सोमवार, 22 सितंबर 2014

श्याम गुप्त का आलेख - भारत राष्ट्र के दुर्बल होने का कारण

जन्मेजय का नाग-यज्ञ भारत राष्ट्र के दुर्बल होने का कारण था ....

प्रायः पाश्चात्य विद्वानों एवं कुछ देशी विद्वान् जो पाश्चात्य चश्मे से ही सब कुछ देखने के आदी हैं द्वारा यह कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के कारण भारत राष्ट्र कमजोर हुआ एवं विदेशी आक्रान्ताओं को देश पर आक्रमण करने का मौक़ा मिला | यह एक प्रकार से महाभारत के महानायक श्रीकृष्ण पर लांक्षन के रूप में भी दोहराया जाता है | जो लोहिया जैसे समाजवादियों के कथन से प्रकट होता है ....

“----लेकिन त्रिकालदर्शी क्यों न देख पाया कि इन विदेशी आक्रमणों के पहले ही देशी मगधधुरी बदला चुकाएगी और सैंकड़ों वर्ष तक भारत पर अपना प्रभुत्व कायम करेगी और आक्रमण के समय तक कृष्ण की भूमि के नजदीक यानि कन्नौज और उज्जैन तक खिसक चुकी होगी, किन्तु अशक्त अवस्था में ।“

वस्तुतः यह सत्य नहीं है | श्रीकृष्ण के काल में देश अस्थिरता से जूझ रहा था| विदेशी शासक ..यवन, म्लेक्ष, शक, हूण आदि ..सुदूर पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्रों पर आधिपत्य जमाये हुए थे एवं भारत आतंरिक भागों में भी दखल रखते थे .... यथा कालयवन जिसे श्रीकृष्ण ने चतुराई से परास्त किया | समस्त भारत विभिन्न जनपदों में बंटा हुआ था जो अपनी अपनी शक्ति, मद व अहंकार में चूर थे व एक दूसरे से युद्धरत रहते थे| स्त्रियों, दासों, गरीबों व सामान्य जनों की दशा अत्यंत शोचनीय थी, जो युधिष्ठिर के द्यूत-क्रीडा एवं द्रौपदी प्रकरण से दृष्टिगत होती है, अधर्म का बोलबाला था | श्रीकृष्ण इस आसन्न खतरे को भांप गए थे | उन्होंने देख लिया कि उत्तर पश्चिम में आगे चल कर यवनों, म्लेक्षों, यूनानियों, हूणों, पठानों, मुगलों आदि के आक्रमण होंगे इसलिए भारतीय एकता की धुरी का केन्द्र कहीं वहीं रचना चाहिए जो इन आक्रमणों का सशक्त मुकाबला कर कर सके । और उन्होंने किया भी भारत के केंद्र में पश्चिमी सीमान्त के समीप सशक्त कुरु धुरी का निर्माण करके |

उस समय देश में शक्ति की दो धुरियाँ थीं ...

एक मगध धुरी जो मगध से मथुरा तक फ़ैली हुई थी| भारतीय जागरण का बाहुल्य उस समय उत्तर और पश्चिम में था एवं खतरा भी उत्तर-पश्चिम सीमान्त से था जो राजगिरि और पटना की सशक्त मगध धुरी से बहुत दूर पड़ जाता था, मगध– धुरी कुछ पुरानी पड़ चुकी थी, शक्तिशाली थी किन्तु उसका फैलाव संकुचित था । बीच में शिशुपाल आदि मगध के आश्रित मित्र थे ।

दूसरी विरोधी इन्द्रप्रस्थ-हस्तिनापुर की कुरु धुरी थी ...कुरु – धुरी नयी व सशक्त थी साथ में शक्ति संपन्न यादवों की मित्र एवं उत्तर-पश्चिमी सीमान्त के समीप थी | अतः श्रीकृष्ण ने पूर्व में मणिपुर से ले कर पश्चिम में द्वारका तक को इस कुरु – धुरी में समावेश किया और उसकी आधार शिला थी कुरु पांचाल संधि | उन्हें सारे देश को बाँधना जो था । महाभारत युद्ध में अधर्मी पीढी का विनाश हुआ परन्तु उन सभी की दूसरी पीढी के योद्धा शासक बने | युधिष्ठिर का धर्म का एकक्षत्र सुशासन लगभग २६ पीढ़ियों तक चला निरापद रूप से |

