बुधवार, 6 अगस्त 2014

राजीव आनंद का आलेख - नवारूण दा : जादुई यथार्थ के चितेरे नहीं रहे

                   नवारूण दा : जादुई यथार्थ के चितेरे नहीं रहे
    भारतीय बंगाली लेखक एवं कवि नवारूण भट्टाचार्य का निधन 66 वर्ष की उम्र में 31 जुलाई को कोलकाता सीटी अस्पताल में हो गया. नवारूण दा की मौत पर हिन्दी पट्टी के लेखकों की बेरूखी दिल को कचोटती है पर लम्हों का भंवर चीर कर जो इंसान बना हो और एहसान की तरह वक्त के सीने में गड़ा हो, उससे बेरूखी दिखा कर भी क्या फर्क पड़ता है, वो तो रहेगा लोगों के दिलों में.


    जीते जी किवदंती बन जाने वाले नवारूण दा ने अपने साहित्य में क्रांतिकारी एवं रेडीकल विचारधारा का सौन्दर्यशास्त्र विकसित किया था. रूसी साहित्य में जो स्थान स्थापना-विरोधी लेखक मिखायल बल्गाकोव का है वही भारतीय साहित्य में नवारूण भट्टाचार्य का है.


    फिल्म और नाटक कलाकार बीजोन भट्टाचार्य तथा प्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी के पुत्र नवारूण दा को साहित्यिक परम्परा बिरासत में मिली और अपनी माँ महाश्वेता देवी की तरह उनके ह्दय में भी सर्वहारा वर्ग के लिए कोमल कोना मौजूद रहा जिसे खाद-पानी उनके नजदीकी रिश्तेदार प्रसिद्ध फिल्म निर्माता ऋतिविक घटक के ससंर्ग से मिलता रहा था. नवारूण दा ने साहित्य को जनता की आत्मा को जगाने का हथियार माना. उनका साहित्य जनता के सांस्कृतिक संघर्ष की गाथा है जिसमें उन्होंने अवरोध पैदा करने वाले किसी को नही बख्शा, चाहे वह सरकार हो या कि नफासत पंसद आधुनिकता, लेखकों का बिचौलियापन हो या अति क्रांतिकारी लफ्फाजी. गुमनाम अंधेरी गलियों, झोपड़पट्टियों और फूटपाथों में रहने वाले गरीब, वंचितों पर नवारूण दा ने जम कर लिखा और उनकी चिंगारी उगलती कलम अक्सराह सरकार से उलझती रही फिर भी वे भयरहित गरीबों की आवाज बन कर उभरे और ताउम्र गरीबों की आवाज बने रहे. जब-जब गरीब, वंचितों द्वारा अपनी छोटी-छोटी मांगों के लिए जुलूस पर सरकारी एंजेसियों ने हल्लाबोला नवारूण दा ने तलवार की तरह अपनी कलम उठा ली.


    नवारूण दा का साहित्य एक प्रतिबद्ध साहित्य है जो समाज की जड़ता को तोड़ता है। उनका साहित्य समाज के उन तबकों के लिए रचा गया जिन्हें आजादी के बाद भी सही मायने में आजादी ;भूख, गरीबी, शोषणद्ध नहीं मिली और जिन्हें हशिए पर धकेल दिया गया. अभिजात साहित्य, चाहे वो किसी भी भाषा का हो, के चौहदी में जिन्हें घुसने नहीं दिया गया, उसे नवारूण दा ने अपने साहित्य में न सिर्फ जगह दी बल्कि उन्हीं को केन्द्रीत कर अपना साहित्य रचा. उनका साहित्य संवेदानात्मक विस्फोट से लबालब भरा है जिसमें गरीबों, वंचितों के रिसते और खदबदाते मानस की अभिव्यक्ति हुई है. उन्होंने होशोहवास में खामोश रहने वालों और बेहोशी की हालात में दौड़ पड़ने वाले कीड़े-मकौड़े की तरह अंधी गलियों और फूटपाथों में जी रहे लोगों पर अपनी बेधड़क कलम चलाया इसलिए उन्होंने लिखा 'अमार कोनो भोय नाई तो' ?


    नवारूण दा का मानना था कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शोषकों की भरीपूरी जमात खड़ी है जो गरीबो, वंचितों से कटी है पर संगठित है और इसी जमात के खिलाफ उन्होंने पूरे रोष और व्यंग्य के साथ लिखा. 1997 में नवारूण दा को उनकी प्रसिद्ध उपन्यास 'हर्बट' के लिए साहित्य अकादमी अवार्ड प्रदान किया गया जिसे कई आलोचकों ने 'अराजक कृति' की संज्ञा दी थी. 'हर्बट' उपन्यास पर बंगाल के प्रसिद्ध फिल्म निर्माता सुमन मुखोपाघ्याय ने इसी नाम से फिल्म का निर्माण किया था जो काफी चर्चित रही और सराही भी गयी थी. वर्ष 2003 में उन्होंने 'कंगाल मालसात' नामक उपन्यास लिखा जिसकी 13000 प्रतियाँ बिकी थी तथा नवारूण दा ने समकालीन बंगला साहित्य में अभूतपूर्व सफलता हासिल किया था. इस उपन्यास पर वर्ष 2012 में इसी नाम से फिल्म बनायी गयी थी जो उनकी पहली फिल्म 'हर्बट' की तरह ही चर्चित रही और लोगों ने इसे काफी सराहा था. उक्त उपन्यासों के अतिरिक्त उन्होंने 'फयातरू बोम्बाचक' नाम से कहानियों का एक सीरिज विकसित किया था जिसमें जादुई यथार्थ का चित्रण नवारूण दा ने बखूबी किया है.


    जादुई यथार्थ को अपने साहित्यिक कृतियों में प्रयोग के लिए जाने जाने वाले विश्व प्रसिद्ध लातिन अमेरिकी लेखक एवं पत्रकार गेबिएल गार्सिया मार्केज के बाद जादुई यथार्थ का सफलता पूर्वक अपने साहित्यिक कृतियों में अगर बृहतर रूप में किसी ने प्रयोग किया तो वे थे नवारूण भट्टाचार्य, जिन्होंने 'लबधक', हलालझंड़ा ओ ओनयानएो' महाजानेर आइना, रातेर सर्कस, एक टुकड़ों नायलोनर दोरी, अमार कोनो भोय नाई तो ?, अंगक्षिक चंद्रग्रहण, म्यूचल मैन, अंधो बेरल, माउसोलिएम आदि में जादुई यथार्थ का ऐसा वृतांत रचा है जो किसी भी मायने में स्वर्गीय मार्केज के जादुई यथार्थ से कम नहीं.


    नवारूण दा को समाज की जड़ता को तोड़ता एक प्रतिबद्ध साहित्य रचने का श्रेय अवश्य दिया जाना चाहिए जिसके वे हकदार हैं. उनकी स्मृति गरीबों, वंचितों के दिलों में अमर रहेगी.उनकी स्मृति को नमन.

 

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राजीव आनंद
प्रोफेसर कॉलोनी, न्यू बरगंड़ा
गिरिडीह-815301 झारखंड़

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