सोमवार, 24 नवंबर 2014

अनिल कुमार पारा का आलेख - आखिर कब तक रहेगी सभ्य समाज की खामोशी ?

आखिर कब तक रहेगी सभ्य समाज की खामोशी ?

भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार , भ्रष्टाचार क्या देश की जनता के सामने यह नया शब्द है, जी नहीं भ्रष्टाचार तो प्राचीन काल से ही भारत की जड़़ों को जकड़े बैठा है।  विद्वानों ने भ्रष्टाचार शब्द का अर्थ बताते हुए कहा है कि किसी के प्रति अपनाया गया भ्रष्ट आचरण ही भ्रष्टाचार है तो फिर हम ये क्यों भूल गये हैं कि जिस तरह से आज देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कई राजनीतिक दलों ने और सामाजिक संगठनों से जंग छेड़ दी है । उसी प्रकार से अब समय आ गया है कि जातिवाद, ऊंच-नीच, भेदभाव, के खिलाफ भी हम सबको एकजुट हो जाना चाहिए । क्यों कि देश में दर्ज भ्रष्टाचार के आंकडों से कई गुना ज्यादा अपराध जातिवाद, ऊंच-नीच, भेदभाव से जुडी घटनाओं के दर्ज हुए हैं।

बहरहाल एक तरफ हीरो बनने की चाह में भ्रष्टाचार शब्द को अपनी जबान की चमक बनाने बाले ईमानदार राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन के विषय में जनता जानती है कि आज भ्रष्टाचार शब्द को अपनी जबान की चमक बनाने वाले लोगों में उन लोगों का चेहरा भी छुपा हुआ है, जिनको भले ही भ्रष्टाचार करने का मौका नहीं मिला हो पर उनके मन में आज भी वह ललक दफन है।

सवाल यह भी है कि क्या भ्रष्टाचार पैसे के लेनदेन को ही कहते हैं? या फिर किसी के प्रति अपनाया गया भ्रष्ट आचरण भी भ्रष्टाचार है? अर्थात क्या जातिवाद को भ्रष्टाचार नहीं कहेंगे? ऊंच-नीच का फर्क पैदा करने वाले इंसानों की गिनती भ्रष्टाचार करने वालों में नहीं है? जो समाज और धर्म के बीच अपनी हँसी के ठहाकों के रास्ते भेदभाव की दीवार बना देते हैं। यह भ्रष्टाचार नहीं है क्या, यह भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में नहीं आता ? यदि देश और सभ्य समाज के जिम्मेदार लोगों की नजरों में जातिवाद, ऊंच-नीच, भेदभाव भी भ्रष्ट आचरण की श्रेणी है, तो क्यों हम अपनी जिम्मेवारी से जी चुरा रहे हैं। क्या भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने वाले राजनीतिक दल या सामाजिक संगठन जातिवाद, ऊंच-नीच भेदभाव को समाप्त करने आगे क्यों नहीं आ रहे हैं? यह सभ्य समाज के समझ के परे है।

पिछले दिनों देश में भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करने के भाषण देने में देश के राजनीतिक दल एक-दूसरे से पीछे नहीं रहे। देश की जनता के सामने देश से भ्रष्टाचार जड़ से समाप्त करने वाले नारे सुखदायी जरूर हैं। और स्वागत योग्य भी हैं। किन्तु चिन्ता इस बात की भी है कि जिस तरह से देश में भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करने की मुहिम छिड़ी है, क्या उसी प्रकार देश से जातिवाद, ऊंच-नीच, भेदभाव करने जैसे भ्रष्ट आचरण को समाप्त करने की मुहिम छेडेंगें? या फिर अखबार में निकली ‘‘मंदिर में दलितों के प्रवेश पर पाबंदी‘‘ ‘‘दबंगों ने घर में घुसकर दलित परिवार को पीटा‘‘ ‘‘दहशत में दलितों ने छोड़ा गांव‘‘ ‘‘दबंगों ने दलित दूल्हे को जबरन घोड़ी से उतारा‘‘ दबंगों ने फिर ढाया दलितों पर कहर‘‘  जैसी इन सुर्खियों से राजनीतिक दल जानबूझकर भी अनजान है।  दोस्तों जिस प्रकार से देश में भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करने की मुहिम छिड़ी है, उसी प्रकार से देश में भ्रष्ट आचरण अर्थात जातिवाद, ऊंच-नीच, भेदभाव को जड़ से समाप्त करने की मुहिम छेड़ने का अब समय आ गया है।  2 अक्तूबर से स्वच्छ भारत मिशन की नींव लगाने वाले वो राजनेता निश्‍चित रूप से स्वच्छ भारत के निर्माण के लिए बधाई के पात्र हैं पर क्या मात्र झाडू लगाने से यह देश स्वच्छ होगा? जिसकी जड़ों में जातिवाद, ऊंच-नीच, भेदभाव, जैसे अमूल मंत्रों ने घर कर लिए हैं।

स्वच्छ भारत का सपना तभी साकार होगा जब देश से जातिवाद, ऊंच-नीच, भेदभाव, पूरी तरह से समाप्त होगा। दोस्तों जब-जब इस भारत देश में जातिवाद, ऊंच-नीच, भेदभाव, जैसी घिनौनी हरकतें सामने आई तब-तब विद्वानों ने कहा कि मानव जीवन से अच्छा तो जानवर का जीवन है जो कम-से-कम एक दूसरे में फर्क तो नहीं समझता। आज के भारत ने मंगल मिशन पर अपना झण्डा भले ही गाड़ दिया हो और ऊंचाई के उस शिखर तक जरूर पहुंच गये हों पर जातिवाद, ऊंच-नीच, भेदभाव, की खाई तक पहुंचने में शायद अभी वक्त लग सकता है। और उस खाई को पाटना भी सभ्य समाज के लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी दिख रहा है। क्यों कि जातिवाद, ऊंच-नीच, भेदभाव की उस तस्वीर को देखते ही सभ्य समाज की सांसें थम जाती हैं। उस तक पहुंचना तो दूर की बात है।

जातिवाद, ऊंच-नीच, भेदभाव, से जुड़ी उन रोंगटे खडे कर देने वाली वारदातों को रोकने के लिये भले ही सरकार ने कडे कानून बनाये हैं पर इनके अमल होने के रास्ते उन दबंगों की घर की चौखट को सलामी देते हुए निकलते हैं जहां कानून के हाथ उनके सामने बौने नजर आते हैं। क्या सभ्य समाज इन घटनाओं से अनजान है? या फिर जानबूझकर अपनी आँखें बंद किये हुए है? तमाम तरह के सवाल अपने आप जन्म लेते हैं। जिनके जवाब देने की जिम्मेदारी मूल रूप से समाज के उन कर्णधारों की बनती है जो अखबार की उन सनसनीखेज खबरों को पढ़कर भी अपनी आँखें मूंद लेते है।

 

अनिल कुमार पारा,

तहसील  रामनगर जिला सतना

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