मंगलवार, 28 अक्तूबर 2014

देवी नागरागी का आलेख - सागर अपने आप में एक परिचय

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सागर अपने आप में एक परिचय

“हर एक लफ़्ज़ से कानों में शहद घोल गया

ये कौन है जो उर्दू ज़बान में बोल गया”

अल्फ़ाज़ जब भी मौन को मुखरित करते हैं तब खामोशियां भी उन्हें सुनने को बेताब हो उठती हैं। ऐसे ही तासीर लिए हर दिल अज़ीज़ शायर सागर त्रिपाठी की रचनाएँ उनका असली परिचय है और उनकी आवाज़ की बुलंदी एक गूंज बनकर ध्वनित होती है--

ग़ज़ल अगर बेलौस मदमाती लहर है तो मैं,

साकित थमा हुआ ‘सागर’ खूब निभती है दोनों की।

सागर से मेरी पहली मुलाक़ात 2007 में श्री आर. पी. शर्मा ‘महरिष’ जी के निवास स्थान पर हुई। बहुत जल्द ही उनकी अपनाइयत ने उन्हें मेरा अनुज बना दिया। और यह कहने में अतिशयोक्ति न होगी कि सागर की विनम्रता में उसकी शालीनता है, और यही उसका परिचय भी।

एक रवायत जिससे सागर बखूबी वाक़िफ़ है वह है शायरी के लिए उनकी बेइंतेहा मुहब्बत। इस क़दर डूबकर लिखने वाले शायर के लिए क़लम भी कह उठती है.....

जो लफ़्ज़ों को सच की सियाही से लिख दे

क़लम से भी होती है ऐसी इबादत ! –स्वयं रचित

साहित्य के विस्तार में अंग्रेज़ी में पढ़ी ये पंक्तियाँ मुझे याद आतीन हैं , जिसका भावार्थ यही है- ‘कवि को हर तरह की फ़िलासफ़ी पढ़नी चाहिए, पर कविता लिखते समय सबको भुला देना चाहिए।‘ और होना भी ऐसा ही कुछ चाहिए, जानी मानी कहावत है-जहां न पहुंचे रवि, वहीं पहुंचे कवि। कविता ही एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा कवि दुनिया को अपनी ही तरह देखता है, समझता है और जो कुछ वह अपने आस-पास घटता हुआ देखता है, उसे अपने जिये हुए पलों के साथ जोड़ते हुए भावनात्मक बिम्ब खींचता है, जिसमें सम्मान रूप से वह रसों की अनुभूति ज़ाहिर करता है-

क्षृंगार, हास्य, करुण, वीभत्स, वीर, अद्भुत

त्यों रौद्र, फिर भयानक है नवम शांत रस

कविता मात्र शब्द भर नहीं, रस पान भी है।

सागर जी की रचनात्मक शैली व शब्दों में रस का आभास स्पष्ट महसूस किया जाता है। इस बानगी में उनकी विशालता देखें-

मैं केवल आँसू की बूंदें

तुम अधरों की मृद मुस्कान!

जीवन के सफ़र में पग-पग क़दम आगे बढ़ाते हुए अहसासों को महसूस करते हुए कवि मन हँसता है, खिलखिलाता है, गाता है, रुदन, करुणा, दया, क्रोध सभी रसों की अनुभूतियों के दौर से गुज़रता है, उन्हें भोगता है। अपने जिये हुए अहसासों को अनुभूति से अभिव्यक्त में ज़ाहिर करने के लिए सोच को शब्दों के लिबास में प्रस्तुत करने में पहल करता है। जहां तक रस्म निभाने की बात आती है सागर जी लफ्जों के साथ-साथ सफ़र करते हैं, पीछे नहीं हटते।

काव्यानुभव में ढलने के लिये रचनाकार को जीवन पथ पर उम्र के मौसमों से गुज़रना होता है और जो अनुभव हासिल होते है उनकी सागर जी के पास कोई कमी नहीं है. जिंदगी की हर राह पर जो देखा, जाना, पहचाना, महसूस किया और फिर परख कर उनको शब्दों के जाल में बुन कर प्रस्तुत किया, उस का अंदाज़ अनोखा देखिये इस शेर में-

जज़्बए इश्क़ के उनवान बादल जाते हैं

हंस तो देता हूँ मगर अश्क भी ढल जाते हैं

कभी गर्दिशों में हूँ कभी तीरगी का मकान हूँ

कहीं बादलों का हमसफर कहीं पंछियों की उड़ान हूँ

ग़ज़ल सिन्फ़ अदब का आईना है जिसमें सामाजिक सरोकारों को भी संदर्भ में लेते हुए, ग़ज़ल के एक शेर में विविध विषयों पर सफलता पूरक रूप से ढाला जाता है। प्रकाश पंडित जी कहते हैं- ".....इसमें कोई संदेह नहीं कि एक काव्य रूप के लिहाज़ से ग़ज़ल सीमित भावनाओं की वाहक है। और यह इतनी मथी जा चुकी है कि अब इस में अधिक मंथन की बहुत ही कम गुंजाइश रह गई है।लेकिन जो लोग इस प्रकार की गुंजाइश निकाल सकते हैं उन्हें अपने विचारों को ग़ज़ल का पहनावा पहनाने का पूरा अधिकार है ..." और यह ग़लत भी नहीं है’ यह क्षमता सागर जी की लेखनी दर्शाती है--

