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यशवंत कोठारी का व्यंग्य - बुक बवाल

यशवंत कोठारी

एक भूतपूर्व मंत्री ने बुक बम फोड़ा। पहले बुक वार्म होते थे, अब बुक से बवाल और बम फोड़ने की कला का विकास हो रहा है. पहले हर छपे हुए शब्द की अहमियत होती थी उसे पत्थर की लकीर समझा जाता था , मगर अब स्थिति ये है कि हर किताब एक नया बखेड़ा खड़ा करने के लिए लिखी जाती है।

पूरी पुस्तक कल्पना और झूठ के सहारे लिखी जाती है और राजनितिक कारणों से प्रकाशित की जाती है। मुझे बुक बवाल के इस नाजुक समय में कुछ मुहावरे याद आ रहे हैं , जिस थाली में खाओ उसी में छेद करो. जिस डाल पर बैठो उसी को काटो. सत्ता की आस्तीन में सांप बन कर बैठ जाओ और मौका मिलते ही विष वामन कर दो.

साहित्य कला, की पुस्तको के अपने मायने होते हैं, और एक अच्छी पुस्तक का स्वर्ग में भी आदर होता है. , लेकिन अपने व्यक्तिगत क्षुद्र स्वार्थों के लिए किताब लिखना , छपवाना और एक बवाल -हंगामा खड़ा करना तो उचित नहीं है।

सब जानते हैं कागज बनाने के लिए कितने पेड़ों की बलि देनी पड़ती हज़ारों पेड़ों की हत्या के बाद एक कागज की किताब अस्तित्व में आती है. और एक तूफ़ान उठा कर चुप हो जाती है।

प्रकाशक तीन सौ प्रतियां छापता है। सौ प्रतियां लेखक -संपादकों को हंगामा खड़ा करने के लिए देता है, और कीचड़ में पत्थर फेंकने का राष्ट्रीय कार्यक्रम संपन्न हो जाता है . टीवी चैनलों पर तथा कथित बुद्धिजीवी बिना किताब पढ़े-देखे बहस करके भरी चेक लेकर घर चले जाते हैं।

एक प्रश्न ये भी है कि जब कोई कमजोर होता है तभी बिलो दी बेल्ट हिट क्यों किया जाता है. किताबी युद्ध जल्दी खत्म हो जाते हैं. सामने वाला भी किताब लिख सकता है, वैसे किताब का शालीन जवाब किताब ही है।

राजनीति के अखाड़े में किताब एक नया दांव है, मगर आत्म कथा रूपी किताब कभी कभी अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है. किताब में अपने मुंह मिया मिट्ठू बनने से कुछ नहीं होता क्योंकि लेखन की निष्ठाएँ बदलती रहती है. विचार कही खो जाते हैं. पारिवारिक स्वार्थ हावी हो जाते हैं.

इस देश का गजोधर, घीसू, रामदीन , जापक लाल सब किताब लिख सकते हैं. और पैंसठ साल का इतिहास सबको बता सकते हैं मगर इन बेचारों को कोई प्रकाशक घास नहीं डालता है. यदि डाले तो प्रजातंत्र की सबसे सच्ची और प्रामाणिक किताब बनेगी और सभी किताबों के ऊपर जाकर बैठेगी यह किताब सबके जेहन में रहेगी.

भूतपूर्व नौकरशाह हों या भूतपूर्व मंत्री या कोई और, देश के आम आदमी के लिए किताब लिखे, अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए नहीं तो ही कलम और देश का भला होगा.

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यशवंत कोठारी 86 . लक्ष्मी नगर ब्रह्मपुरी

जयपुर-302002

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