सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

शशिकांत सिंह ‘शशि’ का व्यंग्य - चिंतक जी की चिंता

चिंतक जी की चिंता

व्‍यंग्‍य

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चिंतक जी दुःखी हैं। देश भाड़ की ओर प्रस्‍थान कर रहा है। सरकार एकदम निकम्‍मी हो गई है। नेता देश को लूट रहे हैं। भ्रष्‍टाचार अपने चरम पर है। अपराध को रोकने वाला कोई नहीं है। अर्थव्‍यवस्‍था इतनी खराब हो गई है कि मत पूछिये। विदेशी पूंजी देश में इतनी आ रही है कि एक दिन फिर से हम गुलाम हो जायेंगे। चायना केवल हमारे सीमाओं पर ही कब्‍जा करने के फिराक में नहीं है। वह हमारी अर्थव्‍यवस्‍था को भी पंगू कर देगा। पकिस्‍तान एक न एक दिन कश्‍मीर पर कब्‍जा कर ही लेगा जब चाहे हमारे सीमाओं पर गोलीबारी करता ही रहता है। अमेरिका के तो हम पिछलग्‍गू हो ही गये हैं। प्रधानमंत्री अमेरिका गये तो उन्‍हें ओर करारा जवाब देना चाहिए था। अनौपचारिक सभाओं से उन्‍हें बचना चाहिए। देश की प्रतिष्‍ठा को आंच पहुंचती है।

देश की प्रतिष्‍ठा का ख्‍याल जब खिलाड़ियों को नहीं रहा तो किसे रहेगा साहब। मैच तक फिक्‍स रहते है। धोनी कोई कप्‍तान है। विदेशों में हारता ही रहता है। कप्‍तान ऐसा होना चाहिए जिसकी टीम कभी नहीं हारे। देश का राष्‍ट्रीय खेल है हाकी लेकिन बढ़ावा दिया जाता है क्रिकेट को। यह देश नहीं बचेगा। हाकी को भी खेल प्राधिकरण खा गया। जनाब जब खेल प्राधिकरणों पर नेताओं का कब्‍जा हो जाये तो खेल को कौन बचायेगा ? खेल खिलाड़ियों के पास रहना चाहिए। एक बैडमिंटन की खिलाड़ी थी। अच्‍छा खासा नाम था। ....हां सानिया मिर्जा। उसने पकिस्‍तानी खिलाड़ी से शादी कर ली। देश की इज्‍जत तो जायेगी ही। इज्‍जत का क्‍या है जब अपराध को रोकने वाला कोई नहीं हो तो कोई किसी की इज्‍जत से खेल सकता है। अपराधी बेखौफ घूम रहे हैं। नहीं ........मुझे तो नहीं मिले लेकिन घूम रहे हैं। पुलिस हाथ पर हाथ रखकर बैठी है। तोंदू पुलिस वालों से भला अपराध रुकेगा। विदेशों मे देखिये पुलिस वाले एकदम फिट होते हैं। क्‍या मजाल कि कमर से बेल्‍ट खिसक जाये। नहीं .......मैं विदेश तो कभी नहीं गया लेकिन ऐसा कहा जाता है। हमारी पुलिस तो अपराधियों के साथ हाथ मिला लेती है। हां ........ये सही है कि जेलों में जो इतने अपराधी हैं। इतने मुकदमें चल रहे है। सब इन्‍हीं पुलिस वालों की बदौलत है। फिर भी अपराध एकदम से खत्‍म होना चाहिए। वह दिन कितने सुख के होंगे जब एक भी अपराध नहीं होगा। रामराज्‍य जितना जल्‍दी हो भारत में आ जाना चाहिए।

रामराज्‍य भी साहब आयेगा कैसे ? जिनके कंधों पर देश का भविष्‍य है। वे लोग इने लापरवाह हैं। उनके अंदर देशभक्‍ति का जज्‍बा ही नहीं है। दिनभर मस्‍ती , डांस , ड्रामा। क्‍या होगा इस देश का। हमारा समय था। दिन भर किताबों में सिर दिये रहते थे। यहां तो आधी रात तक डांस और डीनर होगा। मां-बाप तक की कोई फिक्र नहीं। औरों की तो बात ही छोड़ दीजिये। एक किस्‍म से देखा जाये तो नौजवान भटक गये हैं। उनको सही रास्‍ता दिखाने वाला कोई नहीं है। सबसे बुरी हालत है शिक्षा की। शिक्षा ऐसी है जिसे जिंदगी से कोई लेना-देना नहीं है। बच्‍चों को तोता बनाने वाली शिक्षा है। शिक्षक इतने लापरवाह हैं कि बस पुछिये मत। उनको केवल अपने वेतन से मतलब है। समय पर कोई स्‍कूल नहीं जाता। जाता है तो क्‍लास में जाने से कोई मतलब नहीं। क्‍लास में चले भी गये तो इधर-उधर की बातें अधिक होंगी। काम की कम। इस देश का तो भगवान ही मालिक हैं। स्‍कूल को मंदिर होना चाहिए। शिक्षकों को देवता। तभी बच्‍चे उनकी पूजा करेंगे न। शिक्षकों पर अंकुश लगाने का काम सौंपा गया। पंचायतों को तो उनको केवल अपने हिस्‍से से मतलब है। पंचायतों में ऐसे लोग चुनकर आ रहे हैं जिनका काम धनार्जन है। समाज सेवा कहीं से नहीं है। दिन-रात लूट-खसोट में लगे हैं। विद्यालय और विद्या पर ध्‍यान कौन देगा ? सरपंच को प्रेमचंद जी ने परमेश्‍वर माना था। ये तो तिकड़म से आये लेाग हैं। जनता को भी चाहिए कि सही आदमी को चुनकर भेजे तो भेजेंगे नहीं। भेजेंगे भी कैेसे साहब। जनता जो खुद धर्म और जाति के खाने में बंटी हुई है। अच्‍छे आदमी कहां से चुनकर भेजेगी। भाई-भतीजावाद तो सबसे ज्‍यादा आम आदमी में ही है। अपने रिश्‍तेदारों को वोट देंगे। अपने जाति वालों को वोट देंगे। कहां से देश सुधरेगा। यह देश रसातल में जायेगा ही जायेगा। जनता को राजनीतिक शिक्षा मिलना जरूरी है। राजनीतिक शिक्षा तो तभी मिलेगी जब साक्षरता दर बढ़े। निरक्षर लोग नेताओं के कहने से वोट डालते है। भेढ़चाल है। प्रजातंत्र तो है नहीं। इस देश का तो भगवान ही मालिक है। जनता को भी शिक्षा देने के लिए राजनीतिक दलों को तो खुद ही लोकतंत्र को समझना होगा।

