने वाले चमत्कार करते हैं । ऐसे महानायक भी नहीं जो बिना किसी योजना के , प्रबंधन के, संगठित सेना के , राक्षसों से भिड़कर एक घाव खाए बिना भी सर्वदा विजयश्री का वरण करे । इस उपन्यास में कहीं भी हनुमानजी को उड़ते हुए नहीं चित्रित किया गया । वानर जाति को पूँछ सहित नहीं दिखाया गया तो जटायु व सम्पाति को इंसान के स्वरूप में रखा गया है । ना ही ऐसा दिखाया गया कि मारीच स्वर्ण मृग का रूप धारण करके आया आया था ।

क्यों न राम को महामानव माना जावे। जन्म मानव रूप में लिया , राजकुल में शैशव व युवावस्था का आरम्भिक काल व्यतीत किया पर सर्वदा ज़मीन से जुडे रहे , मानवीय दुर्बलताएँ स्वयं पर हावी न होने दी । जनसेवा को लक्ष्य बनाकर , विलासिता के त्याग का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया ।

१४ वर्ष के वनवास में जिस क्षेत्र में भी निवास किया वहाँ के वंचित व शोषित वर्ग को समानता के स्तर पर लाकर उन्हें सम्मानपूर्ण जीवन जीने का मार्ग दिखाया । उनके हृदयो से भय को निकाल फेंका । उत्तम सामाजिक व्यवस्था की । राक्षसी अनाचार को नष्ट लिए सबको सैनिक बना दिया । व्यावहारिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सबको कृषि की , बुनाई की , अन्य कलाओं की शिक्षा दिलवाई । स्त्रियों , बच्चों तक को शस्त्राभ्यास करवाया गया ताकि वे आत्मरक्षा में समर्थ हो । आश्रमों के कुलपति व ब्रह्मचारी तक सक्रिय होकर सामाजिक कार्यकलापों में हिस्सा लेते चित्रित किये गए है । उनकी ऊर्जा वेदाध्ययन व ध्यान करने तक सीमित न रही । उनकी जड़ता नष्ट हुई व वे समाज के उपयोगी व आदरणीय अंग बने । सभी चरित्रों उचित महत्व दिया गया है \

अर्द्धांगिनी रूप में सीता पाठक की आँखो में सजीव हो उठती है । लक्ष्मण की निष्ठा व उग्रता के साथ न्याय हुआ । वहीं हनुमान द्वारा व्यक्तिगत जीवन की उपेक्षा करके सामाजिक व राजनीतिक कार्यों में प्राणपण से सहयोग तथा उनकी अन्य चारित्रिक विशेषताओं का जीवंत चित्रण किया गया है ।

उपन्यास लेखक को मनोविज्ञान की गहरी समझ है तभी वे जटिल पात्रों के साथ भी न्याय कर पाये चाहे वह कैकेयी का अहंकार हो या ऋषि विश्वामित्र की परदुःखकातरता या इंद्र द्वारा प्रताड़ित होने पर भी ऋषि गौतम द्वारा सहा गया अपनी पत्नी का सामाजिक बहिष्कार । समस्त पात्रो का चरित्र चित्रण मनोवैज्ञानिक आधार पर किया गया है ।

उनके मध्य के संवाद लेखक के गहन अध्ययन के साक्षी है । सभी पात्र तर्क -वितर्क करते दिखाये गए हैं । उनके हृदय में विकट परिस्थिति में संदेह ,भरम , अविश्वास पनपा है । स्वयं राम के हृदय में सुग्रीव के प्रति दो बार संदेह पनपा था। अंगद सुग्रीव के प्रति और दशरथ कैकेयी के प्रति सदा शंकित रहे । इसी स्पष्ट चित्रण के फलस्वरूप हम इन चरित्रों को आस -पास महसूस करते हैं ।

