मंगलवार, 18 नवंबर 2014

प्रमोद यादव की लघुकथाएँ

लघु कथाएं / प्रमोद यादव

( एक )

एक दिन कछुवा तालाब के किनारे चहलकदमी कर रहा था कि अचानक सामने खरगोश आ खड़ा हुआ और बोला- ‘ चलो..हो जाए रेस..और शर्त लगा लो..अब की बार मैं ही जीतूँगा..’

‘ नहीं यार...’ कछुवे ने कहा- ‘ दादे-परदादे जो रेकार्ड बना गए, उसे छेड़ना मैं उचित नहीं समझता..और वैसे भी आज मेरा मूड नहीं....पर हाँ...वो देखो..सामने हिरण का बच्चा कुलांचे भर रहा है..चाहो तो उससे शर्त लगा लो..मैं अभी बुलाये देता हूँ..’

सुनना भर था कि खरगोश नौ दो ग्यारह हो गया.

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( दो )

मगरमच्छ की पत्नी रोज-रोज बन्दर के दिए हुए मीठे-मीठे जामुन खाते एक दिन पति से बोली- ‘ जब उसके जामुन इतने मीठे हैं तो न मालूम उसका कलेजा कितना मीठा होगा..मेरे प्यारे पतिदेव ..मुझे तो बन्दर का कलेजा खाने को मन कर रहा है..आप कल उसे यहाँ ले आईये न..’

‘ कैसी बातें करती हो जी ...बन्दर मेरा इकलौता दोस्त है...जिगरी दोस्त...माना कि उसका कलेजा बेहद मीठा होगा पर दोस्त के साथ मैं विश्वासघात नहीं कर सकता...वह नित्य ही हमें मीठे-मीठे फल देता है और हम उसे इसका ये फल दें ?...उसे मार डालें..नहीं...ये कदापि नहीं होगा..’ मगरमच्छ ने दो टूक बात कह दी.

‘ अरे..कैसी बातें करते हैं आप..मैं आपकी पत्नी हूँ..क्या अपनी पत्नी की इतनी सी इच्छा भी पूरी नहीं कर सकते ? ‘

‘ मैं तुम्हारी सारी इच्छाएं पूरी कर सकता हूँ..सिवा इस एक इच्छा के..’ मगरमच्छ ने जवाब दिया.

‘ तो इसका मतलब ये है कि आप मुझे बन्दर का कलेजा नहीं खिलाएंगे..’

‘ हाँ..बिलकुल नहीं....ये मुझसे नहीं होगा..मैं अपने दोस्त के साथ गद्दारी नहीं कर सकता..’ मगरमच्छ ने फैसला सुनाते कहा.

‘ तो ठीक है...बताईये...आपको पत्नी चाहिए या दोस्त ?..आपको आज दोनों में से एक को चुनना होगा..’ उसकी पत्नी ने गरजते हुए कहा.

‘ ठीक है..अगर ऐसी बात है तो मैं दोस्त को ही चुनूँगा..पत्नी तो एक ढूंढो कई मिल जायेगी.... अच्छे दोस्त किस्मत से मिलते हैं.. गुड-बाय..जा रहा हूँ अपने दोस्त के पास....मीठा कलेजा तो दूर की बात....अब तुम्हें कभी मीठा जामुन भी नसीब नहीं होगा..’

इतना कह मगरमच्छ नदी में तैर गया.

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( तीन )

जैसे ही कौआ रोटी चोँच में दबाये पेड़ पर खाने बैठा, नीचे एक भूखा धूर्त कुत्ता “ भौं-भौं” करते कौवे से कहने लगा-‘ कौआ भैया..बहुत दिनों से तुमसे कोई गाना नहीं सुना...कितना मीठा गाते हो तुम..आज बड़ा मन कर रहा है सुनने को....कुछ सुनाओ न..’

कौवे ने चोँच में दबी रोटी को पंजे के नीचे दबाया फिर बोला- ‘ सदियों से यही झूठी तारीफ़ करते तुम लोग हमें उल्लू बनाते रहे..पर अब यह सब नहीं चलेगा..ज़माना बदल गया है कुत्ते ...जाओ मेरा वक्त बर्बाद मत करो ...जाकर कहीं हड्डी ढूंढो..’

फिर मन ही मन वह बुदबुदाया- ‘ कहाँ-कहाँ से आ जाते हैं डिस्टर्ब करने...चैन से लंच भी नहीं करने देते..’

और कौआ फिर से पंजे में दबी रोटी को चोंच में दबा दूसरे पेड़ की ओर उड़ गया...कुत्ता मुंह लटकाए देखते रहा.

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प्रमोद यादव

गया नगर , दुर्ग , छत्तीसगढ़

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