ओमप्रकाश शर्मा का आलेख - राजभाषा हिन्दी में अहिन्दी भाषियों का योग दान

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राजभाषा हिन्दी व अहिन्दी भाषियों का योग दान हिन्दी एक विकासशील भाषा है। संविधान का सत्रहवां भाग हिन्दी को संघ की राजभाषा को प्रतिष्ठापित करन...

राजभाषा हिन्दी व अहिन्दी भाषियों का योग दान

हिन्दी एक विकासशील भाषा है। संविधान का सत्रहवां भाग हिन्दी को संघ की राजभाषा को प्रतिष्ठापित करने के लिए पारित किया गया लेकिन आज आज़ाद भारत के सातवें दशक के उत्तरार्ध में प्रवेश करने के बाद भी यह अंग्रेजी के साथ निरंतर प्रतिस्पर्धा करते हुए विकास के पथ पर तो अग्रसर है लेकिन इसे वह सम्मान आज भी दिला पाने में असमर्थ हैं जिसकी यह अधिकारी है। हम इसे पूरे देश की भाषा बनाने के लिए बहुत प्रयास करना होगा। इसे सही अर्थों में राष्ट्र भाषा तभी कहा जा सकता है जब भारत के सभी राज्यों के लोग इसे बहुमत से स्वीकार कर्ण और प्रयोग में लाएँ।

प्राय: हिन्दी को सामानजनक स्थान न मिलने के लिए अहिन्दी भाषी क्षेत्र के लोगो को को उत्तरदायी ठहराया जाता है तथा कई लोग आज यह आरोप भी लगाते हैं कि हिन्दी को उन पर बरबस थोपा जा रहा है लेकिन वे इस बात को भूल जाते है कि हिन्दी को संघ की भाषा बनाने का आन्दोलन हिन्दी-भाषियों ने नहीं अपितु अहिन्दी भाषी तीन प्रतिनिधियों डॉ० श्याम प्रसाद मुखर्जी, श्री गोपाल प्रसाद आयंगर तथा श्री कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी द्वारा प्रारम्भ किया गया था। इन लोगों की यह उत्कट अभिलाषा थी कि एकता के विचार से एक राष्ट्रीय भाषा माध्यम का विस्तार करके उसे नई दिशा दी जाए। कई स्तरों पर इनके द्वारा तैयार फार्मूले का पंगु कह कर विरोध किया गया तथापि संविधान सभा ने अन्तत: उसे स्वीकार कर लिया। श्री कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी जी का रविवार २३कक्तूबर ,१९४९ को साप्ताहिक हिन्दुस्तान टाइम्स में “भाषा सम्बन्धी विवाद की वास्तविकता’ नामक लेख प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने लिखा था-

हम में से कुछ लोगों ने दो मास तक राष्ट्र भाषा के बारे में एक फार्मूला तैयार करने का अनथक प्रयास किया जिस पर संविधान सभा के सभी पक्ष सहमत हो सके।

दो वर्ष पहले मेरे अनुरोध पर कांग्रेस पार्टी ने एक प्रस्ताव पास किया जिसमें हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि को भारतीय भाषा और भारतीय भाषा लिपि के रूप में स्वीकार किया गया था। उस समय खूब गर्मागर्मी हुई थी ,पंडित नेहरू बहुत नाराज हुए; कांग्रेस पार्टी में बहुत से छोटे-छोटे धड़े इस पर असंतुष्ट थे तब यह बात संविधानसभा तक पहुँचकर ठंडी हो गई।

पिछली जुलाई में हम में से कुछ लोगों ने मिलकर एक संशोधन तैयार किया जिसके अनुसार हिन्दी तथा देवनागरी को भारत की सरकारी भाषा तथा लिपि तथा अंगरेजी को 10 वर्षों के लिए अतिरिक्त सरकारी भाषा घोषित किया गया। इसा संशोधन को जिसे हिन्दी के हितैषियो की सर्वाधिक सहमति प्राप्त थी संविधानसभा के ८० सदस्यों का समर्थन प्राप्त हुआ।”

मुंशीजी के इस कथन से या स्पष्ट प्रतिध्वनित होता है कि संविधान निर्माण के समय अहिन्दी भाषी प्रतिनिधियों का समर्थन हिन्दी के पक्ष में था लेकिन अधिकाँश हिन्दी भाषी ही उसे तत्काल लागू करने के पक्ष में नहीं थे।