दैवीय पात्रों का ज़मीनी स्तर पर चित्रण अत्यंत ख़ूबसूरती से किया गया है विशेषतः भगवती दुर्गा व इंद्र का संवाद । इन सब घटनाओं का जस्टिफिकेशन अति सरल ढंग से करके भ्रांतियों का निवारण किया गया है । लोक प्रचलित है कि ऋषि अगस्त्य ने समुद्र को पी लिया । अभ्युदय में चित्रित है कि अशिमद्वीप के कालकेयों ने अपने जलपोत द्वारा आकर समुद्रतट के वानरों के ग्रामों में लूटपाट की । वानर जाति द्वारा जलपोत व नौका की निर्माण कला कल्पना से परे थी । पुरोहित ने उन्हें स्वार्थवश बरगलाया था कि नौका से समुद्र देवता रुष्ट हो जायेंगे । ऋषि अगस्त्य ने गुपचुप नौका विज्ञान का विकास किया और कालकेयों का समुद्र मार्ग से पीछा करके उन्हें दण्डित किया । सागर संतरण करते देख ग्रामवासी अनायास बोल उठे कि ऋषि ने समुद्र को पी लिया है ।

अपने बचपन से मैं सुनती , पढ़ती आई कि निर्दोष होने पर भी अहल्या चरित्रभ्रष्टा होने के दोष में ऋषि गौतम के शापवश पत्थर की शिला बन गई थी । श्रीराम के पादस्पर्श से वह पुनः नारी रूप हो गई । अभ्युदय के लेखक ने इस घटना का मर्म समझा और यह चित्रित किया कि अहल्या समाज बहिष्कृत होकर २५ वर्षों तक अपने आश्रम में एकाकी रही । उन्होंने किसी इंसान का मुख तक नहीं देखा । उदरपूर्ति के लिए आश्रम की भूमि पर स्वयं फल , सब्जी व अन्न उपजाती । गौ -पालन करके दुग्ध प्राप्त करती और करघे से बुनकर स्वयं का वस्त्र तैयार करती । यदि २५ वर्ष तक किसी स्त्री ने ऐसा बहिष्कार सहन किया हो तो वह जीवन शिलावत जीवन ही तो है ।

सीता ने अशोकवाटिका में एक वर्ष भयंकर त्रासदीपूर्ण बिताया । यही उनकी अग्निपरीक्षा थी । किसी छद्म अग्निपरीक्षा में जननायक राम का अविश्वास था ।

यह उपन्यास भाषा -शैली व सुगठन की कसौटी पर पूर्णतया खरा उतरता है । भाषा न क्लिष्ट है , न ही साधारण । राम का संघर्ष , किष्किंधा का घटनाचक्र , रावण के विलास का वर्णन तो क्रम से चलता ही है ; समानान्तर रूप से अगस्त्य कथा भी पाठकों को सहज ही जुड़ी हुई लगती है। समस्त घटनाएं सुसंगठित रूप में बद्ध है अतः पाठक का रोमांच बना रहता है । लेखक का रचना-शिल्प प्रशंसनीय है । मेरे व्यक्तिगत मत में उपन्यास में एक बिंदु आलोचनीय है - सीता द्वारा चित्रकूट में भोजन के लिए कृष्णमृग का मांस भूना जाना । वास्तविकता को तर्क से परे रखकर यदि लेखक शाकाहार का सन्देश देते तो अत्युत्तम होता ।

सिद्धाश्रम से प्रारम्भ होकर क्रमशः भरद्वाज आश्रम, चित्रकूट , दंडक वन , पंचवटी , मतंग वन से होती हुई लंका तक संपन्न हुई । अयोध्या से उन्होंने एक सैनिक भी नहीं लिया ।

उन्होंने जन-सामान्य में जागृति लाकर , उन्हीं को प्रबुद्ध बनाकर , उस पीड़ित , त्रस्त ,शोषित व अपमानित जनता के बीच से सेना तैयार की । प्रत्येक अच्छा जननायक कुशलता से नेतृत्व कर सकता है पर जनसामान्य का भी चैतन्य होना आवश्यक है । राम ने वनवास को अभुदय सहर्ष स्वीकार किया । इसे मानवीय कर्तव्य निभाने का श्रेष्ठतम अवसर माना । ऐसी ही दृष्टि समाज का नवनिर्माण कर सकती है ।

mail id - rachnavyas7@gmail.com

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