मेरे होंठों पे अपने लफ़्ज़ रख कर

हक़ीक़त खुद बताना चाहता है

घूमता हूँ आइनों के शहर में

खुद को देखे एक मुद्दत हो गई

सागर त्रिपाठी का नाम समकालीन रचनाकारों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है और उनके रचनात्मक विस्तार में ग़ज़ल, गीत, दोहे, मुक्तक, रुबाई आदि समोहित हैं। उन्हीं धड़कते हुए शब्दों में पाई जाती है राष्ट्रीय एकता, वतन की मुहब्बत व समाज में हो रही विसंगतियों की आवाज़ ! कुल मिलाकर पदध्य की सूक्ष्म संवेदनाओं के कवि व शायर सागर त्रिपाठी ने अपना दायित्व निभाते हुए अँधेरों को मिटाने की बेलौस कोशिश की है।

रोशनी जब मुल्क की सरहद पर कम होने लगे

तब लहू से लौ चरागों की जलानी चाहिए

मैं समुंन्दर की हदों को पार कर जाऊँ मगर

बस किनारे पर ज़रा लौ झिलमिलानी चाहिये

कभी ग़ज़लों, कभी दोहों के माध्यम से सामाजिक, संस्कृतिक व राजनीतिक विकृतियों, व मज़हब के बहरूपियों पर अपनी कलम से करारी चोट करते है

तेरे मेरे ज्ञान का सागर एक समान

मैं जिसको गीता कहूँ, तू कहता क़ुरआन

रामायण, गुरुग्रंथ हो बाईबल या क़ुरआन

दया, धर्म, करुणा, कृपा, सब में एक समान

कहीं -कहीं शब्दों का सहारा लेकर उस शब्द की ओर भी इशारा कर रहे हैं जो इस रचना का आधार है, इस शरीर में प्राण फूंकता है, जो अग्नि बनकर देह में ऊर्जा प्रवाहित करता है. कविता रुपी देह के गर्भ से इस प्रकाश का जन्म होना एक अनुभूति है, जहाँ शब्द, शब्द न रहकर एक ध्वनि बन जाएं और शरीर के माध्यम में आत्मा सा मंडराता रहे. बहुत मुबारक सोच है जो लक्ष को ध्येय मान कर शब्दों की उज्वलता को कविता में उज्गार कर रही है.

सागर जी की नवनीतम कृति ‘शब्दबेध’ क पन्ना दर पन्ना पलटते इस बात से वाकिफ हुए बिना रह पाना मुश्किल है, कि मौन का शब्द विलय, विलय शब्द लय, शब्द का मौन ही मृत्यु है। आंतरिक अभिव्यक्ति के लिए शब्द की ज़रूरत नहीं।

ज़ेहन बसा हिन्दू धरम, दिल में है इस्लाम

धड़कन में रहमान है, मन में बसते राम

इन दोहों की रचनात्मक ऊर्जा में एक-एक दोहे को एक विषय बनाकर लिखने वाले शायर सागर त्रिपाठी, सागर को गागर में समाहित करने का हुनर बखूबी जानते है। उन्होंने जो देखा, जिया, भोगा वही विषय वस्तु बनाकर करीने से दोहे के निर्माण को सुसज्जित किया है।  

आधुनिक जीवन शैली और संपन्नता समाज को एक खास तबके के लिए परम व चरम उपलब्धि है, लेकिन मध्य वर्ग की राह में मजबूरी, लाचारी और विसंगतियों की एक लम्बी श्रंखला चुनौती बनकर सामने आती है, जहां सामान्य व्यक्ति की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जूझने की, विवशताओं और विसंगतियों के ताने-बने बुनकर, सोच को शब्दों का आकार देकर मानवीय संवेदना के अनेक रूपों को मुखरित करते हैं।

अनगिनत हैं सवाल आँखों में

मौन हर बात का जवाब मगर –देवी

इस शेर में अब भी उनके सवाल जवाब तलब रहे हैं....

प्रश्न चिन्ह से हो गए अन्तरंग सम्बंध

दिशाहीन संग्राम भी कब तक लड़े ‘कंबन्ध’

शब्द दर शब्द कड़ी जुड़ती जा रही है। 2008 में प्रकाशित उनकी एक अनुपम कृति “कबन्ध´मिला तो पठनीयता पुस्तक के आगामी पन्नों पर डॉ॰ अनिल मिश्रा की कही बात पर आकर रुकी जहां वे लिखते है- ‘कबन्ध फुटकर रचनाओं के एक अप्रतिम रंगीन वीथिका है। विभिन्न वर्णों, सुगंधों एवं रूपराशियों का कालजयी गुलदस्ता है।

मैं केवल आँसू की बूंदें

तुम अधरों की मृदु मुस्कान

प्रयोगिक संक्षिप्त बहर की ग़ज़लों की तहत---

नर निर्बल है/ काल सबल है,,

झूठ खुलेगा/ अगर मगर से

कविता कम शब्दों में आज के यथार्थ की ओर संकेत कर रही है। सागर जी की रचनाएं प्रशांत नदी की समतल भूमि में बहती धाराओं की तरह है, जहाँ उनकी शब्दावली लहर की मानिंद मन के साहिल से टकराकर आती और जाती है।

कुल मिलाकर सागर त्रिपाठी का व्यक्तित्व बहुआयामी है, उनके व्यक्तित्व की सरलता, निश्छलता, विनम्रता एवं खारापन इनके समूरे साहित्य में व्यापक है।

तुमने हिम्मत अगर हारी है तो साहिल पे रहो

हम को तूफान में ‘सागर’ का मज़ा लेना है

सागर जी की दरियादिल्ली से और भी बहुत सारी उम्मीदें दामन फैलाए खड़ी है –

तू ही सागर है, तू ही किनारा

ढूँढता है तू किसका सहारा

बेपनाह शुभकामनाओं के साथ

 

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देवी नागरानी

पता: ९-डी॰ कॉर्नर व्यू सोसाइटी, १५/ ३३ रोड, बांद्रा , मुंबई ४०००५०

15 अगस्त, 2014

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