शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

दामोदर लाल जांगिड़ का व्यंग्य - कथा कलमुंही कुर्सी की

image

मैं कुर्सी पर ही बैठे बैठे कुर्सी के लिए ही हिन्‍दी शब्‍द ढूंढने में लगा था मगर मुझे पूरे हिन्‍दी शब्‍द कोष में कुर्सी शब्‍द कहीं भी नज़र नहीं आया तो इस कुर्सी के बारे में कुछ और ज्‍यादा जानने की तलब हुई। मैं उर्दु लुगात खोलने ही जा रहा था कि यकायक मेरे हिन्‍दी के विद्वान मित्र डा0 अमुक लाल जी उपनामी आ गये। मुझे मालूम तो था कि इनके पास किसी भी विषय पर कोई भी बात छेड़ना कितना जोखिमी होता है मगर मेरी विवशता थी मुझे कुर्सी शब्‍द के बारे में जानना था तो मैंने यह रिस्‍क ले ली और बाद दुआ सलाम के बिना वक्‍त जाया किये पूछ लिया कि डाक्‍टर साहेब ये कुर्सी शब्‍द किस भाषा का है एक बार तो डाक्‍टर साहब भी थोडा शशोपंज में पड़ गये,मगर तत्‍काल ही बोले कि आप कहीं जिस पर मैं आसीन हूँ इस परिष्‍कृत लोहे की खोखली छड़ों से निर्मित पीठ टिका कर बैठने वाले चौपायी वस्‍तु के बारे में तो नहीं पूछ रहे हैं। अगर इसी के बारे में पूछ रहे हैं तो यह शब्‍द अपनी मातृ भाषा हिन्‍दी का शब्‍द न हो कर अवश्‍य किसी विजातीय भाषा का ही कोई शब्‍द होगा। अपनी मातृ भाषा हिन्‍दी के प्रत्‍येक शब्‍द के निर्माण में धातु होती है मगर आपके इस कुर्सी शब्‍द में कोई धातु कहीं दृष्‍टिगोचर ही नहीं होती अतः ये शब्‍द हिन्‍दी भाषा का नहीं हो सकता। अरे हां अगर इस कुर्सी शब्‍द की अगर शल्‍य क्र्रिया की जाय और इसे कुरसी पढ़ा जाय यानि कु + रसी जिसका अर्थ होता है बुरा रस देने वाली, आसव मदिरा आदि और कुर्सी का नशा तो सारे मादक द्रव्‍यों से कहीं ज्‍यादा होता है। अतः मुझे थोड़ा संशय है कि ये कुर्सी शब्‍द अगर हिंन्‍दी भाषा का है तो कुरसी शब्‍द का ही कोई अपभ्रंश कुर्सी पर बैठे बैठे ही मैंने हिन्‍दी शब्‍द कोष खोला और उसमें कुर्सी शब्‍द तलाशने होगा।

इस कुर्सी की तरफ हर किसी को ही यूं ललचाता देख कर तो कभी कभी शक भी होता है कि हो न हो ये कुर्सी शब्‍द विदेशी आंग्‍ल भाषा के चे‘अर शब्‍द का ही हिंदी अनुवाद होगा। क्‍यों कि हम आज तक विदेशियों और विदेशी वस्‍तुओं को देशी की बनिस्‍पत कुछ ज्‍यादा ही तरजीह देते आये है और इसी के क्रम में ये कुर्सी भी हमारे जीवन का एक हिस्‍सा सी बन गयी है। इस कुर्सी की कहानी भी बेबी चे‘अर से शुरू होती है और व्‍हील चे‘अर तक इंसान का पीछा नहीं छोड़ती। इस कुर्सी के लिए होती इस मारामारी को देख कर तो लगता है कि इस कुर्सी का आविष्‍कार जिसने भी किया होगा वो जरूर बडा़ ही जालिम किस्‍म का आदमी रहा होगा। सरकारी दफातिरों कुर्सिर्यों की तो ही बात अलग है अगर आपने कभी गौर किया हो तो देखा होगा कि बाराती जब घराती के घर जाते हैं तो सबसे पहले वहां रखी कुर्सियों पर ही नज़र दौड़ाते हैं और यदि उनके अनुमान के मुताबिक बारातियों की तादाद से कुर्सियों की संख्‍या अगर थोड़ी सी भी कम नज़र आये तो बाराती एक दूसरे को ही अपना प्रतिद्वन्‍द्वी समझ कर किस तरह कुर्सियों पर टूट पड़ते है और झट से कब्‍जा कर लेते हैं और दुल्‍हे के बापू,मामा,मौसा,चाचा,जीजा व अन्‍य खास वगैरह को तो बिलकुल बेमन से शादी की तमाम रश्‍मो रिवाज खत्‍म होने तक मजबूरन जमीन बीछी दरी पर ही बैठना पड़ता है।

अब कुर्सी चाहे किसी भी भाषा का शब्‍द होगा इससे हमारे क्‍या फर्क पड़ता है क्‍योंकि आज दिन तो कुर्सी आम फहम और हर दिल अज़ीज़ है,हर कोई इसके लिये दीवानगी की हालत में बेतहाशा दौड़ रहा है। वैसे हम कुर्सिर्यों को तीन श्रेणियों में बांट कर ही ठीक से समझ सकते हैं। पहली श्रेणी में हम खानदानी कुर्सियों को ही ले लेते हैं जो सिर्फ किसी खानदान विशेष के वारिशों के लिऐ रिजर्व होती हैं। इन पर बैठने के लिये उस खानदान के वारिशों को कोई खास मसक्‍कत नहीं करनी पड़ती, और इसके लिये कोई खास काबिलियत की भी जरूरत हो ऐसा भी नहीं, इस पर काबिज होने के लिए बस किसी का उस खानदान विशेष में पैदा होना ही काफी होता है। इन खानदानी कुर्सिर्यों को हासिल करना तो दूर की बात इनके वारिशों के अलावा इनकी तरफ किसी को झांकने तक की जुर्रत नहीं करनी चाहिये।

दूसरी श्रेणी में आती है सरकारी कुर्सियां जिनको पाने के लिऐ थोड़ी बहुत पढ़ाई और उचित रिश्‍वत हो तो आसानी के मिल जाती हैं। मगर ये खानदानी और सरकारी कुर्सियां कोई ज्‍यादा नाच नहीं नचवाती हैं नाच तो नचवाती तीसरी श्रेणी की केवल पांच साल के लिये ही हाथ आने वाली राजनीतिज्ञों वाली कुर्सियां और ये किसी से क्‍या क्‍या नाच नचवा सकती हैं यह तो आपने कुछ तो चुनाव घोषित होने के बाद से देख ही रहे होंगे बाकी जब कभी सरकार बनने का वक्‍त आये तब देख लेना।

दामोदर लाल जांगिड

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------