दलों के अंदर ही लोकतंत्र नहीं है। देश में कहा से होगा ? सारे दलों में वंशवाद है। गांधी परिवार में तो है ही। सभी दलों में है। मुलायम के पुत्र अखिलेश ही समाजवादी पार्टी की कमान संभालेंगे। लालू जी तो वंशवाद के सुंदर स्‍तंभ हैं। बादल परिवार पंजाब में हो या पवार परिवार महाराष्‍ट्र में सब यही कर रहे है। करुणानिधि पुत्री के लिए परेशान हैं तो रामविलास पुत्र के लिए। वंशवाद की बेल हर जगह लहलहा रही है। दलबदलना तो पहले से कम हा गया। कारण कानून नहीं है। दलों की अधिकता है। दूसरे दल में जाने की बजाये दल बनाना आसान हो गया। यह देश नहीं बचेगा। इन दलों की करतूतों को उजागर करना जरूरी है। उजागर करेगा कौन ? देश की मीडिया केवल अपने टी आर पी के लिए मरी जा रही है। पहले कहा जाता था कि मीडिया एक मिशन है। अब केवल कमीशन रह गया है। पेड न्‍युज होने लगे है। मीडिया के घराने भी होते हैं जिनके राजनीतिज्ञों के साथ गलबहियां होती हैं। आज इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया की जो हालत है। बहुत पहले से ये बीमारी प्रिंट मीडिया में है। कॉलम राइटर अपने आका को ,खुश करने के लिए लिखते हैं।आका खुश हो गये तो कोई न कोई राजनीतिक पद मिल जायेगा। नहीं मिला तो विज्ञापन तो पक्‍का है ही। विज्ञापनों की तो मूल कमाई है। विज्ञापन करना और लोगों को गुमराह करना। गंजों के सिर पर बाल के विज्ञापन। काली लड़की दूध की तरह सफेद हो जायेगी। लंगड़े ओलंम्‍पिक दौड़ने लगेंगे। जमाना कहां जा रहा है। पता नहीं। बाजार जो चाहे करा ले। सबसे अधिक मूर्ख बनती हैं महिलायें। महिलाओं को तो पता नहीं अक्‍ल से काम लेना ही नहीं आता। हजार-हजार रुपये की क्रीम चेहरे पर मल लेती हैं। औरतों को ही संस्‍कृति का वाहक माना जाता है। मां ही पहली गुरू होती थी। यह देश अब रसातल में जाकर ही मानेगा।

दोष भी किसको दें। बुद्धिजीवी वर्ग ही सुविधाभोगी हो गया है। वह अपने खोल से बाहर आना ही नहीं चाहता। एक महान क्रांति की जरूरत है। यह देश तब तक सुमार्ग पर नहीं आयेगा जब तक देश के बुद्धिजीवी अपने अपने गुट से बाहर निकल कर देश के लिए सोचंगे । जलेस,, प्रलेस, क्‍लेष। जसम , असम खसम यानी कि हद हो गई। सरकार सापेक्ष बुद्धिजीवियों का एक वर्ग अलग है। भगवान इस देश को बचाओ ं। भगवान भी क्‍या बचायेगा। संत-महात्‍मा काशी में बैठकर लोगों को लड़ा रहे हैं।

चिंतक जी की चिंता जब खतरे का निशान पार करने लगी तो हमने पूछा-

-' सर , आप ही कुछ क्‍यों नहीं करते ?'

-' हम .........हम क्‍या करें ? हमें तो चिंतन से ही फुर्सत नहीं मिलती। यह देश रसातल में जाकर रहेगा।'

 

शशिकांत सिंह 'शशि'

जवाहर नवोदय विद्यालय

शंकरनगर,नांदेड़ 7387311701

skantsingh28@gmail.com

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