बुधवार, 12 नवंबर 2014

अशोक गौतम का व्‍यंग्‍य - रोजर ऊर्फ कोठी वाला कुत्‍ता

अपने मुहल्‍ले में कोठी वालों को छोड़ सारे मुहल्‍ले वाले शाम होते ही एक दूसरे के घर शान से पूरे रौब के साथ प्‍याज का गट्‌ठा, नमक की कलछी, सलाद के लिए हरी मिर्च तो कोई तड़के के लिए टमाटर लेने निकल पड़ता है। शायद हमारे मुहल्‍ले में प्‍यार भी तभी है। जिस दिन हम एक दूसरे पर प्‍याज, टमाटर के लिए निर्भर रहना छोड़ देंगे उस दिन हम भी शहर वालों की तरह अकेले- अकेले हो जाएंगे।

इस कोठी की भी अजीब कहानी है। कई सालों तक इस कोठी में कोई न बसा। बस पैसे वाले खरीदते और आने से पहले उसे दूसरे पैसे वालों के हाथों बेचते। पर शुक्र खुदा का, अबके कोठी बस गई।

कोठी में वे बसने आए तो हम मुहल्‍ले वालों को अच्‍छा लगा कि चलो कोई कोठी वाला हमारे मुहल्‍ले में भी है। अब हम भी अपने मुहल्‍ले का पता देते वक्‍त कोठी का ही पता दिया करेंगे 

कोठी वालों ने आते ही सबसे पहला काम ये किया कि अपनी कोठी के चारों ओर ऊंची- ऊंची दीवारें लगा दीं। फिर कोठी वाले तो दूर, हमारी नजरों से कोठी भी दूर हो गई। कई बार तो बड़ा मन करता यह जानने का कि आखिर कोठी वाले होते कैसे होंगे? क्‍या वे दो टांगों, दो कानों, दो आंखों वाले हमारी तरह के ही होते होंगे या फिर․․․․

अचानक कोठी वाले कहीं से बाहर का कुत्‍ता ले आए। कुत्‍ता भी ऐसा कि पैदा हुआ ही हमारे जवान कुत्‍तों जैसा! जरूर बाहर के देश का ही होगा! हमारे यहां का तो हर जीव बूढ़ा हो जाने के बाद भी बच्‍चों सा ही दिखता है। अंगूठा चूसता। तब पहली बार अपने और कोठी वालों के बीच की कुछ दूरी का पता चला।

उस सांझ मौका मिलते ही मैंने उनसे विनम्र निवेदन करते कहा ,‘ साहब! जिस तरह से हमारे देश के एमपी एक- एक गांव गोद ले रहे हैं , आप भी देश हित में मुहल्‍ले का कोई कुत्‍ता गोद ले लेते तो․․․ कम से कम हमारे मुहल्‍ले के एक कुत्‍ते का तो भविष्‍य सुधर-संवर जाता,' तो कोठी के मालिक ने मुझसे अधिक मेरी सोच पर गुस्‍से होते कहा,‘ हम तुम्‍हारे मुहल्‍ले में रहने आ गए इसे ही गनीमत समझो। वरना इस मुहल्‍ले को जानता ही कौन था? रही बात किसी मुहल्‍ले के कुत्‍ते को गोद लेने की, हम कोई एमपी वैम्‍पी तो हैं नहीं जो․․․ हमें कौन से चुनाव लड़ने हैं? हम तो चुनाव लड़ने वालों को आपस में लड़ाते हैं।' तब इतने बड़े आदमी के आगे मेरी और हिम्‍मत न हुई कि मैं कुछ और कह पाता।

कोठीवान कुत्‍ता था कि एक तो बाहर अपने नौकर के बिना घूमने आता ही नहीं था। कोठी वालों को नौकर की आदत तो समझ आ रही थी पर कुत्‍ता भी नौकर का आदी होगा, सोचा न था।

जब कोठी वाला कुत्‍ता चार दीवारी के भीतर अकेला बोर हो जाता तो रोने लगता। भौंकना तो उसे जैसे आता ही नहीं था। भौंकना तो उसे तब आता जो अपने समाज- बिरादरी के बीच उठता बैठता। जब वह भौंकने के बदले रोता तो हमारे मुहल्‍ले के दूसरे कुत्‍ते कोठी की चारदीवारी के पास खड़े हो दुख से उसकी हालत पर आंसू बहाते। पर उनकी विवशता यह थी कि वे आंसू बहाने के सिवाय और कुछ कर भी नहीं सकते थे। हमारे मुहल्‍ले के अपनी बिरादरी के कुत्‍तों की आंखें उसे देखने के लिए तरस जातीं। पर उसकी अकड़ कि वह जब मार्निंग वॉक पर अपने नौकर के साथ होता तो हमारे मुहल्‍ले के कुत्‍तों की ओर देखना तो छोडि़ए, हमारी ओर भी न देखता। तब लगता कि चाहे लाख कोशिश कर लो, इस देश में सबकुछ आ सकता है पर समाजवाद सतिजुग में भी नहीं आ सकता। आदमी की तो छोडि़ए, कुत्‍तों में भी छोटे -बड़े का फर्क तो यहां हर युग में रहेगा ही।

एक रोज उस कोठी वाले कुत्‍ते की दयनीय हालत देख मेरे मुहल्‍ले के एक समझदार कुत्‍ते ने मुझसे आग्रह किया,‘ मित्र! आपसे एक प्रार्थना है !'

