शशांक मिश्र भारती की परिचर्चा - हिन्दी बालसाहित्य में पत्र-पत्रिकाओं व पुस्तकों के प्रति घटता रूझान ?

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परिचर्चाः-

हिन्दी बालसाहित्य में पत्र-पत्रिकाओं व पुस्तकों के प्रति घटता रूझान ?

शशांक मिश्र ''भारती''

आजकल के आडियो-वीडियो और प्रौद्योगिकी के युग में यह ज्वलन्त प्रश्न है कि हिन्दी बालसाहित्य की पत्र-पत्रिकायें एवं बाल पुस्तकें क्यों नहीं पढ़ी जा रही हैं ? इसके पीछे पत्र-पत्रिकाओं में समय के साथ बदलाव, प्रकाशन स्थिति, उनका मूल्य व पाठकों तक पहुंच व प्रसार-प्रचार आदि वो कारण हैं जिनसे आज बाल साहित्य की दशा-दिशा प्रभावित हो रही है। परिणामतः कुछ का वर्चस्व बढ़ रहा है कुछ हतोत्साहित और कुछ लोलुप-बढी-बढ़ी बातें करने वाले तथाकथित प्रकाशकों के मकड़जाल में फंस हानि उठा रहे हैं।

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आजकल की शिक्षा पद्धति उसमें बालपत्रिकाओं की नगण्य भूमिका,अपेक्षित पुस्तकों का विद्यालयी पुस्तकालयों में उपलब्ध न होना,रमसा के अनुदान से पुस्तकों की बच्चों की आवश्यकता के अनुसार न खरीदकर प्रकाशकों की जोड़-तोड़ व कमीशन की मात्रा से क्रय किया जाना यही नहीं उपलब्ध होने वाली पत्रिकाओं-पुस्तकों का अलमारियों में बन्द रहना-दीमकों द्वारा ही पढ़ना। मोटी-मोटी व अधिक मूल्य की छपना ,अभिभावकों के द्वारा रूचि न लेना,अनावश्यक व्यय की अधिकता, पुस्तकों-पत्रिकाओं हेतु पैसा न निकलना। दूसरे जानकारी का अभाव और आवश्यकतानुसार मिल न पाना आदि कारण हैं। जिनसे बालसाहित्य प्रभावित हो रहा है। छपने की मात्रा के अनुसार उसकी पहुंच नहीं है। वहीं कुछ पैसे के दम पर रातों-रात बालसाहित्यकार या उसके प्रकाशक बन हित कम अहित अधिक करते हैं। कई बार अच्छा बाल साहित्य सृजन के बाद प्रसारित नहीं हो पाता। छपकर भी कई कारणों से सामने नहीं आता।

एक बार लग रहा था कि सरकारों की पुस्तक खरीद योजनाओं में बालसाहित्य खरीदने उसको प्रकाशित कर प्रचारित कर कम दरों पर बिक्री करने की नीति सफल होगी ,पर वह भी अत्यल्प रही। राज्य सरकारों की ओर से विशेष प्रयास पुस्तक मेले, लेखकमिलन अवसर उपलब्ध कराये जाते। अच्छा परिणाम निकलता। प्रकाशकों को भी अपने दायरे को बढ़ाकर रचनाकर्म के आधार पर प्रकाशन का निर्णय करने की पहल करनी चाहिए। सौ-पचास कापी छापकर देने या छपाने की परम्परा बन्द हो। साथ ही पेपर बैक में कम पृष्ठों और कम मूल्य की पुस्तकें छापने की परम्परा प्रारम्भ हो। जिसका प्रचार-प्रसार, विज्ञापन, समीक्षा-चर्चा के बाद अभिभावकों और उनके बच्चों को खरीदने में कोई असुविधा नहीं होगी। साथ ही सामग्री चयन वर्तमान परिवेश-आवश्यकतानुसार हो, जो पाठक को अपनी ओर उसी प्रकार खींचेगा, जैसाकि लोहा चुम्बक की ओर खिंचता है। पुस्तक का कलेवर बालअभिरूचि को ध्यान में रख आकर्षक बनाया जाये। विषय वस्तु अनुसार आधुनिकता में ढाल चित्र-रेखाचित्र हों।

प्रसार-प्रचार व पहुंच का सबसे सशक्त माध्यम दैनिक समाचार पत्र-पत्रिकायें हैं। यदि इनमें नियमित रुप से बालसाहित्य छपे उस पर चर्चा हो। बालोपयोगी पुस्तकों की जानकारी कहां उपलब्ध हैं सहित दी जाये। बालचरित्र निर्माण कार्यशाला विद्यालयों के पुस्तकालयों में लोकप्रिय पत्रिकायें-पुस्तकें पाठकों की अभिरूचि आधारित क्रय कर उपलब्ध करायी जायें। उनकों खरीदने का निर्णय, सफल-असफल होने का निर्णय भी बालपाठकों पर छोड़ा जाये। सरकारी खरीद में पुस्तक चयन का अधिकार बच्चों को मिले। कमीशन खोर चयन माफियाओं से मुक्त कर इसको ईमानदारी से करने और मिशन सा मानने वाले निर्णय करें। तो परिणाम अच्छा निःसन्देह सुखद होगा।

बाल साहित्य के संवर्धन विकास में लगे संगठन-संस्थायें विद्यालयों में साप्ताहिक चर्चायें-बाल कविसम्मेलन,प्रतियोगितायें, आदि कर छात्र-छात्राओं की रूचि बाल साहित्य व उसकी पुस्तकों-पत्रिकाओं की ओर मोड़ सकते हैं। इसके अलावा विविध मांगलिक अवसरों पर बाल साहित्य को भेट में देने की परम्परा पड़े। जिससे न केवल सम्बन्धित प्रभावित होंगे। अपितु उनका परिवार और मित्र-बान्धव भी कुछ-कुछ प्रभावित होंगे। देखा-देखी अन्य लोग भी ऐसा कर इस परम्परा को बल प्रदान कर सकते हैं।

कुल मिलाकर सभी को अपने स्तर से प्रयास कर बाल साहित्य की ओर बाल पाठकों को मोड़ना होगा। उनके मशीनी बनते जा रहे जीवन, टी.वी.,कम्प्यूटर और क्रिकेट की भागमभाग की जिन्दगी से बाल पत्र-पत्रिकाओं के लिए समय व धन निकलवाना होगा। उनके नाम से खरीदी जाने वाली पुस्तकों-पत्र-पत्रिकाओं को बन्द अलमारी से बाहर ला उन तक लाना पड़ेगा।

 

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दुबौला-रामेश्वर-262529पिथौरागढ़-उअखण्ड,

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