नाका - विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका. 

विविध विधाओं में से चुनकर पढ़ें -

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---

यहाँ की विशाल ऑनलाइन लाइब्रेरी में मनपसंद रचनाकार अथवा रचनाएँ खोज कर पढ़ें -

 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com  रचनाकार के वाट्सएप्प नंबर 8989162192 (कृपया कॉल नहीं करें, कॉल रिसीव नहीं होगी, तथा इसका उपयोग केवल प्रकाशनार्थ रचना भेजने के लिए ही करें) पर भी वाट्सएप्प से रचनाएँ अथवा रचना पाठ के वीडियो प्रकाशनार्थ भेजे जा सकते हैं. अधिक जानकारी के लिए यह पृष्ठ [लिंक] देखें.

--

सप्ताह की लघुकथाएं

ऑसू

-विश्वम्भर पाण्डेय 'व्यग्र'

जब से विधायक जी ,मंत्री बने, तब से उनकी व्यस्थता और अधिक बढ़ गई थी ।उनका अधिकांश समय समारोहों, संगोष्ठियों, सान्त्वना एवं पुरस्कार कार्यक्रमों में ही बीतने लगा था ।कुछ दिन बाद अपनी बेटी का विवाह-समारोह होने के कारण मंत्री जी ने कुछ दिनों के लिये अपनी सार्वजनिक व्यस्थताओं को विराम लगा दिया था

। आज सुबह बेटी ,अपने पापा को अखबार दिखाते हुये बोली-पापा देखो, आप अखबार में कितने अच्छे मुस्करा रहे हो, घर पर तो मैंने आपको ऐसे मुस्कुराते कभी नहीं देखा । साथ ही इसी अखबार में दूसरे चित्र में कितने ग़मगीन दिखाई दे रहे हो ,इतने ग़मगीन तो आप, दादाजी गुजरे तब भी दिखाई नहीं दिए। बेटी की बात सुनकर मंत्री जी बोले- बेटी, हम नेता, नेता कम, अभिनेता अधिक होते हैं ।पिता की बात सुन बेटी मुस्कुरा गई

अगले दिन दुल्हन की विदाई की वेला पर सभी परिवार- जन एवं उपस्थित रिस्तेदार ,बेटी को ससुराल के लिये विदा कर रहे थे । बेटी आधुनिक विचारों की पढ़ी-लिखी लड़की थी वो हँस-हँस कर सभी से विदा हो रही थी । एक तरफ मंत्रीजी आँखें भर कर खड़े हुए थे । बेटी ,पापा के पास जाकर ,गले मिलते हुए कान में बोली -पापा , ये आपकी आँखों के आँसू ,नेता के हैं या अभिनेता के ये बात सुनकर मंत्रीजी बोले- नहीं बेटी नहीं, ये आँसू ना नेता के ना अभिनेता के हैं बल्कि ये आँसू एक बेटी के बाप के हैं ...

            

गंगापुर सिटी, स. मा.(राज.)322201

----.

 

वासत्य

देवेन्द्र सुथार,बागरा,जालौर। 

एक जंगल मेँ एक मृदंगकार रोज मृदंग बजाता था। जब वह मृदंग बजाता तब वहाँ
एक बकरी बच्चा मेमना आकर बैठ जाता। एक दिन मृदंगकार ने पूछा-रे! तु
रोज-रोज आ जाता है। क्या मेरी ताल अच्छी या फिर मेरी लय अच्छी है जो तू
दौडा-दौडा आ जाता है। तब मेमने ने कहा-मैँ यह तो नहीँ जानता कि आपकी लय
क्या है। आपकी ताल क्या है। लेकिन जो आपके मृदंग पर चमडा लगा वह मेरी मां
का है और जब इस पर थाप पडती है तो मैँ बस दौडा-दौडा आ जाता हूँ।

devendrasuthar196@gmail.com

4 टिप्पणियाँ

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.