कहो दोस्‍त। बंदा तुम्‍हारे किस काम आ सकता है?'

तुम इस कोठी के कुत्‍ते को बंदीगृह से बाहर नहीं निकाल सकते क्‍या??'

क्‍यों, इसके ठाठ से जलन हो रही है? इस हाई सोसाइटी कुत्‍ते को क्‍या तुम लोग अपनी तरह का सड़क छाप बनाना चाहते हो? अरे, शर्म करो शर्म! खुद ऊपर नहीं उठ सकते तो कम से कम दूसरों को तो अपनी लेबल पर मत लाओ!' मैंने कुत्‍ते को फटकारा तो उसने सानुनय कहा,‘ नहीं मित्र! किसी को नीचे लाने की बात नहीं। हम तो चाहते हैं कि हर कुत्‍ता हाई सोसाइटी का ही हो। आदमियों की तरह हममें ईर्ष्‍या भाव नहीं होता। हम आपसे में लड़ते जरूर हैं पर रहते इकट्‌ठे ही हैं। असल में हम इस कुत्‍ते को अपने रस्‍मों रिवाज सीखाना चाहते हैं, हम इसे इसकी संस्‍कृति से जोड़ना चाहते हैं । हम नहीं चाहते कि आदमी की तरह ये कुत्‍ता भी अपनी जड़ों से कट न घर का रहे न घाट का।'

तो??'

इसे किसी तरह बाहर निकाल सकते हो तो हम मुहल्‍ले के समस्‍त कुत्‍ते आपके जिंदगी भर शुक्रगुजार रहेंगे। हम इसे इसकी संसकृति से जोड़ना चाहते हैं बस। उस संस्‍कृति से जिस संस्‍कृति को यह कोठी में रहकर भूल गया है । हम उसे रोना नहीं, भौंकना सीखाना चाहते हैं। हम इसे यह बताना चहते हैं कि भौंकने और रोने में फर्क होता है। अगर तुम इसे इसके समाज से जोड़ने में हमारी सहायता कर दो तो हम तुम्‍हारा यह अहसान जिंदगी भर नहीं भूलेंगे।'

मैं कोशिश करूंगा!' मैंने कहा और आगे जाने को हुआ तो कुत्‍ता बोला,‘ सर! कोशिश मन से करना। नेताओं वाली कोशिश नहीं!'

और एक दिन मैंने देखा कि वह कोठी वाला कुत्‍ता बिलकुल अकेला मेरे घर के सामने खड़ा चार दिन की बासी पड़ी रोटी जिसे मुहल्‍ले के कुत्‍ते तक खाने से छोड़ आगे हो लिए थे को बड़े शौक से खा रहा है। उसे शान से वह रोटी खाते देखा तो चक्‍कर आ गया। हद है यार! जिस रोटी को मुहल्‍ले तक के कुत्‍तों ने नकार दिया उसी रोटी को ये कोठी का कुत्‍ता! आखिर रहा न गया तो मैंने कोठी वाले कुत्‍ते से अपनी जिज्ञासा को शांत करने हेतु पूछा,‘ ये क्‍या हो रहा हे मेरे भाई?'

देखते नहीं, छप्‍पन भोग का परमानंद ले रहा हूं ,' कह चटकारे लेता वह उसी तरह उस बासी रोटी को खाता रहा मानों उसे सच को ही छप्‍पन भोग सोने की थाली में परोसे गए हों।

पर यार! इस रोटी को तो मुहल्‍ले के कुत्‍तों तक․․․․․'

यही तो पूंजीवाद और समाजवाद में बेसिक अंतर है। समाजवाद जिसे बेकार समझते हैं वह पूंजीवादियों के लिए अमृत होता है अमृत।'

पर․․․'

अब क्‍या!'

मुहल्‍ले के कुत्‍ते कह रहे थे कि तुम․․․․ भौंकने की जगह रोते हो। बीच- बीच में कोठी से निकल उनसे मिल लिया करो तो कम से अपनी जमीन से तो जुड़े रहोगे!'

देखो। मैं ठहरा कोठीवादी कुत्‍ता! गलीवादियों से मुझे क्‍या लेना देना․․․․ मेरे भौंकने के बदले रोने से जब पूंजीवादियों को ही शिकायत नहीं तो तुम्‍हें क्‍यों है?' जितने को मैं किसी मुहल्‍ले के समझदार कुत्‍ते कुत्ते  को उसे समझाने के लिए बुलाता वह सारी बासी रोटी के साथ- साथ उस जमीन की मिट्‌टी को जिस पर वह बासी रोटी पड़ी थी चाट, पूरी कोठी के मालिकाना हक के साथ कोठी के भीतर हो लिया।

 

 

अशोक गौतम,

गौतम निवास, अप्‍पर सेरी रोड, सोलन-173212 हिप्र

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