हिन्दी के विरोध में उस समय तीन धड़े बन गए थे- पहला छोटा सा धडा तो सरकारी भाषा बनाने के पक्ष में ही नहीं था, दूसरा बहुत ही शक्तिशाली और छोटा धड़ा हिन्दुस्ताने की मांग कर रहा था तीसरा दक्षिण भारतीयों का जोरदार धडा था जो अंगरेजी भाषा को पन्द्रह वर्ष के लिए सरकारी भाषा रहने दिया जाए तथा हिन्दी के प्रश्न को खटाई में डाल दिया जाए। यह बड़ा धडा जो किसी भी भाषा का संविधान में उल्लेख नहीं चाहता था ने शीघ्र ही अपनी धारणा को बदल दिया लेकिन हिन्दुस्तानी के समर्थकों ने आसानी से अपना पक्ष छोड़ना नहीं चाहा लेकिन अंत में वे लोग नी हिन्दी के पक्ष में सहमत हो गए। कुछ एक ऐसे लोगों जो देवनागरी में हिन्दुस्तानी के पक्षपाती थे अपना दृष्टिकोण बदलना पड़ा। उसके बाद अंग्रेजी के पक्षधर सदस्य ही हिन्दी का विरोध करने वाले रह गए थे।

प्रारूप समिति ,परामर्श समिति , विशिष्ट राजभाषा समिति तथा गैर सरकारी सम्मेलनों में इस सम्बन्ध में विवाद उठ खडा हुआ उत्तेजना हुई ,बुद्धिजीवियों में बहस और तू तू मैं मैं भी हुई और कुछ सदस्य

वाक् आउट भी कर गए। दक्षिणी भारत ने सिद्धांत रूप में हिन्दी व देवनागरी को राजभाषा मान तो लिया लेकिन व्यवहार में वे अंग्रेजी को ही चाहते थे। उनका मत था कि अंग्रेज़ी के स्थान पर तभी किसी दूसरी भाषा को लाया जाए जब संसद का दो तिहाई बहुमत उसके पक्ष में हो। धीरे धीरे यह विरोध कम हुआ तथा अंगरेजी को प्रगतिशील ढंग से विशेषज्ञ आयोग व संसद समिति की समवर्ती सिफारिशों से उत्तरोतर बदल देना निश्चित हुआ।

भाषा विवाद के अंतर्गत अगला विवाद संख्यावाचक अंकों का था। उत्तरी भारत में उस समय अंतर्राष्ट्रीय अंकों को अरबी संख्यावाचक शब्दों के रूप में मानते थे लेकिन उन्होंने उस समय प्रथम बार अनुभव किया की वे मूल रूप में जैसे दक्षिणी भारत में अपनाए जाते थे भारतीय हैं। दक्षिण भारत के लोग संस्कृत में इन्हीं अंकों का प्रयोग करते थे और उन्होंने कभी किसी अन्य अंकों का प्रयोग नहीं किया|

आज हम दक्षिण भारतीयों के रवैये को देश के प्रति असद् भावना पूर्ण मानते है लेकिन उन्हें यह दोष बिल्कुल निर्मूल है। दक्षिण के लोग उतने ही देशभक्त है जितने की अन्य भारतीय| यदि वास्तव में देखा जाए तो वे अधिक देशभक्त रहे क्योंकि व्याकरण संरचना मुहावरों आदि के मामले में हिन्दी दक्षिणी भारत के लोगों के लिए एक अजनबी भाषा है उनकी भाषाओं और उत्तरी भारत की भाषाओं में एक मात्र समानता है उनकी हिन्दी शब्दावली है।

मात्र शुद्ध हिन्दी के उद्देश्य से देवनागरी अंकों के प्रयोग के लिए हिन्दी के लिए दबाव डालना उचित नहीं था इसलिए संख्यावाचक अंकों के लिए अंतर्राष्ट्रीय अंकों को स्वीकार किया गया| अधिकाँश शिष्ट दक्षिण भारतीय आर्य संस्कृति पर उतना ही गर्व करते हैं जितने अन्य भारतीय। जीवन तथा कला के क्षेत्र में वे उत्तरी भारतीयों की अपेक्षा सहज हिन्दू हैं क्योंकि वे मध्य एशिया से समय समय पर आए लोगों के प्रभाव से मुक्त रहे और वे लोग संख्या वाचक अंकों को सदियों से संस्कृत में लिखते आए थे| उस समय दक्षिण के लोगो ने नागरी को देश की एकता के उद्देश्य से स्वीकार कर बहुत उपकार किया है।

वास्तव में देवनागरी के भक्तों ने किसी प्रकार का त्याग नहीं किया| श्री “कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी’ उत्तरी भारतीय ले प्रतिनिधि थे जिन्होंने दक्षिण भारत की ओर से संख्यावाचक अंको में किए जा रहे प्रयासों का समर्थन किया| पहले पंडित नेहरू भी हैरान हुए कि कोइ देवनागरी अंकों में किसी अन्य अंकों के बारे में विचार भी कर सकता है लेकिन बाद में जब उन्हें ज्ञात हुआ कि कि अंतर्राष्ट्रीय संख्यावाचक अंक भारतीय हैं और शून्य की खोज भी भारतीय विद्वान ने ही की है तो उन्होंने बड़े उत्साहपूर्वक अंतर्राष्ट्रीय अंकों को मानना स्वीकार कर लिया|