वस्तुतः जन्मेजय का नागयज्ञ एक एतिहासिक, राजनैतिक व कूटनैतिक भूल थी जिसके कारण भारत राष्ट्र कमजोर हुआ | इसीलिये इस काल से कलयुग का आगमन कहा जाता है | कश्यप ऋषि की संतान नाग जाति हिमालय पार की एक भीषण योद्धा, दुर्धर्ष व लड़ाकू जाति थी जो महाजलप्लावन एवं हिमालय उत्पत्ति के साथ मूलतः हिमालय श्रेणी के पर्वतीय क्षेत्रों में बस गयी एवं धीरे धीरे जल उतरने के साथ समस्त भारत में | सूर्य व चन्द्र वंशियों की भाँति नागवंश भी भारत का मूल शासक वंश बना जिसने भारत व श्रीलंका एवं सुदूर देशों में भी में अपने साम्राज्य स्थापित किये| मानवों एवं नागों में आपसी सम्बन्ध अच्छे रहते थे जो शेषनाग-विष्णु, शिव-वासुकी , मेघनाद की पत्नी शेष-पुत्री सुलोचना, अर्जुन की पत्नी नागकन्या उलूपी, विष प्रकरण में भीम को बचाने व पालने वाले तथा शक्तिवान बनाने वाले यमुना किनारे के क्षेत्र वाले आर्यक नाग आदि तमाम दृष्टांतों से ज्ञात होता है | मथुरा में यमुना से कालिय नाग को ....इन्द्रप्रस्थ की स्थापना के समय खांडव वन से तक्षक नाग कुल को विस्थापित होना पडा, परन्तु अर्जुन या पांडवों या श्रीकृष्ण ने कभी उनका तिरस्कार या विरोध नहीं किया | परन्तु तक्षक नाग ने दुर्योधन की कुटिल नीतिमें आकर अर्जुन का वध करने की चाल को कृष्ण ने असफल कर दिया परन्तु उसे कोइ दंड नहीं दिया | अर्थात कृष्ण, पांडव व युधिष्ठिर काल में उन्होंने नागों के साथ वनांचल की अन्य जातियों व मनुष्यों में सहभाव बनाए रखा क्योंकि वे जानते थे कि देश की रक्षा हेतु उनकी शक्ति व सम्मिलित शक्ति की कितनी महत्त है |

परन्तु राम के अनुज भरत जी के पुत्र तक्ष द्वारा स्थापित तक्षशिला में स्थित तक्षक नाग द्वारा पुराने द्वेष वश अभिमन्यु पुत्र कुरु सम्राट परीक्षत को डंसने पर (युद्ध में छल से ह्त्या करने ) क्रोधवश उसके पुत्र जन्मेजय ने समस्त भारत से नागों का सफाया कर दिया और एक सशक्त, भीषण योद्धा एवं मानव की सहचर जाति का विनाश हुआ जिनके साथ ही वनांचल की अन्य योद्धा बर्बर जातियों का भी विनाश हुआ | देश में वनांचल निवासी, नागों व कुरु वंशियों एवं अन्य वंशों में सत्ता के लिए युद्ध प्रारम्भ होगये| | सता केंद्र तक्षशिला से मगध के बीच बार बार बदलता रहा | देश कमजोर होता चला गया |

             इसी काल में ( लगभग २००० ईपू ) सरस्वती नदी के लुप्त होने एवं जल-प्लावन से क्षेत्र का अधिकाँश भाग विनाश को प्राप्त हुआ,( शायद द्वारिका आदि इसी काल में समुद्र में समा गयीं, कुरु सामराज्य को इन्द्रप्रस्थ छोड़कर कौशाम्बी को राजधानी बनाना पडा, कच्छ आदि मरूभूमि का निर्माण हुआ ) तमाम ऋषियों –मुनियों के हिमालय पर चले जाने के कारण वैदिक सभ्यता व संस्कृति के विनाश होने पर ब्राह्मण भी भ्रष्ट होने लगे, विद्या लुप्त होने लगी, चहुँ ओर अज्ञान का अन्धकार छाने लगा |

यही सिकंदर के आक्रमण का काल है ( १००० ईपू – जिसे योरोपीय विद्वान् ४०० ईपू मानते हैं) | उस समय सीमान्त के नाग शासक वेसीलियस या टेक्सीलियस ने सिकंदर का स्वागत किया था जिसका पुत्र आम्भी सिकंदर का मित्र बना जिसने पोरस पर चढ़ाई के लिए सिकंदर को उकसाया था |

यद्यपि भारतीय शक्ति एवं विभिन्न परिस्थितियों वश सिकंदर को पंजाब से ही लौट जाना पडा परन्तु इस आक्रमण के साथ ही भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमान्त के विदेशी शासकों, यवन, हूण, म्लेक्ष, आदि को भारत की आतंरिक दशा व अशक्त-स्थिति का ज्ञान होगया एवं आक्रमणों का सिलसिला प्रारम्भ होगया,जो मौर्य व गुप्त वंश के शसक्त शासकों के प्रतिरोध के कारण कुछ सदियों तक पुनः रुका रहा परन्तु गुप्त वंश के पतन के पश्चात विभिन्न विदेशी आक्रमणकारियों के आने व उनके शासन का सिलसिला चलने लगा |

            ---- डा श्याम गुप्त , के-३४८, आशियाना, लखनऊ

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