ऐसी परिस्थितियों में के बीच में यह फार्मूला जिसे “मुंशी आयंगर फार्मूले के नाम से जाना जाता तैयार किया गया| मुंशी जी ने जिस समय अंतर्राष्ट्रीय अंकों का  पक्ष लिया तो हिन्दी भाषी उनके बहुत मित्र उनसे असंतुष्ट हो गए क्योंकि उनका मानना था कि वे हिन्दी के स्टार को नीचे गिराना चाहते हैं | उनहोंने उन्हें समझाया कि वे भी हिंदीभाषी उनकी मातृभाषा नहीं हैं और उन्होंने उसे तब से अड़तालीस वर्ष पूर्व स्वामी दयानंद जी प्रेरणा पा कर अपनाया था | क्योंकि उनहोंने पाया था कि वह राष्ट्रीय एकता का एक सर्व श्रेष्ठ हथियार है|

मुंशी जी की मातृभाषा भले ही हिन्दी नहीं थी और न ही वे हिन्दी को अभिव्यंजना और साहित्यिक भंडार की दृष्टि से बंगाली, गुजराती, मराठी से श्रेष्ठ समझाते थे| उन्होंने इसे राष्ट्रीय एकता के रूप में स्वीकार किया था इसलिए अंतर्राष्ट्रीय संख्या वाचक अंकों को स्वीकार करने में उनको कोई हिचकचाहट नहीं हुई जब वैसा करने पर पूरे देश को हिन्दी को स्वीकार करने के लिए तैयार किया जा सकता था| दक्षिणी भारतीयों पर उनकी इच्छा के विरुद्ध राष्ट्र भाषा को नही थोपा जा सकता था; अगर उनके संख्यावाचक अंकों को स्वीकार कर लिया जाए तो वे सहर्ष स्वीकार कर लेंगे ऐसा मुंशी जी का विचार था|

हिन्दी को इसके कई गुणों के आधार पर स्वीकार किया गया है| सर्वप्रथम यह देश के सबसे बड़ी समूह में बोली जाती थी| इसकी अधिकतर रूप रचना और शब्दावली संस्कृत भाषा और उसके परिवार की दूसरी आर्यभाषाओं से ली गई है और इसका वर्तमान रूप संस्कृत की सहायता से तैयार किया गया है| यदि गुजराती ,मराठी बंगाली तथा उडिया की तरह हिन्दी का उद्गम भी संस्कृत की तरह न होता तो यह हमारे लिए एक विदेशी भाषा के सामान ही होती और यदि इसका विकास संस्कृत के भंडार के आधार पर न किया जाता तो इसका कोइ आधार न होता|

कुछ लोगों का मानना है कि संस्कृत के कारण हिन्दी का दृष्टिकोण बड़ा संकुचित और साम्प्रदायिक है वे लोग हमारी भाषाओं के संस्कृत से सम्बन्ध के बार में बहुत कम सोचते हैं। प्रागैतिहासिक काल से भारत की सभी भाषाएँ जिसमें हैदराबाद की उर्दू विजातीय होने के नाते नहीं आती संस्कृत भाषा से सम्पन्नता ,गौरव और प्रवाह को प्राप्त करती आईं है। काल प्रवाह के साथ साथ इसे अन्य बोलियों से सामर्थ्य और बल प्राप्त होता रहा है जैसा कि सभी जीवन्त भाषाओं को होता है

आज भी हम भूल जाते हैं और आयंगर फार्मूले को दासवृति पूर्ण रवैये का परिणाम मानते है लेकिन उस समय हम भूल जाते हैं कि स्वतंत्रता के समय सम्पूर्ण संवैधानिक तथा कानूनी विचार धाराओं का आधार अंग्रेजी शब्दावली थी तथा भारतीय विद्वान अंगरेजी विद्वानों से गहरे सम्बन्ध बना कर तथा अंगरेजी माध्यम में अपने विचार प्रकट करके ऊंचा सम्बन्ध बना पाए थे तथा तत्कालीन भारतीय समाज में अंग्रेजी भाषा के निकट संपर्क से यथार्थता और भावाभिव्यक्ति का विकास हो सकता था| यदि उस समय विश्वविद्यालयों , उच्च न्यायालयों तथा विधानमंडल के कार्यों में हिन्दी के प्रयोग में जल्द बाजी की जाती तो देश के बौद्धिक स्तर नीचे गिरने की सम्भावना थी। इसीलिए चार्टर को संविधानसभा द्वारा लगभग एकमत से स्वीकार कर लिया गया| भाषाई तथा सांस्कृतिक एकता के आधार पर राष्ट्रीय एकता और उसका समाधान ,मुंशी-आयंगर फार्मूला ही था।

नाम

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रचनाकार: ओमप्रकाश शर्मा का आलेख - राजभाषा हिन्दी में अहिन्दी भाषियों का योग दान
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